ब्लॉग

Historical evidence related to the existence of Yakshas and Yakshinis in India

भारत में यक्ष-यक्षिणियों के अस्तित्व से जुड़े ऐतिहासिक प्रमाण

कौन होते हैं यक्ष-यक्षिणी

ऋग्वेद तथा पौराणिक ग्रन्थों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा सिख धर्म के पवित्र ग्रन्थों में भी यक्ष-यक्षिणियों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त पूर्वोत्तर भारत, केरल तथा कश्मीर की लोककथाओं में यक्ष-यक्षणियों का वर्णन किया गया है। भारत के सदियों पुराने उपवनों से जुड़े कई असाधारण प्राणियों में से एक हैं यक्ष और यक्षिणी जो कि देवों, असुरों, गन्धर्वों तथा अप्सराओं से भिन्न माने जाते हैं।

यक्ष-यक्षिणियों को अधिकांश लोग भूत-प्रेत की यो​नि का मानते है लेकिन यह बिल्कुल सत्य नहीं है। दरअसल यक्ष-यक्षिणी की एक अलग जाति है जो अप्सराओं से मिलती जुलती है परन्तु अप्सरा और यक्षिणी दोनों अलग-अलग हैं। हां इतना अवश्य है कि यक्षिणियां भी अप्सराओं की तरह कामुक, अत्यंत खूबसूरत तथा आकर्षक शरीर वाली होती हैं जिनके पास असीम शक्तियां होती हैं। पौराणिक ग्रन्थों में 36 प्रकार की यक्षिणियों का उल्लेख किया गया है जिनमें 8 सबसे प्रमुख हैं जिन्हें अष्ट यक्षिणी कहा गया है। यक्ष-यक्षिणियां मनुष्यों को वरदान अथवा श्राप देने में सक्षम होती हैं।

ऐसी मान्यता है कि इस सृष्टि में कई लोक है तथा इन लोकों की दूरी भी अलग-अलग है। जिनके स्वामी अपने-अपने लोकों में निवास करते हैं। देवताओं से इतर भूत-प्रेत, पिशाच मनुष्यों के आस-पास ही रहते हैं जो थोड़े से प्रयास से ही सिद्ध होते हैं। क्षेत्रपाल तथा भैरव भी हमारे नजदीकी वातावरण में निवास करते हैं। पितरों का भी एक लोक है।

कहते हैं कि यक्ष-यक्षिणियों का निवास पृथ्वी के बिल्कुल नजदीक के लोकों में ही होता है, ऐसे में वे पृथ्वी के जल-वन, उपवन आदि सम्पदाओं की रक्षा करते हैं। वैसे आमतौर पर यक्षणियों का निवास स्थान अशोक वृक्ष माना जाता है। अशोक के वृक्षों के अतिरिक्त यक्षिणियां जलाशयों, पर्वतों, वनों आदि में कहीं भी रह सकती हैं। ऐसा माना जाता है कि ये मनुष्यों से दूर रहती हैं क्योंकि इन्हें एकांत बहुत प्रिय होता है।

यक्ष-यक्षिणियों को साधारणतया विनम्र, दयालु तथा सौम्य स्वभाव का बताया गया है जोकि मनुष्यों की मदद करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यक्ष-यक्षिणियां अपने साधक को संतान सुख, धन, बल, ऐश्वर्य, कामबल प्रदान करती हैं तथा प्राण संकट से भी रक्षा करती हैं। कई ग्रन्थों में बुरी यक्षिणियों का भी उल्लेख मिलता है जो काफी भयानक होती हैं तथा मनुष्यों का अहित करती हैं।

इसे भी पढ़ें : काशी विश्वनाथ मंदिर का आखिर कितनी बार हुआ पुनर्निर्माणपढ़ें रोचक इतिहास

यक्ष-यक्षिणियों की उत्पत्ति

परमपिता ब्रह्माजी ने जल की उत्पत्ति के पश्चात उसकी रक्षा के लिए जिन प्राणियों का निर्माण किया वे जल का यक्षण करने के कारण यक्ष तथा यक्षिणी कहलाए। हांलाकि पौराणिक ग्रन्थों में धन के स्वामी कुबेर को यक्षों का राजा अथवा दिग्पाल कहा गया है। ऐसे में सभी यक्ष-यक्षिणियों को कुबेर के अनुचर तथा द्वारपाल एवं भगवान भोलेनाथ की सेवक-सेविकाओं के रूप में चित्रित किया जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार, माता सती की मृत्यु के पश्चात भगवान शिव अत्यंत गहरी समाधि में चले गए। कालान्तर में आदि शक्ति ने देवी पार्वती के रूप में जन्म लिया। युवावस्था में देवी पार्वती भगवान भोलेनाथ को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप करने लगी। देवराज इन्द्र के कहने पर कामदेव ने ​देवी पार्वती पर एक बाण चलाया ताकि उनकी कामेच्छा बढ़ जाएगी और वह भगवान शिव को पाने के लिए और अधिक प्रयास करेंगी। ऐसे में जब कामदेव ने देवी पार्वती पर कामेच्छा बाण चलाया तो काम की भावना के रूप में उनके माथे पर पसीना आने लगा। आदिशक्ति की उर्जा से परिपूर्ण उस पसीने को देवी पार्वती ने हाथ से पोछकर जमीन पर फेंका तो वह अनेक बूंदों में विभाजित हो गया। कहते हैं देवी पार्वती का पसीना जब जमीन पर गिरा तो उसी पसीने से यक्षिणियों का जन्म हुआ। माना जाता है कि इसी वजह से सभी यक्षिणियां देवाधिदेव महादेव तथा देवी पार्वती की सेवा में लगी रहती हैं।

36 प्रमुख यक्षिणियों के नाम

अत्यंत खूबसूरत, कामुक, आकर्षक शरीर वाली तथा अलौकिक शक्तियों की स्वामिनी यक्षिणियों का उल्लेख हिन्दू धर्म ग्रन्थों में किया गया है। वैसे तो यक्षिणियों की संख्या असंख्य है लेकिन इनमें 36 यक्षिणियों को ही मुख्य माना जाता है। इनमें भी आठ यक्षिणियां सबसे प्रमुख हैं जिन्हें अष्ट यक्षिणी कहा गया है। 36 यक्षिणियों में 12 सात्विक, 12 राजसी तथा 12 तामसिक प्रवृत्ति की होती है। इनके नाम इस प्रकार हैं- मनोहारी,सुर सुंदरी, कनकावती,कामेश्वरी,रतिप्रिया, पद्मिनी, नटी, अनुरागिनी, विचित्र, विभ्रमा, हंसी, भीषणी, जनरञ्जिनि, विशाल, मदना, घन्टाकर्णी, कालकर्णी, महाभया, माहेन्द्री, शंखिनी,श्मशाना, वट, मदनमेखला, चन्द्रि, विकला,स्वर्णरेखा, प्रमोदा, नखकोशिका, भामिनि, स्वर्णावती, धनदा, पुत्रदा, महालक्ष्मी, जया, भूतिनी, कर्णपिशाचनी।

उपरोक्त सभी यक्षिणियां अपने सार्मथ्यानुसार अपने साधक को क्रमश: ऐश्वर्य और धन-संपत्ति, मनोहारी रूप का मालिक, कामबल, बुद्धि-आत्मविश्वास, प्राण संकट से रक्षा, मनचाही वस्तु, गुप्त खजाने की प्राप्ति, दिव्य ​निधि, वशीकरण की शक्ति, असीम सिद्धियां, अदृश्य होने की शक्ति, दिव्य दृष्टि आदि प्रदान करती हैं।

इसे भी पढ़ें : 250 वर्षों तक दत्तक पुत्रों के सहारे चलता काशी का नारायण राजवंश, जानते हैं क्यों?

श्रीवाल्मीकि रामायण में यक्षिणी का उल्लेख

श्रीवाल्मीकि रामायण के 25वें सर्ग में महर्षि विश्वामित्र ताड़का की उत्पत्ति, विवाह और श्राप आदि का प्रसंग सुनाकर श्रीराम को ताड़का वध के लिए प्रेरित करते हैं। तब श्रीराम कहते हैं कि मुनिश्रेष्ठ! यह यक्षिणी एक हजार हाथियों का बल कैसे धारण कर सकती हैं? तब महर्षि विश्वामित्र कहते हैं कि हे रघुनन्दन, इस यक्षिणी को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, सुकेतु यक्ष की पुत्री थी ताड़का किन्तु ऋषि अगस्त्य श्राप के कारण वह अत्यंत कुरूप हो गई थी। ताड़का का विवाह सुंद नामक दैत्य से हुआ था। वह अपने दो पुत्रों सुबाहु और मारीच के साथ अयोध्या के समीप ही रहती थी। महर्षि विश्‍वामित्र के आदेश पर भगवान श्रीराम ने ताड़का का वध कर दिया था। एक प्रसंग में यह भी वर्णन मिलता है कि महर्षि विश्वामित्र ने नटी यक्षिणी को सिद्ध किया था। इस सिद्धि से साधक को प्रत्येक संकट से सुरक्षा मिलती है, चाहे वो देवता अथवा असुर ही क्यों न हो। नटी यक्षिणी अपने साधक की हर हाल में सुरक्षा करती है।

महाभारत के वन पर्व में यक्ष का उल्लेख

महाभारत के वन पर्व में यह कथा आती है कि पांडव अज्ञातवास के दौरान वन-वन भटक रहे थे। एक दिन सभी भाई एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे तभी उन्हें जोर की प्यास लगी। तब युधिष्ठिर ने नकुल से कहा कि वृक्ष पर चढ़कर देखो कि कहीं आसपास जलाशय है? नकुल को थोड़ी दूरी पर जलाशय का आभास हुआ। इसके बाद युधिष्ठिर ने कहा कि इन सभी तरकशों में जल भरकर ले आओ। नकुल जब उस जलाशय के समीप पहुंचे तथा पानी पीने के लिए जैसे ही उस सरोवर में उतरे तभी एक आवाज आई- ठहरो! यह जलाशय मेरे अधीन है, पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो फिर पानी पियो। लेकिन नुकल ने उस आवाज को अनसुनी कर पानी पी लिया और वहीं अचेत हो गए। नकुल को आने में देरी हुई तो सहदेव पहुंचे उनकी भी यही दशा हुई। फिर अर्जुन और उसके बाद भीम पहुंचे लेकिन यक्ष ने उनसे भी यही प्रश्न किया और उनकी भी यही दशा हुई।

इस प्रकार नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम उस जलाशय के पास अचेत अवस्था में पड़े हुए थे। अंत में युधिष्ठिर पहुंचे तो उनके सम्मुख भी भी वही आवाज आई कि पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो फिर जल ग्रहण करो। तब युधिष्ठिर ने पूछा हे जलस्वामी! आप कौन हो? तब उसने कहा कि मैं यक्ष हूं। इस प्रकार यक्ष ने युधिष्ठिर से कई प्रश्न पूछे और उन सभी प्रश्नों के उत्तर युधिष्ठिर ने दिए। आखिर में यक्ष ने युधिष्ठिर के शेष भाइयों को जिंदा कर दिया और वे सभी जल ग्रहण कर लौट गए। गौरतलब है कि इस संसार में अत्यंत दुष्कर प्रश्नों को यक्ष प्रश्न की संज्ञा दी जाती है।

इसे भी पढ़ें : काले जादू और टोने-टोटके पर खूब विश्वास करता था यह मुगल ​बादशाह

जैन धर्म में यक्ष-यक्षिणियों का उल्लेख

जैन धर्म में प्रमुख 25 यक्षिणियों का उल्लेख किया गया है। जिनमें पंचांगुली, चक्रेश्वरी, अंबिका और पद्मावती का नाम शामिल हैं। इन यक्षिणियों को अक्सर जैन मंदिरों में दर्शाया जाता है। जैन धर्म में 15वीं शताब्दी तक यक्षिणियों की पूजा जारी रही,  इनमें से प्रत्येक यक्षिणियों को चौबीस जैन तीर्थंकरों की संरक्षक देवी माना जाता है। जैन धर्मग्रन्थों में यक्ष-यक्षिणियों को अभयारण्यों से जोड़कर देखा गया है क्योंकि चौबीसवें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर अपनी तपस्या के दौरान अस्थायी रूप से अभयारण्यों में ही रूके थे क्योंकि ध्यान के लिए ये बिल्कुल उपयुक्त स्थान थे।

जैन मुनि यतिवृषभ द्वारा रचित करणानुयोग और ब्रह्माण्डविज्ञान के ग्रन्थ तिलोयपन्नति तथा प्रख्यात जैनाचार्य हेमचन्द्रसूरी कृत अभिधानचिंतामणि के मु​ताबिक 45 यक्षिणियों के नाम इस प्रकार हैं— पंचांगुली, चक्रेश्वरी, रोहिणी, अजितबाला, प्रज्ञप्ति, दुरितारी, वज्रसंखला, काली, वज्रंकुशा, महाकाली, मनोवेगा, श्यामा, काली, शांता, ज्वालामालिनी, महाज्वाला, महाकाली, सुतारका, मानवी, अशोक, गौरी, मानवी, गांधारी, चंदा, वैरोती, विदिता, अनंतमती, अंकुशा, मानसी, कन्दर्पा, महामांसी, निर्वाणी, जया, बाला, तारादेवी, धारिणी, विजया, धरनप्रिया, अपराजिता,नारदत्ता, बहुरूपिणी, अम्बिका या कूष्माण्डिनी, पद्मावती, सिद्धायिका।

बौद्ध धर्म में य​क्ष-यक्षिणी

देश के कई प्राचीन बौद्ध स्थलों विशेषकर भरहुत, साँची और मथुरा से बड़ी संख्या में यक्षिणियों की आकृतियां मिलती हैं। ये यक्षिणियां अधिकतर स्तूपों के रंलिंग और स्तम्भों पर बनी हुई हैं। इन यक्षिणियों को सुडौल शारीरिक बनावट के साथ मुस्कुराते हुए सामान्यत: पेड़ को छूते हुए मुद्रा में दिखाया गया है। सम्भवत: अशोक वृक्ष की स्थिति स्पष्ट की गई है। एक चित्र में शाक्य रानी माया के द्वारा लुम्बिनी के एक बगीचे में अशोक वृक्ष के नीचे उसकी शाखा को पकड़े हुए गौतम बुद्ध को जन्म देने की स्थिति को दर्शाया गया है। तिब्बती बौद्ध साहित्य में यक्ष-यक्षिणियों को मानव जाति की सहायता करने वाला बताया गया है, जिनका पुनर्जन्म परोपकारी आत्माओं के रूप में होता है।

बौद्ध साहित्य में जिन 70  यक्षिणियों का उल्लेख मिलता है उनके नाम इस प्रकार हैंहरती, अलिका, वेंदा, अनोपमा, विमलप्रभा, श्री, शंखिनी, मेघा, तिमिसिका, प्रभावती, भीम, हरिता, महादेवी, नाली, उदारिया, कुंती, सुलोचना, शुभ्रु, सुसवारा, सुमति, वसुमति,चित्राक्षी, पूर्णनिशा, गुह्यका, सुगुह्यका, मेखला, सुमेखला, पद्मोच्चा, अभय, जया, विजया, रेवतीका, केशिनी, केशान्त, अनिला, मनोहरा, मनोवती, कुसुमावती, कुसुमपुरवासिनी, पिंगला, वीरमती, वीरा, सुवीरा, सुघोरा , घोरा, घोरावती, सुरसुंदरी, सुरसा, गुह्योत्तमारि, वटवासिनी, अशोक,अंधरासुनारि, अलोकसुनारि, प्रभावती, अतिशयवती, रूपावती, सुरूपा, असिता, सौम्या, काना, मेना, नंदिनी, उपनंदिनी, लोकान्तरा, कुवन्ना ( पाली ), सेतिया (पाली), पियांकरमाता (पाली), पुनब्बासुमाता (पाली), भेसकला (पाली)।

इसे भी पढ़ें : ताजमहल से गायब हो चुकी हैं नायाब और बहुमूल्य चीजें, आखिर किसने और क्या लूटा?

दक्षिण भारत में यक्षिणियां

केरल के लोक साहित्य में यक्षिणियों को नकारात्मक रूप में दर्शाया गया है। कई लोक कथाओं में इनका उल्लेख एक प्रतिशोधी यक्षिणी में रूप में किया गया है जिसकी पूर्व में हत्या हो चुकी है। साल 1967 में प्रकाशित मलयटूर रामकृष्णन के उपन्यास यक्षी में कई यक्षियों को चित्रित किया गया है। इस उपन्यास के अनुसार, वयस्क यक्षिणियां मनुष्यों का रक्त पीने के लिए वर्ष में एक बार धरती पर आती हैं।

तमिलनाडु में नागरकोइल के नजदीक स्थित थेक्कलाई की एक किंवदंती के मुताबिक चेम्पाकावल्ली और नीलापिला नामकी दो खूबसूरत बहनों की हत्या उसके पिता ने कर दी थी। इसके बाद वे यक्षिणियों में परिवर्तित हो गईं। इन यक्षिणियों ने महल के सभी लोगों को प्रताड़ित किया और मार डाला। अंत में अपने पिता की भी हत्या कर दी। इन दोनों यक्षिणियों को शांत करने के लिए लोगों ने उस स्थान पर एक मंदिर बनवाया तथा पूजा-अर्चना की। इनमें बड़ी बहन चेम्पाकावल्ली ने भगवान शिव की पूजा करने के लिए कैलाश की यात्रा की और एक दयालु देवी के रूप में परिवर्तित हो गई जबकि छोटी बहन नीलापिला क्रूर बनी रही। नीलापीला के अनुयायी अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए उससे प्रार्थना करते हैं।

एक किंवदंती यह भी है कि केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में भी कांजीरोट्टू नामक यक्षिणी रहती है। इस यक्षिणी के मनमोहक और क्रूर स्वरूप को श्री पद्मनाभ के मंदिर के दक्षिण-पश्चिम भाग पर दर्शाया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में एक विशाल खजाना है, कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि यदि इस खजाने को खोला गया तो भगवान नरसिम्हा की प्रार्थना बाधित होगी और वह यक्षिणी पूरी दुनिया पर कहर बरपा देगी।

बता दें कि केरल में यक्षिणियों से जुड़ी कई लोकप्रिय कहानियां हैं। कल्लियानकट्टू नीली की कहानी यहां के सबसे लोकप्रिय कहानियों में से एक है। यहां तक कि कुछ आधुनिक मलयालम फिल्में भी यक्षिणियों पर आधारित हैं।

यक्ष-यक्षिणियों की प्रतिमाएं

देश के विभिन्न स्थलों से पा​षाण निर्मित विशालकाय यक्ष-यक्षिणियों की प्रतिमाएं मिली हैं जिनका विवरण कुछ इस प्रकार है- मथुरा जिले के परखम ग्राम से मिली यक्ष मूर्ति जिसे मणिभद्र कहा गया है। मथुरा जिले के बड़ोदा ग्राम से मिली यक्ष प्रतिमा। मथुरा के झींग-का-नगरा ग्राम से मिली यक्षिणी की प्र​तिमा। पद्मावती, ग्वालियर से प्राप्त यक्ष प्रतिमा। पटना के दीदारगंज से प्राप्त चामर ग्राहिणी यक्षिणी की प्रतिमा। पटना से प्राप्त दो अन्य यक्ष प्रतिमाएं। बेसनगर (विदिशा) से प्राप्त यक्षिणी की प्रतिमा। राजघाट वाराणसी से प्राप्त यक्ष की प्रतिमा। शिशुपालगढ़ (उड़ीसा) से प्राप्त यक्ष प्रतिमाएं। कुरूक्षेत्र से प्राप्त यक्ष प्रतिमा तथा मेहरौली से प्राप्त यक्षि​णी की प्रतिमा। अधिकांश विद्वानों का मत है कि इन्ही यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियों के आधार पर कालान्तर में बुद्ध, बोधिसत्व तथा जैन तीर्थंकरों की विशाल मूर्तियों का निर्माण किया गया। इन्हें सर्वत्र देवी-देवताओं के रूप में पूजा जाता था।

इतना ही नहीं,  भारतीय रिज़र्व बैंक मुख्यालय, दिल्ली के प्रवेशद्वार पर भी एक यक्षिणी की मूर्ति लगी है जो कृषि के माध्यम से समृद्धि को दर्शाती है। इससे यह साबित होता है कि भारत में यक्ष-यक्षिणियों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है।

इसे भी पढ़ें : राम नाम की अंगूठी पहनने वाले टीपू सुल्तान ने श्रृंगेरी में करवाए थे सहस्र चंडी यज्ञ

इसे भी पढ़ें : शेरशाह सूरी की नकल कर मुगलों ने भी बनवाई थीं कोस मीनारें, जानते हैं क्यों?