
स्टोरी शुरू होती है, जब मेरठ के विद्रोहियों ने 12 मई 1857 को दिल्ली शस्त्रागार के कार्यवाहक लेफ्टिनेन्ट विलोबी की हत्या कर महल तथा नगर पर अधिकार कर लिया। इसके अतिरिक्त दिल्ली के कुछ अन्य यूरोपीय भी गोली से उड़ा दिए गए। तत्पश्चात विद्रोहियों ने बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित कर दिया।
दिल्ली नगर का हाथ से निकल जाना अंग्रेजों के लिए एक भारी क्षति थी। ऐसे में अंग्रेजों ने दिल्ली पर दोबारा अधिकार करने के लिए पंजाब से सेनाएं बुलवाईं और उत्तर की ओर से आक्रमण किया। भारतीय विद्रोहियों ने पूरी मजबूती से संघर्ष किया लेकिन सितम्बर, 1857 में अंग्रेजों का दिल्ली पर पुन: अधिकार हो गया। इस सैनिक संघर्ष में दिल्ली के निवासियों ने भी प्रतिशोध लिया जिसमें जॉन निकलसन मारा गया परन्तु अंग्रेज सिपाहियों के एक संकेत पर कैप्टन हडसन ने बूढ़े और कमजोर मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को महल में ही बन्दी बना लिया।
वीर सावरकर अपनी प्रसिद्ध कृति ‘1857 का भारतीय स्वातन्त्र्य समर’ में लिखते हैं कि, “विश्वासघाती इलाही बख्श और मुन्शी रजब अली ने अंग्रेज अधिकारियों के चरणों में उपस्थित होकर उन्हें यह सूचना दी कि शहजादे तो अभी भी हुमायूं के मकबरे में छिपे बैठे हैं।” यह समाचार मिलते ही कैप्टन हडसन ने तत्काल प्रस्थान किया और उसने शहजादों को बन्दी बनाकर एक गाड़ी में बैठा दिया। जब इन शहजादों को लेकर यह गाड़ी नगर में पहुंची तो हडसन ने गाड़ी के पास पहुंचकर चिल्लाना शुरू किया- ‘अंग्रेज महिलाओं और बालकों का वध करने वालों के प्राण लेना ही उचित है। इसके बाद अंग्रेज सिपाहियों ने शहजादों के शरीर से सभी आभूषण उतार लिए और हडसन ने उन्हें अपनी गोलियों से भून दिया’। वहीं इतिहासकार यशपाल के मुताबिक, ‘कैप्टन हडसन ने बहादुर शाह जफर के दो बेटों तथा एक पोते को यह वचन देकर कि उन्हें कोई क्षति नहीं पहुंचाई जाएगी, गोली से मार डाला’।
बीबीसी न्यूज हिन्दी संस्करण के मुताबिक, बहादुरशाह जफर के एक बेटे अब्दुल्ला को अंग्रेज गिरफ्तार नहीं कर पाए थे, उसने अपनी पूरी जिन्दगी बेहद गरीबी में टोंक रियासत में बिताई। जबकि बादशाह के अन्य बेटों में किसी को फांसी दे दी गई या फिर किसी को काला पानी की सजा दी गई। कुछ शहजादों को आगरा, कानपुर और इलाहाबाद की जेलों में इस तरह से रखा गया कि तकरीबन दो वर्ष के भीतर ही इनमें से अधिकांश की मौत हो गई।
महाक्रांति के दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने बूढ़े और असक्त बहादुर शाह ज़फ़र को कैद कर बर्मा (वर्तमान में म्यांमार) के रंगून में भेज दिया। जहां तकरीबन 5 वर्ष तक निर्वासित जीवन व्यतीत करने के बाद साल 1862 के नवम्बर महीन में उनकी तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई। यहां तक कि वह खाना-पानी भी निगल नहीं पा रहे थे, उन्हें चम्मच से सूप पिलाया जा रहा था। आखिरकार 7 नवंबर, 1862 की सुबह 5 बजे भारत के अंतिम मुगल बादशाह ने अपनी अंतिम सांसें ली। कहते हैं, बहादुरशाह अपने निर्वासित जीवन से बहुत दुखी थे और उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वह अपनी आखिरी सांसें हिन्दुस्तान की माटी में ही लें। अपने वतन की याद में तड़पते बहादुर शाह जफर के ये अल्फाज आज भी लोगों की जुबां पर हैं - “कितना है बदनसीब जफर ज़फर दफन के लिए, दो गज जमीन भी न मिली कूए यार में।”
बहादुर शाह जफर का संक्षिप्त जीवन परिचय
मुगल बादशाह अकबर द्वितीय को जब अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया तब उनकी एक बेगम ने अपने बेटे मिर्जा जहांगीर को उत्तराधिकारी घोषित करने के लिए दबाव डाला। इसी बीच ईस्ट इंडिया कंपनी ने लाल किले में अपने निवासियों पर हमला करने के आरोप में जहांगीर को निर्वासित कर दिया जिससे अकबर द्वितीय के उत्तराधिकारी मिर्ज़ा अबू ज़फ़र सिराज-उद-दीन मुहम्मद ने बहादुर शाह द्वितीय के नाम से मुगल गद्दी सम्भाली।
24 अक्टूबर 1775 को जन्मे बहादुर शाह द्वितीय एक उर्दू कवि भी थे, जिन्हें भारतीय इतिहास में लोग ‘बहादुर शाह जफर’ के नाम से जानते हैं। बहादुर शाह जफर ने कई उर्दू गजलें भी लिखीं। उनके लेखन का कुछ हिस्सा 1857 की महाक्रांति के दौरान या तो खो गया या फिर नष्ट हो गया, बावजूद इसके उनकी कृतियों का एक बड़ा हिस्सा ‘कुल्लियात-ए-ज़फ़र’ के नाम से संकलित है। भारत के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह की सत्ता केवल पुरानी दिल्ली की चहारदीवारी तक ही सीमित थी, वह केवल नाम के बादशाह थे। दरअसल बहादुर शाह जफर को जब सत्ता मिली तब ईस्ट इंडिया कम्पनी पूरे हिन्दुस्तान पर कब्जा कर चुकी थी और 1857 की महाक्रांति के दौरान अंग्रेजों ने उन्हें कैद कर रंगून (म्यांमार) भेज दिया जहां उनकी मौत हो गयी।
बवासीर के इलाज के लिए टोने-टोटके का सहारा
उत्तर मुगलकालीन इतिहास में बहादुर शाह जफर को सबसे कमजोर मुगल बादशाह का तगमा नसीब हुआ। उन्होंने अपने दरबार में रक्षाबन्धन, होली, दिवाली आदि पर्व मनाए हांलाकि इस धार्मिक सहिष्णुता को उनकी कमजोरी माना गया। शारीरिक रूप से बेहद कमजोर बहादुर शाह जफर को आए दिन बीमारियां घेरे रहती थीं।
बता दें कि बहादुर शाह जफर काले जादू, टोने-टोटके के मकड़जाल से ग्रसित थे। इतिहासकार विलियम डैलरिंपल की चर्चित किताब ‘द लास्ट मुगल’ के मुताबिक, “बहादुर शाह जफर को बवासीर की बीमारी थी, जिसके इलाज के लिए वे ताबीज और गंडे आदि बांधते थे। इतना ही नहीं उन्हें पेट की भी कई बीमारियां थी जिसके लिए एक खास नग वाली बड़ी अंगूठी पहनते थे।”
बहादुर शाह जफर की बीमारी के दौरान उनकी बेगमों को यह शक था कि उन पर किसी ने जादू-टोना कर दिया है। चूंकि पीर-फकीरों तथा हिंदू ज्योतिषियों का एक समूह हमेशा उनके सम्पर्क में रहता था अत: इन लोगों ने बहादुर शाह के लिए ताबीज लिखे और उस ताबीज को पानी में मिलाकर पीने को कहा, जिससे की वह बुरी नजरों से बच जाएंगे।
काले जादू पर भी भरोसा करते थे बहादुर शाह जफर
बहादुर शाह जफर काले जादू पर भी जमकर विश्वास करते थे। वह पीर-फकीरों की सलाह पर काले जादू से बचने के लिए कभी ऊंटों की तो कभी भैंसों की बलि दिया करते थे। इतना ही नहीं तथाकथित जानकारों की सलाह पर जमीन में अंडे भी गड़वाते थे। कहते हैं कि वह एक बड़ी अंगूठी पहनते थे जिससे उनका अपच ठीक हो जाता था। अपने स्वास्थ्य के खातिर उन्होंने उन्होंने गरीबों को गायें, सूफी दरगाहों को हाथी और जामा मस्जिद के खादिमों को घोड़े भी दान में दिए। वह काले जादू से इतना खौफ खाते थे कि यदि किसी ने कह दिया कि फलां आदमी काले इल्म का जानकार है और वह आप जादू कर सकता है, तो उसे तुरन्त कैद कर जेल में डलवा देते थे।
एक घटना का उल्लेख मिलता है कि एक बार उनके किसी मुलाजिम को सांप ने काट लिया, तब बहादुर शाह जफर ने उसे ‘बेजार की मुहर’ से उसे ठीक कर दिया था। उन दिनों ऐसा माना जाता था कि ‘बेज़ार’ सभी प्रकार के ज़हर की काट है, यदि पानी के गिलास में बेज़ार डाल दिया जाये तो वो पानी किसी भी ज़हर को बेअसर कर सकता था। दरअसल बेज़ार एक फ़ारसी शब्द है, जिसका अर्थ से ‘जहर से बचाव’।
इसे भी पढ़ें : मुहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को धूल चटाने वाली मेवाड़ की राजमाता कर्मदेवी