
सांसारिक बन्धनों से परे निष्काम भाव से सर्वदा ईश्वर का स्मरण करते रहना ही संन्यास है। अत: संन्यास व्रत धारण करने वाले संन्यासी कहे जाते हैं अर्थात ब्रह्म चिन्तन में मग्न होकर इस भौतिक संसार से इनका कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। संन्यासी का जीवन समस्त राग-द्वेष और मोह-माया से विलग पूर्णतया एकाकी होता है। वस्त्र, आसन, शैया आदि सुख के साधनों का त्याग कर तपस्या में लीन रहना ही संन्यासी का धर्म होता है। उसकी दृष्टि में कंचन और पाषाण, शत्रु और मित्र आदि सभी समान होते हैं। हमारे देश में वैदिक साहित्य से लेकर ब्राह्मण साहित्य तक में संन्यासियों के विषय में अनेक रहस्यमयी बातें लिखी गईं हैं लेकिन मध्यकाल में भारत आने वाले अरब यात्री भी इन संन्यासियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए और उन्होंने भी संन्यासियों के बारे में विस्तार से लिखा है। इससे जाहिर होता है कि मध्य युग में भी संन्यास का प्रचलन था।
सुलेमान
आधुनिक ईरान के सिराफ का निवासी था सुलेमान। उसने 850 ई. के आस-पास चीन तथा भारत की यात्रा की। सुलेमान ने पाल साम्राज्य विशेषकर राजा देवपाल तथा गुर्जर-प्रतिहार सम्राटों में से एक मिहिर भोज का भी वर्णन किया है। अरब यात्री सुलेमान संन्यासियों के बारे में लिखता है कि, “भारत में ऐसे लोग भी हैं जो सदा पहाड़ों और जंगलों में घूमा करते हैं और लोगों से बहुत कम मिलते-जुलते हैं। जब भूख लगती है तब वे लोग जंगल के फल या घास-पात खा लेते हैं। उनमें से कुछ लोग पूर्णत: नग्न रहते हैं। हां, चीते की खाल का एक टुकड़ा उन पर अवश्य पड़ा रहता है। मैंने इसी प्रकार एक संन्यासी को धूप में बैठे देखा था। सोलह वर्ष बाद जब मैं फिर उस ओर से गुजरा तब भी मैंने उसको उसी प्रकार और उसी दशा में देखा। मुझे आश्चर्य है कि धूप की गर्मी से उसकी आंखें क्यों न बह गईं”। सुलेमान का अचम्भित होना स्वाभाविक था क्योंकि संन्यासियों की साधना, तपस्या और योगक्रिया हमारे देश भारत के अलावा इस संसार में कहीं भी दुर्लभ थी।
अलबरूनी
ईरानी, हिब्रू, सीरियाई और संस्कृत भाषा का जानकार था अलबरूनी। वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। अरबी और फारसी पर समान अधिकार रखने वाले अलबरूनी की चर्चित किताब का नाम ‘किताब-उल-हिन्द’ है। फारसी भाषा में लिखित ‘किताब-उल-हिन्द’ में अलबरूनी ने हिन्दुस्तान के उत्सवों, रीति-रिवाजों, खगोल, विज्ञान, मूर्तिकला, माप-तौल तथा सामाजिक जीवन के अतिरिक्त धर्म-दर्शन के सम्बन्ध में भी विशद वर्णन किया है। अलबरूनी ही ऐसा पहला अरब यात्री था जिसने सबसे पहले श्रीमद्भगवद्गीता की प्रशंसा में कुछ शब्द लिखे हैं।
अरब यात्री सुलेमान की ही तरह अलबरूनी ने संन्यासी जीवन का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि, “चौथा काल जीवन के अन्त तक चलता है। मनुष्य लाल वस्त्र और हाथ में एक दण्डी धारण करता है। सदैव ध्यानस्थ रहता है। वह अपने मस्तिष्क को शत्रुता और मित्रता से तथा काम, क्रोध और लालसा से रहित कर लेता है। एक किसी से एकदम संभाषण नहीं करता। किसी स्वर्गीय पुरस्कार प्राप्ति के निमित्त जब वह विशेष गुण युक्त स्थानों पर भ्रमण करता है तब वह मार्ग के गांव में एक दिन से अधिक और नगर में पांच दिन से अधिक नहीं ठहरता। अगर कोई उसे कुछ देता है तो वह दूसरे दिन के लिए उसमें से नहीं बचाता। मुक्तिमार्ग की चिन्ता करने और जहां से इस संसार में लौटना नहीं होता, उस मोक्ष तक पहुंचने के अतिरिक्त उसके पास दूसरा कोई कार्य नहीं था। अलबरूनी का यह कथन भारतीय धर्मविदों के विचारों से काफी मिलता-जुलता है”।
इब्नबतूता
अब्दुल्ला का पुत्र शेख फकीह अबू अब्दुल्ला मुहम्मद जो साधारणतया इब्नबतूता के नाम से प्रसिद्ध है। मोरक्को के प्रदेश तानजीर का निवासी इब्नबतूता को पूर्वीय देशों में शम्सुद्दीन के नाम से जाना जाता था। इब्नबतूता चौदहवीं शताब्दी का बड़ा ही महत्वपूर्ण यात्री था जो सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में भारत आया था। उसने उत्तरी अफ्रीका, अरब प्रदेश, फारस, कुस्तुनतुनिया आदि की यात्राएं की। इब्नबतूता ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘रेहला’ में दिल्ली के सुल्तानों के अतिरिक्त भारत की भौगोलिक स्थिति, जलवायु,वनस्पति, फल-फूल तथा पशु-पक्षियों, वेशभूषा-खानपान, मनोरंजन एवं आमोद-प्रमोद, स्त्रियों की दशा, सती तथा जौहर प्रथा, विवाह संस्कार के अलावा सूफी संतों तथा हिन्दू जोगियों के बारे में विस्तार से लिखा है।
भारतवर्ष के हिन्दू जोगियों के सम्बन्ध में इब्नबतूता लिखता है कि, “इन जोगियों का साधारण वर्ग पर अत्यधिक प्रभाव था। इन जोगियों ने असंख्य बार असाध्य रोगों से लोगों को मुक्ति दिलाई थी। इनके द्वारा किए गए जादू-टोने से बीमार व्यक्ति भी स्वस्थ्य हो जाते थे। प्रसिद्ध कृति ‘रेहला’ में इब्नबतूता ने अनेक जादू-टोने का वर्णन किया है जो तत्कालीन समाज में प्रचलित थे। वह लिखता है कि इन हिन्दू जोगियों को मुसलमान भी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। ये जोगी महीनों तक न कुछ खाते थे और न कुछ पीते थे। कुछ जोगी भूमि में गुहा बना लेते थे, उसमें केवल हवा आने के लिए छेद होता था। वे इसमें महीनों तक पड़े रह सकते थे। वे गुप्त रहस्यों को भी बता सकते थे। सुल्तान भी उनका बड़ा सम्मान किया करते थे। वे जोगी योग-सिद्धी द्वारा स्वयं को ऐसा बना लेते थे कि उन्हें किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती थी और न ही उन्हें सांसारिक आडम्बरों की चिन्ता ही रहती थी”।
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