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Guru Gobind Singh made a saint such a great warrior which Name was Banda singh Bahadur

गुरु गोबिन्द सिंह ने एक साधु को ऐसा महायोद्धा बनाया जिसके डर से कांपते मुगल

पुंछ जिले के राजौरी नामक गांव में राजपूत रामेदव भारद्वाज के घर 16 अक्टूबर 1670 को एक बालक ने जन्म लिया जिसका नाम था लक्षमण देव। चूंकि रामदेव का मुख्य धंधा खेती-बाड़ी था, ऐसे में परिवार का गुजारा भर ही हो पाता था। परिवार के साधन सीमित थे अत: लक्ष्मणदेव को बचपन में कोई स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं हुई और वह अपने पिता के साथ ही कृषि में हाथ बंटाने लगा।

खाली समय में लक्ष्मण देव तीर-कमान लेकर शिकार के लिए निकल जाया करता था। एक दिन एक हिरनी के शिकार ने उसकी जीवनधारा ही बदलकर रख दी। गर्भवती हिरनी को तड़पते देखकर लक्ष्मण देव एक तरह से बैरागी बन गया। लक्ष्मणदेव अब माधोदास नाम धारण कर साधुओं की एक टोली में शामिल हो गया। नांदेड़ में गोदावरी नदी के किनारे उसने एक आश्रम बनाया और वहां रहकर योग साधना करने लगा। यहां उसके कई अनुयायी बन गए।

माधोदास बैरागी की गुरु गोविन्द सिंह से मुलाकात

मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों में दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिए संघर्ष शुरू हो गया। मुगल गद्दी का वास्तविक उत्तराधिकारी बहादुरशाह प्रथम उन दिनों अफगानिस्तान का सूबेदार था, इस मौके का फायदे उठाते हुए औरंगजेब के तीसरे बेटे मुहम्मद आजम ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा कर लिया। ऐसे में बहादुरशाह प्रथम ने गुरु गोविन्द सिंह से सहायता मांगी। इसके बाद गुरु गोविन्द सिंह के द्वारा भेजी गई लड़ाकू सिखों की सैन्य टुकड़ी की मदद से जून 1707 में जजाऊ के युद्ध में बहादुरशाह प्रथम (मुअज्जम) ने आजम शाह को करारी शिकस्त दी।

मुगल बादशाह बनने के बाद धन्यवाद प्रकट करने के लिए बहादुर शाह प्रथम ने गुरु गोविन्द सिंह को आगरा आमंत्रित किया। इस मुलाकात के दौरान बहादुर शाह प्रथम ने गुरु गोविन्द सिंह को बेहद कीमती वस्त्र-आभूषण भेंट किए। गुरु गोविन्द सिंह अभी आगरा में ही थे तभी बहादुर शाह के छोटे भाई कामबख्श ने दक्कन में विद्रोह कर दिया। ऐसे में इस विद्रोह को दबाने के लिए बहादुर शाह प्रथम अपने साथ गुरु गोविन्द सिंह को भी ले गया।

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दक्कन कूच के दौरान ही साल 1708 में गुरु गोविन्द सिंह की मुलाकात नांदेड़ में माधोदास बैरागी से हुई। माधोदास बैरागी इस पहली मुलाकात में ही गुरु गोविन्द सिंह के आकर्षक व्यक्तित्व से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि वह सदा के लिए उनका शिष्य और अनुयायी बन गया। इस मुलाकात के दौरान गुरु गोविन्द सिंह ने यह पूछा कि तुम कौन हो? तब माधोदास ने कहा कि मैं आपका बंदा हूं। तब गुरुजी ने कहा कि तुम बंदा बहादुर हो तथा अपने तरकस में से 5 तीर देकर सिखों का नेता बनाते हुए पंजाब जाने का हुक्म दिया। गुरु गोविन्द सिंह ने सिखों के नाम एक हुक्मनामा जारी किया कि वे बंदा बहादुर को अपना अगुआ मानें तथा हर मिशन में उसकी सहायता करें। इस समय गुरुजी ने बंदा बहादुर के साथ पांच सिख भी भेजे जिनके नाम थे- बाबा विनोद सिंह, काहन सिंह, दया सिंह, रामसिंह, बाज सिंह।

दक्कन से बड़ी तेजी से सफर तय करते हुए बंदा बहादुर अभी दिल्ली पहुंचा ही था तभी उसे पता चला कि नांदेड़ में गुरुजी की हत्या हो गई है। दरअसल सरहिन्द के सूबेदार वजीर खां के इशारे पर दो अफगानी पठानों जमशेद खान और वासिल बेग ने गुरुजी पर खुखरी से वार कर दिया। इस हमले में बुरी तरह से घायल गुरु गोबिंद सिंह कई दिनों तक जीवन-मौत से लड़ते रहे आखिरकार 7 अक्टूबर 1708 को नांदेड़ में उनकी मृत्यु हो गई।

स​रहिन्द का भयंकर युद्ध

दिल्ली के पास ही बंदा बहादुर ने अपना डेरा डाला और गुरुजी के संदेश सिखों तक पहुंचाना शुरू किया। यहीं पर बंदा ने धार्मिक सभाएं करनी भी आरम्भ कर दीं। भेंट अथवा चढ़ावे में मिले धन को जरूरतमंदों में बांट दिया जाता था। बंदा ने घोषणा की कि जो भी डाकूओं, चोरों और लुटेरों से भयभीत हैं, जिसे न्याय नहीं मिला, जिसके साथ दुर्व्यवहार हुआ हो, वह उसकी शरण में आ जाए। मुग़ल इतिहासकार खाफी खान लिखता है कि हजारों की संख्या में लोगों ने बन्दा बहादुर का नेतृत्व स्वीकार किया, यहां तक कि अब उसे गुरु गोविन्द सिंह का ही स्वरूप समझा जाने लगा।”  खाफी खान यह भी लिखता है कि " कुछ महीनों के भीतर बंदा बहादुर की सेना में क़रीब पाँच हज़ार घोड़े और आठ हज़ार पैदल सैनिक शामिल हो गए। कुछ दिनों बाद इन सैनिकों की संख्या बढ़ कर उन्नीस हज़ार हो गई।"

इस प्रकार बंदा बहादुर की सेनाएं सोनीपत, कैथल को जीतते हुए समाना में दाखिल हुईं। समाना की विजय इतनी महत्वपूर्ण थी जहां से सरहिंद पर आक्रमण करना आसान हो गया था। घुरम्भ, शाहबाद, मुस्तफाबाद, कपूरी तथा सढोरा को फतह करते हुए बंदा बहादुर शीघ्र ही सरहिंद पहुंच गया।

सरहिन्द में ही गुरु गोविन्द सिंह के दो छोटे बेटों को दीवारों में चिनवाया गया था जिसमें सरहिंद के सूबेदार वजीर खां और उसके दीवान सुच्चानंद ने विशेष भूमिका निभाई थी। इसलिए सरहिंद में प्रवेश करते ही बंदा बहादुर ने भूमिहीनों को भूमि देने की घोषणा की तथा लूट के माल को समान रूप से बांटने का वादा किया, इसलिए उसके पास सैनिकों की कमी नहीं थी। दूसरी तरफ वजीर खां भी अपनी तैयारियों में लगा हुआ था, उसने मुस्लिम भूप​तियों से कहा कि यदि बंदा बहादुर युद्ध जीत गया तो उनके घर और सम्पत्तियां सुरक्षित नहीं रहेंगी। ऐसे में सर​हिंद का युद्ध काफी भयंकर हुआ।

इस युद्ध में फतह दर्शन का नारा लगाते हुए बंदा बहादुर की सिख सेनाओं ने पूरे शहर को रौंद डाला। वजीर खां के मरते ही मुस्लिम सेनाओं का मनोबल टूट गया और बंदा बहादुर को विजयश्री मिली। दीवान सुच्चानंद जीवित ही पकड़ा गया, जिसे कई तरह ​की यातनाएं दी गईं। गंडा सिंह के मुताबिक, “बंदा बहादुर के हाथों लगभग दो करोड़ की वह लूट पड़ी जो वजीर खां के खजाने व वस्तुओं से प्राप्त हुई तथा कुछ लाख सुच्चानंद की सम्पत्ति से प्राप्त हुए।  सरहिंद के सभी 28 परगने जिनसे तकरीबन 36 लाख की सालाना आय प्राप्त होती थी, सिखों के नियंत्रण में आ गए। अब यमुना से सतलुज के भीतर का पूरा क्षेत्र बंदा बहादुर के नियंत्रण में था।

राजधानी निर्माण, सिक्के और हुक्मनामे

बंदा बहादुर ने हिमालय की श्रेणियों में स्थित मु​खलिसगढ़ के किले की मरम्मत करवाकर इसका नाम लौहगढ़ रखा तथा सरहिन्द की समस्त लूट, युद्ध के हर्जाने, लगान आदि की रकम तथा खजाने को लौहगढ़ में रख दिया गया। इतना ही नहीं, लौहगढ़ के किले में ही कई तरह के अस्त्र-शस्त्रों का भंडार भी रखा गया। इस प्रकार एक बैरागी साधु जो सैनिक कमांडर बनकर बंदा बहादुर बना, उसके पास बड़ी संख्या में सेना और अनुयायी मौजूद थे।

बंदा बहादुर ने अपना प्रशासन भलीभांति चलाने के लिए बाज सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त किया और बाबा अली सिंह उसके नायब बने। फतेह सिंह को समाना का सूबेदार, विनोद सिंह तथा राम सिंह थानेश्वर के सूबेदार बनाए गए। इसके अलावा सरहिन्द के 28 परगनों के सरकारी अधिकारी तथा कर्मचारी भी बदल दिए गए। 

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बंदा बहादुर ने गुरु नानक देवजी व गुरु गोविन्द सिंह के नाम से सिक्के जारी किए। इन सिक्कों के एक तरफ यह लिखा रहता था-

सिक्का जद हर दो आलम ते-ऐ नानक साहिब अस्त, फतेह गोविन्द सिंह शाह--शाहन फजल ए सचा साहिब अस्त।

अर्थात- दो जहानों के लिए ये सिक्के नानक की तलवार तथा गुरु गोविन्द की कृपा से मिली विजय के उपलक्ष्य में जारी किए गए।

इस सिक्के के दूसरी तरफ अंकित था-

जर्ब बा अमन उद दहर-मसवरत सहर, जीनत उल तख्त ऐ मुबारक बख्त।

हुक्मनामे जारी करने के लिए एक सील व मुहर जारी की गई थी जिस पर फारसी में यह अंकित रहता था-

देग--तेग--फतह ओ नसरत--बेदरंग, यफ्त आज नानक गुरु गोविन्द सिंह।

यह मुहर भविष्य में सिख शासकों द्वारा प्रयोग की गई जिसमें सिखों की लो​कप्रियता तथा सफलता दोनों का रहस्य दिखाई देता है। गंडा सिंह के मुताबिक, ​सरहिंद विजय के पश्चात बंदा बहादुर ने एक नए संवत का भी आरम्भ किया।

मुगलों से संघर्ष

मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम को राजपूताना में व्यस्त जानकर बंदा बहादुर ने एक बार फिर से यमुना के दूसरी ओर सहारनपुर की तरफ रूख किया। सहारनपुर को जीतने के पश्चात बंदा बहादुर की उपस्थिति में गुर्जरों ने बेहार, अमहेटा तथा ननौता को तहस-नहस कर दिया। इस प्रकार गंगा-यमुना के दोआब में आतंक की स्थिति बन गई। इसी बीच जालंधर के किसानों की पुकार पर बरसात से पहले ही बंदा बहादुर पंजाब लौट गया।

राहौन के स्थान पर मुगल फौजदार शमस खां के साथ हुए घमासान युद्ध में बंदा बहादुर की सिख सेना ने मुगलों को परास्त किया। इस युद्ध में सिखों ने ढाई फट” (पहले आक्रमण करो फिर भागते हुए देखो, फिर लौटकर जबरदस्त आक्रमण करो)  की नीति अपनाई थी। बंदा बहादुर की सेनाओं ने अमृतसर, कसूर, बटाला, कलानूर तथा पठानकोट को जीतने के बाद लाहौर पर आक्रमण कर उसे जमकर लूटा। इस प्रकार यमुना से रावी तक तथा उसके पार तक बंदा बहादुर की तूती बोलती थी।

पंजाब में हो रहे इस तरह के विद्रोह को देखते हुए मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम ने अपने सेनापति फिरोज खान के नेतृत्व में एक सेना भेजी जिसने अमीनगढ़, थानेश्वर, करनाल, शाहबाद आदि को जीतकर वहां फिर से मुगल सत्ता स्थापित की। ऐसे समय में बंदा बहादुर लौहगढ़ की तरफ चला गया लेकिन मुगल सेनाओं ने जब मुखलिसगढ़ का घेरा डाला तब बंदा बहादुर अपने कुछ साथियों को लेकर वहां से भागने में सफल रहा।

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मुखलिसगढ़ पर मुगल विजय के बाद भी बंदा बहादुर निराश नहीं हुआ बल्कि उसने हुक्नामें भेजने आरम्भ कर दिए और पंजाब के किसानों को कीरतपुर में अपने झंडे के नीचे आने का आह्वान किया। इसके बाद उसने शिवालिक की पहाड़ियों में बसे विलासपुर को जैसे ही फतह किया कुल्लू, मंडी तथा चंबा के राज्य स्वयं ही आत्मसमर्पण कर गए।

बंदा बहादुर की बढ़ती शक्ति देखकर बहादुर शाह बौखला गया उसने सिखों के कत्लेआम का आदेश दिया लेकिन संयोगवश  1712 में 27 फरवरी को बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु हो गई और उसके बेटों में उत्तराधिकार युद्ध शुरू हो गया। इस अवसर का फायदा उठाकर बंदा बहादुर ने लौहगढ़ तथा सढोरा को हस्तगत कर लिया और काफी समय तक अपने अधीन बनाए रखा।

बंदा बहादुर को कुचलने पर अमादा था बादशाह फर्रूखसियर

बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उसका बड़ा बेटा जहांदरशाह मुगल गद्दी पर बैठा लेकिन उसके भतीजे फर्रुखसियर ने विद्रोह कर दिया और विजयी होते ही दिल्ली में जहांदरशाह की हत्या करवा दी। मुगल बादशाह फर्रूखसियर अब बंदा बहादुर और उसके अनुयायियों को कुचलने के लिए कटिबद्ध था। ​फर्रूखसियर ने अबदुस्समद और उसके बेटे जकारिया खां के नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना भेजी, दो सेनापतियों वाली मुगल सेनाएं बंदा बहादुर को सढोरा तथा मुखलिसढ़ से खदेड़ने में सफल रहीं। ​अत: बंदा बहादुर को भागकर शिवालिक की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी।

मुगल दरबार में इस विजय को जश्न के तरह मनाया गया। अबदुस्समद और जकारिया खां को सम्मानित किया गया। लेकिन मौका देखकर बंदा बहादुर ने बटाला तथा कलानौर पर तथा उसके अनुयायियों ने रोपड़ पर आक्रमण कर दिया। ऐसे में फर्रूखसियर ने अब्दुस्समद और जकारियां खां को दोबारा भेजा। बंदा बहादुर ने गुरूदास नांगल के स्थान पर एक गढ़ीनुमा किले में अपनी छावनी डाल रखी थी। सुरक्षा के लिए एक खाई खोदी गई तथा उसे पास की नहर से पानी काटकर भर दिया गया। लेकिन मुगल सेना ने इस किले को चारो तरफ से घेर लिया था। रसद तथा मदद के सभी रास्ते बंद हो चुके थे। यह घेराबंदी महीनों तक चली जिससे बंदा बहादुर के पास मौजूद राशन समाप्त हो गया।

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सिखों ने गधों और घोड़ों का माँस तथा हड्डियों को पीसकर खाया। बंदा बहादुर का खास सेनापति विनोद सिंह रात के अंधेरे में पहाड़ों की तरफ चला गया। आठ महीने की घेरेबंदी के बाद बंदा बहादुर ने दिसम्बर 1715 को आत्मसमर्पण कर दिया।

बंदा बहादुर की दिल्ली में निर्मम हत्या

तकरीबन 200 बंदियों को तो वहीं मौत के घाट उतार दिया गया और जो बच गए थे, उन्हें बंदा बहादुर व उसके परिवार के साथ बंदी बनाकर पहले लाहौर तथा फिर दिल्ली लाया गया। बंदा बहादुर से मुगल इतना भय खाते थे कि कैद में होने के बावजूद उसे जंजीरों से बांधकर लोहे के एक पिंजरे में बंद किया गया था।

जकारियां खां के नेतृत्व में बंदा बहादुर और 744 जीवित सिखों के जुलूस ने 27 फरवरी को दिल्ली में प्रवेश किया। इस जुलूस को दिल्ली की गलियों व बाजारों से निकाला गया। 377 ऊँटों के काफिले वाले इस जुलूस में प्रत्येक क़ैदी का एक हाथ गर्दन के पीछे कर लोहे की ज़जीर से बाँधा हुआ था। इसके अतिरिक्त 2000 सिखों के सिर लंबे बांसों पर लटका रखे थे। लोहे के पिंजड़े में डालकर बंदा बहादुर को हाथी पर सवार कराया गया था। उसके पीछे नंगी तलवार लिए दो मुगल सैनिकों को बांधा गया था।

बंदा बहादुर के अनुयायियों से इस्लाम धर्म कबूल करने की पेशकश की गई और उनके इनकार करते ही बेरहमी से हत्या कर दी जाती थी। 1716 में 19 जून को बंदा बहादुर तथा उसके कुछ साथियों को क़ुतब मीनार के नजदीक महरौली स्थित बहादुर शाह की क़ब्र ले जाया गया और उससे कब्र के सामने सिर झुकाने के लिए कहा गया।

बंदा बहादुर तथा उसके अनुयायियों द्वारा ऐसा करने से मना करते ही कोतवाल सरबराह ख़ाँ के इशारे पर मुगल सैनिकों ने बंदा बहादुर के सामने ही उसके 4 साल के बेटे अजय सिंह के टुकड़े कर दिए और फिर उसका कलेजा निकालकर बंदा बहादुर के मुंह में ठूंस दिया। इसके बाद जल्लाद ने बंदा बहादुर के शरीर को जगह-जगह से काटा और आखिर में तलवार के एक प्रहार से उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया।

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