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Vasco da Gama sold pepper in Portugal at 60 times the price

वास्कोडिगामा ने पुर्तगाल में 60 गुने दाम पर बेची थी काली मिर्च, कारण जानते हैं आप?

यूरोप में गरम मसालों की मांग निरंतर रहती थी क्योंकि शीतकाल में चारे के अभाव में बड़ी संख्या में पशुओं को मारकर उनके मांस को नमक लगाकर सुरक्षित कर लिया जाता था जिसे स्वादिष्ट बनाने के लिए मसालों की आवश्यकता पड़ती थी। यदि हम गरम मसालों की बात करें तों लौंग, इलाईची, दालचीनी, जायफल आदि दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे लेकिन कालीमिर्च तो भारत के सिवाए अन्यत्र कहीं नहीं मिलती थी। काली मिर्च की महत्ता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में इसका इस्तेमाल मुद्रा और किराए के रूप में होने लगा था। यूरोप में मसालों का व्यापार विशेष रूप से लाभप्रद था, किन्तु 1453 ई. के बाद तुर्कों ने एशिया माइनर के जरिए व्यापार पर रोक लगा दी थी। अत: मसालों के लिए अन्य मार्ग खोजना आवश्यक हो गया था।

वास्कोडिगामा का कालीकट आगमन

ऐसे में पुर्तगाल के राजा मैनुएल प्रथम के आदेश पर वास्कोडिगामा ने 8 जुलाई 1497 को चार छोटे जहाजों के साथ अपनी यात्रा शुरू की। इनमें से साओ गेब्रियल नाम के जहाज का कमांडर खुद वास्कोडिमा था जबकि साओ राफ़ाएल नामक जहाज का कमांडर उसका भाई पाओलो था। वास्कोडिगामा की इस टीम में कुल 171 लोग थे जिनमें से कई माहिर जहाजी थे। इन जहाजों पर 3 साल तक का राशन भी मौजूद था।

तकरीबन 11 माह की लम्बी समुद्री यात्रा के बाद 20 मई 1498 को पुर्तगाली कमांडर वास्कोडिगामा गुजराती पथ प्रदर्शक अब्दुल मनीक की मदद से भारत के दक्षिणी पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित कालीकट बन्दरगाह पहुंचा। वास्कोडिगामा ने कालीकट में उतरकर वहां के राजा यानी जामोरिन को चीनी का एक बक्सा, दो तेल के पीपे, दो पीपे शहद के, एक थान कपड़े का, 6 टोपियां और मूंगे की चार मालाएं पेश की। ये सब देखकर राजा जमोरिन के दरबारियों की हंसी छूट गई थी, उन्होंने कहा कि हमे लगा कि तुम लोग राजा को सोने-चांदी भेंट करोगे।

बावजूद इसके राजा जमोरिन ने पुर्तगालियों का स्वागत किया और उन्हें काली मिर्च एवं अन्य जड़ी बूटियां ले जाने की आज्ञा प्रदान की। भारत से वापस लौटते समय वास्कोडिगामा अपने जहाज में काली मिर्च भरकर ले गया और सारे अभियान के व्यय से 60 गुना अधिक मूल्य पर बेचा। इस व्यापार के बाद वास्कोडिगामा पुर्तगालियों की नजर में हीरो बन चुका था। वैसे वास्कोडिगामा ने भारत से काली मिर्च ले जाने की शुरूआत तो कर दी लेकिन 16वीं सदी में पुर्तगालियों ने इस देश को हरी मिर्च भी दे दी।

बेशकीमती थी काली मिर्च

जिन दिनों वास्कोडिगामा कालीकट से कालीमिर्च लेकर पुर्तगाल पहुंचा था, उस वक्त काली मिर्च पूरे यूरोप में सोने के भाव बिकती थी। प्राचीन रोम के लेखक प्लिनी द एल्डर की किताबों में इस बात का उल्लेख है कि काफी लम्बे समय तक भारत से काली मिर्च खरीदते रहने के कारण रोम का स्वर्ण भंडार भी लगभग समाप्त हो चला था। दक्षिण भारत के तटीय इलाकों से प्राप्त रोमन स्वर्ण मुद्राओं के जखीरे इस बात के गवाह हैं।

पूर्वी मध्यकाल में काली मिर्च के महंगे दामों के कारण ही इस काला सोना भी कहा जाता था। काली मिर्च के बढ़ते डिमांड और कीमत में बढ़ोतरी के कारण दुनिया के कई हिस्सों में इसका इस्तेमाल मुद्रा और किराए के रूप में होने लगा था। यही वजह है कि काली मिर्च को कभी-कभी 'मसालों का राजा' भी कहा जाता है। ब्रिटेनिका में इस बात का जिक्र किया गया है कि जर्मन मसाला व्यापारियों से व्यापार करने से पूर्व बतौर शर्त किंग ऑफ इंग्लेंड एथेलरेड द्वितीय ने 10 पौंड काली मिर्च की डिमांड की थी। 

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केवल भारत में ही मिलती थी काली मिर्च

इस बात में कत्तई सन्देह नहीं है कि काली मिर्च के रूप में दुनिया को मिला सबसे नायाब मसाला भारत की देन है। तकरीबन 4 हजार वर्ष पुराने तमिल साहित्य के अतिरिक्त संस्कृत साहित्य में काली मिर्च का वर्णन मिलता है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ चरकसंहितामें काली मिर्च को मरीचम कहा गया है। वहीं सुश्रुतसंहिता में इसे वेल्लजकहकर अत्यंत गुणकारी बताया गया है।

काली मिर्च का जनक दक्षिण भारत ही है। मालाबार के तटीय क्षेत्रों के साथ-साथ कोंकण से लेकर दक्षिण में त्रावणकोर-कोचीन तक काली मिर्च की खेती प्रत्येक घर में होती है। बतौर उदाहरण- केरल में सबसे ज्यादा विदेशी व्यापार काली मिर्च का ही होता है और इससे बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा कमाई जाती है। इसके अतिरिक्त मैसूर, कुर्ग, महाराष्ट्र तथा असम के सिलहट और खासी के पहाड़ी इलाकों में भी काली मिर्च की खेती बड़े पैमाने पर होती है। वैसे तो वर्तमान में काली मिर्च की खेती थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, बोर्नियो, इंडोचीन, मलय, श्रीलंका जैसे देशों में भी होने लगी है लेकिन आज की तारीख में भी भारत की काली मिर्च अतुलनीय है, इसीलिए यह काफी ऊंचे दामों में बिकती है।

यूरोप में काली मिर्च के डिमांड की असली वजह

केवल भारत ही काली मिर्च का सबसे बड़ा और एकमात्र उत्पादक देश था।

यूरोपीय देशों में जाड़े के दिनों में मांस को काफी लम्बे समय तक सुरक्षित रखने तथा जायकेदार बनाने के लिए काली मिर्च का इस्तेमाल किया जाता था।

पुर्तगाली, यहूदी, चीनी, फ्रेंच और अंग्रेज सभी काली मिर्च के दीवाने थे क्योंकि यूरोप में इसकी खपत बड़े पैमाने पर थी।

यूरोप में शाही परिवार के अलावा केवल रईस लोग ही काली मिर्च का इस्तेमाल करते थे। यूरोप में काली मिर्च सोने के भाव बिकती थी।

मौसमी फल और सब्जियों के मूल स्वाद को बरकरार रखने के लिए नमक और काली मिर्च का इस्तेमाल होने लगा।

फ्रांस के राजा लुई चौदहवें ने हुक्म दिया था कि उसकी रसोई में काली मिर्च के अलावा कोई भी दूसरा मसाला इस्तेमाल न किया जाए।

ग्रीस, रोम, पुर्तगाली सभ्यताओं में इस बात का उल्लेख मिलता है कि 2,500 ईसा पूर्व मिस्र में लोगों को दफनाए जाने के दौरान उनकी कब्रों में काली मिर्च भी रखी जाती थी।

काली मिर्च एक औषधि मसाला है जो भूख बढ़ाती है, भोजन का पचाती है, लीवर को मजबूत बनाती है, साथ ही पेट दर्द एवं पेट के कीड़ों से निजात दिलाती है। यह कफ और सर्दी में आराम पहुंचाती है। शरीर को तंदुरुस्त भी रखती है।

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