इस स्टोरी में हम आपको राजस्थान के कुछ चर्चित जगहों के बारे में बताने जा रहे हैं जो रामायण तथा महाभारतकालीन माने जाते हैं। हांलाकि इन प्रमुख स्थलों से जुड़ी घटनाओं का हमें सर्वमान्य प्रमाण तो नहीं मिलते हैं लेकिन पौराणिक मान्यताओं तथा जनश्रुतियों के आधार पर ये चर्चित जगहें आज भी लोगों के दिलों में मौजूद हैं।
1- तीर्थराज पुष्कर
पौराणिक उल्लेखों के मुताबिक, किसी युग में राजस्थान में आज की तरह रेगिस्तान नहीं था, अपितु यहां लवण सागर नामक खारा समुद्र लहराता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब भगवान श्रीराम लंका जाने के लिए वानरों सहित समुद्र के किनारे पहुंचे तो उन्होंने लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र से रास्ता मांगा। तीन दिन तक अनुनय-विनय करने के बाद भी जब समुद्र ने भगवान श्रीराम का अनुरोध नहीं सुना तो उन्होंने समुद्र को सुखाने के लिए अग्निबाण का सन्धान किया। जिसे देखकर समुद्र भयभीत हो गया और उसने श्रीराम को समुद्र पार करने का उपाय बता दिया। इसके बाद समुद्र ने श्रीराम से प्रार्थना की कि इस अमोघ आग्नेयास्त्र का प्रयोग द्रुमकुल्य (लवण सागर का उत्तरी क्षेत्र) पर करें, जहां दुष्ट आभीर आदि समुद्री जल को अपवित्र करते हैं।
भगवान श्रीराम ने वैसा ही किया और फिर गगनभेदी गर्जन के साथ समुद्र का पानी सुख गया। उस स्थल पर जहां श्रीराम का आग्नेयास्त्र गिरा, एक विशाल छिद्र हो गया जिससे विमल जल स्रोत फूटने लगा, यह जल स्रोत तीर्थराज पुष्कर कहलाता है। ऋग्वेद के 10वें मंडल के 136वें सूक्त के 5वें मंत्र में पूर्व तथा पश्चिम के दो समुद्रों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिनका विवरण शतपथ ब्राह्मण भी मिलता है।
एक दूसरी पौराणिक मान्यता यह है कि अजमेर जिले में स्थित तीर्थराज पुष्कर एक ऐसा पवित्र स्थल है जहां परमपिता ब्रह्मा ने यज्ञ किया था। इसी झील के किनारे ब्रह्माजी का प्रसिद्ध मंदिर भी विद्यमान है। मेनका नामक अप्सरा ने इसी पवित्र जल कुंड में स्नान कर महर्षि विश्वामित्र की तपस्या भंग की थी।
2- नाग पहाड़
तीर्थराज पुष्कर झील के किनारे नाग पहाड़ स्थित है। पौराणिक मान्यता है कि नाग पहाड़ पर अगस्त्य मुनि रहा करते थे। नाग पहाड़ पर स्थित नाग कुंड को परमपिता ब्रह्मा के पुत्र वतु का निवास स्थान माना जाता था। इसके पीछे यह कहानी जुड़ी है कि च्यवन ऋषि द्वारा अनुशासित होने के बाद वतु ने नागा पहाड़ पर शरण ली थी। ऐसा माना जाता है कि नाग पहाड़ के ढलानों के ऊपर एक पवित्र जल स्रोत मौजूद था। आज की तारीख में नाग पहाड़ तीर्थयात्रियों तथा पर्यटकों के लिए एक महत्वपूर्ण जगह बन चुका है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, नाग पहाड़ की ऊंचाई पिछले कुछ वर्षों से कम होती जा रही है और भविष्य में नाग पहाड़ का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।
3- सीताबाड़ी
राजस्थान के बारां जिले में स्थित केलवाड़ा कस्बे के पास मौजूद सीताबाड़ी मंदिर के जलकुंड में स्नान करके लोग मोझ की कामना करते हैं। यहां हर साल जून के महीने में एक विशाल मेला लगता है जो सीताबाड़ी मेला के नाम से विख्यात है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लंका से लौटने के बाद लोकोपवाद के डर से श्रीराम ने माता सीता का त्याग कर दिया था। चूंकि यहीं पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, अत: माता सीता ने अपना निर्वासित जीवन व्यतीत किया। यहीं लव-कुश का जन्म हुआ था तथा महर्षि वाल्मीकि ने लव-कुश को यहीं शिक्षा-दीक्षा दी थी और उन्हें धनुर्विद्या में पारंगत किया था। श्रीराम के सभी भाईयों सहित उनकी विशाल सेना को लव-कुश ने पराजित किया था। सीताबड़ी मंदिर में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की अति सुन्दर मूर्तियां विराजमान हैं।
4- आबू पर्वत
राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित आबू पर्वत अपनी पौराणिक मान्यताओं के लिए विख्यात है। राजस्थान में यह जनश्रुति विख्यात है कि महर्षि वशिष्ठ ने असुरों के विनाश के लिए इसी पर्वत पर यज्ञ किया था। ऐसी मान्यता है कि एक शक्तिशाली सर्प अर्बुदा के नाम पर इस पर्वत का नाम आबू पड़ा। दरअसल आबुर्दा सर्प ने भगवान शिव के वाहन नंदी की जान बचाई थी। आबू पर्वत की गुफा में एक पदचिह्न अंकित है जिसे लोग भृगु का पदचिह्न मानते हैं। आबू पर्वत जैन अनुयायियों की तीर्थस्थली भी है। इस पवित्र पर्वत पर कभी भगवान महावीर का भी आगमन हुआ था। पर्वत के बीच में संगमरमर निर्मित दो विशाल जैन मंदिर मंदिरों की शोभा देखते ही बनती है।
5- मण्डोर
मण्डोर का अतिप्राचीन नाम ‘माण्डवपुर’ या ‘मांडव्यपुर’ था। राजस्थान के लोगों का ऐसा मानना है कि लंका के राजा रावण का विवाह मण्डोर में हुआ था। इसका तात्पर्य यह है कि राजकुमारी मंदोदरी जोधपुर के मण्डोर की थी। रावण और मंदोदरी का विवाह मण्डोर में ही हुआ था, इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है लेकिन यह बात जानकर आपको हैरानी होगी कि मण्डोर में आज भी रावण की पूजा होती है और दशहरे के दिन यहां रावण दहन नहीं होता है। यदि मध्यकालीन इतिहास की बात करें तो मारवाड़ के राठौड़ राजवंश की पुरानी राजधानी मंडोर ही थी। इससे पूर्व यहाँ पर इंदा राजपूतों का शासन था। राजाओं द्वारा बनाए गए महल यहां खंडित अवस्था में देखे जा सकते हैं। दुर्ग देवल, देवताओं की राल, जनाना, उद्यान, संग्रहालय, महल तथा अजीत पोल मण्डोर के दर्शनीय स्थल हैं।
6- बैराठ
महाभारतकालीन मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर यानी बैराठ थी। बता दें कि मत्स्य जनपद में वर्तमान अलवर, जयपुर, भरतपुर तथा धौलपुर जिले का कुछ क्षेत्र हिस्सा आता था। बैराठ (विराटनगर) में राजा विराट का शासन था। राजा विराट के राजमहल में ही पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का तेरहवां वर्ष व्यतीत किया था। गाण्डीवधारी अर्जुन ने बृह्नला का वेष धारण कर विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य की शिक्षा दी थी। बाद में उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के साथ हुआ।
7- बाणगंगा नदी
राजस्थान के तीन जिलों जयपुर, दौसा और भरतपुर से होकर बहने वाली बाणगंगा नदी का इतिहास महाभारतकाल से जुड़ा है। राजस्थान के लोगों का ऐसा मानना है कि महाभारतकाल में विराटनगर में पानी की बहुत कमी थी। अज्ञातवास के दिनों में एक बार भीम को बहुत तेज प्यास लगी और वह पानी के लिए व्याकुल हो उठे तब अर्जुन ने अपने गाण्डीव से तीर का प्रहार पृथ्वी पर किया जिससे यहां से गंगा की धारा प्रकट हुई। इसलिए इस नदी को लोग ‘बाणगंगा’ अथवा ‘अर्जुन की गंगा’ भी कहते हैं। जयपुर ज़िले में बैराठ के समीप की पहाड़ियों से बाणगंगा का उद्गम होता है। इसे 'ताला नदी' भी कहा जाता है, क्योंकि यह ताला गांव से होकर निकलती है। बाणगंगा की कुल लम्बाई 380 किमी. है। बाणगंगा राजस्थान की एकमात्र ऐसी नदी है, जिसके उद्गम से लेकर विलय तक कोई सहायक नदी नहीं है।
8- द्रोणपुर
राजस्थान के चूरू ज़िले में छापर नामक एक खारे पानी झील है, जिससे पहले नमक बनाया जाता था। इसी के आसपास के क्षेत्र को द्रोणपुर के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में राजस्थान का उत्तरी क्षेत्र पांचाल राजा द्रुपद के अधिकार में था जिसे अर्जुन ने विजित कर अपने गुरू द्रोणाचार्य को भेंट कर दिया था। यदि मध्यकाल की बात करें तो मोहिलों की दो राजधानियों में से एक का नाम द्रोणपुर था।
9- अलवर (उलूक प्रदेश)
राजस्थान की राजधानी जयपुर से 150 किमी. उत्तर में स्थित अलवर प्राचीन काल में उलूक प्रदेश कहलाता था। पौराणिक महाकाव्य महाभारत में यह उल्लेख मिलता है कि उलूक एक राजा थे, जो द्रौपदी के स्वयंवर में आये हुए थे। इतना ही नहीं उलूक ने महाभारत युद्ध में पाण्डवों के विरूद्ध कौरवों का साथ दिया था।
एक पौराणिक मान्यता यह भी है कि यहीं पर मत्स्य महाजनपद के राजा विराट के पिता वेणु ने मत्स्यपुरी नामक नगर बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया था। राजा वेणु की मृत्यु के बाद राजा विराट ने मत्स्यपुरी से 35 मील पश्चिम में विराट (अब बैराठ) नामक नगर बसाकर मत्स्य प्रदेश की राजधानी बनाया। शाल्व जनपद में भी अलवर का क्षेत्र शामिल था। वर्तमान में प्रशासनिक मुख्यालय अलवर कई किलों, झीलों, हेरिटेज हवेलियों और प्रकृति भंडार के साथ पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र है।
10- ‘देवी पुराण’ में उल्लेखित राजस्थान के 5 वन
महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित ‘देवी भागवत पुराण’ को हिन्दू धर्म के 18 महापुराणों में से एक माना जाता है। मां दुर्गा के पवित्र आख्यानों से युक्त इस पुराण में तकरीबन 18 हजार श्लोक हैं। आपको जानकारी के लिए बता दें कि देवी भागवत पुराण में उल्लेखित 9 वनों में से 5 वन राजस्थान की भूमि पर स्थित हैं, जो इस प्रकार हैं- पुष्कराण्य, अर्बुदारण्य, काम्यवन (कामा), जम्बु मृग (पुष्यकराण्य के पास), मरू जंगल (जांगल प्रदेश)।
वानस्पतिक दृष्टि से जांगल का अर्थ- “वह भूभाग जहां साधारणतया आकाश साफ रहता है और जहां जल और वनस्पति का आभाव हो तथा वृक्षों में शमी (खेजड़ी) और केर आदि का आधिक्य हो।” महाभारतकाल में वर्तमान जोधपुर व बीकानेर के क्षेत्र को जांगल प्रदेश कहते थे। कुरू व भद्र राज्यों के पड़ोस में होने के कारण इस प्रदेश को ‘कुरू जांगला’ और ‘भाद्रेय जांगला’ भी कहा जाता था। यहां तक कि जांगल क्षेत्र का अधिपति होने के कारण बीकानेर के शासक ‘जांगलधर पतिशाह’ कहलाते थे।
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