अकबर के नवरत्नों में शामिल बीरबल की बुद्धिमता और हाजिर जवाबी के किस्सों से हिन्दुस्तान का बच्चा-बच्चा वाकिफ है। किन्तु क्या आप जानते हैं अकबर के सबसे भरोसेमंद साथी बीरबल की मौत मुगल इतिहास में आज भी एक रहस्य है।
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा में हुई बीरबल की मौत के लिए कुछ इतिहासकार अकबर को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। वहीं कुछ विद्वानों का मानना है कि बीरबल अपने मुगल सैन्य अधिकारियों के धोखे का शिकार बने थे।
हैरानी की बात यह है कि स्वात घाटी में यूसुफजाई कबीले के विरूद्ध हुए युद्ध में बीरबल की लाश तक नहीं मिली थी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर में बीरबल के साथ क्या हुआ था? इन रोचक प्रश्नों की जानकारी के लिए मुगल इतिहास से जुड़ी यह स्टोरी जरूर पढ़ें।
अकबर के सबसे भरोसेमंद साथी थे बीरबल
मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल बीरबल अपनी हाजिर जवाबी, व्यंगपूर्ण किस्सों और अपनी बुद्धिमता के लिए विख्यात होने के साथ-साथ एक कहानीकार, ब्रजभाषा के कवि, अध्येता, दार्शनिक, कलाकार, संगीतकार, सेनापति, प्रशासक तथा बेहतरीन शख्सियत के धनी भी थे।
इतिहासकार अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के मुताबिक, बीरबल का असली नाम ‘गदई ब्रह्मदास’ और ब्रिटिश इतिहासकार जॉर्ज ग्रियरसन के अनुसार बीरबल का असली नाम ‘महेश दास’ था। वहीं, इलाहाबाद किले के अशोक ‘लाट’ में बाद के दिनों में उत्कीर्ण किए गए अभिलेख के अनुसार, बीरबल का वास्तविक नाम महेश दास और पिता का नाम गंगा दास है।
इतिहासकारों का मानना है कि बीरबल साल 1556 में ही अकबर के दरबार में आ गए थे। अकबर के दरबार में बीरबल के आगमन को लेकर कई इतिहासकारों ने अलग-अलग विवरण दिए हैं। डॉ. आरपी त्रिपाठी सहित अन्य इतिहासकारों का मानना है कि तानसेन की ही तरह बीरबल भी रीवां के राजा राम चंद्र के दरबार में नियुक्त थे, तत्पश्चात अकबर ने उन्हें अपने यहां बुला लिया। वहीं कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि बीरबल पहले आमेर के राजा भगवान दास के दरबार में नियुक्त थे और ‘ब्रह्मगुप्त’ नाम से कविताएं लिखा करते थे, तत्पश्चात भगवानदास ने उन्हें अकबर के दरबार में भेज दिया।
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अकबर से उम्र में 14 साल बड़े बीरबल मुगल दरबार के सबसे विश्वासपात्र पदाधिकारियों में से एक थे। साल 1528 में काल्पी के पास में जन्में बीरबल मुगल दरबार के ऐसे पहले अफसर थे जिन्हें अकबर ने ‘राजा’ की उपाधि से नवाजा था। 1582 ई. में अकबर ने जब ‘दीन-ए-इलाही’ नामक नया धर्म प्रवर्तित किया तब हिन्दुओं में केवल राजा बीरबल (महेशदास) ने ही इसे स्वीकार किया था।
इरा मुखौटी की चर्चित किताब 'अकबर द ग्रेट मुग़ल' के अनुसार, “अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी में बीरबल के लिए भी एक महल बनवाया था। बीरबल का महल जब जनवरी 1583 में बनकर तैयार हुआ तो इसके उद्घाटन समारोह (गृह प्रवेश कार्यक्रम) में अकबर भी शामिल हुए थे।” बादशाह अकबर के सबसे घनिष्ठ मित्र राजा बीरबल मुगल दरबार के एकमात्र ऐसे मंत्री थे जिन्होंने कई विभागों की जिम्मेदारियां निभाईं।
राजा बीरबल की रहस्यमयी मौत
अकबर के सबसे भरोसेमंद साथी बीरबल की मौत मुगल इतिहास में आज भी एक रहस्य है। बीरबल की मौत के लिए कुछ इतिहासकार अकबर को जिम्मेदार ठहराते हैं। वहीं कुछ विद्वानों का मानना है कि बीरबल अपने मुगल सैन्य अधिकारियों के धोखे का शिकार बने थे।
हैरानी की बात यह है कि स्वात घाटी में यूसुफजाई कबीले के विरूद्ध हुए युद्ध में बीरबल की लाश तक नहीं मिली थी। चलिए इस घटना पर विस्तार से नजर डालते हैं ...
पहला तथ्य - धोखे का शिकार बने बीरबल
मुगल बादशाह अकबर और राजा बीरबल की घनिष्ठ मित्रता से इतिहास का प्रत्येक विद्यार्थी वाकिफ है। मुगल दरबार में बीरबल के बढ़ते कद से ज्यादातर मुगल पदाधिकारी खफा थे, अत: उन्होंने राजा बीरबल के खिलाफ एक षड्यंत्र रचा।
संयोगवंश साल 1586 में पश्तून यूसुफ़ज़ई कबीले ने मुगलों के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। यह कबीला स्वात और बाजौड़ क्षेत्र में रहता था जिसे हम सभी पाकिस्तान के ‘खैबर पख्तूनवा’ के नाम से जानते हैं। मुगल सैन्य पदाधिकारियों ने अकबर के समक्ष युसूफजाई विद्रोह को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया ताकि राजा बीरबल को वहां भेजा जा सके।
बीरबल ने इस खतरे को पहले ही भांप लिया था, इसलिए उन्होंने अकबर से इस पर फिर से विचार करने को कहा लेकिन अकबर ने बीरबल को सैन्य अभियान पर भेज दिया। बीरबल जब स्वात घाटी पहुंचे तब उन्हें तूफान और पहाड़ों के बीच रास्ते में पत्थर देखने को मिले।
बीरबल ने स्वात घाटी के पहाड़ी दर्रे में जैसे ही प्रवेश किया युसूफजाई कबीले के सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। इस दौरान मुगल सैन्य पदाधिकारी बीरबल को छोड़कर भाग खड़े हुए, इसके बाद यह युद्ध नरसंहार में बदल गया। इस हमले में बीरबल की मृत्यु हो गई।
कही-कहीं यह भी कहा जाता है कि मुगल सरदार जैन खान कोका और बीरबल में तनिक भी नहीं पटती थी। अत: युद्ध के दौरान बीरबल को धोखे से काबुल की पहाड़ियों से नीचे गिरा दिया गया, जिससे उनकी मौत हो गई।
दूसरा तथ्य - रणनीतिक अकुशलता
इतिहासकार इरा मुखोटी की किताब ‘अकबर द ग्रेट मुगल’ के अनुसार, साल 1586 में स्वात और बाजौड़ क्षेत्र में पश्तून यूसुफ़ज़ई कबीलों की मुगलों विरूद्ध विद्रोह को दबाने के लिए बादशाह अकबर ने ज़ैन ख़ां कोका और बीरबल को भेजा। हांलाकि बीरबल और जैन खां कोका के बीच मतभेद थे, जिसका फायदा युसूफजाई पठानों ने उठाया।
ज्ञातव्य है कि अबुल फ़ज़ल भी इस सैन्य अभियान का नेतृत्व करना चाहता था, ऐसे में अकबर ने इन दोनों के नाम की पर्ची बनाकर बीरबल का चुनाव किया था। इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी के अनुसार, “16 फरवरी 1586 ई. को यूसुफजई पठानों ने मलंदराई पास की ऊंचाइयों पर चढ़कर मुगलों पर आक्रमण किया। कबीलायियों के लिए मुगल सैनिक एक कटोरी में पड़े मछली की तरह थे, जिन पर तीर और पत्थर बरसाए गए। इस घटना को युसूफजाई त्रासदी कहा जाता है। इस सैन्य हमले में बीरबल समेत आठ हजार मुगल सैनिक मारे गए।”
बीरबल की लाश भी नहीं मिली
राजा बीरबल के साथ युसूफजाई त्रासदी ‘स्वात घाटी’ में घटित हुई थी। वर्तमान में पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित ‘स्वात घाटी’ इस्लामाबाद से 160 किमी. दूर हिन्दू कुश पर्वत श्रृंखला में स्थित है। पख्तूनख्वा प्रांत को ‘सूबा-ए-सरहद’ भी कहा जाता है जो अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर स्थित है।
भौगोलिक स्थिति के हिसाब से युसूफजाई कबीले के विद्रोहियों ने मलंदराई पास की ऊंचाइयों पर चढ़कर बलंदरी घाटी में तीर और पत्थर बरसाए। इस हमले में अन्य मुगल सैनिकों के साथ बीरबल भी पत्थरों के नीचे दबकर मर गए। बीरबल की लाश को छोड़कर मुगल सैनिक वापस लौट आए। दरअसल अकबर इसलिए दुखी था क्योंकि बीरबल का उचित तरीके से दाहसंस्कार भी नहीं किया जा सका। लिहाजा अकबर ने क्रोधावेश में जैन खान कोका और अबुल फजल को हुक्म दिया वो उन्हें अपनी शक्ल न दिखाएं।
अकबर स्वयं काबुल जाकर बीरबल की लाश को लाना चाहता था किन्तु दरबारियों ने सांत्वना दी कि उनके मित्र बीरबल के पार्थिव शरीर को पवित्र करने के लिए सूरज की रोशनी ही पर्याप्त है। अब सवाल उठता है कि आखिर में बीरबल की लाश को छोड़कर मुगल सैनिक वापस क्यों लौट आए? हांलाकि युसुफजाई त्रासदी के कुछ सप्ताह के भीतर ही राजा टोडरमल की अगुवाई में मुगल फौज ने स्वात घाटी और बाजौर पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की।
चूंकि बीरबल की लाश नहीं मिली थी, ऐसे में अफवाहें उड़ती रही कि वह अभी जिन्दा हैं और संन्यासी बन चुके हैं। कुछ लोग कहते कि बीरबल को अमुक जगह देखा गया है, ऐसे में अकबर अपने मातहतों को बीरबल का पता लगाने के लिए भेज देते। बीरबल के अफवाह से जुड़ा यह सिलसिला तकरीबन एक साल तक चलता रहा। जबकि हकीकत यह थी कि बीरबल एक रहस्यमयी मौत शिकार बन चुके थे, यह तथ्य आज भी इतिहासकारों के मध्य विवाद का विषय है।
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