हिन्दुओं के पवित्र चार धामों में से एक ओडिशा राज्य का पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर आजकल फिर से चर्चा में है। दरअसल 48 साल बाद जगन्नाथ मंदिर का तीसरा रत्न भंडार खोला गया, जिसमें सोने-चांदी और हीरे जैसी मूल्यवान धातुओं का अकूत खजाना मिला है।
हैरानी की बात है कि इस खजाने के अलावा जगन्नाथ मंदिर परिसर में कई अन्य खुफिया चैम्बर होने का दावा किया जाता है जिनमें बड़ा खजाना छुपा हो सकता है। जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों के वंशजों का दावा है कि मंदिर के भीतर बनी गुप्त सुरंग में आज भी अथाह संपदा मौजूद है। हांलाकि इस गुप्त तहखाने को आज तक खोला नहीं गया है।
यह सच है कि जगन्नाथ मंदिर को तकरीबन 18 हमलों एवं लूटपाट का सामना करना पड़ा, बावजूद इसके यह पवित्र स्थल भारत के सबसे धनी मंदिरों में से एक है। अब आपका सोचना लाजिमी है जगन्नाथ मंदिर पर तकरीबन 18 हमले हुए फिर भी मंदिर का यह अकूत खजाना कैसे बचा रहा? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
जगन्नाथ मंदिर पर हुए 18 हमलों का क्रमवार विवरण
विदेशी आक्रमणकारियों तथा लुटेरों ने भारतवर्ष के तकरीबन सभी वैभवशाली एवं समृद्ध मंदिरों को अपना पहला निशाना बनाया। इतना ही नहीं, अपने आक्रमणों के दौरान इन लुटेरों ने न केवल धन-सम्पत्ति लूटी अपितु उन मंदिरों को नष्ट करने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।
आक्रमणकारियों द्वारा भारत के वैभवशाली मंदिरों को लूटने एवं विध्वंस करने की इसी श्रृंखला में एक नाम ओडिशा राज्य का पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर भी है जिसे तकरीबन 18 आक्रमणों एवं लूटपाट का सामना करना पड़ा, जिसका क्रमवार विवरण निम्नलिखित है।
1. जगन्नाथ मंदिर को नष्ट करने के उद्देश्य से उत्कल प्रान्त (अब ओडिशा) पर पहला हमला साल 1340 में बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने किया था। ‘बंगाल का सिकन्दर’ कहे जाने वाले इलियास शाह ने मंदिर परिसर में खूब कत्लेआम किया। हांलाकि राजा नरसिंह देव तृतीय के आदेश पर पुजारी एवं स्थानीय लोग जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को छुपाने में सफल रहे।
2. जगन्नाथ मंदिर पर दूसरा हमला दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने साल 1360 में किया। इस आक्रमण का नेतृत्व सुल्तान ने स्वयं किया था। सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के इस आक्रमण के दौरान ओडिशा पर गंग वंश के राजा भानुदेव तृतीय का शासन था। सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने लूटपाट करने के साथ ही जगन्नाथ मंदिर को काफी क्षति पहुंचाई थी।
3. बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के कमांडर इस्माइल गाजी के नेतृत्व में साल 1509 में जगन्नाथ मंदिर पर तीसरा आक्रमण किया गया। इस हमले की खबर मिलते ही मंदिर पुजारियों ने प्रतिमाओं को चिल्का झील में छुपा दिया था। उन दिनों ओडिशा के शासक प्रताप रुद्रदेव ने सुल्तान की सेनाओं को हुगली में करारी शिकस्त दी थी।
4. जगन्नाथ मंदिर पर चौथा एवं सबसे बड़ा हमला अफगान आक्रमणकारी काला पहाड़ ने साल 1568 में किया था। इस हमले के दौरान आक्रमणकारियों ने मंदिर की वास्तुकला को काफी क्षति पहुंचाई। हांलाकि इस हमले से पूर्व एक बार फिर से पुजारियों ने मंदिर की मूर्तियों को चिल्का झील में छुपा दिया था। इस हमले के बाद जगन्नाथ रथयात्रा वर्षों तक रुकी रही और ओडिशा में हिंदू शासन का अंत हो गया।
5. साल 1592 में जगन्नाथ मंदिर पर पांचवा हमला हुआ। ओडिशा के सुल्तान ईशा के बेटे उस्मान और कुथू खान के बेटे सुलेमान ने इस हमले में न केवल मंदिर सम्पदा को लूटा अपितु मूर्तियों को अपवित्र किया तथा लोगों का बेरहमी से कत्लेआम भी किया।
6. जगन्नाथ मंदिर पर छठवां हमला बंगाल के नवाब इस्लाम खान के कमांडर मिर्जा खुर्रम ने साल 1601 में किया। इस दौरान मंदिर पुजारियों ने मूर्तियों को भार्गवी नदी के रास्ते नाव द्वारा पुरी के पास एक गांव कपिलेश्वर में छुपा दिया था।
7. ओडिशा के सूबेदार हाशिम खान ने जगन्नाथ मंदिर पर हमला किया। यह जगन्नाथ मंदिर पर किया गया सातवां हमला था। हांलाकि इस हमले से पूर्व ही मूर्तियों को जगन्नाथ मंदिर से तकरीबन 50 किलोमीटर दूर खुर्दा के गोपाल मंदिर में छुपा दिया गया। तत्पश्चात 1608 ई. में इन मूर्तियों को जगन्नाथ मंदिर में लाकर पुन: स्थापित किया गया।
8. जगन्नाथ मंदिर पर आठवां हमला एक हिंदू जागीरदार ने किया जो हाशिम खान की सेना में काम करता था। हांलाकि उस वक्त मंदिर में मूर्तियां मौजूद नहीं थीं। मंदिर का धन लूटने के बाद उसे एक किले में तब्दील कर दिया गया।
9. जगन्नाथ मंदिर पर नौंवा हमला साल 1511 में मुगल बादशाह अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल के पुत्र राजा कल्याणमल ने किया था। इस दौरान भी मंदिर के पुजारियों ने मूर्तियों को बंगाल की खाड़ी स्थित एक द्वीप में छुपा दिया था।
10. साल 1617 में जगन्नाथ मंदिर पर दसवां हमला भी राजा टोडरमल के पुत्र कल्याणमल ने ही किया था। ओडिशा के सूबेदार कल्याणमल ने इस हमले में जगन्नाथ मंदिर को बुरी तरह लूटा था। हांलाकि इस बार भी मूर्तियों को सुरक्षित स्थानांतरित कर दिया गया। यद्यपि कल्याणमल के हमलों से मंदिर की रथयात्रा नहीं हो सकी थी।
11. मुगल बादशाह जहांगीर के सेनापति मुकर्रम खान ने साल 1617 में जगन्नाथ मंदिर पर हमला किया था। जगन्नाथ मंदिर पर किया गया यह 11वां हमला था। इस दौरान जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को गोबापदार नामक जगह पर छुपा दिया गया था।

12. जगन्नाथ मंदिर पर बारहवां हमला ओडिशा के मुगल सूबेदार मिर्जा अहमद बेग ने साल 1621 में किया। मिर्जा अहमद बेग को मुगल बादशाह जहांगीर के काल में ओडिशा का सूबेदार बनाया गया था।
13. ओडिशा के मुगल सूबेदार मिर्जा मक्की ने साल 1641 में जगन्नाथ मंदिर पर हमला किया। यह जगन्नाथ मंदिर पर किया गया 13वां हमला था।
14. जगन्नाथ मंदिर पर चौदहवां हमला भी मिर्जा मक्की ने ही किया था।
15. जगन्नाथ मंदिर पर पन्द्रहवां हमला अमीर फतेह खान द्वारा किया गया। इस हमले में उसने मंदिर के रत्नभंडार में मौजूद हीरे, मोती और सोने लूट लिए।
16. मुगल बादशाह औरंगजेब ने साल 1692 में जगन्नाथ मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त करने का फरमान जारी किया। उन दिनों ओडिशा के नवाब इकराम खान ने मंदिर पर हमला कर भगवान जगन्नाथ का स्वर्ण मुकुट लूट लिया। हांलाकि जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को बिमला मंदिर में छुपा दिया गया था।
17. जगन्नाथ मंदिर पर 17वां हमला ओडिशा के सूबेदार मुहम्मद तकी खान ने साल 1699 में किया था। इस बार भी भगवान की मूर्तियों को सुरक्षित स्थान पर छुपा दिया गया।
18. ब्रिटिश काल में जगन्नाथ मंदिर को 18वां एवं अंतिम हमला झेलना पड़ा। दरअसल अलख पंथ के कुछ सदस्यों ने जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को क्षति पहुंचाने की कोशिश की थी, किन्तु पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए।
जगन्नाथ मंदिर के अकूत खजाने का स्रोत
पहला सवाल यह उठता है कि जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार में मौजूद सोने-चांदी और हीरे के स्वर्ण आभूषणों के अतिरिक्त अन्य रहस्यमयी खजाने किसके थे? दरअसल गंगवंश के राजा अनन्तवर्मन देव ने 12वीं सदी में जगन्नाथ मंदिर की नींव रखी थी, कालान्तर में अन्य शासकों ने मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण करवाया।
जगन्नाथ मंदिर में मौजूद खजाने का एक बड़ा हिस्सा अलग-अलग कालखंड में राजाओं, महाराजाओं और श्रद्धालुओं द्वारा भेंट किया गया है। माना जाता है कि राजा अनंगदेव भीम ने भगवान जगन्नाथ को साढ़े चौदह लाख ग्राम सोना दान में दिया था। इसके अतिरिक्त सूर्यवंशी राजाओं ने भी भगवान जगन्नाथ को सोना-चांदी और कीमती रत्न दान में दिए थे।
एक शिलालेख के मुताबिक, 15वीं सदी में महाराजा कपिलेन्द्रदेव ने दक्षिण अभियान के बाद मंदिर को भरपूर दान दिया। कहा जाता है कि वह 16 हाथियों पर लदवाकर सोना-चांदी और कीमती रत्न मंदिर तक लाए थे। इसी तरह महाराजा रणजीत सिंह ने भी मंदिर के लिए सोना दान दिया था, जो कि मात्रा में स्वर्ण मंदिर अमृतसर से भी ज्यादा था।
कहा जाता है, महाराजा रणजीत सिंह ने जगन्नाथ मंदिर को कोहिनूर हीरा दान करने की भी इच्छा जताई थी। इस प्रकार 14वीं से 18वीं सदी के बीच जगन्नाथ मंदिर में इतना स्वर्ण आभूषण जमा हो गया था, जिससे लूटने के लिए विदेशी आक्रान्ताओं की होड़ मच गई।

रत्न भंडार में मौजूद खजाने की गणना
जगन्नाथ मंदिर के भीतरी रत्न भंडार को पहली बार साल 1978 में खोला गया था। साल 1978 में की गई गिनती के मुताबिक, मंदिर के भीतरी रत्नभंडार में तकरीबन 45 किलो के 367 सोने के जेवर और तकरीबन 184 किलो के 231 चांदी के जेवर मौजूद थे।
तकरीबन 46 साल बाद जुलाई, 2024 में मंदिर के बाहरी और आंतरिक कक्षों को खोला गया, जिसमें भारी मात्रा में बेशकीमती आभूषण और बहुमूल्य रत्न मिले। अब तकरीबन 48 साल बाद 2026 में एक बार फिर से इस रत्न भंडार को खोला गया है।
जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार से 4 आलमारी और 3 सन्दूकें निकली हैं। रत्न भंडार में मौजूद दुर्लभ रत्नों तथा बेशकीमती आभूषणों की गणना के लिए 3D मैपिंग, वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी का सहारा लिया जा रहा है। अधिकारियों के संरक्षण में रत्न भंडार में मौजूद खजाने की पूरी सूची तैयार की जा रही है।
क्या गुप्त तहखानों में भी मौजूद है अकूत खजाना
जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों का कहना है कि राजा लोग जीत में मिले सोने-चांदी के मुकुट, बेशकीमती आभूषण, सिंहासन तथा हीरे-जवाहररात आदि रत्न भंडार में ही रखते थे। मंदिर पुजारियों के मुताबिक, “जगन्नाथ मंदिर के खजाने में अत्यधिक सोना-चांदी व बहुमूल्य रत्न होने की वजह से विदेशी आक्रान्ता बार-बार इस पर हमला करते थे।” जगन्नाथ मंदिर के पुजारी पंडित सोमनाथ बड़े दावे के साथ कहते हैं कि “मंदिर पर हुए 18 हमलों के बावजूद यह भारत का सबसे धनी मंदिर है।”
मंदिर के अकूत खजानों में कई गुप्त चैंबर (secret chambers) और एक रहस्यमयी सुरंग होने का भी दावा किया जाता है। सबसे पहले साल 2018 में तकरीबन सोलह लोग एक ख़ुफ़िया अंधेरी सुरंग में अन्दर रहे थे, उनका मकसद था खुफिया तहखाने तक पहुंचना। ऐसी धारणा है कि जगन्नाथ मंदिर के खुफिया तहखाने की सुरक्षा विषधर सर्प करते हैं, इसलिए वे लोग अपने साथ सांप पकड़ने वाले भी ले गए किन्तु तहखाने तक पहुंचने के बाद पता चला कि चाबी ही गायब है।
लोगों का कहना है कि जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार से सांपों की फूंकार सुनाई देती है। उस जगह एक हांडी में महाप्रसाद भी रखा जाता है, किन्तु आज तक यह अज्ञात है कि इसे कौन खा जाता है। पुजारी बासुदेव कहते हैं कि हम लोग महीने में 15 दिन रत्नभंडार के समक्ष की काम करते हैं, इस दौरान जब जगन्नाथ जी की लाइट काट दी जाती है, तब धूप अंधेरे में कई रहस्यमयी आवाजें सुनाई देती हैं।
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