कादिरी सिलसिले (Qadiri Silsila) की स्थापना 12वीं सदी में शेख अब्दुल कादिर अल जिलानी (1077-1166 ई.) ने बगदाद में की थी। महान सूफी संत शेख अब्दुल कादिर अल जिलानी को 'पीरान-ए-पीर' (संतो के संत ) तथा 'पीर-ए-दस्तगीर' (मददगार संत) आदि की उपाधियों से नवाजा गया था।
कादिरी सिलसिला सुन्नी इस्लाम का पहला रहस्यवादी, उदारवादी और 'वहदत-अल-वजूद' (सर्वेश्वरवाद) के सिद्धान्त का समर्थक था। वहदत-अल-वजूद से तात्पर्य है — “भगवान सर्वव्यापी है और सब में उसी की झलक है, उससे कुछ भी अलग नहीं है, सभी मनुष्य समान हैं”। ईश्वर के प्रति प्रेम और आंतरिक शुद्धि कादिरी सिलसिले की प्रमुख शिक्षाओं में से एक है। यह सिलसिला परोपकार, विनम्रता, धर्मपरायणता और संयम पर बल देता है।
भारत में कादिरी सिलसिले की शुरूआत 15वीं-16 वीं शताब्दी में मुहम्मद गौस ने उच्छ (सिन्ध) में की जिसमें शाह नियामतउल्ला ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। शाह नियमतुल्लाह ने इस सिलसिले को भारत में ज्यादा लोकप्रिय बनाया। दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी ने अपनी पुत्री की शादी मुहम्मद गौस से कर दी।
शेख मीर मुहम्मद उर्फ मियां मीर (मृत्यु 1635 ई.) कादिरी सिलसिले के भारत में सबसे प्रसिद्ध संत थे। कहते हैं मियां मीर के शिष्य गुरु अर्जुन देव भी थे। मियां मीर ने ही अमृतसर में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। मियां मीर के एक शिष्य मुल्ला शाह ने इस मत का प्रचार कश्मीर में किया। बादशाह शाहजहां भी मुल्ला शाह का आदर करता था।
राजकुमार दारा शिकोह भी कादिरी सिलसिले का अनुयायी था। दारा शिकोह ने लाहौर में मियां मीर से मुलाकात की थी। मियां मीर की मृत्यु के पश्चात दारा शिकोह ने मुल्ला शाह की शिष्यता ग्रहण की।
यद्यपि कादिरी सूफी साधक रूढ़िवादी (गाने-बजाने के घोर विरोधी) थे किन्तु दारा शिकोह बड़ा ही उदारवादी था। दारा शिकोह के संरक्षण में यह सिलसिला मुग़ल काल में सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली बना।
दारा शिकोह ने अपनी कृति 'सफीनत-उल-औलिया' में विभिन्न सिलसिले के संतों का वर्णन किया है, जबकि उसकी कृति ‘सकीनत-उल-औलिया’ में भारत की कादिरी परम्परा के सूफियों का जीवन वर्णन है। दारा शिकोह के एक अन्य ग्रन्थ ‘मजमा-उल-बहरैन’ (दो समुद्रों का संगम) में हिन्दू और मुस्लिम सूफी मत का तुलनात्मक वर्णन है। अपने इस ग्रन्थ में दारा शिकोह ने यह दिखाने की कोशिश की है कि हिन्दू और सूफी पंथ के बीच क्या समानता है।
दारा शिकोह की बहिन जहांआरा बेगम भी मुल्ला शाह की शिष्य थी। जहांआरा बेगम ने ‘साहिबिया’ शीर्षक से मुल्ला शाह का जीवन वृत्तान्त लिखा और ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और उनके शिष्यों से सम्बन्धित घटनाओं का भी वर्णन किया।
दारा शिकोह की हत्या के पश्चात औरंगजेब का दौर आया किन्तु उसकी रूढ़िवादी नीतियों के कारण कादिरी सिलसिले को शाही संरक्षण मिलना बिल्कुल कम हो गया बावजूद इसके यह आम लोगों में लोकप्रिय बना रहा।
कादिरी सिलसिले के अन्य लोकप्रिय सन्तों में शेख दाऊद, शेख मूसा, और शेख अब्दुल माली कादिरी का नाम शामिल है। उर्दू के विख्यात कवि हसरत मोहानी और पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि मुहम्मद इकबाल भी कादिरी सिलसिले के ही अनुयायी थे। चूंकि कादिरी सिलसिले का प्रतीक चिह्न गुलाब है। लिहाजा इसके सदस्य अक्सर अपनी हरी पगड़ी (टोपी) पर गुलाब का चिन्ह अंकित करते हैं।
भारत में कादिरी सिलसिले का मुख्य केंद्र पंजाब (लाहौर) था। इस सिलसिले का प्रचार-प्रसार कश्मीर, उत्तर प्रदेश (आगरा, दिल्ली) एवं दक्कन (बीजापुर और गुलबर्गा) में सर्वाधिक हुआ। कादिरी सिलेसिले के अनुयायी भारत के अलावा बांग्लादेश, चीन, तुर्की, इंडोनेशिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बाल्कन, रूस, फिलिस्तीन के साथ पूर्वी-पश्चिमी और उत्तरी अफ्रीका में भी मौजूद हैं।
कादिरी सिलसिले का सांस्कृतिक योगदान
कादिरी सिलसिले ने आंतरिक शुद्धि, ईश्वर के प्रति प्रेम, परोपकार, विनम्रता और धर्मपरायणता जैसी समाज सेवा की शिक्षाओं को बढ़ावा दिया। यह दर्शन रूढ़िवादी उलेमाओं के विचारों के विपरीत था जिससे सामाजिक सौहार्द का मार्ग प्रशस्त हुआ।
कादिरी सूफी संतों ने वंचितों-गरीबों के उत्थान के लिए काम किया, दान-पुण्य को बढ़ावा दिया और लोगों की कठिनाइयों को कम करने में काफी मदद की जिससे यह सिलसिला आमजन के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। कादरी साधकों को अपने आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक एकीकरण के चलते विभिन्न सम्प्रदायों के बीच संवाद स्थापित करने में मदद मिली।
कादिरी सिलसिले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— कादिरी सिलसिले की स्थापना सर्वप्रथम बगदाद में किसने की थी — शेख अब्दुल कादिर अल जिलानी।
— भारत में कादिरी परम्परा का प्रवर्तक कौन था — मुहम्मद गौस।
— भारत में कादिरी सिलसिले का सबसे प्रसिद्ध संत — मियां मीर।
— मियां मीर का शिष्य मुल्ला शाह किसके गुरु थे— दारा शिकोह एवं उसकी बहन जहांआरा बेगम।
— दारा शिकोह की वह कृति जिसमें कादिरी सिलसिले के संतों का वर्णन है — सकीनत-उल-औलिया।
— जहांआरा की वह कृति जिसमें मुल्ला शाह का जीवन वृत्तान्त लिखा है — साहिबिया।
— कादिरी सिलसिले का प्रतीक चिह्न है — गुलाब।
— अमृतसर में स्वर्ण मंदिर की नींव किसने रखी थी — मियां मीर ने।
— गुरु अर्जुनदेव कादिरी सिलसिले के किस सूफी संत से प्रभावित थे — मियां मीर।
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