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the most brutal acts of the Mughal Emperor Akbar

मुगल बादशाह अकबर के क्रूरतम कारनामें जानकर दंग रह जाएंगे आप

मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार विसेन्ट आर्थर स्मिथ और स्टेनली लेनपूल के अति​रिक्त भारत के ज्यादातर इतिहासकारों ने मुगल बादशाह अकबर को महान बताने की कोशिश की है। यह सच है कि अनपढ़ होने के बावजूद बादशाह अकबर ने राजस्व एवं शासन से जुड़े नवीन और उदार सिद्धान्तों के प्र​तिपादन के साथ ही मुगल वंश को स्थायित्व प्रदान किया। किन्तु इस रोचक स्टोरी में आज हम आपको बादशाह अकबर के कुछ ऐसे क्रूरतम कारनामों से अवगत कराने जा रहे हैं, जो उसके स्वर्णिम इतिहास पर काला धब्बा माने जाते हैं।

1. चित्तौड़ नरसंहार  :  30,000 राजपूतों का कत्ल

चित्तौड़ नरसंहार बादशाह अकबर के नाम पर एक बड़ा धब्बा है, जिसे धोने के लिए उसने आगरा किले के द्वार पर दो राजपूत सरदारों जयमल और फतह सिंह (फत्ता) की हाथी पर बैठी हुई मूर्तियां लगवाईं।  बादशाह अकबर ने 23 अक्टूबर 1567 को चित्तौड़ पर आक्रमण किया। मुगलों की घेराबन्दी के दौरान राजपूत सरदारों की सलाह पर राणा उदय सिंह किले से सुरक्षित निकलकर जंगलों में चले गए। जबकि चित्तौड़ किले की रक्षा का भारत जयमल राठौड़ एवं फत्ता (फतेह सिंह) सिसोदिया के कंधों पर था।

तकरीबन पांच महीने की जबरदस्त घेराबन्दी के बावजूद मुगलों को कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी। किन्तु एक रात जब जयमल राठौड़ चित्तौड़ किले की मरम्मत करवा रहा था, तभी अकबर ने अपनी संग्राम नामक बन्दूक से सेनापति जयमल को गोली मार दी, जिससे वह बुरी तरह घायल हो गया और उसकी मृत्यु हो गई।

तत्पश्चात उसी रात राजपूतों की हार सुनिश्चित देखकर किले की स्त्रियों ने जौहर कर लिया और प्रात:काल ही फत्ता (फतेह सिंह) की अगुवाई में  8,000 से अधिक राजपूत योद्धा केसरिया वस्त्र पहनकर मुगलों से जमकर युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए। फिर क्या था, अकबर ने तकबरीन 300 हाथियों के साथ किले में प्रवेश करते ही नरसंहार का आदेश दिया।

इस हत्याकाण्ड में तकरीबन 8 हजार राजपूत योद्धाओं के अतिरिक्त 30000 लोग कत्ल कर दिए गए। कहते हैं, अकबर ने मारे गए हिंदुओं की जनेऊ एकत्रित करवाई, जिसका कुल वजन 74.5 मन निकला, जो इस नरसंहार की भयावहता को दर्शाता है।

2. अकबर ने राजपूत सरदारों को कोड़े मारे

'दलपत विलास' मध्यकालीन इतिहास की एकमात्र ऐसी रचना है, जिससे हमें जानकारी मिलती है कि क्रोधित अकबर एक बार अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठा था। यह घटना है मई, 1578 के शुरूआती महीने की जब एक दिन मुग़ल बादशाह अकबर अत्यन्त गुस्से में था। इस असाधारण घटना का जिक्र अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुलफजल ने अकबरनामा में भी किया है।

दरअसल मुगल बादशाह अकबर मई, 1578 में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त स्थित झेलम नदी के पास दो हफ़्तों से डेरा डाले हुए था। इस दौरान 'क़मरग़ा' (मशहूर शिकार) के दूसरे दिन अकबर सुबह अकेले ही निकल पड़ा था, ​यानि उसके साथ कोई भी दरबारी नहीं था। जब अकबर अस्थायी पड़ाव पर लौटा, जहाँ दरबार ठहरा हुआ था, तो उसके राजपूत सरदार (ठाकुर) कबड्डी खेल रहे थे। ठाकुर सरदारों को लगा कि शायद अकबर भी उनके खेल में शामिल होगा लेकिन अकबर झेलम नदी में स्नान करने चला गया।

अकबर जब स्नान करके लौटा तब उसने राजपूत सरदार दांजी को देर से आने के कारण चार-पाँच कोड़े मारे। इसके बाद उसने पृथ्वीदीप कछवाहा को सात-आठ कोड़े मारे। इतना ही नहीं, अकबर ने दो राजपूतों युवकों तथा उनके कुछ सेवकों को भी कोड़े लगाने के निर्देश दिए। 

इतना ही नहीं, अकबर ने पृथ्वीदीप कछवाहा के चाचा रणधीरोत को भी कोड़े लगाने के निर्देश दिए, तत्पश्चात आत्मग्लानि में रणधीरोत ने स्वयं को तीन बार कठार घोप ली। अकबर इतने पर भी  शान्त नहीं हुआ, उसने उसे हाथी से कुचलने का आदेश दिया।

जब कुंवर मानसिंह ने बादशाह अकबर के चरणों को (अभिवादन के रूप में) स्पर्श किया, तो अकबर मानसिंह से कहा- ‘देखो ! इस राजपूत कमीने ने क्या किया— “इसने अपने पेट में छुरा घोंप लिया। अगर यह जीवित है, तो इसके घाव पर पट्टी बँधवा दो। अगर यह मर गया है, तो लकड़ी और कफ़न का इंतज़ाम करो।हांलाकि पृथ्वीदीप कछवाहा का चाचा रणधीरोत मर चुका था।

3. अकबर ने चचेरे भाई को दी फांसी

बादशाह अकबर ने युद्ध के दौरान दुश्मन सैनिकों की बर्बर हत्याएं कीं। इसके अलावा वह मुगलिया तख्त को सुरक्षित रखने के लिए अपनों का कत्ल करने से भी नहीं चूका। यह घटना है, साल 1560 की जब अकबर के आदेश पर सेनापति एवं संरक्षक बैरम खां ने उसके चचेरे भाई अबुल कासिम मिर्ज़ा (कामरान मिर्ज़ा का पुत्र) को फांसी दे दी।

दरअसल  19 मार्च, 1560 को बादशाह अकबर जब शिकार पर गया हुआ था, तब बैरम खान ने अबुल-कासिम मिर्ज़ा को फांसी पर लटका दिया। यह कार्रवाई उस समय के राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और उत्तराधिकार संघर्ष का परिणाम मानी जाती है।

4. अहमदाबाद में नरमुंडों की मीनार

मुगल बादशाह अकबर ने साल 1572-1573 ई. में गुजरात पर विजय प्राप्त की थी। इस विजय के उपलक्ष्य में उसने फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा बनवाया था। गुजरात अभियान के दौरान अकबर महज 11 दिनों में आगरा से अहमदाबाद पहुंच गया था। ​ब्रिटिश इतिहासकार आर्थर स्मिथ ने अकबर के गुजरात अभियान कोसंसार के इतिहास का सर्वाधिक द्रुतगामी आक्रमणकहा है।

अकबर ने व्यक्तिगत रूप से गुजरात अभियान का नेतृत्व किया और 1573 तक सूरत, अहमदाबाद और कैम्बे जैसे प्रमुख शहरों पर कब्जा कर लिया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, अकबर ने गुजरात अभियान के दौरान विद्रोहियों को कुचलने के लिए 2 सितंबर 1573 को अहमदाबाद के पास साबरमती नदी के तट पर 2,000 से अधिक नरमुंडों की मीनार (स्तूप) बनवाई थी।

5.  अफगानी योद्धा दाऊद खां के धड़ को दीवार में चुनवा दिया

किताब 'तारीख-ए-मगध' के अनुसार, अफगानी पठान दाऊद खां खुद को एक स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित करना चाहता था। 28 वर्षीय योद्धा दाऊद खां की ताकत का अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उसके पास 1 लाख 40 हजार पैदल सैनिक (प्यादा), 3600 हाथी और 20 हजार तोपों की विशाल फौज थी।

इस बात की भनक जब बादशाह अकबर को लगी तब उसके गवर्नर मुनीम खां ने धोखे से उसकी गर्दन काट दी। इसके बाद उसने दाऊद का सिर अकबर के कदमों में पेश किया। तत्पश्चात अकबर ने अफगानी पठान दाऊद खां के धड़ को उसी तलवार के साथ दीवार में खड़ा करके चुनवा दिया।

बिहार के नालंदा स्थित उगावां गांव में अफगानी योद्धा दाऊद खां पुरानी खड़ी कब्र आज भी मौजूद है। यही वजह है कि दाऊद खां क्रियान्वी की कब्र को 'खड़ी कब्र' के रूप में जाना जाता है, जबकि सिर किसी दूसरी जगह दफ़न है।

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