दिसम्बर 1911 में ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम और महारानी मेरी के भारत आगमन पर उनके स्वागत हेतु वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने दिल्ली के कोरोनेशन पार्क में एक भव्य दरबार का आयोजन किया था, यह घटना भारतीय इतिहास में ‘दिल्ली दरबार’ के नाम से विख्यात है।
अंग्रेजी शासनकाल में भारत आने वाले इकलौते ब्रिटिश सम्राट थे जार्ज पंचम। साल 1911 में 7 से 16 दिसंबर तक चलने वाले दिल्ली दरबार का आधिकारिक समारोह एक भव्य आयोजन में तब्दील हो चुका था। 1911 के दिल्ली दरबार में देश के तकरीबन सभी राजा, महाराजा, राजकुमार, नवाब तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों सहित सभापति आदि सम्राट जार्ज पंचम एवं क्वीन मैरी के प्रति आदर व्यक्त करने पहुंचे थे।
दिल्ली दरबार में 12 दिसम्बर 1911 को सम्राट जार्ज पंचम ने बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा की तथा कलकत्ता की जगह दिल्ली को भारत की नई राजधानी बनाने की अनुमति प्रदान की। तत्पश्चात 1 अप्रैल 1912 को कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली भारत की नई राजधानी बनी।
बंगाल विभाजन रद्द होने के बाद उड़ीसा और बिहार को बंगाल से अलग कर दिया गया। असम को पुन: 1874 की स्थिति में लाया गया, अब असम में सिलहट भी शामिल था।
दरअसल ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की शक्ति और वैभव को प्रदर्शित करने वाले दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम ने 6100 हीरे, माणिक, नीलम और पन्ना जड़ित इम्पीरियल मुकुट पहना था जिसका कुल वजन एक किलो से अधिक था। साथ ही एक शनील और मिनिवर टोपी भी थी, जिसका वजन 965 ग्राम था।
जबकि महारानी मेरी के लिए तैयार किए गए मुकुट में प्लैटिनम और सोने में जड़े 2,200 हीरे के स्क्रॉल और झालरें थीं, साथ ही 10 पन्ना की बूंदें भी थीं। महारानी मेरी के हार में जड़ा एक -एक हीरा 8.8 कैरेट का मार्क्यूज़ हीरा था, जिसे कुलिनैन सप्तम बुलाया गया। इसके अलावा पटियाला की महारानी ने भी देश की सभी महिलाओं की तरफ क्वीन मेरी को गले का एक खूबसूरत हार भेंट किया था।
ब्रिटिश सम्राट एवं रानी के इम्पीरियल मुकुट को तैयार करने का काम लंदन के शाही जौहरी गैराल्ड एंड कंपनी को सौंपा गया था। ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम एवं रानी मेरी उस सिंहासन पर बैठे थे जिन्हें 96000 चांदी के रुपए पिघलाकर ढाला गया था तथा उन पर सोने की परत चढ़ाई गई थी। इस शाही सिंहासन को राज्याभिषेक के लिए कलकत्ता के शाही टकसाल में तैयार किया गया था। जब जार्ज पंचम और क्वीन मेरी लाल किले के एक झरोखे में दर्शन के लिए आए तक वहां दस लाख से अधिक लोग उपस्थित थे।
उत्तरी दिल्ली के कोरोनेशन पार्क में आयोजित 1911 के दिल्ली दरबार में तकरीबन 26,800 पदक ब्रिटिश रेजिमेंट के अफसरों तथा सैनिकों को वितरित किए गए। वहीं भारतीय रियासतों के शासकों तथा उच्च पदस्थ अधिकारियों को छोटी संख्या में स्वर्ण पदक प्रदान किए गए। 12 दिसंबर, 1911 को आयोजित दिल्ली दरबार भारत में ब्रिटिश सरकार द्वारा आयोजित राज्याभिषेक समारोहों की श्रृंखला का तीसरा और अंतिम समारोह था।
इससे पूर्व 1 जनवरी 1877 को महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी के रूप में मान्यता देने के लिए दिल्ली के लाल किले में पहला समारोह आयोजित किया गया था जबकि साल 1903 में एडवर्ड सप्तम के सम्मान में दूसरा समारोह आयोजित किया गया था। हैरानी की बात है कि कलकत्ता शहर अंग्रेजों की गतिविधियों और सत्ता का केंद्र था, बावजूद इसके तीनों दरबार दिल्ली में ही आयोजित किए गए।
16 दिसम्बर 1911 को दिल्ली दरबार के समापन अवसर पर शाही परिवार को 101 तोपों की सलामी दी गई और एक अन्य जुलूस निकाला गया। 17 दिसम्बर को वाइसरीगल लॉज (अब राष्ट्रपति भवन) में एक गार्डन पार्टी आयोजित की गई थी। जबकि 18 दिसंबर को भारतीय राजकुमारों और प्रमुखों के लिए एक दरबार आयोजित किया गया, जहाँ उन्होंने ब्रिटिश सम्राट को श्रद्धांजलि अर्पित की।
वहीं 19 दिसंबर, 1911 को आम जनता के लिए एक दरबार आयोजित किया गया, जहाँ राजा और रानी 100,000 से अधिक लोगों की भीड़ के सामने उपस्थित हुए। 20 दिसंबर, 1911 को राजा और रानी दिल्ली से स्वदेश प्रस्थान कर गए।
प्रथम विश्वयुद्ध में भारत की समस्त राजनीतिक पार्टियों ने ब्रिटेन का साथ दिया। उदारवादियों ने इस उम्मीद के साथ ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन किया ताकि उनके सहयोग के बदले उनकी स्वशासन की मांग को पूरा किया जाएगा।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिए धन तथा सेना में भारतीय सैनिकों की भर्ती के लिए गांवों का दौरा किया था। लिहाजा गांधीजी को सेना में भर्ती करने वाला ‘सार्जेन्ट’ कहा जाने लगा। ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी को ‘केसर-ए-हिन्द’ की उपाधि दी।
प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन द्वारा टर्की के विरूद्ध युद्ध की घोषणा से मुस्लिम लीग का सरकार से मोहभंग हो गया तथा लीग अब कांग्रेस के नजदीक आने लगी।
दिल्ली दरबार से जुड़ी रोचक जानकारियां
— ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम एवं महारानी मेरी की भारत यात्रा पर तकरीबन 700,000 पाउंड (90144810 रुपए) से अधिक खर्च हुए जिसे भारत सरकार ने ही वहन किया।
— दिल्ली दरबार में शामिल होने वाले मेहमानों के लिए उत्तरी दिल्ली के 30 गांवों को हटाकर एक नया अस्थायी शहर बनाया गया था।
— 25 वर्ग मील में फैला तकरीबन 40,000 तंबूओं से युक्त यह अस्थायी शहर दिल्ली दरबार का एक हिस्सा था जिन्हें क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित किया गया था।
— हैदराबाद के निज़ाम ने स्वयं के लिए एक विशेष परिसर बनवाया था जिस पर तकरीबन 100,000 पाउंड खर्च हुए। ध्यान देने योग्य है कि उन दिनों हैदराबाद महामारी के संकट से जूझ रहा था।
— दिल्ली दरबार के लिए बनी सड़कों और शिविरों के ठेकेदार राय बहादुर नारायण सिंह थे, जो आगे चलकर लुटियंस दिल्ली के प्रमुख निर्माताओं में से एक थे।
— वायसराय लार्ड हार्डिंग द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार की शक्ति और वैभव ने मुगल दरबार की यादें ताजा कर दी जिसमें आलीशान पोशाकें, रत्नजड़ित सिंहासन, जड़ाऊ तथा सोने से मढ़े वास्तुशिल्पीय ढाँचे–स्तंभ और मेहराब आदि शामिल थे।
— ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम एवं क्वीन मेरी के शाही वस्त्रों को सम्भालने के लिए राजा-महाराजाओं के दस युवा राजकुमारों को सेवक के रूप में चुना गया था, जिसके लिए उन्हें कई दिनों तक प्रशिक्षण दिया गया था।
— दिल्ली दरबार में सिर्फ पटियाला के महाराजा ने ही पाँच करोड़ रुपए के आभूषण पहने थे।
— दिल्ली दरबार में भोपाल की बेगम भी उपस्थित थीं, जिन्होंने सिर से पैर तक सोने के वस्त्र से अपना आवरण ढका हुआ था।
— बड़ौदा के गायकवाड़ महाराजा सयाजीराव ने ब्रिटिश सम्राट के सम्मुख केवल एक बार सिर हिलाकर अभिवादन किया और पीठ फेरकर और एक हाथ पतलून की जेब में डालकर, दूसरे हाथ में छड़ी घुमाते हुए चले गए। वायसराय हार्डिंग और अन्य ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके इस कृत्य को "राजद्रोह" समझा।
— मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह दिल्ली दरबार में भाग लेने के लिए दिल्ली गए थे, लेकिन केसरी सिंह बारहट द्वारा रचित चेतावनी ‘रा चूंगट्या’ (सोरठा) पढ़ने के बाद, उन्होंने दरबार में भाग न लेने का निर्णय लिया और उदयपुर लौट आए।
— ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम और महारानी मेरी के अपोलो बंदर पर आगमन की स्मृति में मुंबई में 31 मार्च 1911 को 'गेटवे ऑफ इंडिया' का निर्माण कार्य शुरू किया गया जो 1924 में बनकर पूरा हुआ।
— दिल्ली दरबार की कई प्रसिद्ध पेंन्टिग बनाने वाले चित्रकारों में मोर्टिमर मेनपेस, राजा रवि वर्मा, एडविन लॉर्ड वीक्स, चार्ल्स डिक्सन और विलियम ऑर्पेन का नाम शामिल है।
— दिल्ली दरबार की सबसे प्रसिद्ध पेंन्टिग का शीर्षक है- "द दिल्ली दरबार - द स्टेट एंट्री इन टू द एरेना” जिसे ब्रिटिश चित्रकार मोर्टिमर मेनपेस ने तैयार किया था।
— दिल्ली दरबार की एक उल्लेखनीय पेंटिंग राजा रवि वर्मा ने भी तैयार की, जिसका शीर्षक था- "1903 का दिल्ली दरबार"।
— उत्तरी दिल्ली का कोरोनेशन पार्क शहर के विस्तृत फैलाव एवं जबरदस्त ट्रैफिक के बावजूद वर्तमान में खाली पड़ा मैदान मात्र है, जहां यदा-कदा धार्मिक आयोजन व नगर महापालिकाओं के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
