बगदाद निवासी शेख़ शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी ने 12वीं शताब्दी में ‘सुहरावर्दी सिलसिले’ की स्थापना की। खलीफा अल-नासिर ने शेख़ शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी के लिए बगदाद में उद्यान और स्नानघर से युक्त आलीशान मठ (खानकाह) बनवाया था।
इतना ही नहीं, शेख़ शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी ने खलीफा की ओर से मिस्र के अय्यूबिद सुल्तान मलिक अल-आदिल प्रथम, बुखारा के ख्वारिज़्म-शाह मुहम्मद और कोन्या के सेल्जुक शासक कैकुबाद प्रथम के लिए राजदूत के रूप में कार्य किया।
शेख़ शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी ने अपने कई शिष्यों को सुहरावर्दी सिलसिले के प्रचार-प्रसार हेतु भारत भेजा। भारत में सुहरावर्दी सिलसिले के प्रवर्तक शेख बहाउद्दीन जकारिया (तकरीबन 1170-1262 ई.) थे। शेख बहाउद्दीन जकारिया के दादा शाह कमाल-उद-दीन अली शाह कुरैशी मक्का से मुल्तान आए थे। शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के शिष्य शेख बहाउद्दीन जकारिया तथा जलालुद्दीन तबरीजी ने मुल्तान और सिंध को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया।
बंगाल में सुहरावर्दी सिलसिले को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जलालुद्दीन तबरीजी को जाता है। जलालुद्दीन तबरीजी ने अपने खानकाह में लंगर (फ्री में भोजन) की व्यवस्था की थी, ऐसा कहा जाता है कि बंगाल में इस्लामीकरण की प्रक्रिया में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ज्यादातर विद्वानों का मानना है कि सुहरावर्दी सूफ़ियों ने स्थानीय शासकों की मदद से हिंदुओं को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया। सुहरावर्दी सम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र मुल्तान था। पंजाब, सिंध, गुजरात, बंगाल, हैदराबाद एवं बीजापुर के क्षेत्रों में सुहरावर्दी सिलसिले का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। हिन्दुस्तान में सुहरावर्दी सिलसिले की सबसे बड़ी उपस्थिति कश्मीर में थी। सुहरावर्दी सूफी सैयद शरफ-उद-दीन अब्दुल रहमान शाह उर्फ बुलबुल शाह ने कश्मीर के राजा रिंचन शाह को इस्लाम में परिवर्तित कर दिया था।
सहरावर्दी सिलसिला खुदा के सात नाम तथा हजारों जपों पर आधारित है। यह सम्प्रदाय सात सूक्ष्म आत्माओं और सात रोशनियों से सम्बद्ध है। अफ़ग़ानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप के बाद सुहरावर्दी सिलसिले की शाखाएं पश्चिम की तरफ बढ़ीं। सुहरावर्दी सिलसिले ने सूफी मत के प्रति अपने विशिष्ट दृष्टिकोण और राजनीतिक शक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित कर कई क्षेत्रों को प्रभावित किया।
चिश्ती सिलसिले के ठीक विपरीत सुहरावर्दी सिलसिले के संत विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे तथा सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेते थे। वे ‘शेख-उल-इस्लाम’ तथा ‘सद्र-ए-विलायत’ जैसे राजकीय पद भी ग्रहण करते थे। ये सूफी संत अपने परिवार के लिए सुविधाजनक व्यवस्था करते तथा पुत्रों की शिक्षा के लिए मोटे वेतन पर शिक्षकों की नियुक्ति करते थे। यद्यपि सुहरावर्दी सन्तों में भी शेख सदरूद्दीन जैसे लोग धन सम्पत्ति को ईश्वर भक्ति के रास्ते में बाधक मानते थे।
सुहरावर्दी संम्प्रदाय के संतों का समयानुसार दिल्ली सल्तनत, गुजरात सल्तनत और मुगल साम्राज्य के साथ मजबूत सम्बन्ध बने रहे। सल्तनत काल में पंजाब, सिंध और बंगाल सुहरावर्दी गतिविधियों के तीन प्रमुख केन्द्र थे। शेख बहाउद्दीन जकारिया मुल्तान के शासक नासिरूद्दीन कुबाचा के प्रशासन की खुलेआम आलोचना किया करते थे।
शेख बहाउद्दीन जकारिया ने मुल्तान के शासक नासिरूद्दीन कुबाचा के विरूद्ध सुल्तान इल्तुतमिश को सहायता दी। अत: इल्तुतमिश ने जकारिया को ‘शेख-उल-इस्लाम’ (इस्लाम का प्रमुख) की उपाधि प्रदान की तथा अनुदान की व्यवस्था की। शेख बहाउद्दीन जकारिया को सुल्तान इल्तुतमिश की तरफ से आधिकारिक राजकीय संरक्षण मिलने से दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक संरचनाओं में सुहरावर्दी सम्प्रदाय की स्थिति ज्यादा मजबूत हुई।
मुल्तान में खानकाह की स्थापना करने वाले शेख बहाउद्दीन जकारिया आत्मा की उन्नति के लिए व्रत रखने तथा शारीरिक कष्ट में तनिक भी विश्वास नहीं करते थे। बहाउद्दीन जकारिया की मृत्यु के पश्चात उनका पुत्र सद्रद्दीन आरिफ मुल्तान के सुहरावर्दी सम्प्रदाय की गद्दी पर बैठा। तत्पश्चात आरिफ का पुत्र शेख रूकनुद्दीन अब्लुफत मुल्तान शाखा की गद्दी पर बैठा। हमीदुद्दीन नागौरी भी सुहरावर्दी सिलसिले के प्रख्यात संत थे। सुहरावर्दी सिलसिले में शेख़ मूसा भी एक महत्त्वपूर्ण सूफ़ी संत हुए, जो सदैव स्त्री के वेश में रहते थे तथा नृत्य-संगीत में अपना समय व्यतीत करते थे।
जलाली शाखा की स्थापना
शेख बहाउद्दीन जकारिया के अनन्य शिष्य सैयद जलालुद्दीन बुखारी ने उच्छ (सिन्ध) में खानकाह स्थापित कर सुहरावर्दी सिलसिले के जलाली शाखा की स्थापना की। सैयद जलालुद्दीन बुखारी को ‘जलाल सुर्ख’ (लाल) या ‘सुर्ख-पोश बुखारी’ (बुखारा के लाल वस्त्रधारी) के नाम से भी जाना जाता है। चूंकि सैय्यद जलाल बुखारी हमेशा लाल चोगा पहनते थे इसीलिए उन्हें सुर्ख-पोश (लाल वस्त्रधारी) की उपाधि मिली।
ऐसा कहा जाता है कि 1198 ई. में जन्मे सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी ने 36 बार मक्का की यात्रा की। साथ ही जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी ने मिस्र, सीरिया, इराक और मक्का सहित कई अन्य देशों की यात्राएं पूर्ण की, इसीलिए सुर्ख बुखारी को ‘जहानियाँ जहां गश्त’ (विश्व का यात्री) की उपाधि से नवाजा गया। सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी को सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने ‘शेख-उल-इस्लाम’ (मुख्य काजी) के पद पर नियुक्त किया किन्तु वे पद त्याग कर हज के लिए मक्का चले गए।

सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी ने एक इस्लामी धर्म प्रचारक के रूप में आजीवन यात्राएं की तथा दक्षिणी पंजाब और सिंध क्षेत्रों में सम्मा, सियाल, चधार, दाहेर और वारार जनजातियों को इस्लाम में परिवर्तित किया। सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी तकरीबन 1244 ई. में अपने पुत्र बहा-उल-हलीम के साथ पंजाब के उच्छ में चले गए, जहाँ उन्होंने एक धार्मिक विद्यालय की स्थापना की।
1292 ई. में सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी की मृत्यु हो गई तत्पश्चात उनका पुत्र शेख जलालुद्दीन मखइन जहांनियां उच्छ की सुहरावर्दी गद्दी पर बैठा। सैयद जलालुद्दीन बुखारी के वंशजों तथा शिष्यों ने सुहरावर्दी सिलसिले को कालपी, गुजरात और विशेष रूप से दिल्ली तक फैलाया, जिससे उत्तरी भारत में सुहरावर्दी केन्द्रों का एक नेटवर्क स्थापित हुआ।
सैयद जलालुद्दीन बुखारी को उच्छ में ही दफनाया गया था किन्तु घग्गर-हाकरा नदी की भयंकर बाढ़ से उनकी कब्र क्षतिग्रस्त हो गई तत्पश्चात उनके कब्र को कत्तल शहर में स्थानांतरित कर दिया गया। मुहम्मद नासिर-उद-दीन के पुत्र सज्जादा नशीन मखदूम हामिद ने बुखारी के अवशेषों को पुन: उच्छ में स्थापित कर, उसके ऊपर एक शानदार कब्र का निर्माण करवाया। बाद में, इस कब्र का पुनर्निर्माण 1670 ई. में बहावलपुर के नवाब बहावल खान द्वितीय ने करवाया।
कश्मीर में सुहरावर्दी सिलसिले का विस्तार
भारत में सुहरावर्दी सिलसिले की सर्वाधिक उपस्थिति कश्मीर में देखने को मिली। सूफी सैयद शरफ-उद-दीन अब्दुल रहमान शाह उर्फ बुलबुल शाह ने 1320 ई. में कश्मीर में सुहरावर्दी सिलसिले की शुरूआत की।
सुहरावर्दी सिलेसिले के विस्तार के साथ ही बुलबुल शाह ने कश्मीर में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की नींव रखने व बंधुत्व की भावना का प्रचार-प्रसार करने में महत्वपूर्ण निभाई। कश्मीर के राजा रिंचन शाह का इस्लाम में धर्मान्तरण बुलबुल शाह की मुख्य उपलब्धि मानी जाती है। इस शाही धर्मान्तरण से कश्मीर क्षेत्र में सुहरावर्दी सम्प्रदाय के प्रतिष्ठा और प्रभाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
इतिहासकारों के मुताबिक सुहरावर्दी सूफी बुलबुल शाह के विचारों में बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और इस्लाम का सम्मिश्रण शामिल था, जिसके चलते उन्होंने काशगर तथा लद्दाख के राजकुमार रिंचन शाह को काफी प्रभावित किया। जिस दौर में कश्मीर की जनता सामंतवाद, भारी करों तथा राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रही थी, बुलबुल शाह के विचारों ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया जिससे सुहरावर्दी सम्प्रदाय के विस्तार में काफी आसानी हुई।
शेख शर्फुद्दीन याह्या मनैरी
भारतीय इतिहास में शेख शर्फुद्दीन याह्या मनैरी 13वीं शताब्दी के प्रमुख सूफी संत थे। बतौर महान मुस्लिम नेता शरफुद्दीन याह्या मनैरी ने सुहरावर्दी सिलसिले का खूब प्रचार-प्रसार किया। फारसी, अरबी और अन्य पारंपरिक विद्याओं के जानकार शेख शर्फुद्दीन याह्या मनैरी ने अपना सम्पूर्ण जीवन सुहरावर्दी सिलसिले के अध्यापन एवं संचालन में ही समर्पित कर दिया।
हज़रत फखरुद्दीन इराकी
कवि, लेखक, सूफी और साहित्यकार हज़रत फखरुद्दीन इराकी सूफीवाद के क्षेत्र में एक ऐसा नाम थे, जिन्होंने कई पारंपरिक सूफी प्रथाओं और कार्यों का विरोध किया। अपनी व्यापक यात्राओं के दौरान उन्होंने इस्लाम जगत की गम्भीर शिक्षाओं का गहन ज्ञान प्राप्त किया।
ईरान में जन्में हज़रत फखरुद्दीन इराकी ने शेख बहाउद्दीन सुहरावर्दी से ज्ञान प्राप्त किया था। हज़रत फखरुद्दीन इराकी ने तकरीबन 25 वर्षों तक अपनी शिक्षाओं से लोगों को प्रभावित किया।
सुहरावर्दी सिलसिले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— सुहरावर्दी सिलसिले के वास्तविक संस्थापक - बगदाद निवासी शेख़ शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी।
— सुहरावर्दी सिलसिले की प्रमुख विशेषता क्या है- आंतरिक शुद्धि पर जोर।
— सुहरावर्दी सिलसिला आध्यात्मिकता के किस पहलू को प्राथमिकता देता है - आध्यात्मिक मार्गदर्शन।
— भारत में सुहरावर्दी सिलसिले का प्रवर्तक - शेख बहाउद्दीन जकारिया।
— भारत में सुहरावर्दी सिलसिले के शुरूआती तीन मुख्य केन्द्र - मुल्तान, सिन्ध और पंजाब।
— सुहरावर्दी सूफी बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह कहां है - मुल्तान में।
— इल्तुतमिश ने किस सूफी को ‘शेख-उल-इस्लाम’ की उपाधि दी थी - बहाउद्दीन जकारिया।
— भारत में सुहरावर्दी सिलसिले के ‘जलाली शाखा’ की स्थापना किसने की - सैयद जलालुद्दीन बुखारी।
— सैयद जलालुद्दीन बुखारी के तीन अन्य उपनाम - जलाल सुर्ख, सुर्ख-पोश बुखारी और जहानियां जहां गश्त।
— सैयद जलालुद्दीन बुखारी किस रंग का चोगा पहनते थे - सुर्ख लाल।
— सैयद जलालुद्दीन बुखारी की उपाधि ‘जहानियां जहां गश्त’ से क्या तात्पर्य है - विश्व का यात्री।
— मुहम्मद बिन तुगलक ने किस सुहरावर्दी को मुख्य काजी नियुक्त किया था - सैयद जलालुद्दीन बुखारी।
— सैयद जलालुद्दीन बुखारी ने कितनी बार मक्का की यात्रा की- 36 बार।
— कौन थे वह सूफी सुहरावर्दी जो सदैव स्त्री के वेश में रहते थे - शेख़ मूसा।
— कश्मीर में सुहरावर्दी सिलसिले की शुरूआत किसने की- बुलबुल शाह।
— लद्दाख का वह राजकुमार जिसने बुलबुल शाह से प्रभावित होकर इस्लाम धर्म अपना लिया - रिंचन शाह।
— सुहरावर्दी सिलसिले का भारत की संस्कृति पर प्रभाव - सांस्कृतिक समन्वय में योगदान।
इसे भी पढ़ें : भारत में चिश्ती सिलसिले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
