इस सच से पूरी दुनिया वाकिफ है कि विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भारत की अमूल्य धरोहर है। कोहिनूर हीरा दिल्ली सल्तनत के कई सुल्तानों से लेकर मुगल बादशाहों तत्पश्चात ईरानी आक्रमणकारी नादिरशाह और फिर अफगानी लुटेरे अहमद शाह अब्दाली के पास पहुंचा। इसके बाद यह नायाब तोहफा महाराजा रणजीत सिंह के पास भी काफी अर्से तक रहा। आखिर में साल 1849 में इस बेशकीमती हीरे को ब्रिटिश सरकार ने हथिया लिया।
तत्पश्चात साल 1937 में कोहिनूर हीरे को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ के नए ताज में जड़ दिया गया, तब से लेकर आज तक यह अनमोल हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज की शोभा बढ़ाता आ रहा था। किन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि साल 2023 में किंग चार्ल्स तृतीय और महारानी कैमिला के राज्याभिषेक के दौरान कोहिनूर हीरे से जड़े ब्रिटिश ताज का इस्तेमाल नहीं किया गया।
हम सभी जानते हैं कि कोहिनूर हीरे को इंग्लैण्ड से भारत वापस लाने के सम्बन्ध में सदैव आधिकारिक स्तर पर मांगें उठती रहती हैं। कोहिनूर हीरे को इंग्लैण्ड कब वापस लौटाएगा, यह अभी भविष्य के गर्त में है। फिलहाल आप सोच रहे होंगे कि विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा सबसे पहले भारत के किस हिन्दू राजा के पास था और उसने यह अनमोल हीरा एक ताकतवर हिजड़े को क्यों सौंप दिया? इस रोचक प्रश्न का उत्तर जानने के लिए कोहिनूर हीरे से जुड़ी यह स्टोरी जरूर पढ़ें।
सबसे पहले किस हिन्दू राजा के पास था कोहिनूर
12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दक्षिण भारत में तेलंगाना स्थित काकतीय राज्य का शासक प्रताप रुद्रदेव था जिसकी राजधानी वारंगल थी। काकतीय राजवंश के अंतिम सम्राट प्रताप रुद्रदेव (1289 से 1323 ई. तक) को भारतीय इतिहास में ‘रुद्रदेव द्वितीय’ के नाम से भी जाना जाता है।

कहते हैं, विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा सर्वप्रथम वारंगल स्थित मंदिर में काकतीय राजवंश की कुलदेवी भद्रकाली की बाई आंख में जड़वाया गया था। कोहिनूर हीरा कभी काकतीय राजवंश के शाही खजाने का मुख्य आकर्षण था। काकतीय शासक प्रताप रुद्रदेव के बाद पश्चात कोहिनूर हीरा दिल्ली के कई सुल्तानों एवं मुगल बादशाहों, तत्पश्चात ईरानी आक्रमणकारी नादिरशाह और फिर अफगानी लुटेरे अहमद शाह अब्दाली के पास पहुंचा। इसके बाद यह नायाब तोहफा महाराजा रणजीत सिंह के पास भी काफी अर्से तक रहा। साल 1849 में कोहिनूर ब्रिटिश सरकार के हाथों में चला गया।
विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा सबसे पहले आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित गोलकोंडा की खदान में 13 फीट की गहराई में मिला था। इतिहासकारों के मुताबिक, कोहिनूर हीरे की आजतक कोई कीमत नहीं लगा पाया। कोहिनूर को या तो बाहुबल से जीता गया या फिर लूटा गया। शुरूआत में कोहिनूर हीरा तकरीबन 186 कैरेट का था, किन्तु इस बेशकीमती हीरे को कई बार तराशा गया। ऐसे में अब कोहिनूर 105.6 कैरेट का है, जिसका कुल वजन महज 21.12 ग्राम रह गया है।
प्रताप रुद्रदेव ने किस हिजड़े को सौंपा था कोहिनूर
दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने साल 1309 ई. के नवम्बर महीने में अपने ताकतवर सेनापति मलिक काफूर को तेलंगाना पर आक्रमण करने के लिए भेजा। मलिक काफूर दिसम्बर महीने में देवगिरी पहुंच गया। देवगिरी के राजा रामचन्द्र देव ने मलिक काफूर के लिए रसद की व्यवस्था की तथा मराठा सैनिकों को भी उसके साथ भेजा, साथ ही स्वयं भी कुछ दूर तक मलिक काफूर के साथ गया।
मलिक काफूर ने हीरों (Diamonds) की खानों के जिले भैरागढ़ के रास्ते तेलंगाना में प्रवेश किया। मार्ग में मलिक काफूर ने सिरपुर किले को भी फतह किया और जनवरी 1310 ई. में वह तेलंगाना की राजधानी वारंगल के निकट पहुंच गया।

वारंगल का किला पहले मिट्टी की और उसके बाद पत्थर की प्राचीर से सुरक्षित था। इतना ही नहीं, वारंगल किले के चारों तरफ पानी से भरी हुई खाईं थी, बावजूद इसके प्रताप रुद्रदेव अपने दुश्मन के समक्ष किले की रक्षा नहीं कर सका और सन्धि की इच्छा प्रकट की।
प्रताप रुद्रदेव ने स्वयं की एक सोने की मूर्ति बनवाकर उसके गले में सोने की जंजीर डालकर आत्मसमर्पण के लिए मलिक काफूर के पास भेजा। फिर क्या था, मलिक काफूर सन्धि के लिए राजी हो गया। तत्पश्चात प्रताप रुद्रदेव ने मलिक काफूर को 100 हाथी, 700 घोड़े तथा अतुल धनराशि प्रदान की, इसी के साथ अलाउद्दीन खिलजी की आधीनता स्वीकार की एवं वार्षिक कर (Annual Tax) देना भी कुबूल किया।
लूट में प्राप्त हुई अपार सम्पत्ति को ऊंटों पर लादकर मलिक काफूर मार्च, 1310 ई. में उत्तर भारत लौटा। इतिहासकार खाफी खां लिखता है कि “इसी अवसर पर प्रतापरूद्रदेव ने मलिक काफूर को विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी दिया था, जिसे काफूर ने अपने स्वामी अलाउद्दीन खिलजी को सौंप दिया।”
सेनापति मलिक काफूर था एक हिजड़ा
साल 1299 ई. में गुजरात सैन्य अभियान के दौरान सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को मलिक काफूर नामक एक नायाब तोहफा भी मिला। दरअसल अलाउद्दीन खिलजी के सैन्य कमांडर नुसरत खां ने जब बन्दरगाह खम्भात पर कब्जा किया, ठीक उसी दौरान उसने हिन्दू से मुसलमान बनाए गए एक खूबसूरत हिजड़े मलिक काफूर को हजार दीनार में खरीदा था।
यही वजह है कि मलिक काफूर को ‘हजार दीनारी’ भी कहा जाता था। इतिहासकार अब्दुल मलिक ईसामी लिखता है कि “जवानी के दिनों में मलिक काफूर खम्भात के एक धनी ख्वाजा का गुलाम था। अत: बेहद खूबसूरत दिखने वाले गुलाम मलिक काफूर को नपुंसक बना दिया गया था।”
जेएनयू के प्रोफेसर नजफ हैदर के मुताबिक, “उस दौर में काफूर हिजड़ों के ही नाम हुआ करते थे। उन दिनों जिन लोगों को बधिया (कैस्ट्रेशन) से हिजड़ा बनाया जाता था, उनकी तीन श्रेणियां हुआ करती थीं, उसी कैटेगिरी के हिसाब से ऐसा नाम मिलता था।” अलाउद्दीन खिलजी ने काफूर को ‘मलिक’ की उपाधि दी थी।
प्रोफेसर हैदर कहते हैं कि उन दिनों गुलामों को खरीद कर, तत्पश्चात उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देकर सैन्य कमांडर बनाया जाता था क्योंकि उनकी वफादरी बहुत अहम होती थी। फारसी इतिहासकार मोहम्मद कासिम फरिश्ता अपनी किताब में लिखता है कि “अलाउद्दीन खिलजी पूरी तरीके से अनपढ़ था, इसलिए वह मलिक काफूर पर निर्भर होता चला गया।
मलिक काफूर ने इसका फायदा उठाया, वह सल्तनत के रोजमर्रा के कामों से लेकर वित्तीय मामलों में भी दखल देने लगा, यहां तक कि हरम का भी सर्वेसर्वा बन गया। मलिक काफूर एक सैनिक से नायक का रैंक हासिल करते हुए खिलजी की सेना का जनरल बन गया।”
बतौर सैन्य कमांडर मलिक काफूर ने साल 1306 में मंगोल आक्रमणकारियों को धूल चटाकर अपनी सैन्य प्रतिभा का परिचय दिया। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत को विजित करने की जिम्मेदारी मलिक काफूर को सौंप दी। मलिक काफूर ने 1306-1307 ई. में देवगिरी, 1309 ई. में तेलंगाना, 1310 ई. में होयसल तथा 1311 ई. में पाण्डय राज्य को अपने अधीन कर लिया। दक्कन विजय के पश्चात मलिक काफूर अपार धन-सम्पति तथा हाथी-घोड़े लेकर उत्तर भारत वापस लौटा था। ऐसे में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण भारत का श्रेय मलिक काफूर को दिया जाता है।
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