शत्तारी सिलसिले की स्थापना 15वीं शताब्दी में शेख सिराजुद्दीन अब्दुल्ला शत्तारी (मृत्यु 1485 ई.) ने खुरासान में की, बाद में वह भारत आ गए। शत्तारी सिलसिले के साधक भी सुहरावर्दियों की भांति आरामदायक जीवन व्यतीत करते थे। शत्तारी सिलसिले के संतों ने शासक वर्ग तथा अमीरों से सम्बन्ध बनाए रखा।
मुगल काल में शत्तारी सिलसिले को ईरान में ‘इश्किया’ तथा तुरान व तुर्की में ‘बिस्तामिया’ कहते थे। शत्तारी परम्परा में वुजूदी विचारों को स्वीकार किया गया और हिन्दू विचारों के प्रति उदारता का रूख अपनाया गया।
शत्तारी सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत ग्वालियर के शेख मुहम्मद गौस (1485-1563 ई.) थे। हाजी हमीद हसन के शिष्य मुहम्मद गौस को ‘कुत्ब’ भी कहा जाता था। मुहम्मद गौस की सबसे अधिक विख्यात रचना ‘जवाहिर-ए-खम्स’ है, जिसमें उन्होंने अपने आध्यात्मिक खोज को अभिव्यक्त किया है। इस रचना में रहस्यवादी और जादुई क्रियाओं का भी उल्लेख है, ऐसी मान्यता है कि शेख मुहम्मद ग़ौस भूत-प्रेत भगाने की विद्या के अग्रदूतों में से एक थे।
हिन्दू धर्म में रूचि होने के कारण मुहम्मद गौस ने संस्कृत का अध्ययन किया और ‘कलीद-ए-मखाजिन’ नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें उन्होंने सूफी सिद्धान्त और हिन्दुओं के ज्योतिष के साथ सम्बन्धों का विश्लेषण किया। मुहम्मद गौस ने हठ योग की पुस्तक अमृत कुण्ड का ‘बहार-उल-हयात’ नाम से अनुवाद भी किया।
शत्तारी सूफी संत मुहम्मद गौस ने मुगल बादशाह हुमायूं को भी शिक्षा दी। ऐसे में मुहम्मद गौस के मुगल बादशाह हुमायूं एवं बैरम खां सहित कुछ अन्य अमीरों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण अकबर के साथ उनके सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे।
दरअसल शेख सलीम चिश्ती की शिक्षाओं के प्रति अकबर के झुकाव के कारण मुहम्मद गौस को मुगल राजधानी आगरा से ग्वालियर लौटना पड़ा। हांलाकि संगीत सम्राट तानसेन के गुरु थे मुहम्मद गौस। तानसेन को मुहम्मद ग़ौस के मकबरे परिसर में दफनाया गया था।
शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल में जौनपुर, बंगाल एवं दक्कन में शत्तारी सम्प्रदाय के प्रमुख केन्द्र थे। इसके अलावा गुजरात व मध्यप्रदेश में भी शत्तारी काफी लोकप्रिय हुए। बुरहानपुर के शत्तारी सूफियों में शेख ईसा तथा उसके शिष्य शेख बुरहानुद्दीन गरीब प्रमुख थे।
औरंगजेब ने उत्तराधिकार युद्ध शुरू होने से पहले शेख बुरहानुद्दीन से आशीर्वाद लिया था। शत्तारी सूफी साधकों ने हिन्दू -मुस्लिम धार्मिक विचारों की साम्यता दिखाकर उन्हें निकट लाने का प्रयास किया।
मुहम्मद गौस के उत्तराधिकारी वजीहुद्दीन अल्वी को 'हैदर अली सानी' के नाम से जाना जाता था। पूर्वी गुजरात के प्राचीन शहर चंपानेर में जन्में वजीहुद्दीन अल्वी ने अहमदाबाद से इस्लामी अध्ययन में ज्ञान प्राप्त किया और अपने समय के एक प्रमुख विद्वान और मुफ्ती बन गए।
शत्तारी सिलसिले के छह मूलभूत सिद्धान्त
1. किसी भी इंसान को आत्म-अस्वीकृति में नहीं अपितु आत्म-पुष्टि में विश्वास रखना चाहिए।
2. व्यर्थ चिन्तन समय की बर्बादी है।
3. प्रत्येक सूफी को कहना चाहिए ‘मैं एक हूं’ और ‘मेरा कोई साझीदार नहीं है’।
4. मुजाहिदा (कठिन संघर्ष) का विरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
5. फ़ना जैसी कोई अवस्था नहीं है, क्योंकि इसके लिए दो व्यक्तित्वों की आवश्यकता होती है।
6. किसी विशेष भोजन से परहेज नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने गुण और कर्मों को सार्वभौमिक अहंकार के समान समझना चाहिए।
अन्य सम्प्रदायों से जुड़े सूफी संत
- ऋषि आन्दोलन - कश्मीर के शेख नुरूद्दीन ऋषि (मृत्यु 1430 ई.) का ऋषि आन्दोलन भी सूफी सम्प्रदाय का ही एक हिस्सा था।
- शेख नूरुद्दीन को 'नन्द ऋषि' अथवा 'आलमदार-ए-कश्मीर' भी कहा जाता है। शेख नूरुद्दीन ऋषि के संदेश स्थानीय लोगों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हुए।
- कश्मीर में ऋषि आन्दोलन के संस्थापक नन्द ऋषि के उत्तराधिकारी का नाम बाबा बामुद्दीन ऋषि था जो पहले मूर्तिपूजक थे, किन्तु नन्द ऋषि के ज्ञान और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार कर लिया।
- कश्मीर की शैव महिला संत लल्ला योगेश्वरी के विचारों को भी शेख नुरूद्दीन ऋषि ने अपने आन्दोलन में शामिल कर लिया। श्रीनगर स्थित शेख नुरूद्दीन ऋषि की प्रसिद्ध दरगाह चरार-ए-शरीफ को आतंकवादियों ने साल 1995 में जला दिया।
- कुबराबिया सिलसिला – 13वीं शताब्दी की कुबराबिया सिलसिले की शुरुआत शेख नजमुद्दीन कुबरा ने उज़्बेकिस्तान में की थी।
- मीर सैय्यद हमदानी कुबराबिया सिलसिले के सूफी कवि थे। भारत में इस सिलसिले को लोकप्रिय बनाने का श्रेय मीर सैय्यद अली हमदानी को जाता है। कश्मीर में यह सिलसिला काफी प्रचलित था। हमदानी 14वीं शताब्दी में कश्मीर आए।
- सन्त बुल्लेशाह - संत बुल्लेशाह का नाम बुलाकीराम था। बुल्लेशाह का जन्म 1703 ई. में कुस्तुनतुनिया के एक सैय्यद परिवार में हुआ था। बुल्लेशाह एक महान सूफी संत, दार्शनिक और पंजाबी कवि थे।
- बुल्लेशाह की संगीतमय ‘काफियाँ’ (Kafis) स्थानीय और आम जनमानस के बहुत करीब थीं, इसीलिए उन्हें 'जनता का कवि' भी कहा जाता है। बुल्लेशाह की कई पंक्तियाँ आज भी भारत और पाकिस्तान में सूफी संगीत और हिन्दी सिनेमा में गाई जाती हैं।
- अब्दुल वहीद बिलग्रामी - अब्दुल वहीद बिलग्रामी ने हकैक-ए-हिन्दी नामक पुस्तक की रचना की जिसमें उन्होंने सूफी सन्दर्भ में कृष्ण, राधा, गोपियों तथा मुरली एवं यमुना आदि शब्दों का अर्थ स्पष्ट करने की कोशिश की।
- अब्दुल वहीद बिलग्रामी ने उपरोक्त हिन्दू शब्दों का इस्तेमाल ईश्वर (अल्लाह) के प्रति प्रेम और आत्मा (भक्त) के मिलन को दर्शाने के लिए किया है।
- रोशनियां सम्प्रदाय - इस सम्प्रदाय के संस्थापक बायजित अंसारी (पीर रोशन) एक ओर्मुर योद्धा, सूफी कवि और क्रांतिकारी थे। पश्तो साहित्य का विकास बायजित अंसारी के ‘खैर-उल-बयान’ से शुरू हुआ।
- रोशनियां सम्प्रदाय बाद में मुगल साम्राज्य के विस्तार के खिलाफ एक सशक्त सशस्त्र प्रतिरोध में बदल गया। पीर रोशन एवं उनके उत्तराधिकारियों ने मुगल बादशाह अकबर और बाद के शासकों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़े।
- मुगल सेनाओं के खिलाफ रोशनियों का संघर्ष लगभग 1630 के दशक तक चलता रहा, इसके बाद यह आंदोलन धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
- कलंदरी सम्प्रदाय - इस सम्प्रदाय के संस्थापक नजीमुद्दीन कलंदर थे। इस सिलसिले के सूफी साधक घुमन्तू फकीर होते थे, जो इस्लामी सिद्धान्तों को नहीं मानते थे। कलन्दरों का सम्पर्क नाथ योगियों से अधिक था और वे नाथ योगियों व नागा संन्यासियों की भांति कान छिदवाते थे। अब्दुल अजीज मक्की को कलंदरी सम्प्रदाय का प्रथम संत माना जाता है।
- कलंदरी सम्प्रदाय के संत अपना सिर, दाढ़ी और भौहें मुंडवाकर साधारण कंबल या ऊनी वस्त्र पहनते थे। इतना ही नहीं, वे सांसारिक सम्पत्ति से दूर रहते थे।
- प्रसिद्ध सूफी गीत- “दमादम मस्त क़लन्दर…”पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कलंदरी संत और कवि लाल शाहबाज कलन्दर के नाम समर्पित है।
