मौर्योत्तर काल में विकेन्द्रीकरण पर नियंत्रण रखने के लिए राजव्यवस्था में दैवी तत्वों को समाविष्ट करने की प्रवृत्ति अपनाई गई। चीनी शासकों की तरह कुषाण राजाओं ने देवपुत्र जैसी उपाधियां धारण की। रोम का उदाहरण लेकर कुषाण शासकों ने मृत राजाओं की मूर्तियां बनवाकर मंदिर बनवाने की प्रथा (देवकुल) प्रारम्भ की।
कुषाणों के समय भारत में द्वैध शासन की विचित्र प्रथा शुरू हुई। सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों तथा बौद्ध श्रमणों को राजस्व एवं प्रशासनिक करों से मुक्त भूमि दान करने की प्रथा शुरू की। हांलाकि भूमि दान का पहला प्रमाण ई.पू. प्रथम शताब्दी का है।
प्रारम्भ में भूमि दान ‘कर’ मुक्त होती थी, किन्तु बाद में राजाओं ने दान की भूमि से प्रशासनिक नियंत्रण हटाकर दान ग्रहिता को ही समर्पित करना आरम्भ कर दिया। शक तथा पार्थियन शासकों ने संयुक्त शासन का चलन प्रारम्भ किया जिसके तहत युवराज सत्ता की भागीदारी में राजा के बराबर सहभागी होता था।
प्रशासन में सामन्तीकरण की प्रक्रिया कुषाण काल से ही शुरू होती दिखाई देती है। कुषाण लेखों में पहली बार दण्डनायक तथा महादण्डनायक जैसे पदाधिकारियों की नियुक्ति का उल्लेख मिलता है। कुषाणों ने ही प्रान्तों में द्वैध शासकत्व की विचित्र प्रणाली का प्रचलन शुरू किया। कुषाण राजवंश के महान शासक कनिष्क ने पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय साम्राज्य की स्थापना की।
मौर्योत्तर कालीन समाज
मौर्योत्तर काल में स्मृतियों की रचना हुई। समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि था। नासिक प्रशस्ति में सातवाहन नरेश गौतमीपुत्र शातकर्णी को ‘अद्वितीय ब्राह्मण’ कहा गया है। मनु के अनुसार, शूद्रों का कार्य तीन उच्चतर वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) की सेवा करना था। मौर्योत्तर काल में अधिकांश शिल्पी शूद्र वर्ण से ही आते थे, किन्तु अब उनके धन-प्रतिष्ठा में वृद्धि हो गई थी।
मौर्योत्तर काल में विदेशी आक्रमणों (शक, यवन, पह्वलव, कुषाण) की वजह से परम्परागत वर्ण व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया और अनेक वर्णसंकर जातियां उत्पन्न हुई। मनुस्मृति में तकरीबन 60 वर्णसंकर जातियों का उल्लेख मिलता है। स्मृतिकारों ने उन्हें ‘निम्न कोटि के क्षत्रिय’ की उपाधि प्रदान की।
मनुस्मृति में कहा गया है कि पवित्र धार्मिक संस्कारों तथा ब्राह्मणों की अवहेलना करने के कारण ही यवन, शक, पहलव आदि जातियां धीरे-धीरे शूद्रों की श्रेणी में गिर गईं।
कौटिल्य ने भी अनेक वर्णसंकर जातियों का उल्लेख किया है, इनकी उत्पत्ति विभिन्न वर्णों के अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों से बताई गई है। ब्राह्मण वंश के सातवाहन शासकों ने वर्ण संकरता रोकने का भरसक प्रयास किया किन्तु शातकर्णी प्रथम द्वारा अंगकुल की क्षत्रिय पुत्री नागनिका से तथा वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी द्वारा रुद्रदामन की पुत्री से विवाह अन्तर्जातीय विवाह के उदाहरण हैं।
आचार्य कौटिल्य ने चाण्डालों के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णशंकर जातियों को शूद्र माना है। प्रारम्भिक स्मृतिकारों के अनुसार, ब्राह्मण को शूद्र द्वारा दिया गया अथवा स्पर्श किया गया अन्न किसी भी स्थिति ग्रहण नहीं करना चाहिए। भागवत पुराण में कहा गया है कि शूद्र जातियां विष्णु पूजन से पवित्र हो जाती हैं।
मनुस्मृति में विधवाओं के मुंडन की संस्तुति की गई है। मनु के अनुसार, जिस स्त्री के पति ने उसे छोड़ दिया हो अथवा विधवा हो गई हो, यदि वह अपनी इच्छा से दूसरा विवाह करे तो वह पुनर्भू तथा उसकी सन्तान पुनर्भव कहलाती थी।
नियोग से उत्पन्न पुत्र क्षेत्रज कहलाता था। अविवाहित लड़कों के पुत्र को सहोदर कहा जाता था। समान वर्ण में विवाह से उत्पन्न पुत्र को औरस कहा जाता था। पुत्रों की श्रेणी में औरस सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। घर में रहने वाली कन्या या दासी से उत्पन्न पुत्र को कानीन कहा जाता था।
मौर्योत्तर कालीन धर्म
मौर्योत्तर काल में सातवाहन शासकों ने ब्राह्मण होने के बावजूद बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया। इनके शासन काल में स्तूप, बोधिवृक्ष, बुद्ध के चरणचिन्ह, धर्मचक्र, त्रिशूल, बुद्ध तथा अन्य बड़े संतों के धातु अवशेषों की पूजा-अर्चना की जाती थी। इस काल में महायान बौद्ध धर्म का काफी विकास हुआ।
वैदिक देवताओं के स्थान पर नवीन देव वर्ग का उदय हुआ जिनमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की त्रिमूर्ति बहुत विख्यात है। द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व की घोसुण्डी वेदिका लेख में वासुदेव-संकषर्ण की मूर्ति पूजा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। शक महाक्षत्रप षोडास के मोराकूप लेख में पंचवीरों की प्रतिमा व उनके मंदिर का उल्लेख मिलता है। शक क्षत्रप षोडास के अन्य अभिलेख में वासुदेव मंदिर के प्रवेश द्वार निर्माण की जानकारी मिलती है।
कुषाण शासक हुविष्क की एक स्वर्ण मुद्रा पर एक देवता अपने एक हाथ में चक्र तथा दूसरे हाथ में उर्ध्वलिंग लिए चित्रित किया गया है, सम्भवत: यह समन्वित देवता हरिहर की प्रतिमा का पूर्व रूप है। कुषाण शासक ‘देवपुत्र’ के अतिरिक्त ‘षाहि’ अथवा ‘षाहानुषाहि’ की उपाधि धारण करते थे।
विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म के अलावा भागवत धर्म को भी प्रश्रय प्रदान किया। बतौर उदाहरण - हेलियोडोरस का विदिशा (बेसनगर) अभिलेख व मोरा कूप अभिलेख भागवत धर्म की प्रसिद्धि साबित करते हैं। कुषाणों के विरूद्ध अपनी विजय के उपलक्ष्य में भारशिव नागों ने वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किया।
मौर्योत्तर कालीन कला
मौर्योत्तर काल में कला को वास्तविक प्रेरणा बौद्ध धर्म तथा यूनानी प्रभाव से मिली। कला के क्षेत्र में दो मुख्य शैलियों का विकास हुआ — 1. गान्धार कला शैली 2. मथुरा कला शैली।
गान्धार कला शैली का विकास प्रमुखतया कुषाण काल में हुआ, इस कला शैली को बौद्ध-ग्रीक (इण्डो-ग्रीक) शैली भी कहा जाता है। क्योंकि गान्धार कला शैली का विषय वस्तु बौद्ध किन्तु निर्माण का ढंग यूनानी था। गान्धार कला शैली में काले रंग के स्लेटी पत्थर का प्रयोग किया गया है।
गान्धार कला शैली में भगवान बुद्ध की सर्वाधिक मूर्तियों का निर्माण हुआ है, जिनमें मैत्रेय, धर्मचक्र मुद्रा, ध्यानमुद्रा, अभयमुद्रा व वरदमुद्रा की मूर्तियों का निर्माण शामिल है। गान्धार कला शैली की प्रारम्भिक मूर्तियों में बुद्ध का मुख ग्रीक देवता अपोलो से मिलता है। गन्धार कला शैली की उत्पत्ति का मुख्य स्रोत एशिया माइनर तथा हैलेनिस्टिक आर्ट (यूनान की प्राचीन मूर्ति कला) थी। गान्धार कला शैली यथार्थवादी है।
मथुरा कला शैली आदर्शवादी व विशुद्ध भारतीय है। भगवान बुद्ध की प्रथम मूर्ति का निर्माण मथुरा शैली में हुआ। मथुरा कला शैली प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व मथुरा में प्रारम्भ हुई। मथुरा शैली की मूर्तियों में आध्यात्मिकता एवं भावुकता की प्रधानता है। भरहुत और सांची की कलाओं से मथुरा कला का निकट सम्बन्ध है।
स्मारक, स्तूप, चैत्य और विहार मौर्योत्तरकालीन कला के बेहतरीन उदाहरण हैं। मथुरा संग्रहालय कुषाणकालीन मूर्तियों का भारत में सबसे बड़ा संग्रह है।
व्यापार
व्यापार की उन्नति मौर्योत्तर काल का उज्जल पक्ष है। भारत का मध्य एशिया तथा पाश्चात्य विश्व के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संघ की स्थापना इस काल की महत्वपूर्ण विशेषता है।
कुषाण काल में व्यापार-वाणिज्य के लिए स्वर्ण सिक्कों का नियमित प्रचलन हुआ। तत्पश्चात गुप्त शासकों ने इन्हीं के अनुकरण पर सिक्के चलवाए। मौर्योत्तर काल में व्यापार मुख्यत: अरब सागर के तटवर्ती बन्दरगाहों पर होता था। भारत से मिस्र को निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में हाथी दांत, कछुए, सीपियां, मोती, रंग, नील एवं बहुमूल्य लकड़ियां शामिल थीं।
ईसा की पहली शती में हिप्पालस नामक ग्रीक नाविक ने अरब सागर से चलने वाली मानसूनी हवाओं की जानकारी दी। इससे पश्चिमी एशिया के बन्दरगाहों से व्यापार और अधिक सुगम हो गया। मध्य एशिया से गुजरने वाला व्यापारिक मार्ग जो चीन को रोमन साम्राज्य से जोड़ता था, ‘सिल्क मार्ग’ (Silk Rout) कहलाता था। सिल्क रूट पर कुषाणों का अधिकार था।
सिन्धु के मुहाने पर स्थित बरबारीकम एवं पूर्वीतट पर अरिकामेडु तथा बेरीगाजा (भरूच) आदि मौर्योत्तर काल के महत्वपूर्ण बन्दरगाह थे। ईस्वी सन की प्रथम शताब्दी में अज्ञात यूनानी नाविक ने अपनी रचना ‘पेरीप्लस आफ दि एरिथ्रियन सी’ में भारत द्वारा रोमन साम्राज्य को निर्यात की जाने वाली गोल मिर्च, मोती, हांथी दांत आदि वस्तुओं का विवरण दिया है।
बावेरू जातक के अनुसार, भारतीय व्यापारी बेबीलोन (पश्चिमी एशिया) को कौए व मोर जैसे पक्षी निर्यात करते थे। इसी जातक में तटदर्शक पक्षियों का भी उल्लेख है जो जहाज के समुद्री संकट के समय निकटवर्ती स्थल का पता लगाते थे।
प्लिनी ने प्रतिवर्ष रोम से भारत में जाने वाले सोने की भारी मात्रा के लिए दुख प्रकट किया है। ईसा की पहली शती से ज्यादातर व्यापार मुख्यत: समुद्री मार्ग से ही होने लगा था, इससे पहले अधिकतर व्यापार स्थल मार्ग से होता था। भड़ौच (भरूच) मौर्योत्तर काल का सबसे महत्वपूर्ण एवं उन्नतिशील बन्दरगाह था। प्लिनी के मुताबिक, सबसे बड़ा जलयान 75 टन का था।
मसाला एवं लोहे की वस्तुएं विशेषकर बर्तन रोमन साम्राज्य को भेजी जाने वाली मुख्य वस्तुएं थीं। गरम मसालों (विशेषकर काली मिर्च, तेजपत्ता, लौंग, इलायची) के लिए दक्षिण भारत मशहूर था। रोमन व्यापारियों ने सर्वप्रथम भारत के दक्षिणी हिस्से में व्यापार शुरू किया इसीलिए सबसे पहले रोमन सिक्के तमिल राज्यों में मिले हैं। दक्षिण भारत में ही रोमन व्यापार सर्वाधिक लाभप्रद स्थिति में रहा।
रोम से भारत आने वाली वस्तुओं में सबसे महत्वपूर्ण सोने-चांदी के रोमन सिक्के हैं। स्ट्रैबो ने पश्चिमी व्यापार में भारतीय भागीदारी से सम्बन्धित रोचक संस्मरणों का वर्णन किया है। प्लिनी ने अपनी कृति ‘नेचुरल हिस्ट्री’ में भारतीय बहुमूल्य रत्नों की एक लम्बी सूची दी है और भारत को बहुमूल्य रत्नों का एक बड़ा उत्पादक देश बताया है। उसने भारतीय नदियों को ‘रत्नधारक’ की उपाधि से विभूषित किया है।
‘पेरीप्लस आफ दि एरिथ्रियन सी’ के अज्ञात यूनानी लेखक के मुताबिक “प्रथम सदी ईस्वी में मोती उद्योग (शुक्ति) काल्ची (पाण्डय राज्य में ताम्रपर्णी नदी पर कोरकाई) तथा तटवर्ती देशों से संचालित होते थे। चर्चित कृति ‘पेरीप्लस आफ दि एरिथ्रियन सी’ के अनुसार, “फारस (ईरान) की खाड़ी से भृगुकच्छ (भरूच) में दासों का व्यापार किया जाता था।”
रोमन व्यापारी भारत मालों काली मिर्च, मोतियों तथा हीरों के क्रय का भुगतान स्वर्ण (सोने) के रूप में करते थे। ईरानी साम्राज्य को भारत बतौर नजराना 320 टैलेण्ट सोना प्रतिवर्ष देता था।
रोम से सम्पर्क के परिणामस्वरूप कुषाण शासकों ने स्वर्ण मुद्राएं जारी की जो गुप्तकाल में खूब प्रचलित हुईं। पश्चिम के लोगों को भारत की काली मिर्च (गोल ) इतनी प्रिय थी कि संस्कृत में काली मिर्च का नाम ही ‘यवन प्रिय’ पड़ गया। लिहाजा रोम में स्वर्ण मुद्रा का इतना तेजी से कमी का अनुभव हुआ कि उसे भारत के साथ काली मिर्च और इस्पात के माल का व्यापार बन्द करना पड़ा।
मौर्योत्तर काल में कश्मीर, कौशल, विदर्भ और कलिंग हीरों के लिए विख्यात थे। जहां मगध वृक्षों के रेशों से बने वस्त्रों के लिए मशहूर था, वहीं बंगाल मलमल के लिए प्रसिद्ध था। ईस्वी सन की प्रथम शताब्दी में भारतीय मोतियों तथा रत्नों की रोमन साम्राज्य में भारी डिमांड के चलते भारत में पश्चिमी व्यापारियों का व्यापक रूप से आगमन शुरू हुआ।
संगम युगीन तमिल कृतियों में तटीय नगरों में पाई जाने वाली यवन व्यापारियों की बस्तियों का उल्लेख मिलता है। तमिल कविताओं में मुजीरिस (केरल के क्रेगनोर) एवं नागापत्तनम (पाण्डय साम्राज्य का पत्तन) के पत्तनों से यूनानी मदिरा तथा स्वर्ण का आयात करने वाले व भारत से काली मिर्च, मसालों एवं बहुमूल्य रत्नों का निर्यात करने वाले सुन्दर एवं विशालकाय भवनों का चित्रण किया गया है।
अरिकामेडु में 1945 ई. में हुई खुदाई से ईस्वी सन की प्रथम दो शताब्दियों के रोमन मृदभाण्डों के अनेक टुकड़ों के साथ-साथ एक रोमन व्यापारिक केन्द्र (बस्ती) के अवशेषों का पता चलता है। चर्चित कृति ‘पेरिप्लस आफ द एरिथ्रियन सी’ में अरिकामेडु को पेडोक नाम से सम्बोधित किया गया है।
इस काल में उज्जयिनी उत्तर-दक्षिण एवं पूर्व-पश्चिम के मध्य एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में सर्वाधिक प्रसिद्ध था। तक्षशिला विभिन्न दिशाओं से आने वाले माल संग्रह स्थल के रूप में विख्यात था। दक्षिण भारत के प्रमुख बन्दरगाहों में तोण्डी (टिण्डिस), मुशिरी (मुजिरिस), पुहार (कावेरीपत्तनम) शालियूर, बंदर आदि थे। कावेरीपत्तनम बन्दरगाह एक नगर के रूप में विकसित था।
पुरातात्विक उत्खनन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अधिकतर नगर ईसा की पहली और दूसरी सदियों में कुषाण काल में फले-फूले अर्थात कुषाणकाल में नगरीकरण अपने चरमोत्कर्ष पर था।
वाणिज्य एवं व्यवसाय
व्यापार एवं विनिमय में मुद्राओं का इस्तेमाल मौर्योत्तर युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मौर्य काल में शिल्पी और कारीगर राज्य के नियंत्रण में काम करते थे जबकि मौर्योत्तर काल में स्वत्रंत। जातक ग्रन्थों में 18 प्रकार के शिल्पियों का उल्लेख मिलता है।
बौद्ध ग्रन्थ दीघनिकाय में 24 प्रकार, महावस्तु में 36 प्रकार के तथा मिलिन्दपन्हों में 75 प्रकार के व्यवसायों का उल्लेख मिलता है। मौर्योत्तर काल तक उद्योगों का स्थानीयकरण हो चुका था। प्राचीन भारत के शिल्प एवं वाणिज्य के इतिहास में यह चरमोत्कर्ष का काल था।
साहित्यिक स्रोतों में शिल्पियों को अधिकतर नगरों से जोड़ा गया है। श्रेणि, निगम, पूग, सार्थवाह आदि व्यापारिक संगठन थे। मथुरा क्षेत्र तथा पश्चिम दक्कन क्षेत्र के अभिलेखों में श्रेणियों उल्लेख मिलता है। पश्चिमी दक्कन में गोवर्धन (नासिक) नामक नगर शिल्पी श्रेणियों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था।
ठीक इसी समय मथुरा क्षेत्र के एक लेख में इस बात का उल्लेख मिलता है कि एक व्यापारिक प्रमुख ने आटा पीसने वाले कारीगरों की श्रेणी के पास धन जमा कराया था। श्रेणियों के पास रखी इस धरोहर को अक्षयनीवि कहा जाता था। गन्धिकों का शब्दार्थ- गन्ध विक्रेता है किन्तु वास्तविक अर्थ में व्यापारी है। संघ के सिक्के कौशाम्बी के आस-पास के क्षेत्र में पाए गए हैं।
मथुरा साटक (सटका) नामक एक विशेष प्रकार के वस्त्र के निर्माण का बड़ा केन्द्र था। इसका उल्लेख पतंजलि ने भी किया है। इस काल में शिल्पियों की कम से कम चौबीस-पच्चीस श्रेणियां प्रचलित थीं। अभिलेखों के मुताबिक, अधिकतर शिल्पी मथुरा क्षेत्र में तथा पश्चिमी दक्कन में जमे थे।
स्ट्रेबो के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी हस्तशिल्पी के हाथ या आंख को क्षति पहुंचाता था तो उसे मृत्युदण्ड दिया जाता था। कुषाण काल में भवन निर्माण तकनीक के विकास के प्रमाण मिले हैं, सूखी तथा पकाई हुई मिट्टी के खपड़े का प्रयोग इस काल की विशेषता है। यूनानी साक्ष्य एवं जातकों से यह प्रमाण मिलता है कि व्यवसाय सामान्यत: आनुवांशिक होता था।
बौद्ध साहित्य में ऐसे सन्दर्भ मिलते हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण एवं क्षत्रिय केवल आपातकाल में ही नहीं अपितु सामान्य परिस्थितियों में भी व्यापारिक उद्यमों को अपनाते थे। मौर्योत्तर काल की प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापारियों तथा शिल्पकारों की श्रेणियों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान था। व्यापारिक एवं औद्योगिक समूहों द्वारा अनुबन्धों तथा समझौते से सम्बन्धित प्रलेखों को स्थितिपत्र या संवित् पत्र कहा गया है।
सम्राट स्कन्दगुप्त के इन्दौर ताम्रपत्र अभिलेख में एक ब्राह्मण दानदाता द्वारा सूर्य मंदिर में प्रतिदिन दीपक जलाने के लिए निश्चित मात्रा तेल की व्यवस्था करने के लिए स्थानीय तैलियों की एक श्रेणि को निश्चित धनराशि प्रदान करने का उल्लेख है। मौर्योत्तर काल में बढ़ईगीरी अति प्राचीन हस्तशिल्प था।
पूर्वी मालवा की राजधानी विदिशा के हाथी दांत के दस्तकारों द्वारा दान देने से सम्बन्धित एक अभिलेख हमें सांची के स्तूप के तोरण द्वार से लिखित प्राप्त होता है। इस समय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्योग सूत की कताई एवं बुनाई था। उरैयूर एवं अरिकामेडु सूती वस्त्र के प्रमुख केन्द्र थे।
मौर्योत्तर काल में विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग व्याज दर निर्धारित थी। मनु,गौतम एवं याज्ञवल्क्य के अनुसार, ब्राह्मण 2 प्रतिशत, क्षत्रिय 3 प्रतिशत तथा वैश्य 4 प्रतिशत तथा शूद्र 5 प्रतिशत व्याज देता था। श्रेणियां कभी-कभी धरोहर रखने तथा महाजन का कार्य भी करती थीं। कई नगरों में उन्होंने अपने सिक्के तक प्रचलित करवाए थे। भारतीय-यूनानी (इण्डो-ग्रीक) युग से पहले तक्षशिला से प्राप्त 5 सिक्कों पर निगम शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है।
सिक्के (Coins)
मौर्योत्तर कालीन नगरों में विभिन्न प्रकार के सिक्कों का प्रचलन था।
सोने का सिक्का — निष्क, स्वर्ण तथा पल।
चांदी का सिक्का — शतमान।
तांबे का सिक्का — काकणि।
कार्षापण — सोना, चांदी, तांबा और शीशे से कार्षापण नामक सिक्का बनता था।
श्रेष्ठी — श्रेष्ठियों को उत्तर भारत में सेठ एवं दक्षिण भारत में शेट्टि व चेट्टियार कहा जाता था।
निगम का प्रधान श्रेष्ठि, श्रेणी का प्रधान प्रमुख तथा पूग का प्रधान ज्येष्ठक कहलाता था। सम्भवत: श्रेष्ठक संघ का सबसे अनुभवी वृद्ध व्यक्ति होता था।
मौर्योत्तर कालीन साहित्यिक रचनाएं
मौर्योत्तर काल की साहित्य रचनाओं में संस्कृत भाषा का सर्वाधिक प्रचलन था। प्रख्यात व्याकरणाचार्य पाणिनी की प्रसिद्ध रचना अष्टाध्यायी पर लिखी गई टीका पतंजलि कृत महाभाष्य है।
अश्वघोष कृत सौन्दरानंद में भगवान बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनन्द के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के प्रसंग का वर्णन है। रूद्रदामन का गिरनार अभिलेख व कुषाण साम्राज्य के सुई विहार अभिलेख में भी संस्कृत का प्रयोग हुआ है।
हाल कृत गाथा सप्तशती, पतंजलि कृत महाभाष्य, चरक कृत चरक संहिता, भरत कृत नाट्यशास्त्र, वात्स्यायन कृत कामसूत्र, अश्वघोष कृत सौन्दरानन्द, बुद्धचरित, सारिपुत्र प्रकरण तथा महाकवि भास की रचना स्वप्नवासवदत्ता मौर्योत्तर काल की महान रचनाएं है।
राजव्यवस्था एवं प्रशासन से जुड़े स्मरणीय तथ्य
— व्यापारिक संगठनों के प्रकार — श्रेणि, निगम, पूग एवं सार्थ।
— जातक ग्रन्थों में कितने प्रकार की श्रेणियों का उल्लेख मिलता है — 18 प्रकार की श्रेणियां।
— बाबेरू में समुद्र में जहाज की स्थिति संदेहास्पद होने पर स्थल का पता लगाने के लिए किसकी मदद ली जाती थी —तटदर्शक पक्षियों।
— बावेरू जातक में भारतीय व्यापारियों द्वारा किस देश के साथ कौवे व मोर पक्षियों की बिक्री का उल्लेख मिलता है — बेबीलोन (पश्चिमी एशिया)।
— व्यापारी लोग यात्रा पर जाने से पूर्व गति, ऊर्जा और सामर्थ्य प्राप्ति के लिए किस देवता की पूजा करते थे — देवराज इन्द्र।
— मौर्योत्तर कालीन भारत के प्रमुख बन्दरगाह थे — भड़ौच, सोपारा, अरिकामेडु तथा ताम्रलिप्ति।
— मौर्योत्तर काल में किस सामाजिक व्यवस्था का उदय हुआ — सामन्तवाद।
— मनु ने किस जाति को द्वितीय श्रेणी का क्षत्रिय माना है — शक एवं पार्थियन।
— भारत में बेहतर घुड़सवार सेना का गठन किस राजवंश ने किया था — शक एवं कुषाण।
— फारस की खाड़ी से किस शहर में दासों का निर्यात किया जाता था — भृगुकच्छ (भरूच)।
— “भारत के साथ व्यापार करके रोम अपना स्वर्ण भण्डार लुटाता जा रहा है” — प्लिनी कृत नेचुरल हिस्ट्री।
— रोमन व्यापारी भारत से क्या आयात करते थे — मसाले तथा लोहे की वस्तुएं।
— किस राजवंश के शासकों ने ‘देवपुत्र’ की उपाधि धारण की — कुषाणों ने।
— मौर्योत्तर काल की प्रमुख विशेषता — ईटों के कुओं का निर्माण।
