भारत का इतिहास

Prominent Saint of the Bhakti Movement: Ramanuja

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्त : रामानुज

उपनिषद में धर्म को ईश्वर के सम्बन्ध में ज्ञान माना गया है। यद्यपि श्वेताश्वेत्तर उपनिषद में भक्ति का पहली बार उल्लेख मिलता है किन्तु भक्ति का विस्तृत उल्लेख सर्वप्रथम श्रीमद्भागवतगीता में हैं, जहां इसे मोक्ष प्राप्ति का अचूक साधन बताया गया है।

भक्ति आन्दोलन को हम दो चरणों में विभाजित कर सकते हैं :

पहला चरण - श्रीमद्भागवतगीता काल से 13वीं सदी तक, जब भारतवर्ष में इस्लाम का प्रवेश हो चुका था। इस काल में भक्ति का सम्बन्ध व्यक्तिगत भाव से था। गीता का उपदेश उन लोगों के लिए नैतिक सन्देश था जो बौद्धिक ज्ञान के जरिए मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ थे।

इन लोगों के लिए वेद तथा उपनिषद की शिक्षा बेहद कठिन थी। गीता में न केवल उपनिषदों के दर्शन अपितु योग तथा सांख्य योग के सिद्धान्तों का भी समावेश है और उसमें एक एकेश्वरवाद की पुष्टि है। गीता में भक्ति को सभी के लिए मोक्ष का साधन बताया गया है।

दूसरा चरण - भक्ति आन्दोलन का दूसरा चरण 13वीं सदी से 16वीं सदी तक है। इस काल में इस्लाम तथा हिन्दू धर्म के पारस्पिरिक सम्बन्धों के फलस्वरूप नवीन विचारों का उदय हुआ।

  भक्ति आन्दोलन की चिंगारी दक्षिण भारत में सुलग रही थी, जिसकी लपटें थोड़े ही समय में सम्पूर्ण भारत में फैल गई। आलवारों (वैष्णव संत) का भक्तिवाद भी जनसाधारण की चीज था जो शास्त्र का सहारा पाकर पूरे भारतवर्ष में फैल गया। वैसे तो भक्ति के अंकुरण वेदों में भी देखे जा सकते हैं किन्तु भक्ति की वास्तविक नींव श्रीमद्भागवतगीता से पड़ी।

भक्ति आन्दोलन की शुरूआत 8वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य दक्षिण भारत में हुई। शैव नयनारों तथा वैष्णव अलवारों ने जातिप्रथा को अस्वीकार कर स्थानीय भाषा में ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत प्रेम व भक्ति का संदेश फैलाया।

उत्तर भारत में सामाजिक रूढ़िवादी परम्परा के विरूद्ध भक्ति स्वर मुखरित करने वाले संत का नाम रामानन्द है। भगवान श्रीराम के उपासक रामानन्द का जन्म इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। रामानन्द के बारह शिष्यों में कबीर (जुलाहा), सेन (नाई), सदन (कसाई), रैदास (चमार), पीपा (राजपूत) आदि प्रमुख थे।

प्राचीन भागवत धर्म में जीव तथा ब्रह्म की एकता भक्ति के उपयुक्त मानी गई। किन्तु 12वीं सदी में भागवत धर्म ने नया स्वरूप ग्रहण किया और इनमें चार प्रमुख सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ।

प्रथम सम्प्रदाय रामानुज तथा उनके अनुयायियों का था, जो लक्ष्मी-नारायण की भक्ति व पूजा में विश्वास करते थे। दूसरा सम्प्रदाय चैतन्य महाप्रभु का था। तीसरा सम्प्रदाय वल्लभाचार्य के समर्थकों का था। सूरदास एवं मीराबाई भी इसी सम्प्रदाय से थे जो श्रीकृष्ण की मूर्ति पूजा पर जोर देते थे। चौथा सम्प्रदाय रामानन्द के समर्थकों का था, जो राम-सीता की पूजा करते थे।

रामानुज

संत रामानुज वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, जिन्हें वेदान्त के विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रणेता माना जाता है। सगुण ईश्वर में विश्वास करने वाले रामानुज ने श्री सम्प्रदाय की स्थापना की।श्री सम्प्रदाय के सिद्धान्तों में भगवान श्री लक्ष्मीनारायण इस जगत के माता-पिता हैं और सभी जीव उनकी संतान हैं। इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक रामानुज शेषनाग के अवतार समझे जाते थे। विद्वान, सदाचारी, धैर्यवान और बेहद उदार रामानुजाचार्य अलवार भक्तों की शिष्य परम्परा में थे।

रामानुज पहले संत थे जो ज्ञान के स्थान पर भक्ति को मोक्ष का सबसे सरल साधन मानते थे। रामानुज ने भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। चरित्रबल और भक्ति में अद्वितीय रामानुजाचार्य को योग सिद्धियाँ भी प्राप्त थीं। 

रामानुज का जन्म साल 1017 ई. में तमिलनाडु राज्य में मद्रास के समीप पेराम्बदूर नामक गांव में एक भट्ट ब्राह्मण परिवार में हुआ था। रामानुज की मां का नाम कान्तिमती तथा पिता का नाम केशव भट्ट था। रामानुज का मूल नाम लक्ष्मण था। उन्हें इलैया पेरुमल भी कहा जाता है जिसका अर्थ है- उज्ज्वल अथवा प्रकाशमान रामानुज को रामानुजाचार्य के नाम से भी जाना जाता है। 16 वर्ष की उम्र में रामानुज का विवाह रक्षकम्बल से हुआ था।

पिता की मृत्यु के पश्चात रामानुज ने गृहस्थ आश्रम त्याग कर श्रीरंगम् के यतिराज नामक संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली। रामानुज की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र कांची और श्रीरंगम था। रामानुज ने श्रीरंगम के मंदिर में शिक्षण कार्य भी किया।

शंकराचार्य के अनुयायी रामानुज ने अपने गुरु यादव प्रकाश से कांची में वेदान्त की शिक्षा ग्रहण की। रामानुजाचार्य की बुद्धि इतनी कुशाग्र थी कि वह अपने गुरु की व्याख्या से भी अधिक विस्तृत व्याख्या कर दिया करते थे। अत: थोड़े ही समय में रामानुज के वेदान्त का ज्ञान इतना बढ़ गया कि इनके गुरु यादव प्रकाश के लिए इनके तर्कों से पार पाना कठिन हो गया। रामानुज की विद्वता की ख्याति दिनप्रतिदिन बढ़ती ही गई, आखिरकार गुरु यादव प्रकाश भी रामानुजाचार्य के शिष्य बन गए।

रामानुज की प्रमुख कृतियां

रामानुज ने वेदान्त संग्रह, वेदान्त सूत्र, बादरायण का भाष्य तथा भगवद्गीता की व्याख्या लिखीब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और दिव्य प्रबन्धम् की टीका रामानुज की अमर कृति है। विशिष्टद्वैत दर्शन के प्रतिपादक रामानुज के सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ श्रीभाष्यम्, गीता भाष्यम् एवं वेदान्त संग्रहम् हैं। रामानुज के नाम से सम्बद्ध दो अन्य भक्तिपरक रचनाएं 'गद्यत्रयम' और 'नित्य ग्रन्थहैं, हांलाकि इनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। रामानुज की उक्त सभी रचनाएं संस्कृत भाषा में हैं।

वैष्णव धर्म का प्रचार- प्रसार

शैव अनुयायी चोल शासक कुलोत्तुंग प्रथम ने रामानुज को शैव धर्म ग्रहण नहीं करने पर दण्ड देने की धमकी दी। सगुण ईश्वर में विश्वास करने वाले रामानुज ने मनुष्य की समानता पर बल दिया और जाति व्यवस्था की भर्त्सना की। इन्हीं वजहों से चोल प्रशासन के विरोध के कारण उन्हें श्रीरंगम छोड़ना पड़ा तत्पश्चात रामानुज ने तिरूपति को अपना केन्द्र बनाया।

तत्पश्चात रामानुज शालग्राम नामक स्थान पर रहने लगे। उस क्षेत्र में उन्होंने 12 वर्ष तक वैष्णव धर्म का प्रचार किया। श्रीरंगपट्टनम में दक्षिण बद्रिकाश्रम का विशाल मंदिर रामानुज की अमर कृति है। वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए रामानुज ने पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया और साल 1137 में  माघ शुक्ल दशमी, मंगलवार को 120 वर्ष की आयु पूर्ण कर ब्रह्मलीन हुए।

रामानुजाचार्य का अपने शिष्यों को अंतिम संदेश

भगवान के श्री चरणों में सर्वदा चित्त लगाने वाले भक्तों का ही संग करो और अपने गुरु के समान उनकी सेवा करो।

हमेशा वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों तथा महान वैष्णवों के शब्दों में पूर्ण विश्वास करो।

काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे आंतरिक शत्रुओं से हमेशा सतर्क रहो और अपनी इंद्रियों के दास कभी मत बनो।

भगवान् श्री नारायण की पूजा-अर्चना करो और हरिनाम ही एकमात्र आश्रय है, ऐसा समझकर आनंद अनुभव करो ।

भगवान के परम भक्तों की निष्ठापूर्वक सेवा करो, ऐसा करने से सर्वोच्च कृपा का लाभ निश्चितरूप से अतिशीघ्र मिलता है।

रामानुज का दृष्टिकोण : क्या है भक्ति

रामानुज के मुताबिक, भक्ति से तात्पर्य पूजा-पाठ या कीर्तन-भजन नहीं अपितु ध्यान और ईश्वर की प्रार्थना करना है। कहते हैं, गहन भक्ति के कारण संत रामानुजाचार्य को मां सरस्वती के साक्षात् दर्शन प्राप्त हुए थे। ऐसी मान्यता है कि कश्मीर के शारदापीठ में रामानुज आचार्य के कप्यासं पुण्डरीकाक्षम् की व्याख्या सुनकर मां सरस्वती ने उन्हें भाष्यकार की उपाधि से सम्मानित किया। तभी से इन्हें भाष्यकार रामानुजाचार्य के रूप में जाना जाता है।

सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रामानुज ने भक्ति को जाति एवं वर्ग से पृथक सभी के लिए सम्भव माना। श्री रामानुज आचार्य ने कहा कि जीव अपनी भक्ति के आधार पर जीवन-मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो सकता है, यही मोक्ष है। मोक्ष की स्थिति में आत्मा का परमात्मा में विलय नहीं होता, अपितु वह ब्रह्म के सदृश हो जाता है।

रामानुज का विशिष्टाद्वैत दर्शन

रामानुज के दर्शन में परमसत्ता के तीन स्तर माने गए हैं- 1.ब्रह्म अर्थात् ईश्वर 2. चित्त  अर्थात् आत्म तत्व 3. अचित अर्थात प्रकृति तत्व। रामानुज के मुताबिक, चित् (आत्म तत्त्व) तथा अचित् (प्रकृति तत्त्व) ब्रह्म अथवा ईश्वर से अलग नहीं है अपितु ये दोनों ब्रह्म के ही दो स्वरूप हैं। यही रामनुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत का सिद्धान्त है।

बतौर उदाहरण - जिस प्रकार से शरीर और आत्मा अलग होते हुए भी जुड़े रहते हैं, ठीक उसी प्रकार ब्रह्म या ईश्वर से पृथक चित् एवं अचित् तत्त्व का कोई अस्तित्व नहीं हैं। सगुण और साकार भगवान विष्णु हैं जो सभी कल्याणकारी गुणों से युक्त, सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं। भगवान के प्रति अनन्य भक्ति और पूर्ण शरणागति ही मोक्ष पाने का एकमात्र साधन है।

रामानुज ने आदि शंकराचार्य के मायावाद का खंडन किया। आदि शंकराचार्य ने जगत को माया करार देते हुए इसे मिथ्या कहा, जबकि रामानुज के मुताबिक जगत का निर्माण ब्रह्म ने ही किया है, अत: यह मिथ्या नहीं हो सकता। रामानुज आचार्य ने आदि शंकराचार्य के मायावाद का खंडन करने के लिए सात तर्क दिए, जिन्हें सप्तानुपत्ति कहा जाता है।

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