परिस्थितियां - साल 1909 के पश्चात भारत में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। मिंटो-मार्ले सुधार अधिनियम 1909 ने हिन्दू-मुसलमान के मध्य विभेद की खाई खड़ी कर दी। कांग्रेस में भी फूट व्यापक हो गई। गरमदल वालों ने उग्र राष्ट्रीयता की नीति अपनाकर अपनी आतंकवादी गतिविधियां तेज कर दी।
सरकार ने यद्यपि इनका दमन कठोरतापूर्वक किया, फिर भी स्थिति बिल्कुल सामान्य नहीं बन सकी। इसके साथ ही अनेक सुविधाएं प्राप्त करने के बावजूद मुसलमान अंग्रेजों से संतुष्ट नहीं हो सके। लिहाजा वे धीरे-धीरे कांग्रेस के नजदीक आने लगे परिणामस्वरूप 1916 ई. में ‘लखनऊ पैक्ट’ हुआ।
भारत सचिव एडविन सेमुअल मांटेग्यू ने 20 अगस्त 1917 को एक घोषणा की जिसमें भारत में धीरे-धीरे उत्तरदायी शासन स्थापित करने की बात कही गई। नवम्बर, 1917 में एडविन मांटेग्यू (कार्यकाल 1917-1922) स्वयं भारत आए। तत्पश्चात साल 1918 में वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड और एडविन सेमुअल मांटेग्यू ने संवैधानिक सुधारों की अपनी योजना तैयार की, जिसे ‘मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स’ कहा जाता है। मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार योजना ही ब्रिटिश संसद में पास होकर 1919 ई. में ‘भारत सरकार अधिनियम’ बन गया।
अधिनियम के उद्देश्य
भारत सरकार अधिनियम 1919 की प्रस्तावना में अंग्रेजी सरकार के उद्देश्य स्पष्ट किए गए। इसके अनुसार भारत को अंग्रेजी साम्राज्य का अभिन्न अंग बनाए रखते हुए भारतीयों का शासन में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना ब्रिटिश सरकार का एकमात्र उद्देश्य था।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीयों को प्रशासनिक मामलों से सम्बद्ध करना एवं स्वायत्त शासन का विकास करना था। इसके अलावा प्रान्तों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करना एवं उन्हें धीरे-धीरे केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण से मुक्त करना भी ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य था। इस प्रस्तावना द्वारा मांटेग्यू की घोषणा को वैधानिक रूप प्रदान किया गया।
भारत सरकार अधिनियम के प्रावधान
भारत सरकार अधिनियम 1919 द्वारा गृह सरकार, केन्द्रीय सरकार और प्रान्तीय सरकारों के गठन, कार्यों एवं अधिकारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, जो निम्नलिखित हैं —
1. गृह सरकार में परिवर्तन - इस अधिनियम द्वारा गृह सरकार के गठन में परिवर्तन किए गए। इंडिया कौंसिल के सदस्यों की संख्या 8 से बढ़ाकर 12 कर दी गई तथा उनकी कार्यावधि 5 वर्षों के लिए निश्चित कर दी गई। इन 12 सदस्यों में 3 भारतीयों को भी स्थान दिया गया।
कौंसिल का नियंत्रण भारत सरकार पर से ढीला कर दिया गया। कौंसिल अध्यक्ष पद पर विराजमान भारत सचिव के वेतन की व्यवस्था अब भारतीय आय से नहीं अपितु इंग्लैण्ड के खजाने से की जाने लगी।
अब भारत सचिव पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण स्थापित हो गया जो पहले नहीं था। इंग्लैण्ड में एक भारतीय उच्च आयुक्त नियुक्त किया गया जो वायसराय के एजेन्ट के रूप में कार्य करने लगा।
भारत सरकार के लिए शस्त्र खरीदने, व्यापारिक मामलें तथा इंग्लैण्ड में भारतीय विद्यार्थियों की देखभाल का कार्य उसे सौंपा गया। उसकी नियुक्ति भारत सरकार करती थी और वह उसी के निरीक्षण में कार्य करता था।
2. केन्द्रीय सरकार में परिवर्तन
भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत केन्द्रीय सरकार के ढांचे में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए, दरअसल इसमें भारतीयों का सहयोग लिया गया।
कार्यकारिणी –
सबसे पहले वायसराय की कौंसिल के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 8 कर दी गई। इन 8 सदस्यों में से तीन स्थान भारतीयों के लिए सुनिश्चित किया गया। गृह, वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभाग अंग्रेज सदस्यों को जबकि शिक्षा, श्रम, स्वास्थ्य एवं उद्योग की जिम्मेदारी भारतीय सदस्यों को दी गई। यद्यपि कार्यकारिणी का निर्णय बहुमत के आधार पर होता था, किन्तु वायसराय इस निर्णय को मानने के लिए हमेशा बाध्य नहीं था।
कार्यकारिणी का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन केन्द्रीय तथा प्रान्तीय विषयों का विभाजन था। केन्द्रीय विषयों की देखभाल का अधिकार वायसराय एवं उसकी कौंसिल को था। केन्द्रीय सूची में रक्षा, विदेश मामले, राजनीतिक सम्बन्ध, डाक-तार, संचार व्यवस्था, सार्वजनिक ऋण, नागरिक और आपराधिक कानून एवं प्रशासन इत्यादि थे।
प्रान्तीय विषयों में स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, सार्वजनिक निर्माण, कृषि, आबकारी, जेल, सिंचाई इत्यादि रखे गए। आय के साधनों को भी केन्द्रीय एवं प्रान्तीय सरकारों के मध्य विभाजित कर दिया गया।
विधायिका –
अब एक सदनीय इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल की जगह दो सदनों वाली विधायिका की स्थापना की गई। 1. उच्च सदन (राज्य परिषद/council of states) 2. निम्न सदन (केन्द्रीय विधानसभा/central legislative council)
1.उच्च सदन का गठन — उच्च सदन यानी राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 रखी गई। इनमें 34 निर्वाचित तथा 26 वायसराय द्वारा मनोनीत सदस्य थे। मनोनीत सदस्यों में 19 शासकीय तथा 07 गैर सरकारी सदस्य थे। निर्वाचित सदस्यों में 20 साधारण निर्वाचन क्षेत्रों से, 10 मुसलमानों द्वारा, 3 यूरोपियनों और 01 सदस्य सिखों द्वारा चुने जाने थे।
सदस्यों का चुनाव 5 वर्षों के लिए होता था। मताधिकार के अधिकार सीमित थे। उच्च सदन का मतदाना होने के लिए दस हजार रुपए की वार्षिक आय पर आय कर (Income Tax) देना अथवा 750 रुपए वार्षिक मालगुजारी देना जरूरी था। सदन की बैठक बुलाने, स्थगित करने अथवा सदन भंग करने का अधिकार वायसराय को ही था।
2. निम्न सदन का गठन — निम्न सदन यानी केन्द्रीय विधानसभा के सदस्यों की संख्या 145 थी। इनमें 104 निर्वाचित तथा 41 मनोनीत सदस्य थे। 41 सदस्यों में से 26 सरकारी और 15 गैर सरकारी सदस्य थे। 104 निर्वाचित सदस्यों में 52 साधारण निर्वाचन क्षेत्रों से, 30 मुसलमानों एवं 2 सिखों के लिए सुरक्षित थे जबकि 20 विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्रों में 9 जमींदार तथा 7 भूस्वामी, 4 व्यापारिक संघ से चुने जाते थे।
इस सदन की अवधि 3 वर्ष थी जिसे वायसराय बढ़ा सकता था अथवा समय पूर्व ही भंग भी कर सकता था। निम्न सदन का मतदाता बनने के लिए 50 रुपए वार्षिक भूमि कर, या फिर 15 रुपए मासिक किराए के मकान में रहता हो अथवा 15 रुपए म्यूनिसिपल टैक्स देता हो। इसके अतिरिक्त 2000 रुपए की आय पर आयकर देने वाला ही निम्न सदन का मतदाना बन पाता था।
विधायिका की कार्यपद्धति एवं अधिकार —
दो सदनवाली (उच्च एवं निम्न) केन्द्रीय विधायिका को विस्तृत अधिकार प्राप्त थे। केन्द्रीय विधायिका देश-विदेश में रहने वाले भारतीयों एवं अधिकारियों के लिए कानून बना सकती थी, कानून बदल अथवा समाप्त कर सकती थी।
कोई भी सदन वायसराय की स्वीकृति प्राप्त करने के बाद ही कानून बनाता था। वायसराय इंग्लैण्ड के सम्राट की अनुमति प्राप्त कर वैसे विधेयक को भी कानून में परिवर्तित कर सकता था जो विधायिका द्वारा पास नहीं किया गया हो।
विदेशी अथवा देशी रियासतों, सेना, धर्म, ऋण, ‘कर’ इत्यादि से जुड़े विधेयक वायसराय की अनुमति से ही सदन में पेश किए जा सकते थे। राजकीय आय-व्यय का विधेयक किसी भी सदन में नहीं रखा जा सकता था। वायसराय अपने वीटो पॉवर यानी कि निषेधिकार का प्रयोग कर किसी भी विधेयक पर बहस रोक सकता था। इस विधायिका क्षेत्र में भी वायसराय को अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किए गए।
3. प्रान्तीय सरकारों का गठन एवं द्वैध शासन व्यवस्था
भारत सरकार अधिनियम 1919 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रान्तों में द्वैध शासन की स्थापना थी। 1919 ई. के अधिनियम ने केन्द्रीय सरकार के अतिरिक्त प्रान्तीय सरकारों की व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।
सबसे विशिष्ट बात यह थी कि इस अधिनियम द्वारा सर्वप्रथम आठ प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था लागू की गई जिसमें असम, बंगाल, बिहार और उड़ीसा, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत, बॉम्बे, मद्रास और पंजाब प्रांत शामिल थे। द्वैध शासन व्यवस्था के तहत गवर्नर ही प्रांत का कार्यकारी प्रमुख था।
प्रान्तीय कार्यकारिणी - प्रान्तों में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के दृष्टिकोण से द्वैध प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई। इस व्यवस्था के अनुसार, प्रान्तीय विषयों को दो श्रेणियों में रखा गया — रक्षित एवं हंस्तातरित (Reserved and Transferred)।
रक्षित विषयों का प्रशासन प्रान्तीय गवर्नर अपनी कार्यकारिणी के मनोनीत सदस्यों की सहायता से करता था। ये सदस्य विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे। रक्षित विषयों की सूची में वित्त, राजस्व, न्याय, पुलिस, समाचार पत्र, सिंचाई, जलमार्ग, खान, बिजली, कल-कारखाने, सार्वजनिक सेवाएं इत्यादि विभागों को रखा गया।
हंस्तातरित विषयों की सूची में शिक्षा एवं पुस्तकालय, संग्रहालय, स्थानीय स्वशासन, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा, कृषि, सहकारिता, पशुपालन, सार्वजनिक निर्माण विभाग, माप-तौल, आबकारी,दान इत्यादि विभागों को सम्मिलित किया गया।
इन विषयों सम्बन्धित प्रशासन की जिम्मेदारी प्रान्तीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों में से नियुक्त मंत्रियों को दी गई। अपने कार्यों के लिए मंत्री विधानसभा के प्रति उत्तरदायी थे। नई व्यवस्था के अनुसार, प्रान्तों पर से केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण कम कर दिया गया, परन्तु प्रान्तीय गवर्नरों एवं उनकी कौन्सिल के सदस्यों को व्यापक अधिकार मिले। मंत्रियों की नियुक्ति, उनकी बर्खास्तगी और उनके कार्यों का निरीक्षण गवर्नर ही करता था।
प्रान्तीय विधायिका - प्रान्तीय विधायिका या विधान परिषद के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गई। यह संख्या विभिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न थी। बतौर उदाहरण - बिहार और उड़ीसा में विधानपरिषद के सदस्यों की संख्या जहां 103 रखी गई, वहीं बंगाल में इनकी संख्या 140 थी। इन परिषदों की कुल सदस्य संख्या का 70 फीसदी निर्वाचित होता था, जिनमें 20 फीसदी सरकारी सदस्य एवं 10 फीसदी गैर सरकारी मनोनीत सदस्य होते थे।
मतदान का अधिकार संपत्ति एवं शिक्षा के आधार पर निर्धारित किया गया। जैसे— 2000 रुपए की आय पर ‘आयकर’ देने वाला, 3 रुपए म्युनिसिपल टैक्स देने वाला या फिर 10 से 15 रुपए की मालगुजारी देने वाला व्यक्ति ही मतदाता हो सकता था। इसके अतिरिक्त साम्प्रदायिक तथा वर्गीय चुनावमंडलों के साथ-साथ सीमित संख्या में महिलाओं को भी वोट देने का अधिकार मिला।
परिषद के सदस्यों को प्रस्ताव पेश करने, प्रश्न पूछने, बहस करने, प्रान्तीय विषयों पर कानून बनवाने एवं बजट को अस्वीकार करने का भी अधिकार दिया गया। इस प्रकार भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत प्रान्तों में उत्तरदायी शासन की स्थापना की दिशा में पहला ठोस कदम उठाया गया।
भारत सरकार अधिनियम -1919 की समीक्षा
ब्रिटिश विद्वान B.R. Tomlinson लिखता है कि “भारत सरकार अधिनियम का प्रयत्न यह था कि किसी प्रकार से एक प्रभावशाली वर्ग को कम से कम दस वर्ष के लिए ब्रिटिश राज का समर्थक बना लिया जाए”। लिहाजा भारत सरकार अधिनियम 1919 में कई प्रावधान बनाए गए किन्तु यह भारतीयों को संतुष्ट नहीं कर सका।
कांग्रेस ने इस अधिनियम को ‘निराशाजनक और असंतोषप्रद’ कहा। वहीं, बाल गंगाधर तिलक ने मांटेग्यू चेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स को ‘अयोग्य-निराशाजनक तथा अधंकारमय भोर’ कहा। एनी बेसेंट ने इसे ‘इंग्लैंड के प्रस्ताव के योग्य और भारत को स्वीकार करने के लिए अयोग्य’ पाया। सुभाषचन्द्र बोस ने भारत सरकार अधिनियम 1919 को भारतीयों के लिए ‘बेड़ियों का नया जाल’ कहा।
भारत सरकार अधिनियम 1919 में किए सुधार बड़े महत्वपूर्ण लगे किन्तु वास्तविक रूप से कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। सबसे बड़ी बात कि इस अधिनियम में भी वर्ग विभेद और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया। लिहाजा अंग्रेजों तथा भारतीयों के बीच सत्ता संघर्ष के चलते साल 1922 से 1927 के बीच बड़ी संख्या में सांप्रदायिक दंगे हुए।
केन्द्रीय कार्यकारिणी में यद्यपि भारतीयों को भी स्थान मिला, लेकिन उन्हें कम महत्वपूर्ण विभाग ही सौंपे गए। इन सदस्यों पर वायसराय का इतना अधिक प्रभाव था कि वे स्वतंत्रतापूर्वक कोई भी कार्य नहीं कर सकते थे।
केन्द्रीय एवं प्रान्तीय विषयों का बंटवारा स्वेच्छाचारी ढंग से किया गया था। केन्द्रीय विधानमंडल की भूमिका भी वायसराय के सामने गौण थी। इसलिए कहा गया कि 1919 अधिनियम ने केन्द्र में उत्तरदायी शासन नहीं अपितु प्रतिचारी सरकार की स्थापना की।
सबसे दोषपूर्ण व्यवस्था द्वैध शासन की थी। सबसे दयनीय स्थिति मंत्रियों की थी, एक तरफ उन्हें गवर्नर को प्रसन्न रखना पड़ता था, दूसरी तरफ विधानपरिषद को। हांलाकि इन दोनों के विचारों में हमेशा विरोधाभास होता था। इसलिए मंत्रीगण ज्यादातर गवर्नर की इच्छानुसार ही कार्य करते थे। गवर्नर मंत्रियों की उपेक्षा भी करते थे, और कई मामलों में उनकी राय जानने की आवश्यकता नहीं महसूस करते थे।
गवर्नर मंत्रियों से ज्यादा नौकरशाही की सलाह मानते थे। फलत: मंत्रियों का अपने विभागों पर ही नियंत्रण नहीं रहा। वे पदाधिकारियों का स्थानान्तरण अपनी इच्छानुसार करने में असमर्थ थे। सबसे बड़ी आर्थिक समस्या थी, उन्हें धन के लिए वित्त विभाग पर रहना पड़ता था, जिस पर गवर्नर, नौकरशाही तथा वित्त सदस्यों का नियंत्रण था।
इन परिस्थितियों में मंत्रीगण कोई भी प्रभावशाली भूमिका नहीं निभा सके। इस सम्बन्ध में मद्रास के मंत्री के.वी. रेड्डी ने कहा कि “मैं विकास मंत्री था किन्तु मेरे अधीन वन विभाग नहीं था। मैं सिंचाई मंत्री था लेकिन मेरे अधीन कृषि विभाग नहीं था।”
पृथक मतदान एवं सुरक्षित स्थानों की व्यवस्था ने साम्प्रदायिकता की भावना को अत्यधिक विकसित कर दिया। वोट देने का अधिकार भी कुछ व्यक्तियों को ही मिल सका। इन आलोचनाओं के बावजूद यह कहा जा सकता है कि उत्तरदायी शासन की स्थापना की दिशा में भारत सरकार अधिनियम 1919 एक कदम और आगे बढ़ा। अंग्रेजों का यह कथन असत्य सिद्ध हो गया कि ‘भारतीय स्वशासन के योग्य नहीं हैं’, यह संवैधानिक अनुभव भारतीयों के लिए बहुत लाभप्रद और प्रोत्सोहन देने वाला साबित हुआ।
भारत सरकार अधिनियम 1919 से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
— एडविन सेमुअल मांटेग्यू को जब भारत सचिव पर नियुक्त किया गया तब ब्रिटेन का प्रधानमंत्री कौन था — लॉयड जार्ज।
— मांटेग्यू घोषणा (1917) का निष्कर्ष क्या था — भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना जिसमें ब्रिटिश शासक जनता के निर्वाचित सदस्यों के प्रति उत्तरदायी होते।
— किस अधिनियम को ‘मांटेग्यू चेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स’ कहा जाता है — भारत सरकार अधिनियम-1919
— मांटेग्यू घोषणा को उदारवादियों ने संज्ञा दी — भारत का मैग्नाकार्टा।
— मांटेग्यू सुधारों का स्वागत करते हुए सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 1918 में किस संस्था की स्थापना की — अखिल भारतीय उदारवादी संघ।
— भारत सरकार अधिनियम 1919 के संवैधानिक सुधार कब लागू हुए — साल 1921 में।
— भारत सरकार अधिनियम 1919 की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था — प्रान्तों में द्वैध शासन की स्थापना।
— भारत सरकार अधिनियम 1919 का मुख्य उद्देश्य क्या था — अंग्रेजी सरकार में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना।
— भारत में पहली बार लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान — 1919 अधिनियम के तहत।
— सिविल सेवकों की भर्ती के लिए भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना कब हुई — 1926 ई. में।
— भारत सरकार अधिनियम 1919 की 10 साल बाद समीक्षा हेतु एक वैधानिक आयोग की नियुक्ति की गई, उसका क्या नाम था — साइमन कमीशन।
— सर्वप्रथम किन आठ प्रान्तों में द्वैध शासन व्यवस्था लागू की गई — मद्रास, बम्बई, बंगाल, संयुक्त प्रान्त (यूपी), पंजाब, बिहार और उड़ीसा, मध्य प्रान्त, असम, उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त।
— द्वैध शासन का जनक किसे माना जाता है — सर लियोनेल कर्टिस।
— भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत प्रांतों में द्वैध शासन की प्रणाली कैसी थी — प्रांतीय विषयों को स्थानांतरित और आरक्षित श्रेणियों में विभाजन।
— किस अधिनियम के तहत विधानसभा में एंग्लो इंडियन के लिए सीटें आरक्षित की गईं — भारत सरकार अधिनियम, 1919
