बाबर के चार पुत्र थे — हुमायूं, कामरान, अस्करी और हिन्दाल। अपने भाईयों में हुमायूं सबसे बड़ा था। हुमायूं का जन्म बाबर की तीसरी पत्नी माहम बेगम से साल 1508 में काबुल में हुआ। कामरान और अस्करी का जन्म बाबर की पत्नी गुलरूख बेगम से तथा हुमायूं के सबसे छोटे भाई हिन्दाल का जन्म दिलदार बेगम से हुआ था। बाबर की मृत्यु के 4 दिन पश्चात 30 दिसम्बर 1530 को हुमायूं 23 वर्ष की आयु में हिन्दुस्तान की गद्दी पर बैठा।
मुगल बादशाहों में हुमायूं एकमात्र शासक था जिसने अपने भाईयों में साम्राज्य का विभाजन किया था, जो उसकी असफलता का सबसे प्रमुख कारण था। हुमायूं ने कामरान को काबुल और कन्धार, अस्करी को सम्भल तथा हिन्दाल को अलवर की जागीर दी। हिन्दाल ने आगरा में ‘बादशाह’ की पदवी धारण की। इतना ही नहीं, हुमायूं ने अपने चचेरे भाई सुलेमान मिर्जा को बदख्शां की जागीर दी।
शुरूआत में बाबर का प्रमुख मंत्री निजामद्दीन अली खलीफा हुमायूं को अयोग्य समझकर बाबर के बहनोई मेंहदी ख्वाजा को गद्दी पर आसीन करना चाहता था किन्तु स्वयं का जीवन खतरे में समझकर उसने हुमायूं का समर्थन कर दिया। हुमायूं के सबसे बड़े शत्रु अफगान थे जो मुगलों को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए लगातार प्रयत्नशील थे। इसी क्रम में हुमायूं का प्रमुख शत्रु अफगान नेता शेर खान था जिसे हम सभी शेरशाह सूरी के नाम से जानते हैं।
हुमायूं का दूसरा प्रमुख शत्रु गुजरात का शासक बहादुर शाह था। हुमायूं की असफलता एक प्रमुख कारण उसकी व्यक्तिगत दुर्बलता भी थी। इस सम्बन्ध में लेनपूल लिखता है कि “हुमायूं का असफलता का मुख्य कारण उसकी विवेकरहित दयालुता थी।”
— हुमायूं ने गुजरात के शासक बहादुर शाह की बढ़ती हुई शक्ति को रोकने के लिए साल 1531 में कालिन्जर के शासक प्रताप रूद्र देव पर आक्रमण कर पराजित किया तथा हिन्दू मंदिरों को तुड़वाया।
— अफगानों के साथ हुमायूं का पहला मुकाबला 1532 ई. में दोहरिया के युद्ध (उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्थित) में हुआ। अफगानों का नेतृत्व महमूद लोदी कर रहा था किन्तु अफगानों की करारी हार हुई। इस युद्ध में शेर खान भी महमूद लोदी के साथ था किन्तु उसने केवल दिखावे के लिए मदद की। दरअसल हिन्दुस्तान में अफगानों की कमान शेर खान स्वयं अपने हाथों में लेने को उद्दत था।
— साल 1532 में हुमायूं ने जब पहली बार चुनार किले का घेरा डाला तब यह किला अफगान नायक शेर खान के अधीन था। इस दौरान शेरखान ने बड़ी चतुराई से हुमायूं की आधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने बेटे कुतुब खां के साथ एक अफगान सैनिक टुकड़ी मुगलों की सेवा में भेज दी।
— साल 1532 में ही हुमायूं ने रायसीन किले को जीत लिया और 1533 ई. में मेवाड़ को सन्धि करने के लिए विवश किया। दरअसल बहादुर शाह ने तुर्की के प्रसिद्ध तोपची रूमी खां की मदद से एक अच्छा तोपखाना तैयार कर लिया था।
— अप्रैल, 1535 में मन्दसौर के युद्ध में हुमायूं ने बहादुर शाह को करारी मात दी और मांडू व चम्पानेर के किलों को जीत लिया। हुमायूं गुजरात में सैनिक सफलता प्राप्त करने वाला प्रथम मुगल बादशाह था। हुमायूं ने अस्करी को गुजरात व मालवा का गवर्नर नियुक्त किया, किन्तु बहादुर शाह ने कुछ समय बाद फिर से मुगलों को निकाल बाहर किया।
— अगस्त, 1535 में हुमायूं तथा बहादुर शाह के सिपहसालार इकतार खां के मध्य चम्पानेर का युद्ध हुआ जिसमें हुमायूं विजयी हुआ तथा उसे चम्पानेर किले से गुजरात के सुल्तानों का खजाना प्राप्त हुआ।
— जब गुजरात के शासक बहादुरशाह ने साल 1534-35 में चित्तौड़ किले की घेराबन्दी की तो चित्तौड़ की रानी कर्णावती (करमेती) ने राखी भेजकर हुमायूं से सहायता की प्रार्थना की किन्तु हुमायूं ने कोई सहायता नहीं की। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि बहादुरशाह ने हुमायूं को यह सूचना भिजवाई थी कि वह इस आक्रमण नहीं करे, ताकि वह काफिरों का वध कर सके। इसलिए हुमायूं सारंगपुर में आकर रूक गया।
अफगान नेता शेरशाह सूरी से मुकाबला
अफगान नेता शेर खान (शेरशाह सूरी) ने साल 1534 में सूरजगढ़ को जीता। इसके बाद 1536 में बंगाल जीतकर वहां के शासक नुसरत शाह से 13 लाख दीनार वसूला एवं ‘हजरते आला’ की उपाधि धारण की। इस प्रकार बिहार और बंगाल का निर्विवाद शासक बन जाने से शेर खान की शक्ति और सम्मान में बहुत अधिक वृद्धि हुई।
लिहाजा शेर खान की शक्ति को रोकने के लिए हुमायूं ने 1538 ई. में चुनारगढ़ (चुनार किले) पर दूसरा घेरा डाला और किले पर अधिकार कर लिया। हांलाकि इससे पूर्व ही शेरशाह सूरी बंगाल एवं चुनारगढ़ के खजाने को बिहार स्थित रोहतासगढ़ के किले में सुरक्षित पहुंचा चुका था।
चुनारगढ़ पर अधिकार करने के बाद हुमायूं 15 अगस्त 1538 को बंगाल की राजधानी गौड़ पहुंचा। गौड़ में हुमायूं को सिर्फ लाशों के ढेर तथा उजाड़ ही दिखाई दिए। हुमायूं ने गौड़ का नाम जन्नताबाद रख दिया। इस दौरान हुमायूं ने एक बड़ी गलती कर दी, वह गौड़ में ही 8 माह तक ऐशोआराम करने लगा।
इस बीच शेर खान ने बनारस, कड़ा, बहराइच, कन्नौज व सम्भल पर अधिकार कर लिया तथा जौनपुर व चुनारगढ़ को घेरकर आगरा से हुमायूं को अलग कर दिया। वहीं हिन्दाल ने शेख बहलोल को मारकर आगरा में स्वयं को बादशाह घोषित किया।
1. चौसा का युद्ध (29 जून, 1539 ई.)
बंगाल से लौटते समय हुमायूं एवं शेर खान के बीच बक्सर के निकट चौसा नामक स्थान पर 29 जून 1539 ई. को युद्ध हुआ, जिसमें हुमायूं की करारी हार हुई। चौसा के युद्ध में हुमायूं की करारी हार के पीछे उसकी अव्यवस्थित सेना एवं भाईयों का सहयोग नहीं मिलना शामिल था।
चौसा युद्ध के दौरान हुमायूं अपनी जान बचाने के लिए घोड़े सहित गंगा नदी में कूद गया और निजाम नामक भिश्ती की सहायता से अपनी जान बचाई। हुमायूं ने इस उपकार के बदले उस भिश्ती को एक दिन का बादशाह बना दिया था। तब निजाम भिश्ती ने चमड़े के सिक्के चलवाए।
चौसा युद्ध में हुमायूं को करारी शिकस्त देने के बाद शेर खान ने शेरशाह की उपाधि धारण की। इसी के साथ शेरशाह सूरी ने अपने नाम का खुतबा पढ़वाने तथा सिक्का ढालने का आदेश दिया।
2. कन्नौज अथवा बिलग्राम का युद्ध (17 मई, 1940 ई.)
17 मई, 1540 को हुमायूं और शेरशाह सूरी के मध्य कन्नौज (बिलग्राम) में निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में भी हुमायूं की करारी शिकस्त हुई। कन्नौज के युद्ध में हुमायूं का भाई कामरान सहयोग करने हेतु आया था किन्तु नेतृत्व के प्रश्न पर मतभेद होने के कारण वह बिना युद्ध लड़े ही चला गया। इस युद्ध तारीख-ए-रशीदी के लेखक मिर्जा हैदर दुगलत ने भी भाग लिया, वह लिखता है कि “एक भी तीर-गोली नहीं चली व मुगल सेना युद्ध मैदान से भाग खड़ी हुई।” इसी के साथ हिन्दुस्तान की सत्ता अफगानों के नेता शेरशाह सूरी के हाथों में आ गई।
कन्नौज युद्ध में हार के पश्चात हुमायूं ने शेरशाह के विरूद्ध मारवाड़ के शक्तिशाली राजा मालदेव से मदद मांगी। पहले तो मालदेव ने हुमायूं को सहायता देने का आश्वासन दिया किन्तु बाद में शेरशाह सूरी के भय से उसने हुमायूं की कोई मदद नहीं की।
लिहाजा, अब स्थिति यह हो गई कि कन्नौज युद्ध के पश्चात हुमायूं को भारत छोड़कर तकरीबन 15 वर्षों तक निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा। अपने निर्वासन काल के दौरान 29 अगस्त 1541 को हुमायूं ने हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरू फारस के शिया मीर बाबा दोस्त (मील अली अकबर जामी) की पुत्री हमीदा बेगम से निकाह कर लिया।
हमीदा बेगम को मरियम मकानी के नाम से भी जाना जाता है। इसी विवाह के पश्चात अमरकोट के राणा वीरसाल के किले में 15 अक्टूबर 1542 ई. को अकबर का जन्म हुआ। हांलाकि हुमायूं के फारस जाते समय नवजात अकबर अस्करी के हाथ लग गया।
हुमायूं ने साल 1544 में फारस (ईरान) के शाह तहमाश्प के यहां शरण ली। फारस के शाह तहमास्प ने हुमायूं को इस शर्त पर शरण दी कि वह शिया मत स्वीकार करेगा व प्रचार-प्रसार करेगा, साथ ही कन्धार जीतने के बाद ईरान को दे देगा।
हुमायूं की हिन्दुस्तान वापसी
इस प्रकार फारस के शाह तहमास्प से मिली सैन्य मदद से हुमायूं ने अपने भाई अस्करी को पराजित कर 1545 ई. में काबुल और कन्धार पर अधिकार कर लिया। साल 1547 में कामरान ने 5 वर्ष के अकबर को काबुल किले की दीवार पर लटका दिया ताकि हुमायूं किले पर तोप न चलाए। बाद में हुमायूं ने कामरान को बन्दी बनाकर अन्धा कर दिया।
शेरशाह सूरी की निधन के पश्चात हिन्दुस्तान पर अधिकार करने के उद्देश्य से हुमायूं 5 दिसम्बर 1554 ई. को पेशावर पहुंचा। इसके बाद हुमायूं ने फरवरी 1555 ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया।
3. मच्छीवारा का युद्ध (15 मई 1555 ई.)
15 मई 1555 ई. को मुगलों एवं अफगान सरदार नसीब खान एवं तातार खान के मध्य मच्छीवारा का युद्ध (लुधियान, पंजाब) हुआ। मच्छीवारा के युद्ध में अफगानों की हार हुई फलस्वरूप सम्पूर्ण पंजाब पर मुगलों का अधिकार हो गया।
4. सरहिन्द का युद्ध (22 जून 1555 ई.)
22 जून 1555 ई. को मुगलों और अफगानों के बीच सरहिन्द का युद्ध हुआ। सरहिन्द के युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व बैरम खान ने किया जबकि अफगान सेना का नेतृत्व सिकन्दर सूर (सूर वंश का पांचवा शासक) ने किया। सरहिन्द के युद्ध में अफगान बुरी तरह पराजित हुए। इस हार के बाद सिकन्दर सूरी शिवालिक की पहाड़ियों में भाग गया।
सरहिन्द के युद्ध ने मुगलों को एक बार फिर से हिन्दुस्तान की सत्ता प्रदान की। इस प्रकार 23 जुलाई 1555 ई. को हुमायूं पुन: दिल्ली की गद्दी पर आरूढ़ हुआ। हांलाकि वह बहुत ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सका।
हुमायूं की मृत्यु
हुमायूं एक दिन दिल्ली स्थित दीनपनाह भवन (शेर मण्डल) स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था, इस दौरान उसका पैर फिसल गया जिससे वह नीचे गिरकर मर गया। इस प्रकार जनवरी, 1556 ई. में हुमायूं ने अपनी अंतिम सांस ली।
इतिहासकार लेनपूल लिखता है कि “हुमायूं का अर्थ होता है- भाग्यवान, किन्तु वह एक अत्यधिक दुर्भाग्यशाली व्यक्ति था। वह जीवनभर लुढ़कता रहा और लुढ़कर ही उसकी मौत हो गई।” हुमायूं ज्योतिष में अधिक विश्वास करता था। इसलिए वह सप्ताह में सात दिन सात रंग के कपड़े पहनता था। मुख्यत: वह इतवार को पीले, शनिवार को काले एवं सोमवार को सफेद रंग का कपड़ा पहनता था।
हुमायूं ने दिल्ली में दीनपनाह नामक दुर्ग बनवाया, जिसे आजकल पुराना किला के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा आगरा की मस्जिद और ईरानी शैली में निर्मित हिसार स्थित फतेहाबाद की मस्जिद हुमायूं द्वारा निर्मित प्रमुख इमारते हैं।
हुमायूं की असफलता का सबसे प्रमुख कारण उसका कमजोर चरित्र था। हुमायूं अफीम का बहुत शौकीन था। अबुल फजल ने हुमायूं को ‘इन्सान-ए-कामिल’ कहकर सम्बोधित किया है। हुमायूं के तीन प्रमुख प्रतिद्वंदी उसके निकट सम्बन्धी ही थे, जो मिर्जा कहलाते थे : 1. मुहम्मद जमान मिर्जा 2. मिर्जा मुहम्मद सुल्तान 3. मिर्जा मेहंदी ख्वाजा।
हुमायूं का सबसे योग्य एवं वफादार सेनापति बैरम खान था, जिसने निर्वासन के दिनों में व राजसिंहासन प्राप्त करने में बहुत ज्यादा मदद की। हुमायूं के बारे में लेनपूल ने लिखा है कि “हुमायूं गिरते-चढ़ते इस जीवन से मुक्त हो गया, ठीक उसी तरह से जिस तरह तमाम जिन्दगी वह गिरते-पड़ते चलता रहा था।”
हुमायूं का मकबरा
अकबर की सौतेली मां हाजी बेगम ने फारसी वास्तुकार मीरक मिर्जा गयास की देखरेख में दिल्ली में हुमायूं का मकबरा बनवाया। अकबर काल में निर्मित हुमायूं के मकबरे पर फारसी प्रभाव स्पष्ट दिखता है। हुमायूं के मकबरे को ताजमहल का पूर्वगामी माना जाता है किन्तु इसमें ताजमहल की भांति स्वतंत्र मीनारे नहीं हैं। हुमायूं के मकबरे में दोहरे गुम्बद का प्रयोग हुआ है। चार बाग पद्धति का पहली बार प्रयोग हुमायूं के मकबरे में हुआ। हांलाकि इससे पूर्व सिकन्दर लोदी का मकबरा बाग में ही बना था।
हुमायूं के मकबरे में दफनाए गए शाही व्यक्ति — बेगा बेगम, हमीदा बानू बेगम, हुमायूं की छोटी बेगम, दारा शिकोह, जहांदरशाह, फर्रूखशियर, रफी उद्दरजात, रफी उद्दौला और आलमगीर द्वितीय।
1857 की महाक्रांति के दौरान अंग्रेज लेफ्टिनेंट हडसन ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर और उसके तीन शहजादों को हुमायूं के मकबरे से ही गिरफ्तार किया था।
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