बाबर की मृत्यु के चार दिन पश्चात हुमायूं 23 वर्ष की उम्र में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। हांलाकि बादशाह बनने के दस वर्ष के अन्दर ही हुमायूं को हिन्दुस्तान से बेदखल होना पड़ा। दरअसल मुगल शासक हुमायूं का सामना एक महान अफगानी योद्धा शेरशाह सूरी से हुआ जो युद्धकौशल और कूटनीति के मामले में उससे बहुत ज्यादा बेहतर था।
चंदेरी के युद्ध में मुगलों की तरफ से लड़ने वाले शेरशाह सूरी ने कहा था कि “अगर भाग्य ने मेरी सहायता की तो मैं सरलता से मुगलों को एक दिन भारत से बाहर खदेड़ दूंगा।” उसका यह कथन सच साबित हुआ, बंगाल और बिहार पर नियंत्रण रखने वाले शेरशाह सूरी ने साल 1539 में चौसा के युद्ध में हुमायूं को करारी शिकस्त दी और शेरशाह की उपाधि धारण की तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा सिक्के ढलवाए।
आखिरकार 1540 ई. में कन्नौज के निर्णायक युद्ध में शेरशाह सूरी ने हुमायूं को पराजित कर दिल्ली का सिंहासन प्राप्त कर लिया। इस प्रकार शेरशाह सूरी ने हुमायूं को हिन्दुस्तान से बाहर खदेड़ दिया और उसे तकरीबन 15 वर्षों तक निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा।
शेरशाह सूरी की खौफ से हुमायूं अपनी जान बचाकर ईरान भाग गया। अब आपका सोचना लाजिमी है कि आखिर में हुमायूं को ईरान के किस शासक ने और किन शर्तों पर शरण दी थी? इतना ही नहीं, निर्वासन के दौरान हुमायूं ईरान में कितने दिनों तक रहा और उसने किन-किन शहरों में अपना जीवन व्यतीत किया? इन सभी प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
शेरशाह सूरी ने दी हुमायूं को कारारी शिकस्त
मुगल गद्दी पर बैठने के बाद हुमायूं ने 1530 से 1540 ई. के मध्य अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों पर सकुशल शासन किया। किन्तु इस दौरान हुमायूं का सामना अफगानी योद्धा शेरशाह सूरी से हुआ जिसका बंगाल और बिहार पर पूरा नियंत्रण था, अपनी इसी महात्वाकांक्षा के चलते वह मुगल बादशाह हुमायूं के लिए खतरा बन गया।
इतिहासकार फरहत नसरीन अपनी किताब ‘इफ हिस्ट्री हैज टॉट अस एनीथिंग’ में लिखती है कि “जहां तक युद्धकौशल और कूटनीति की बात है, शेरशाह सूरी मुगल बादशाह हुमायूं के मुकाबले बहुत ज्यादा बेहतर था।” यही वजह है कि 54 वर्षीय शेरशाह सूरी ने 32 वर्षीय हुमायूं को दो बार करारी शिकस्त दी।
शेरशाहू सूरी और हुमायूं के बीच चौसा का ऐतिहासिक युद्ध 26 जून, 1539 ई. को लड़ा गया। शेरशाह सूरी ने वर्षा शुरू होते ही 26 जून को भोर में ही मुगलों पर धावा बोल दिया। इससे मुगलों में भगदड़ मच गई और तकरीबन 8000 मुगल सैनिक और सरदार मारे गए। कर्मनासा नदी पार करने के प्रयास में मुगलों के हजारों घोड़े डूब गए अथवा मारे गए। स्वयं हुमायूं का घोड़ा डूब गया और एक भिश्ती ने हुमायूं की जान बचाई।
अफगानों के हाथ बड़ी मात्रा में लूट का माल तथा हरम की स्त्रियां मिली किन्तु उन्हें सम्मानपूर्वक हुमायूं के पास पहुंचा दिया गया। चौसा युद्ध के पश्चात शेरशाह सूरी ने अपना राज्याभिषेकर करवाया तथा ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की व अपने नाम का खुतबा पढ़वाया एवं सिक्के ढलवाए।
चौसा में मिली पराजय से हुमायूं की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। कई मुगल उमरा उसके विरूद्ध हो गए। उसके भाई कामरान ने भी हुमायूं का साथ नहीं दिया अपितु वह लाहौर लौट गया। ऐसे में शेरशाह सूरी को नियंत्रित करने के लिए हुमायूं ने कन्नौज की तरफ कूच किया। इस बार भी हुमायूं ने चौसा वाली गलती दोहराई, उसने गंगा नदी पारकर दक्षिणी तट पर अपना सैन्य खेमा लगाया।
15 मई को घनघोर वर्षा हुई जिससे मुगल खेमे में पानी भर गया। 17 मई 1540 को मुगल सैनिक अपने खेमे को ऊंची जगह पर ले जाने का प्रयास कर रहे थे, तभी अफगानों ने अचानक हमला कर दिया। इस तीव्रगामी हमलें में मुगल तोपखानों का भी इस्तेमाल नहीं कर सके और जल्द ही सेना के पांव उखड़ गए और मुगल सैनिक भाग खड़े हुए। इस प्रकार 17 मई 1540 को कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में शेरशाह सूरी ने हुमायूं को करारी शिकस्त देकर उसे हिन्दुस्तान से भागने के लिए बाध्य कर दिया।
हिन्दुस्तान से जान बचाकर भागा हुमायूं
17 मई, 1540 को कन्नौज का युद्ध हारने के पश्चात हुमायूं अपनी जान बचाकर आगरा पहुंचा लेकिन वहां भी नहीं ठहर सका क्योंकि शेरशाह उसका पीछा करता हुआ आ रहा था। हुमायूं भागकर लाहौर पहुंचा लेकिन वह अपने भाई के साथ मिलकर कुछ नहीं कर सका।
लाहौर में स्वयं को सुरक्षित न देखकर हुमायूं सिंध चला गया। तत्पश्चात हुमायूं ने सिन्ध को जीतने का प्रयत्न किया किन्तु वह असफल हुआ। इसी अवसर पर 1541 ई. में हुमायूं ने अपने भाई हिन्दाल के गुरू मीरअली अकबर की पुत्री हमीदा बानू बेगम से शादी कर ली।
जब हिन्दाल और उसके वफादार सहयोगी यादगार मिर्जा ने भी हुमायूं का साथ छोड़ दिया तब उसे जोधपुर के शक्तिशाली शासक मालदेव से सहायता का अश्वासन मिला। किन्तु शेरशाह सूरी की बढ़ती शक्ति और हुमायूं की दुर्बल स्थित को देखकर मालदेव ने अपना विचार त्याग दिया लिहाजा हुमायूं को वापस लौटना पड़ा। रास्ते में अमरकोट के राजा वीरसाल ने हुमायूं को शरण दी, अमरकोट के किले में ही हुमायूं के पुत्र अकबर (जलाल) का जन्म हुआ।
हुमायूं अमरकोट में भी नहीं रूक सका। उस समय सिन्ध के शासक शाह हुसैन अरगों ने हुमायूं से छुटकारा पाने के लिए रसद और धन देने का आश्वासन दिया जिसे हुमायूं ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद हुमायूं कन्धार की ओर चल पड़ा। कन्धार में कामरान की तरफ से उसका भाई अस्करी सूबेदार नियुक्त था। कामरान के इशारे पर अस्करी ने हुमायूं को कैद करने का प्रयत्न किया, हांलाकि हुमायूं बड़ी कठिनाई में चौदह महीने के बेटे अकबर और पत्नी हमीदाबानू बेगम को छोड़कर अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ।
सम्भवत: कामरान ने हुमायूं के बेटे अकबर (जलाल) को बंधक बना लिया था। किन्तु अस्करी ने अकबर को न केवल गोद लिया अपितु कामरान को यह समझाया कि वह बालक अकबर के साथ सख्ती नहीं बरते। इस प्रकार अकबर यानी कि जलाल का बचपन काबुल और कन्धार पहाड़ी इलाकों में रोमांच के साथ बीता। हुमायूं के वापस लौटने तक अस्करी ने ही अकबर (जलाल) की देखभाल की और कामरान से उसकी जान बचाई।
ईरान पहुंचा हुमायूं
शेरशाह सूरी से निर्णायक युद्ध हारने के बाद हुमायूं को जब हिन्दुस्तान के किसी कोने में जगह नहीं मिली तो वह साल 1544 में ईरान के तत्कालीन सफाविद साम्राज्य के शासक शाह महमास्प के संरक्षण में चला गया। ऐतिहासिक स्रोतों के मुताबिक, ईरान में सफाविद शासक शाह तहमास्प ने हुमायूं को इस शर्त पर संरक्षण प्रदान किया कि सुन्नी मुसलमान हुमायूं स्वयं शिया बन जाएगा और अपने राज्य की सीमाओं में शिया धर्म को फैलाएगा।
इतना ही नहीं, मुगल गद्दी को पुन: हासिल करने व कन्धार को जीतने के लिए शाह तहमास्प ने हुमायूं को तकरीबन 12,000 ईरानी घुड़सवार सैनिकों की भी सैन्य मदद दी। इस मदद के बदले हुमायूं ने शाह तहमास्प को कन्धार वापस करने का वादा किया।
ईरान में कहां रहता था हुमायूं
अपने निर्वासन के दौरान हुमायूं सफाविद राजवंश के शासक शाह तहमास्प के संरक्षण में ईरान के अलग-अलग शहरों में रहा, जिसका उल्लेख कुछ इस प्रकार मिलता है। ऐतिहासिक स्रोतों के मुताबिक, मुगल बादशाह हुमायूं ने ईरान के ताब्रिज़ शहर में सफाविद शासक 'शाह तहमास्प' के शाही दरबार में काफी समय बिताया था। इसके अलावा हुमायूं को शाह तहमास्प के कई शाही महलों में ठहराया गया। इस दौरान वह हेरात और इस्फहान के राजसी बागों और महलों से बहुत प्रभावित हुआ और यहीं से मुगल दरबार में फारसी संस्कृति की नींव पड़ी।
हुमायूं को दोबारा मिला हिन्दुस्तान का सिंहासन
ईरान का राजा शाह तहमास्प हुमायूं की भारत में मुगल सत्ता को दोबारा प्राप्त करने की क्षमता पहचानता था। यही वजह है कि उसने हुमायूं को मजबूत ईरानी सैन्य सहायता प्रदान की। ऐसे में ईरानी शासक शाह तहमास्प की मदद से हुमायूं ने काबुल और कंधार को जीत लिया। कन्धार को जीतकर हुमायूं ने उसे ईरानियों को सौंप दिया किन्तु शाह तहमास्प के पुत्र का निधन हो जाने के पश्चात कन्धार को पुन: अपने अधीन कर लिया।
शेरशाह सूरी की मृत्यु के पश्चात हुमायूं ने हिन्दुस्तान की तरफ रूख किया। हुमायूं ने दिसम्बर 1554 में पेशावर और फरवरी 1555 में लाहौर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद मई, 1555 में मुगलों और अफगान सरदार नसीब खान और तातार खां की अगुवाई में मच्छीवारा का युद्ध हुआ। इस युद्ध में अफगान सरदार बुरी तरह हारे सम्पूर्ण पंजाब पर मुगलों का अधिकार हो गया।
तत्पश्चात 22 जून 1555 को मुगलों और अफगानों के मध्य सरहिन्द का निर्णायक युद्ध लड़ा गया। सरहिन्द के युद्ध में अफगानों का नेतृत्व सिकन्दर सूर एवं मुगलों का नेतृत्व हुमायूं के कुशल सेनापति बैरम खान ने किया। इस युद्ध में अफगान बुरी तरह हारे। इस प्रकार सरहिन्द विजय ने हुमायूं को हिन्दुस्तान की गद्दी प्रदान की। लिहाजा 23 जुलाई 1555 ई. को हुमायूं एक बार फिर से दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ।
हुमायूं को अपने भाईयों से मिला छुटकारा
बाबर के चार पुत्र थे - हुमायूं, कामरान, अस्करी और हिन्दाल। इनमें हुमायूं सबसे बड़ा था। मुगल बादशाहों में हुमायूं एकमात्र शासक था जिसने अपने भाइयों में साम्राज्य का विभाजन किया था, जो उसकी असफलता का सबसे बड़ा कारण था। कामरान और अस्करी ने हुमायूं का आजीवन विरोध किया।
कामरान ने काबुल पर दो बार अधिकार कर लिया, उसने कभी अफगानों की सहायता ली, कभी उज्बेगों की, तो कभी सिन्ध के अमीर की। किन्तु हुमायूं ने कामरान को हर बार शिकस्त दी। बावजूद इसके हुमायूं अपने छोटे भाईयों कामरान और अस्करी को माफ करता रहा।
आखिरकार हुमायूं ने इन्हें दंडित करने का निर्णय लिया, इसके बाद कामरान की आंखें निकाल ली गई और मक्का जाने की आज्ञा दे दी गई, जहां 1557 ई. में उसकी मौत हो गई। अस्करी को भी कैद से मुक्त कर मक्का जाने की आज्ञा दे दी गई, तत्पश्चात 1558 ई. में उसकी भी मृत्यु हो गई। जबकि हिन्दाल अपने बड़े भाई हुमायूं की तरफ से युद्ध करता हुआ साल 1551 में ही मारा जा चुका था। इस प्रकार हुमायूं को अपने भाईयों से छुटकारा मिला।
हुमायूं की मृत्यु
23 जुलाई 1555 ई. को हुमायूं एक बार फिर से हिन्दुस्तान की गद्दी पर आसीन हुआ किन्तु वह ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सका। दुर्भाग्य से 21 जनवरी के दिन दिल्ली के पुराने किले में स्थित पुस्तकालय शेर मंडल की सीढ़ियों से नीचे उतरते समय जामें में उसका पैर फंस गया और सिर के बल गिरता हुआ वह जमीन पर आ गया।
हुमायूं के खोपड़ी की हड्डी टूट चुकी थी, उसके दाहिने कान से तेजी खून बह रहा था। शेरमंडल की सीढ़ियों से गिरने के पश्चात हुमायूं ने आंख नहीं खोली और तीन दिन बाद 24 जनवरी 1556 ई. की शाम 47 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई। हुमायूं के बारे में इतिहासकार लेनपूल लिखता है कि “हुमायूं आजीवन लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते हुए ही उसकी मौत हो गई।”
मुल्ला बेकशी नामक एक हमशक्ल को हुमायूं की पोशाक पहनाकर 17 दिनों तक उसकी मौत को छुपाया गया, ताकि विद्रोह न हो सके। तत्पश्चात शहजादे अकबर को उत्तराधिकारी घोषित कर 13 वर्ष की उम्र में दिल्ली के तख्त पर आसीन किया गया।
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