ब्लॉग

To what extent was Mughal Emperor Humayun fond of books?

किस हद तक किताबों का शौकीन था मुगल बादशाह हुमायूं?

दोस्तों, कुछ इतिहासकारों ने मुगल बादशाह हुमायूं को अफीमची, नृत्य-संगीत, भोग-विलास का शौकीन तथा अदूरदर्शी शासक के रूप में दिखाने की कोशिश की है। जबकि हकीकत यह है कि जटिल एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाले हुमायूं ने 15 साल के निर्वासन के बावजूद अपनी सैन्य तथा कूटनीतिक योग्यता के कारण हिन्दुस्तान में मुगल सत्ता दोबारा प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की।

हुमायूं ने अपने निर्वासन के दौरान भारत, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, फ़ारस ईरान होते हुए यूरोप की सीमाओं तक तकरीबन 122 शहरों का दौरा किया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि फारसी, अरबी, गणित तथा ज्योतिष का जानकार हुमायूं मुगलकाल का एकमात्र बादशाह है जो किताबों का सर्वाधिक शौकीन था। ऐसे यदि आप भी मुगल बादशाह हुमायूं की किताबों से जुड़े शौक के बारें में रोचक बातें जानने को इच्छुक हैं, तो यह स्टोरी जरूर पढ़ें। 

संघर्षशील एवं धैर्यवान शासक था हुमायूं

महान अफगान शासक शेरशाह सूरी से करारी शिकस्त खाने के बाद हुमायूं को तकरीबन 15 वर्षों तक हिन्दुस्तान से निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा। इस दौरान हुमायूं ने भारत, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, फ़ारस (ईरान) होते हुए यूरोप की सीमाओं तक तकरीबन 122 शहरों का दौरा किया।

अपने निर्वासित जीवन के दौरान हुमायूं ने ईरान के सफाविद शासक शाह तहमास्प के यहां शरण ली तथा उसकी सहायता से साल 1555 में दिल्ली की सत्ता पुन: प्राप्त करने में सफलता हासिल की। साल 1530 से 1540 तथा 1555 से 1556 तक यानि महज 11 वर्षों के छोटे से शासनकाल में बादशाह हुमायूं ने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से पर शासन किया।

बाबर से विरासत में मिली थी शैक्षणिक अभिरूचि

जटिल एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाले हुमायूं को फारसी, अरबी, गणित तथा ज्योतिष की औपचारिक शिक्षा प्रदान की गई थी। यद्यपि हुमायूं को किताबों, कला और विज्ञान के प्रति अभिरूचि अपने पिता बाबर से विरासत में मिली थी, जो स्वयं तुर्की भाषा का ज्ञाता था। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामातुर्की भाषा में ही लिखी थी।

मुबईयान नामक पद्य शैली का जन्मदाता बाबर को ही माना जाता है। इसके अतिरिक्त बाबर ने 'खत-ए-बाबरी' नामक एक लिपि का भी अविष्कार किया था। मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने पहली बार शहजादे हुमायूं को बलूच भाड़े के सैनिक गाज़ी खान की लाइब्रेरी से किताबों का एक संग्रह तोहफ़े में दिया था।

किताबों का बेहद शौकीन था हुमायूं

मुगल बादशाह हुमायूं का किताबों के प्रति दीवानगी ताउम्र दिखती है। हिन्दुस्तान में शासन करने से लेकर ईरान में अपने निर्वासित जीवन के दौरान भी उसने किताबों को खुद से कभी दूर नहीं किया। मुगल बादशाह हुमायूं बंगाल और गुजरात अभियानों दौरान एक चलती-फिरती लाइब्रेरी अपने साथ ले गया था। यहां तक कि अफगान योद्धा शेरशाह सूरी से हारने के बाद जब उसने कैम्बे (खंभात) में डेरा डाला तब भी उसके साथ कई किताबें एवं एक लाइब्रेरियन था।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में आर्ट हिस्ट्री की प्रोफेसर कविता सिंह ने स्क्रॉल में एक आर्टिकल में लिखा है कि एक रात कोली जनजाति (भीलों) के समूह ने हुमायूं के गुजरात अभियान के दौरान उसके शिविर को लूट लिया था, यहां तक कि उसके कुछ मुख्य सरदार भी मारे गए थे। इस दौरान उसकी कई दुर्लभ किताबें खो गईं जिसमें उस्ताद बिहज़ाद द्वारा चित्रित तैमूर-नामा भी शामिल था। हुमायूं ने किताबों के नुकसान पर न केवल दुख जाताया था बल्कि एक-एक करके सबसे कीमती पांडुलिपियों के नाम भी बताए।

अपने निर्वासन के दौरान हुमायूं ने ईरान के शाह तहमास्प की मदद से अपने भाई कामरान मिर्जा से काबुल और कन्धार को वापस जीत लिया था। कामरान के साथ हुए युद्ध में हुमायूं बुरी तरह घायल हुआ था, इसके अलावा चमड़े के बक्सों में रखी उसकी पूरी लाइब्रेरी खो गई थी।

किन्तु कुछ ही दिन बाद हुमायूं ने जब जीत हासिल की तब उसने अपनी खोई हुई लाइब्रेरी दोबारा प्राप्त कर ली। हुमायूं ने अपने सरदारों से लाइब्रेरी के बारे में पूछा तब उसे बताया गया कि किताबें सुरक्षित हैं। इसके बाद हुमायूं ने कहा कि अल्लाह का शुक्र है कि जो चीजें बदली नहीं जा सकतीं, वे सुरक्षित हैं ! बाकी चीजों की बात करें तो, वे छोटी-मोटी बातें हैं।इसके बाद उस रात हुमायूं के शिविर में जश्न मनाया गया।

हुमायूं की लाइब्रेरी 'शेर मंडल'

मुगल बादशाह हुमायूं अपने निर्वासित जीवन के दौरान ईरान के शासक शाह तहमास्प के दरबार की साहित्यिक और कलात्मक गतिविधियों से काफी प्रभावित हुआ। यही वजह है कि साल 1555-56 में दिल्ली की सत्ता पर दोबारा कब्जा करने बाद उसने पुराने किले में 'शेर मंडल' नामक एक पुस्तकालय और वेधशाला का निर्माण करवाया।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि शेर मंडल नामक की यह दो मंजिला इमारत शेरशाह सूरी ने 1541 ई.में बनवाई थी। यह अष्टकोणीय इमारत ग्रेनाइट और लाल बलुआ पत्थर से निर्मित थी। बादशाह हुमायूं के निजी पुस्तकालय शेरमंडल में फारसी, अरबी और संस्कृत ग्रंथों की बहुलता थी। खगोलीय गणनाओं में गहरी रुचि रखने वाला हुमायूं ज्योतिष और जादू की रहस्यमयी किताबों का दीवाना था।

निजी लाइब्रेरी शेर मंडल में बैठकर हुमायूं घंटों किताबें पढ़ता था और ज्योतिषीय गणनाएँ करता था। हुमायूं अपने दरबार में ज्योतिषियों को रखता था और निर्णय लेने से पहले सितारों की स्थिति देखता था। हुमायूं अपनी राशि के हिसाब से सप्ताह में सात दिन अलग-अलग रंग के कपड़े पहनता था।

बादशाह हुमायूं सैन्य अभियानों पर जाने से पूर्व अपनी सफलता सुनिश्चित करने हेतु ज्योतिष के विचित्र तरीकों का सहारा लेता था। बतौर उदाहरण- ‘अकबरनामा के एक चित्र में हुमायूँ के कंधे पर एक सफेद मुर्गा बैठा हुआ दिखाया गया है, ऐसा माना जाता है कि साल 1548 में बदख्शां अभियान के दौरान उसने इसे शुभ संकेत माना था। फ़ारसी इतिहासकार फ़रिश्ता के अनुसार, “बादशाह हुमायूं ने सात हॉल बनवाए, जिनका नाम सात ग्रहों के नाम पर रखा।

शेर मंडलकी सीढ़ियों से गिरकर हुई थी मौत

युद्ध अभियानों तथा अपनी यात्राओं के दौरान चलती-फिरती लाइब्रेरी साथ लेकर चलने वाले हुमायूं की मौत भी लाइब्रेरी में ही लिखी थी। गुलबदन बेगम कृत हुमायूंनामा के अनुसार,  साल 1556 में 24 जनवरी के दिन कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। हुमायूं ने गुलाब जल मंगवाकर अफीम की आखिरी खुराक ली। दिल्ली सल्तनत के कुछ लोग हज यात्रा करके लौटे थे, उनसे मिलने के लिए उन्हें लाल पत्थरों से बने पुस्तकालय शेर मंडल में बुलाया जो पुराने किले की छत पर मौजूद था।

हुमायूं अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों पर पहुंचा ही था तभी बगल की मस्जिद से अल्लाह हू अकबर..’ की आवाज सुनाई दी। अजान की आवाज सुनकर हुमायूं ने बैठकर सिजदा करने की कोशिश की तभी उसका पैर जामे में फंस गया जिससे वह लड़खड़ा सिर के बल सीढ़ियों से गिरता हुआ जमीन पर आ गया।

हुमायूं के खोपड़ी की हड्डी टूट गई थी उसके दाहिने कान से तेजी से खून निकल रहा था। शेर मंडल की सीढ़ियों से गिरने बाद हुमायूं ने आंख नहीं खोली और तीन दिन बाद 24 जनवरी, 1556 की शाम 47 साल की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। मुल्ला बेकशी नामक एक हमशक्ल को हुमायूं की पोशाक पहनाकर 17 दिनों तक उसकी मौत को छुपाया गया ताकि विद्रोह न हो सके। इसके बाद शहजादे अकबर को उत्तराधिकारी घोषित कर महज 13 वर्ष की उम्र में दिल्ली के तख्त पर आसीन किया गया।

इसे भी पढ़ें : चौसा का भिश्ती सिर्फ एक दिन के लिए बना था हिन्दुस्तान का बादशाह

इसे भी पढ़ें : वात्स्यायन रचित 'कामसूत्र' पूरे विश्व में इतना पॉपुलर क्यों है?