यह स्टोरी उस दौर की है जब साल 1539 में 26 जून को बिहार के बक्सर जिले में गंगा नदी के किनारे स्थित चौसा में अफगानी योद्धा शेरशाह सूरी ने मुगल बादशाह हुमायूं को करारी शिकस्त दी थी। इतना ही नहीं, हुमायूं अपनी जान बचाने के लिए घोड़े समेत गंगा नदी में कूद पड़ा, किन्तु कुछ देर पश्चात वह डूबने लगा।
इस दौरान चौसा के निजाम नामक भिश्ती ने गंगा में कूदकर हुमायूं की जान बचाई। 17 मई, 1540 को कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में शेरशाह सूरी ने हुमायूं को निर्णायक शिकस्त दी। इसके बाद हुमायूं को हिन्दुस्तान छोड़कर ईरान में शरण लेनी पड़ी। शेरशाह की मौत के बाद अफगानों को पराजित कर हुमायूं साल 1555 में एक बार फिर से दिल्ली के तख्त पर बैठा।
आपको यह बात जानकर हैरानी होगी कि निर्वासन के पश्चात दोबारा सत्ता प्राप्त करने में बादशाह हुमायूं को 15 साल लग गए किन्तु वह चौसा के भिश्ती निजाम को नहीं भूला था। अपनी मौत से महीनाभर पहले 14 दिसम्बर 1555 को हुमायूं ने चौसा के उस भिश्ती को एक दिन के लिए दिल्ली का बादशाह बनाया। अब आपका सोचना लाजिमी है, आखिर में हुमायूं ने चौसा के भिश्ती निजाम को एक दिन के लिए हिन्दुस्तान का बादशाह क्यों बनाया और फिर क्या हुआ?
...तो फिर गंगा नदी में डूब जाता हुमायूं
बंगाल से लौटते समय हुमायूं ने ग्राण्ड ट्रंक रोड का सहारा लिया, दुर्भाग्यवश इस भाग पर अफगानों का अधिकार था। बादशाह हुमायूं जब बिहार के बक्सर स्थित चौसा नामक स्थान पर पहुंचा तब उसने गंगा और कर्मनासा नदी के मध्य में अपनी सेना का पड़ाव डाला। वहीं दूसरी तरफ, उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी शेर खान (शेरशाह सूरी) भी अपनी सेना के साथ हुमायूं का इंतजार कर रहा था।

जून का महीना था, शेर खान (शेरशाह सूरी) वर्षा की प्रतीक्षा कर रहा था क्योंकि वह जानता था कि मुगल सेना गंगा और कर्मनासा नदी के बीच में थी और वह भाग नीचा था इसलिए निचले भाग में वर्षा का पानी भरने तथा नदियों में बाढ़ आने के कारण मुगल सेना आसानी से कठिनाई में फंस सकती है।
शेर खान का अन्दाजा सटीक निकला, बारिश के शुरू होते ही मुगल सेना को कठिनाई होने लगी। इस अवसर का लाभ उठाकर 26 जून की भोर में शेरशाह सूरी ने अचानक मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया। इसके बाद मुगलों में भगदड़ मच गई और बड़ी संख्या में मुगल सैनिक मारे गए और ज्यादातर भाग खड़े हुए।
स्वयं मुगल बादशाह हुमायूं अपनी जान बचाने के लिए घोड़े सहित गंगा नदी में कूद पड़ा। हूमायूं का घोड़ा गंगा नदी में ही डूब गया, युद्ध में घायल हुमायूं भी डूबने ही वाला तभी नदी किनारे पानी भरते निजाम नामक एक भिश्ती ने अपनी मशक के सहारे उसकी जान बचाई। हांलाकि सच तो यह है कि, निजाम नामक उस भिश्ती को यह नहीं पता था कि उसने जिस शख्स की जान बचाई है, वह हिन्दुस्तान का बादशाह हुमायूं है। हांलाकि इस उपकार के बदले हुमायूं ने उस भिश्ती को एक दिन के लिए बादशाह बनाने का वादा किया और वहां से चला गया।
बता दें कि, मध्यकाल में भिश्तियों के कंधे पर बकरी अथवा बकरे के चमड़े से बना एक मशक हुआ करता था, जिसमें पानी भरा होता था। भिश्ती लोगों को अपनी मशक से पानी पिलाने के अलावा सड़कों पर पानी छिड़काव का काम भी करते थे।
चौसा के भिश्ती को 15 वर्षों तक नहीं भूला हुमायूं
चौसा युद्ध के पश्चात शेर खान ने स्वयं को सुल्तान घोषित किया, अपने नाम के खुतबे पढ़वाए तथा सिक्के ढलवाए एवं ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की। 17 मई, 1540 ई. को कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में शेरशाह सूरी ने हुमायूं को निर्णायक शिकस्त दी। इसके बाद हुमायूं को हिन्दुस्तान छोड़कर ईरान भागना पड़ा।
हांलाकि शाहंशाह शेरशाह की मौत के बाद 15 मई 1555 ई. को मच्छीवारा के युद्ध में अफगानों को निर्णायक शिकस्त देकर हुमायूं ने सम्पूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात 22 जून 1555 ई. को मुगल सेना ने बैरम खान के नेतृत्व में सूर शासक सिकन्दर सूर को सरहिन्द के युद्ध में पराजित किया।
सरहिन्द विजय ने हुमायूं को दोबारा भारत का राजसिंहासन प्रदान किया। ऐसे में 23 जुलाई 1555 ई. को हुमायूं एक बार फिर से दिल्ली के तख्त पर बैठा किन्तु वह अपने 15 वर्षों के निर्वासित जीवन के दौरान भी चौसा के निजाम नामक उस भिश्ती को भूला नहीं था, जिसने उसकी जान बचाई थी।
चौसा के भिश्ती को एक दिन के लिए बनाया बादशाह
वादे के मुताबिक, हुमायूं ने दिल्ली की गद्दी पर बैठते ही निजाम नामक भिश्ती को एक दिन का बादशाह बनाने के लिए अपनी शाही सवारी बक्सर के चौसा में भेजी और निजाम नामक उस भिश्ती को आगरा बुलवाया। इस्लाम के जानकारों की एक बैठक के बाद आगरा की बड़ी मस्जिद के सूफी संत शेख मुहम्मद गौस की सलाह पर हुमायूं ने 14 दिसम्बर 1555 ई. को चौसा के भिश्ती निजाम को एक दिन के लिए बादशाह बना दिया।
इस घटना का उल्लेख सूफी संत शेख मुहम्मद गौस ने अपनी किताब ‘सूफी हुमायूं’ में विस्तार से किया है। किताब ‘सूफी हुमायूं’ के अनुसार, “निजाम नामक भिश्ती को सिर्फ एक ही आदेश लागू करने का अधिकार दिया गया, ऐसे में निजाम नामक भिश्ती ने राज्य में अपने नाम से चमड़े के सिक्के (निज़ाम सिक्का) चलाने का आदेश पारित किया।
निजाम सिक्के से पहली खरीद ईरान से आए रेशम के व्यापारी फिरोज फरहान के साथ किया गया। चूंकि टकसाल का अधिकार निजाम भिश्ती के पास नहीं था, ऐसे में निजाम सिक्के को राजमोहर का दर्जा प्राप्त नहीं हो सका। निजाम नामक भिश्ती द्वारा चमड़ के सिक्के चलाने का उल्लेख लखनऊ संग्रहालय के अतिरिक्त बक्सर के चौसा युद्ध स्थल पर स्थापित स्तम्भ में उत्कीर्ण है।

अजमेर में है भिश्ती निजाम सिक्का की मजार
चौसा के युद्ध में घायल बादशाह हुमायूं की जान बचाने वाले चौसा के भिश्ती निजाम की मौत के बाद उसे अजमेर के दरगाह में दफनाया गया। यही वजह है कि चौसा के भिश्ती निजाम की मजार अजमेर स्थित ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में मौजूद है, जिसे निजाम गेट के नाम से जाना जाता है। अब्बासी समाज (भिश्ती समुदाय) प्रतिवर्ष 9 तारीख को गरीब नवाज के उर्स के बड़े कुल की रस्म के दिन निजाम सिक्का का सालाना उर्स मनाता है।
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