भारतीय इतिहास में पृथ्वीराज चौहान के मुकाबले कन्नौज के शक्तिशाली राजा जयंचद को गद्दार ठहराया जाता है। किन्तु इतिहास का बारीकी से अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि उसे जानबूझकर गद्दार साबित किया गया।
ज्यादातर लोककथाओं में राजा जयचंद को सिर्फ इस बात के लिए गद्दार ठहराया जाता है कि उसने पृथ्वीराज चौहान के विरूद्ध मुहम्मद गोरी को आमंत्रित किया और उसकी मदद की, किन्तु यह बिल्कुल सच नहीं है।
आखिर में आक्रमणकारी मुहम्मद गोरी के विरूद्ध राजा जयंचद ने पृथ्वीराज चौहान की मदद क्यों नहीं की, यह सच जानकर आपके होश उड़ जाएंगे। कन्नौज का राजा जयंचद गद्दार नहीं अपित एक वीर शासक था, यह जानने के लिए इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें।
पृथ्वीराज चौहान का मौसेरा भाई था जयचंद
साल 1052 में दिल्ली की स्थापना करने वाले अनंगपाल तोमर का कोई पुत्र नहीं था, सिर्फ दो पुत्रियां ही थीं। राजा अनंगपाल ने अपनी पहली पुत्री सुन्दरी (कीर्तिमालिनी/हरको देवी) का विवाह कन्नौज के राजा विजयचंद के साथ किया था। वहीं अनंगपाल की दूसरी पुत्री कर्पूर देवी (कमला) का विवाह अजेमर के चौहान राजा सोमेश्वर के साथ हुआ था।
चौहान वंशी शासक सोमेश्वर की पत्नी कर्पूर देवी की गर्भ से साल 1166 ई. में पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ। साल 1177 ई. में सोमेश्वरर की मृत्यु के पश्चात महज 11 वर्ष की उम्र में पृथ्वीराज चौहान अजमेर का शासक बना।
जबकि कमौली शिलालेख के मुताबिक, गहड़वाल वंशी राजा विजयचंद का पुत्र जयचंद 21 जून 1170 ई. में कन्नौज के राजसिंहासन पर बैठा। ऐसे में स्पष्ट है कि पृथ्वीराज चौहान और राजा जयंचद, दोनों मौसेरे भाई थे।
पृथ्वीराज और जयचंद के बीच दुश्मनी की शुरूआत
चूंकि अनंगपाल तोमर का कोई पुत्र नहीं था, ऐसे में उसने अपनी छोटी पुत्री कर्पूरदेवी के सुयोग्य पुत्र पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का राजा बना दिया। चूंकि चौहान साम्राज्य के उत्तर-पूर्व में स्थित कन्नौज का शक्तिशाली राजा जयंचद भी अनंगपाल तोमर का ज्येष्ठ नाती था, ऐसे में दिल्ली की गद्दी पर वह भी अपना अधिकार समझता था। इस प्रकार दिल्ली के राजसिंहासन के लिए पृथ्वीराज और जयचंद के बीच दुश्मनी की शुरूआत हुई।
पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चन्दरबरदाई कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार, चौहान और गहड़वालों के बीच वैमनस्यता का तात्कालिक कारण संयोगिता थी। चन्दरबरदाई लिखता है कि संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान आपस में प्रेम करते थे। ऐसे में जयचंद ने अपनी पुत्री संयोगिता का विवाह किसी दूसरे राजा से करने के लिए एक स्वयंवर आयोजित किया। संयोगिता के स्वयंवर में देशभर के कई राजा-महाराजाओं को निमंत्रित किया गया किन्तु पृथ्वीराज चौहान को नहीं बुलाया गया।
यहां तक कि जयचंद ने पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए उसकी लोहे की मूर्ति बनवाकर द्वारपाल के स्थान पर लगवा दी। स्वयंवर के समय संयोगिता ने अपनी वरमाला पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति के गले में डाल दी। इसके बाद पृथ्वीराज चौहान सैन्यबल के साथ घटनास्थल पर पहुंचा और संयोगिता को उठाकर अपने साथ ले आया और अपनी राजधानी पहुंचकर उसके साथ गन्धर्व विवाह कर लिया।
संयोगिता से विवाह कितना उचित था?
यह सच है कि गहड़वाल वंशी राजा जयचंद और चौहान वंशी शासक पृथ्वीराज चौहान, दोनों मौसेरे भाई थे। जाहिर है, जयचंद की पुत्री संयोगिता रिश्ते में पृथ्वीराज चौहान की पुत्री अथवा भतीजी लगती थी। ऐसे में पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता का अपहरण कर उससे गन्धर्व विवाह करना किस हद उचित था, यह निर्णय आप है।
यदि सामाजिक एवं नैतिक मर्यादा की बात की जाए तो यह विवाह पूरी तरह से अनुचित था, क्योंकि हिन्दू धर्म में अपनी पुत्री, धर्म पुत्री अथवा भतीजी से विवाह करना पूरी तरह से वर्जित है। यही वजह है कि पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता का विवाह इतिहासकारों के मध्य आज तक विवाद का विषय बना हुआ है।
...क्या सच में गद्दार था जयचंद
भारतीय इतिहास के एकमात्र ग्रन्थ ‘पृथ्वीराज रासो’ में चन्दरबरदाई ने जयचंद को गद्दार साबित करने का प्रयास किया है। वहीं बादशाह अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने ‘आईन-ए-अकबरी’ में जयचन्द के गोरी से मिलने की मनगढ़त कहानी लिखी है। जबकि ‘हम्मीर महाकाव्य, ‘प्रबन्ध चिन्तामणि’ और जैन ग्रंथ ‘पृथ्वीराज विजय’ में इस तरह का कोई जिक्र नहीं है कि जयचंद गद्दार था।
हम्मीर महाकाव्य के अनुसार, “पृथ्वीराज को जयचंद ने नहीं, बल्कि उनके अपने ‘घोड़ों के मालिक’ और संगीतकारों ने धोखा दिया था।” वहीं, मेरुतुंग रचित ‘प्रबन्ध चिंतामणि’ के अनुसार, “तराइन के दूसरे युद्ध में गोरी ने चौहान सेना की आपसी कलह और असावधानी का फायदा उठाया। गोरी ने छल-कपट का प्रयोग कर सुबह के समय, जब सेना विश्राम कर रही थी, अचानक आक्रमण किया।” जैन ग्रंथ ‘पृथ्वीराज विजय’ में राजा जयचंद द्वारा गोरी को मदद दिए जाने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।
ठीक इसके विपरीत लोककथाओं में यह धारणा जोर-शोर से प्रचारित गई कि संयोगिता के अपहरण से क्रुद्ध होकर जयचंद ने मुहम्मद गोरी को आमंत्रित किया था और तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज के विरूद्ध उसकी मदद की थी। किन्तु भारतीय इतिहास में इस बात का कहीं भी साक्ष्य नहीं मिलता है कि जयचंद ने पृथ्वीराज के विरूद्ध मुहम्मद गोरी की मदद की। यही वजह है कि सतीश चंद्र, आर.सी. मजूमदार जैसे कई इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं हैं कि जयचंद ने गोरी की मदद की थी।
जबकि हकीकत यह है कि गहड़वाल वंश के अंतिम शक्तिशाली राजा जयचंद ने आज के उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ भागों पर शासन किया था। चूंकि जयचंद की पृथ्वीराज से पहले से ही शत्रुता थी, ऐसे में उसने गोरी के विरूद्ध तराईन के प्रथम और द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को सहायता नहीं दी। एक सच यह भी है कि पृथ्वीराज चौहान ने गोरी के विरूद्ध राजा जयचंद से कभी सहायता नहीं मांगी।
ली इब्न अल-अथिर के अनुसार, ‘अश्वपति नरपति गजपति राजत्रयाधिपति’ की उपाधि धारण करने वाले “जयचंद की सेना में दस लाख सैनिक थे और 700 हाथी थे। जब जयचंद की सेना चलती थी तो ऐसा प्रतीत होता था मानो पूरा शहर चल रहा है।”
विद्यापति के ‘पुरुष-परीक्षा’ और ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार, जयचंद ने भी मुहम्मद ग़ोरी को कई बार हराया था। इतिहासकार हसन निजामी भी अपनी कृति ‘ताज-उल-मासिर’ में लिखता है कि “जयचंद एक शक्तिशाली शासक था, जो मुस्लिम विरोधी था।”
राजशेखर सूरि के ‘प्रबन्ध-कोश’ में जयचंद को विजेता बताया गया है जिसका गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र पर प्रभुत्व था। वहीं नयनचन्द्र ने ‘रम्भामंजरी’ में “जयचन्द को यवनों का नाश करने वाला कहा है।” साल 1194 में कन्नौज के राजा जयचंद और मुहम्मद गोरी के मध्य हुए चंदावर युद्ध से यह बात साबित हो जाती है कि यदि गोरी और जयचंद के बीच मित्रता होती तो वह आक्रमण क्यों करता?
चन्दावर का युद्ध (1194 ई.)
प्रख्यात इतिहासकार एल.पी.शर्मा अपनी किताब ‘मध्यकालीन भारत’ में लिखते हैं कि “साल 1194 में मुहम्मद गोरी कन्नौज के शासक जयचंद पर आक्रमण करने के लिए एक बार फिर से भारत आया।
कन्नौज और इटावा के मध्य चन्दावर नामक स्थान पर मुहम्मद गोरी से राजा जयचंद का युद्ध हुआ। इस युद्ध में जयचन्द मारा गया और राजपूतों की पराजय हुई। मुहम्मद गोरी ने आगे बढ़कर बनारस को लूटा और जयचन्द के राज्य के प्राय: सभी प्रमुख स्थानों पर अधिकार कर लिया।”
जयचंद को पराजित करने के बाद गोरी का मुकाबला करने के लिए उत्तर भारत में अन्य कोई शक्तिशाली राजा शेष नहीं रहा। इसी के साथ तुर्कों के लिए बिहार तथा बंगाल विजय का मार्ग प्रशस्त हो गया। जयचंद को शिकस्त देने के बाद मुहम्मद गोरी भारत से वापस लौट गया और विजित प्रदेशों को संगठित करने का उत्तरदायित्व कुतुबुद्दीन ऐबक पर छोड़ गया।
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