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The British wanted to demolish the Taj Mahal, you will be shocked to know the reason.

ताजमहल को तोड़ना चाहते थे अंग्रेज, कारण जानकर दंग रह जाएंगे आप

दुनिया के सात अजूबों में से एक आगरा के ताजमहल को साल 1983 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था। भारत-इस्लामी कला का अद्भुत नमूना ताजमहल केवल प्यार की निशानी नहीं हैं, बल्कि यह नायाब इमारत मुगलिया साम्राज्य की दौलत और ताकत को भी प्र​दर्शित करती है।

यद्यपि मुगलिया साम्राज्य के पतन के सा​थ ही हीरे की तरह चमकने वाले ताजमहल पर भी शामत आनी शुरू हो गई। हैरानी की बात है कि ताजमहल को एक दो बार नहीं बल्कि कई बार लूटपाट का सामना करना पड़ा। ताजमहल को सबसे अधिक क्षति पहुंचाने वालों में यदि अंग्रेजों का नाम पहले पायदान पर रखा जाए तो यह बिल्कुल लाजिमी होगा।

वैसे तो ताजमहल की साख को पहला धक्का तब लगा जब 12 जून 1761 ई. को भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने आगरा पर अधिकार कर उसे खूब लूटा। क्रिस्टोफर टेन डीजल की किताब 'The history of architecture in India' के अनुसार, ‘जाटों के अफलातून कहे जाने वाले महाराजा सूरजमल ने मुगल सत्ता के प्रतीक ताजमहल में भूसा भरवा दिया तथा इस इमारत को अस्तबल (घुड़साल) में बदल दिया था।

इतना ही नहीं, जब जाट सैनिक ताजमहल को जलाने के लिए तत्पर हुए तब उसने ऐसा करने से रोक दिया। जाट सैनिक ताजमहल से चांदी का कीमती दरवाजा उखाड़कर ले गए थे। ताजमहल के इस मुख्य द्वार में सोने-चांदी के सिक्के जड़े हुए थे।

उत्तर पश्चिमी प्रान्त के इंस्पेक्टर जनरल डॉ जॉन मरे ने साल 1864 में एक रिपोर्ट पेश की थी जिसके मुताबिक, “1857-58 की महाक्रांति के दौरान ताजमहल को भारी नुकसान पहुंचा। ब्रिटिश अधिकारी और अंग्रेज सैनिक ताजमहल की दीवारों में जड़े बहुमूल्य पत्थर, रत्न और लैपिज लूजली खोदकर निकाल ले गए।

उपरोक्त तथ्यों से इतर एक ऐसा भी दौर आया, जब अंग्रेजों ने ताजमहल को तोड़ने की पूरी तैयारी कर ली थी किन्तु ब्रिटिश हुकूमत का मंसूबा अधूरा रह गया। अब आपका सोचना लाजिमी है कि आखिर में अंग्रेज ताजमहल को क्यों तोड़ना चाहते थे? इस संवेदनशील प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।

ताजमहल का लुटेरा जनरल लेक

साल 1800 में जनरल लेक ब्रिटिश भारत का कमांडर-इन-चीफ बना। उसने 1803 में मराठा ताकतों को हराकर दिल्ली और आगरा पर कब्जा किया। निजी रूप से जनरल लेक एक ऐसा जुआरी था, जिसने जुए में अपने परिवार की ज्यादातर सम्पत्ति गंवा दी थी।

साल 1803 में जनरल लेक ने जैसे ही आगरा पर कब्जा किया, ताजमहल में जड़े नायाब एवं बेशकीमती पत्थर गायब होने लगे। ताजमहल की कालीनें बेच दी गईं।

मुगल पेटिंग्स लन्दन पहुंचा दी गईं। इसके बाद भी अंग्रेजों का मन नहीं भरा तो ताजमहल को किराए पर दे दिया और वहां पार्टियां होने लगी। ताजमहल के आसपास लॉज बनाकर हनीमून के लिए दिए जाने लगे।

ताजमहल पर विलियम बेंटिक की नजर

वर्मा के साथ हुए जंग (1824 -1826 ई.) में काफी धन खर्च हुआ था जिससे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी कर्जे में आ गई थी। वहीं बंगाल आर्मी के अफसर वेतन बढ़ोतरी पर अड़े हुए थे। ठीक इसके विपरीत लंन्दन से कम्पनी के खर्चे में कटौती का आदेश मिला। ऐसे में इस खर्चे की भरपाई के लिए अंग्रेजों ने ताजमहल को अपना निशाना बनाया।

बंगाल के गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक ने साल 1830 में आगरे का दौरा किया। इस दौरान बेंटिक की नजर आगरा किले के हमाम में लगे संगमरमर पर पड़ी, तत्पश्चात उसने इस संगमरमर को बेच दिया। तत्पश्चात अंग्रेजों ने धीरे-धीरे आगरा किले में प्रयुक्त ढेर सारे संगमरमर बेच दिए। जब गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक का इससे भी मन नहीं भरा तब उसने ताजमहल का मैटेरियल बेचकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का खजाना भरने का निर्णय लिया।

ताजमहल को तोड़कर बेचने की तैयारी

वैसे तो ज्यादातर ब्रिटिश इतिहासकार ताजमहल की नालामी की बात को एक सिरे से नकारते हुए यह कहते हैं कि अंग्रेजों द्वारा ताजमहल को बेचने की बात का कोई साक्ष्य नहीं है। किन्तु जेएनयू में आर्ट एण्ड हिस्ट्री की प्रोफेसर डॉ. कविता सिंह लिखती है कि जब अंग्रेजों ने आगरे का बहुत सारा संगमरमर नीलाम करना शुरू किया, तब इस तोड़फोड़ के खिलाफ स्थानीय जनता के साथ-साथ ब्रिटिश कम्यूनिटी भी शामिल थी।

बेरेसफोर्ड के दस्तावेजों के मुताबिक, आगरा किले के संगमरमर बेचकर महज 500 पाउण्ड हासिल हुए थे। बेरेसफोर्ड के इसी दस्तावेज में ताजमहल को बेचने के प्रस्ताव की भी जानकारी मिलती है। इस बारे में कर्नल स्लीमैन लिखता है कि यदि आगरा का संगमरमर बिक जाता तो सम्भवत: ताजमहल को गिराकर उसे बेच दिया जाता।

वैल्श यात्री फेनी पार्क्स साल 1850 में प्रकाशित अपनी किताब में लिखती है कि ताजमहल को बेचने की तैयारी हो चुकी है, लेकिन सही कीमत नहीं मिल रही है। अभी तक महज 2 लाख रुपए का प्रस्ताव मिला है, साथ ही अंग्रेजों को यह डर है कि ताजमहल गिराए जाने से दंगे भड़क सकते हैं।

 आगे फेनी लिखती हैं कि ताजमहल को एक हिन्दू खरीदना चाहता हैं और उसके मैटेरियल से वह वृदांवन में एक शानदार मंदिर बनवाना चाहता है। दरसअल फेनी अपनी किताब में जिस हिन्दू व्यापारी की बात कर रही हैं, उसका नाम सेठ लक्ष्मीचंद जैन था। मूलरूप से जयपुर निवासी लक्ष्मीचन्द्र जैन उस दौर में राजाओं के साहूकार के रूप में काम करता था। सेठ लक्ष्मीचंद जैन को उन दिनों उत्तर भारत के सबसे अमीर इन्सान की पदवी प्राप्त थी। लन्दन के अखबार द टाइम्स ने लक्ष्मीचंद को भारत का रोथ्सचाइल्ड कहा था।

खैर, साल 1831 में ताजमहल को बेचने के लिए बोलियां लगनी शुरू हो गई। सेठ लक्ष्मीचंद जैन ने सबसे पहले 2 लाख रुपए की बोली लगाई, इस रकम को कम मानकर खारिज कर दिया गया। इसके चंद महीनों बाद दूसरी बोली लगी, इस दौरान लक्ष्मीचंद जैन ने सात लाख रुपए की बोली लगाई। मामला आगे बढ़ता, इससे पहले ही जनता को इस नीलामी की खबर लग गई। इतना ही नहीं, ब्रिटिश इंटिलीजेन्स ने आशंका जताई कि यदि ताजमहल गिराया गया तो दंग भड़क सकते हैं। इसके बाद गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक ने ताजमहल को तोड़कर बेचने का प्लान स्थगित कर दिया।

इस घटना की पुष्टि यूपी के पूर्व विधायक और सेठ लक्ष्मीचंद जैन के वंशज विजयकुमार जैन ने अपनी किताब मथुरा सेठ में भी किया है। इसके अलावा साल 2005 में ताजमहल पर हक को लेकर जब मुस्लिम वक्फ बोर्ड और भारतीय पुरातत्व विभाग आमने-सामने आए तब एएसआई की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा पेश किया गया, जिसमें ताजमहल के इतिहास को सूचीबद्ध किया गया था। एएसआई के इसी हलफनामें में ताजमहल की 7 लाख में प्रस्तावित बिक्री और उसके विध्वंस से जुड़े साक्ष्य भी पेश किए गए हैं।

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