इस्लाम में विभिन्न रहस्यात्मक प्रवृत्तियों और आन्दोलनों को सूफीमत या तसव्वुफ के नाम से जाना जाता है। सूफीवाद की शुरूआत एक सुधारवादी आन्दोलन के रूप में इस्लाम धर्म में ही हुई। इसकी शुरूआत सर्वप्रथम ईरान में हुई जिसमें शिया और सुन्नी सम्प्रदायों के मतभेदों को दूर करने का प्रयास किया गया। सूफीवाद एक ऐकेश्वरवादी विचारधारा है।
मूलत: इनका आधार इस्लाम ही था, परन्तु इन्होंने इस्लाम के कर्मकाण्ड के स्थान पर उसके आध्यात्मिक पहलू पर अधिक जोर दिया। वे इस्लाम की मूल आत्मा में विश्वास करते थे न कि उसके बाहरी रूप में। अबू नस्र अल सिराज की पुस्तक ‘किताब-उल-लुमा’ के अनुसार, सूफी उन लोगों को कहा जाता था जो ऊनी (सफ) वस्त्र पहनते थे। बाद में शुद्ध आचरण (सफा) करने वाले आध्यात्मिक लोगों को सूफी कहा गया।
वहीं कुछ विद्वानों के अनुसार, सूफी शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘सफा’ से बना है जिसका अर्थ है ‘चटाई’। अत: सूफी उन लोगों को कहा गया जो चटाई पर बैठकर ईश्वर की उपासना किया करते थे। एक अन्य विचारधारा के अनुसार, मदीना में मुहम्मद साहब द्वारा बनवाई गई मस्जिद के बाहर सफा (मक्का में एक पहाड़ी) पर जिन लोगों ने शरण ली और ईश्वर की आराधना में लीन रहे, उन्हें सूफी कहा गया।
10वीं शताब्दी में मुताजिल यानि की तुर्क बुद्धिवादी दर्शन का आधिपत्य समाप्त हुआ और पुरातनपंथी विचारधारा का जन्म हुआ जो कुरान और हदीस पर आधारित थी, इसी समय सूफी रहस्यवाद का जन्म हुआ। परम्परावादियों की रचना इस्लामी कानून की चार विचारधाराओं में बंट गई। इसमें से हनफी विचारधारा सबसे अधिक उदारवादी थी। इसे ही पूर्वी तुर्कों ने अपनाया और ये पूर्वी तुर्क ही कालान्तर में भारत आए।
दरअसल रहस्यवादियों का जन्म इस्लाम के अन्तर्गत बहुत पहले ही हो गया था, यही बाद में सूफी कहलाए। महिला रहस्यवादी रबिया (8वीं सदी) तथा मंसूर बिन हल्लाज (10वीं सदी) प्रारम्भिक सन्त थे। मंसूर को फांसी दे दी गई। मंसूर ने स्वयं को ‘अनलहक’ (मैं ईश्वर हूं) घोषित किया। मंसूर समुद्री मार्ग से भारत आया था। अल-गज्जाली (12वीं सदी) ने रहस्यवाद और इस्लामी परम्परावाद के बीच मेल कराने का प्रयत्न किया। दिल्ली सल्तनत की स्थापना से पूर्व ही भारत में सूफी सन्तों का आगमन शुरू हो चुका था। 12वीं शताब्दी तक सूफी सम्प्रदाय का 12 सिलसिलों में विभाजन हो चुका था।
सूफी लोग पीर (गुरु) तथा मुरीद (शिष्य) के सम्बन्ध को अत्यधिक महत्व देते हैं। गुरु को मुर्शीद भी कहा जाता है। सूफी संत के उत्तराधिकारी को ‘वलि’ कहते थे। सूफी सिलसिला दो वर्गों में विभाजित है - 1. बा शरा : जो इस्लामी विधान शरियत को मानते हैं। 2. बे शरा : जो शरियत को नहीं मानते हैं।
सूफियों का जीवन सादा होता था। वे मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते थे। सूफी सन्त समा (संगीत एवं नृत्य) को फना (ईश्वर की प्राप्ति) होने में सहायक मानते थे। सूफी सन्तों के विचारों तथा कथनों को मलूफजात कहा जाता है। जबकि सूफी सन्तों के पत्रों के संकलन को मकतूबात कहा जाता है तथा सूफी संतों के निवास स्थान खानकाह कहलाते हैं।
अधिकांश सूफी सन्तों में राजसत्ता व सांसारिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण नहीं होता था। उनके विश्व परित्याग की भावना को सूफी मत में ‘तर्क-ए-दुनिया’ कहा गया। राज्य नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र को सूफी शब्दावली में ‘विलायत’ कहा गया है। इसे चिश्ती सूफियों ने विकसित किया।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में सूफी मत का विकास मुस्लिम शासन की स्थापना से शुरू होता है। तत्पश्चात सूफी सिलसिले तथा खानकाह का विस्तार मुल्तान से लखनौती तथा पंजाब से देवगिरि तक हो गया।
भारत में सूफी मत के शीघ्र सफलता का कारण था कि सूफी साधकों ने भारतीय सामाजिक तथा धार्मिक वातावरण के अनुकूल अपने को ढालने का निश्चय किया।
सूफीवाद पर बौद्ध तथा हिन्दू रीति-रिवाजों का प्रभाव
भक्ति आन्दोलन के सुधारकों ने जिन समस्याओं पर विचार किया, सूफी साधकों ने उसी वातावरण के अनुकूल स्वयं को बनाया तथा अनेक हिन्दू संस्कारों तथा रीति-रिवाजों को अपनाया। शेख के समक्ष नतमस्तक होना, अतिथि को जल देना, नए शिष्य का सिर मुंडवाना, संकीर्तन का आयोजन, चिल्लाह-ए-मा-अकुस (भारतीय प्राणायाम) आदि रीतियों तथा सिद्धान्तों को हिन्दू और बौद्ध धर्मों से ग्रहण करके हिन्दू जनता को अपनी तरफ आकृष्ट किया। बतौर उदाहरण- सूफ़ियों तथा हिन्दू योगियों के बीच प्रकृति, ईश्वर, आत्मा और पदार्थ के सम्बन्ध में विचारों में काफ़ी समानता देखने को मिलती है।
इस काल में सूफी संतों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जब दिल्ली के अधिकांश सुल्तान धर्मान्ध तथा रूढ़िवादी थे, तो सूफी साधकों ने अत्यंत उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया। हांलाकि कुछ सूफी सिलसिले राजाश्रय में भी विश्वास रखते थे।
भारत में रहस्यवाद की पहली पाठ्य पुस्तक फारसी भाषा में ‘कश्फ-उल-महजूब’ की रचना गजनी के निवासी अल हुजवेरी ने लाहौर में की। महमूद गजनवी के आक्रमण के पश्चात अल हुजवेरी लाहौर में आकर रहने लगे थे।
बंगाल में हठ योग की पुस्तक अमृत कुण्ड का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया गया था। बाद में सैयद मुर्तजा ने योग कलन्दर की रचना की। 17वीं शताब्दी में लिखी गई फारसी पुस्तक ‘दबिस्तान-ए-मजाहिब’ में सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।
सूफियों से सम्बन्धित शब्दावली
समा - संगीत एवं नृत्य, फना- ईश्वर के प्रेम में विह्वल, चिल्ला - लगातार चालीस दिनों तक साधना, हश्म-ए-दम -प्राणायाम, तवव्बुल - परमात्मा में विश्वास, वजहत-उल-वजूद : सर्वेश्वरवाद, मकतूबात - सूफी सन्तों के पत्रों का संकलन, खानकाह - सूफी संतों का निवास स्थान, मलूफजात - सूफी सन्तों के विचार तथा कथन, तर्क-ए-दुनिया - विश्व परित्याग की भावना, विलायत - राज्य नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र।
प्रमुख सूफी संतों की उपाधियां
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती- गरीब नवाज, शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया- महबूबे इलाही, शेख़ नासिरुद्दीन महमूद-चिराग-ए-दिल्ली, सैय्यद मुहम्मद गेसूदराज- बन्दा नवाज, शेख़ अहमद सरहिन्दी- मुजदिह आलिफसानी।
सूफी दर्शन के पांच सोपान
सूफियों का मानना था कि ईश्वर एक है और सभी कुछ ईश्वर में है तथा इसके बाहर कुछ भी नहीं। सब कुछ त्यागकर ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे में प्रत्येक सूफी का उद्देश्य को आत्मा को परमेश्वर में विलीन करना है, इसके लिए सूफी दर्शन में पांच सोपान बताए गए हैं —
1. ईश्वर की आराधना।
2. ईश्वर के प्रति आत्मा का समर्पण।
3. एकान्त में ईश्वर का ध्यान।
4. ज्ञान अथवा ईश्वर के प्रति दार्शनिक विचार।
5. ईश्वरीय शक्ति व प्रेम का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाने पर शरीर का भान न रह जाना।
सूफी मत में ईश्वर प्राप्ति के प्रमुख चरण
सूफियों का यह विश्वास था कि ईश्वर अपने समस्त पुत्रों को उसमें समाहित हो जाने की क्षमता दी है और यह क्षमता मानव शरीर के अन्दर छुपी हुई है। इस क्षमता को एक पथ-प्रदर्शक जो ईश्वरीय स्पर्श एवं ज्योति के द्वारा प्रबुद्ध हो गया हो और जिसमें ईश्वरीय रहस्यों को लोगों के सन्मुख प्रकट करने की योग्यता हो, की सहायता से विकसित किया जा सकता है। सूफी सन्तों ने ईश्वर प्राप्ति के लिए निम्नलिखित चरणों को मुख्य रूप से बताया है —
1. नासूत - इस अवस्था में इस्लाम के नियम पथ-प्रदर्शक रहते हैं।
2. मलाकूत - इस अवस्था में मनुष्य फरिश्ता का रूप धारण कर लेता है तथा पवित्र हो जाता है।
3. जबारूत - इस अवस्था में मनुष्य में ईश्वरीय शक्तियों का अवतरण होता है।
4. लाहत - इस अवस्था में मनुष्य को पूर्ण सत्य का ज्ञान हो जाता है तथा अन्त में वह देवत्व में मिल जाता है।
इन चारों अवस्थाओं को पार करने के लिए मुरीद यानि शिष्य को धिक्र की अवस्था से गुजरना पड़ता है। ‘धिक्र’ एक ऐसा कर्मकाण्ड है जिसमें मुरीद को अपनी प्रत्येक श्वास के साथ अल्लाह के नाम का स्मरण करना पड़ता है। ऐसा हमेशा करते रहने से वह कभी-कभी संज्ञाहीन होकर अपनी सुध-बुध खो बैठता है और आहक (ईश्वर का दर्शन या मिलन) हो जाता है।
भारत में सूफी सिलसिलों के संस्थापक एवं स्थान
अबुल फजल ने ‘आईन-ए-अकबरी’ में चौदह सूफी सिलसिलों का उल्लेख किया है। इनमें चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी और नक्शबंदी अत्यन्त प्रसिद्ध रहे हैं। इस्लामी विधान को मानने वाले सिलसिलों में से केवल दो ही उत्तर भारत में अधिक प्रचलित हुए। ये सिलसिले थे -चिश्ती और सुहरावर्दी।
1.चिश्ती सम्प्रदाय - ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, अजमेर।
भारत के सबसे असरदार सूफी सिलसिलों में से एक है चिश्ती सम्प्रदाय। 12वीं सदी में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने इसे शुरू किया था। चिश्ती सिलसिला प्यार, सहनशीलता और इंसानियत की सेवा पर ज़ोर देने के लिए जाना जाता है। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के अनुयायियों ने उन्हें ‘गरीब नवाज़’ की उपाधि दी।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने दया, उदारता और मेहमाननवाज़ी के मूल्यों को बढ़ावा दिया। सबको एक साथ लेकर चलने की वजह से यह सिलसिला जल्द ही एक शक्तिशाली आध्यात्मिक आंदोलन बन गया। चिश्ती सम्प्रदाय के प्रमुख सूफी संतों में निज़ामुद्दीन औलिया और बाबा फ़रीद ने जनता की भलाई पर ध्यान दिया, गरीबों को खाना खिलाया तथा यह संदेश दिया कि इंसानों से प्यार करके ही ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।
2. सुहरावर्दी सम्प्रदाय - शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी, मुल्तान।
शेख अबुल नजीब अल-सुहरावर्दी ने सुहरावर्दी सूफी सिलसिले की स्थापना की। किन्तु भारत में इस सम्प्रदाय को लोकप्रिय बनाने और स्थापित करने का श्रेय शेख बहाउद्दीन ज़कारिया को जाता है। सुहरावर्दी सिलसिले के संतों ने सूफी आध्यात्मिकता और इस्लामी कानून के बीच संतुलन बनाए रखा। चिश्ती संतों के ठीक विपरीत सुहरावर्दी सम्प्रदाय शासन तंत्र से बातचीत को महत्व देता था।
3. कादिरी सम्प्रदाय - शाह नियामतुल्ला, उच्छ।
कादिरी सिलसिले की शुरूआत बगदाद में शेख अब्दुल कादिर जिलानी ने की। किन्तु भारत में इसको लोकप्रिय बनाने का श्रेय शाह नियामतुल्ला को जाता है, जिन्होंने उच्छ से ही पूरे देश में इस सिलसिले का प्रचार-प्रसार किया।
कादिरी सिलसिले में स्वयं की पवित्रता, आत्मनियंत्रण और ईश्वर भक्ति पर जोर दिया जाता था। चिश्ती या सुहरावर्दी सिलसिलों के मुकाबले कादिरी सम्प्रदाय कुछ ज्यादा चर्चित नहीं हुआ।
यद्यपि दक्कन तथा पंजाब के प्रान्तों में कादिरी सिलसिले को कुछ ज्यादा अहमियत मिली। कादिरी सिलसिले ने एक पवित्र और रूहानी ज़िंदगी जीने पर जोर दिया।
4. फिरदौसी सम्प्रदाय - शेख बदरूद्दीन, बिहार।
सुहरावर्दी सिलसिले की एक प्रमुख शाखा था फिरदौसी सम्प्रदाय। भारत में इसे स्थापित करने का श्रेय शेख बदरुद्दीन समरकंदी को जाता है, यह सम्प्रदाय मुख्य रूप से बिहार में सक्रिय था। सुहरावर्दी सम्प्रदाय सख्त इस्लामी कानून पालन करने व व्यक्तिगत आध्यात्मिक अभ्यासों के लिए जाना जाता था।
5. नक्शबन्दी सम्प्रदाय - ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद, उच्छ।
नक्शबंदी सिलसिला मौन साधना के लिए जाना जाता है, जबकि अन्य सूफी सम्प्रदाय बोलकर किए जाने वाले तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। नक्शबंदी सिलसिले की स्थापना मुगल काल में ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद ने की थी।
नक्शबंदी सिलसिला शेख अहमद सरहिंदी के नेतृत्व में ज्यादा प्रभावशाली हो गया। शेख अहमद सरहिंदी ने सुन्नी इस्लाम को फिर से ज़िंदा करने तथा अकबर के शासनकाल में मुगल दरबार से बहुत ज़्यादा मेलजोल रोकने की कोशिश की।
6. शत्तारी सम्प्रदाय - शाह अब्दुल्ला शत्तारी, जौनपुर।
शत्तारी सम्प्रदाय को ईरान से भारत लाने वाले संत का नाम शेख सिराजुद्दीन अब्दुल्ला शत्तर है। शत्तारी सम्प्रदाय के संतों में संत मुहम्मद गौस और तानसेन का नाम प्रमुख है।
शत्तारी सिलसिला तेज़ आध्यात्मिक प्रगति, यौगिक प्रथाओं के समावेश और हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक मेलजोल के लिए जाना जाता है। शत्तारी सम्प्रदाय में योग आसन, प्राणायाम और ध्यान जैसी हिंदू रहस्यवादी प्रथाओं को अपनाया गया।
क्षेत्रीय साहित्य पर सूफीवाद का प्रभाव
सर्वप्रथम देश के उत्तर पश्चिमी भाग में पश्तो साहित्य का विकास रोशनिया परम्परा के संस्थापक बायजीद अंसारी के ‘खैर उल बयान’ से शुरू हुआ। जबकि चिश्ती सूफी अबुल रहमान की रचना के जरिए पश्तो साहित्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा।
पंजाबी साहित्य की शुरूआत भी शेख इब्राहीम फरीद की रचना से शुरू हुआ जिसके अंशों को सिखों के आदिग्रन्थ में शामिल किया गया। पंजाब के प्रमुख सूफी कवियों में सुलतान बाहू, बुल्लेशाह और वारिस शाह थे। वारिस शाह का ‘हीर-रांझा’ की प्रेम कहानी बेहद चर्चित है।
शाह अब्दुल लतीफ की कृति शाहजू रिसालो ने सिन्धी साहित्य को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। हांलाकि हिन्दी और बंगला साहित्य के विकास में सूफियों की भूमिका अपेक्षाकृत कम रही। बावजूद इसके हिन्दी में मलिक मुहम्मद जायसी का पदमावत और कबीर की कविताएं बेहद उल्लेखनीय हैं। ध्यान रहे, जायसी और कबीर दोनों ही सूफी विचारधारा से प्रभावित थे। बंगला में भी रहस्यवादी कविता की भरमार है, पूर्वी बंगाल में नदियों पर सुन्दर लोकगीत गाए जाते थे।
गैर रूढ़िवादी सूफी
शरीयत की पूर्ण उपेक्षा करने वाले सूफियों को अक्सर ‘मजजूब’ कहा जाता था। कुछ विख्यात मजजूबों ने ऐसे सभी कार्य किए जो निषिद्ध थे। जैसे- लाहौर के शेख सादुल्ला ने एक वेश्या से प्रेम किया और उसके साथ बैठकर शराब पीते थे। हांलाकि बाद में अपना जीवन अध्ययन में बिताया।
एक अन्य मजबूब शेख जलाल कन्नौजी कभी-कभी अपना चेहरा काला कर लेते थे और अपनी गर्दन में पलंग की डोरी बांधकर रोते-बिलखते सड़कों पर घुमते थे। वहीं 17वीं सदी में विख्यात मजबूब सरमद थे जिनकी कविताओं, प्रवचनों तथा निर्वस्त्र रहने से कट्टरपंथी चिढ़ते थे।
दाराशिकोह से सम्बन्ध होने के कारण औरंगजेब ने 1661 ई. में मजबूब सरमद का कत्ल करवा दिया। कुल मिलाकर मजबूबों की संख्या और प्रभाव सीमित थे, और उनमें से कोई भी सूफी आन्दोलन की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं थे।
भारत में सूफीवाद का प्रभाव
दक्षिण एशिया की यात्रा करने वाले सूफी संतों ने भारत के सामाजिक, आर्थिक और दार्शनिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सूफी सन्तों ने देश के प्रमुख शहरों में बौद्धिक विचारों का प्रचार-प्रसार करने के अलावा गरीबों तक भी अपनी पहुंच बनाई।
सूफियों के अनुसार, ईश्वर की नजर में सभी मुनष्य समान हैं। इसके अलावा देश के सूफी संतों ने क्षेत्रीय साहित्य जैसे उर्दू, सिंधी, पंजाबी बनाम फारसी, तुर्की और अरबी के विकास में भी योगदान दिया। भारतीय सूफीवाद ने हिन्दू धर्म जैसी अन्य धार्मिक परम्पराओं को भी प्रभावित किया।
सूफियों ने धार्मिक विभाजनों से परे प्रेम, ईश्वर के प्रति भक्ति और मानवता की सेवा पर जोर दिया। सूफियों की गहन भक्ति तथा साधारण जीवन शैली ने आमजन को प्रभावित किया। सूफियों की मानवतावादी शिक्षा और ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम आज भी लोकगीतों में देखी जा सकती है। धार्मिक तथा साम्प्रदायिक संघर्ष से इतर हिन्दूओं और मुसलमानों में प्रेम और शांति स्थापित करना सूफियों की खासियत थी।
भारतीय सूफीवाद का पतन
हिन्दुस्तान में सूफीवाद की प्रगति 18वीं सदी में मुगल साम्राज्य के पतन के साथ ही रूक गई। सूफीवाद की मुख्य विशेषताओं में पीर और मुरीद, खानकाह का सामुदायिक जीवन आदि की परम्परा जारी रही किन्तु पहले की शताब्दियों की तुलना में सूफियों की आध्यात्मिक शक्ति क्षीण हो गई।
पहले के महान सूफी संत केवल आध्यात्मिक गुरू ही नहीं अपितु पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए अधिकार प्राप्त व्यक्ति थे। किन्तु 18वीं सदी के बाद सूफी संतों को केवल जादुई ज्ञान के लिए जाना जाने लगा। विभिन्न सांसारिक उपलब्धियों के लिए गंडे और ताबीज बनाना महत्वपूर्ण समझा जाने लगा।
18वीं सदी में उत्पन्न चुनौतियों का मुस्लिम समाज सामना नहीं कर पाया। इसी वजह से यह पतन हुआ। इसके अतिरिक्त इसी काल में पश्चिमी देशों में औद्योगिक विकास की बढ़ती हुई शक्ति भी एक प्रमुख चुनौती बनी। 18वीं सदी के प्रबुद्ध सूफी शेख वली उल्लाह भी शरीयत पर लौट आए और इस्लाम पर आधारित बादशाही प्रथा पर निर्भर रहने लगे। हांलाकि 18वीं सदी में इस्लाम का आधुनिकीकरण तो हुआ किन्तु सूफी प्रथा का पतन हुआ जो आज तक जारी है।
