भारत का इतिहास

Swadeshi and Boycott Movement: History, Causes and Effects

स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन : इतिहास, कारण एवं प्रभाव

19 जुलाई 1905 को ब्रिटिश भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल (वायसराय) लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा की। बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रवाद पर एक प्रछन्न प्रहार था। यही वजह है कि लार्ड कर्जन को भारतीय राष्ट्रवाद का उत्प्रेरक कहा जाता है।

ऐसे में इस निर्णय के विरूद्ध भारत में चारों तरफ कड़ी प्रतिक्रिया हुई। हांलाकि जनता ने महसूस किया कि आवेदनबाजी, ज्ञापनबाजी, भाषणबाजी और जनसभाओं से कुछ नहीं होने वाला है, अत: संघर्ष का कोई दूसरा तरीका अपनाना होगा।

अत: 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हाल की एक ऐतिहासिक बैठक में स्वदेशी आन्दोलन की विधिवत घोषणा की गई तथा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा ऐतिहासिक बहिष्कार प्रस्ताव पारित किया गया। स्वदेशी आन्दोलन का लक्ष्य अपने देश में बने माल का सर्वाधिक उपयोग करके ब्रिटिश हुकूमत को आर्थिक नुकसान पहुंचाना तथा जनता के लिए रोजगार सृजन करना था।

फिर क्या था,  स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन के उद्घोषक लोगों से मैनचेस्टर के कपड़े, लिवरपूल के नमक, विदेशी जूते, कागज, दवाईयां, चीनी तथा सिगरेट आदि के बहिष्कार की अपील करने लगे। बहिष्कार का सुझाव सर्वप्रथम संजीवनी के सम्पादक कृष्ण कुमार मित्र ने 13 जुलाई 1905 के अंक में दिया था।

16 अक्टूबर 1905 के दिन बंगाल विभाजन प्रभावी हुआ, उस दिन पूरे बंगाल में शोक दिवस मनाया गया। घरों में चूल्हा नहीं जला, लोगों ने उपवास रखा, कलकत्ता में हड़ताल घोषित की गई। जनता ने जुलूस निकाला। सवेरे जत्थे के जत्थे लोगों ने गंगा स्नान किया और सड़कों पर वन्देमातरम गाते हुए प्रदर्शन करने लगे। रविन्द्रनाथ टैगोर के सुझाव पर बंगाल विभाजन को रक्षा बन्धन दिवस के रूप में मनाया गया। लोगों ने एक दूसरे के हाथ पर राखियां बांधी यह जताने के लिए कि अंग्रेजी सरकार बंगाल को बांटकर उनकी एकता को कमजोर नहीं कर सकती।

बाद में आनन्द मोहन बोस और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने दो विशाल जनसभाओं को सम्बोधित किया। एक जनसभा में 50 हजार तथा दूसरी में 75 हजार लोग एकत्र हुए। राष्ट्रीय आन्दोलन के बैनर तले इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में लोग कभी इकट्ठे नहीं हुए थे।

देखते ही देखते स्वदेशी आन्दोलन ने जोर पकड़ना शुरू कर लिया। बतौर उदाहरण- साल 1906 में बारीसाल सम्मेलन के अध्यक्ष अब्दुल रसूल ने कहा था, “पिछले 50 से 100 वर्षों के दौरान हम जो हासिल नहीं कर सके, वह हमने छह महीनों में हासिल कर लिया है और हमें यहां तक पहुंचाया है बंगाल विभाजन ने। बंग भंग जैसी शर्मनाक घटना ने स्वदेशी आन्दोलन को जन्म दिया है।”  

स्वदेशी आन्दोलन का प्रचार-प्रसार

देश के उग्रपंथी तथा नरमपंथी नेताओं ने स्वदेशी आन्दोलन का संदेश पूरे देश में फैलाया। बाल गंगाधर तिलक ने मुम्बई तथा पुणे में इस आन्दोलन का प्रचार किया। अजीत सिंह तथा लाला लाजपत राय ने पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में इस आन्दोलन को पहुंचाया। उत्तर भारत में रावलपिंडी, कांगड़ा, मुल्तान तथा हरिद्वार में स्वदेशी आन्दोलन ने खूब जोर पकड़ा।

दिल्ली में स्वदेशी आन्दोलन का नेतृत्व सैयद हैदर रजा ने किया। चिदम्बरम पिल्लै ने मद्रास (अब चेन्नई) प्रेसीडेन्सी में इसका नेतृत्व किया। वहीं बिपिन चन्द्र पाल ने अपने भाषणों से स्वदेशी आन्दोलन को और मजबूत किया।

स्वदेशी आन्दोलन को कांग्रेस का समर्थन

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी स्वदेशी आन्दोलन का समर्थन करना शुरू कर दिया। 1905 में गोपाल ​कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित बनारस अधिवेशन में स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन को समर्थन मिला। बनारस अधिवेशन में ही कांग्रेस ने सर्वप्रथम स्वदेशी के प्रस्ताव को अपनाया तथा स्वशासन को कांग्रेस का लक्ष्य बताया महात्मा गांधी ने स्वदेशी आन्दोलन को स्वराज की आत्मा कहा।

हांलाकि बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल तथा लाला लाजपत राय जैसे उग्र राष्ट्रवादी नेता स्वदेशी आन्दोलन एवं ​बहिष्कार आन्दोलन को सम्पूर्ण भारत में फैलाना चाहते थे, इनका अगला लक्ष्य स्वराज था। जबकि नरमपंथी नेता स्वदेशी तथा बहिष्कार आन्दोलन के बंगाल से बाहर विस्तार के विरूद्ध थे।

साल 1906 में कलकत्ता अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उद्देश्य अन्य उपनिवेशों की तरह भारत में भी अपनी सरकार का गठन करना है अर्थात स्वराज की स्थापना। हांलाकि साल 1907 के सूरत अधिवेशन में स्वदेशी आन्दोलन को लेकर कांग्रेस पार्टी विभाजित हो गई। 

स्वदेशी आन्दोलन की पृष्ठभूमि

स्वदेशी आन्दोलन के दौरान विदेशी माल के बहिष्कार को सर्वाधिक सफलता मिली, यह आन्दोलन काफी लोकप्रिय रहा। बंगाल सहित अन्य प्रान्तों में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। महिलाओं ने विदेशी कपड़ों तथा विदेशी बर्तनों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया। यहां तक कि महन्तों ने भी विदेशी चीनी से बने प्रसाद को लेने से इनकार कर दिया।

बड़े शहरों, जिलों, कस्बों तथा तालुका से लेकर गांवों में भी जनसभाओं के जरिए राजनीतिक चेतना जगाई गई जिससे जनमानस में स्वराज के लिए मन मचलने लगा। स्वदेशी तथा ब​हिष्कार आन्दोलन को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए अश्विनी कुमार दत्त की संस्था स्वदेश बांधव समिति ने उत्तेजक भाषणों और स्वदेशी गीतों का सहारा लिया। इसके अलावा स्वदेश बांधव समिति ने अपने सदस्यों को अकाल और महामारी में राहत कार्य का प्रशिक्षण दिया, स्कूल खोले, स्वदेशी दस्तकारी को प्रशिक्षण दिया और मुकदमों के निपटारे के लिए पंच अदालतें बनाई।

1905 ई. में प्रथम औद्योगिक सम्मेलन रमेशचन्द्र दत्त के नेतृत्व में बनारस में हुआ। पी.सी.राय ने प्रसिद्ध बंगाल केमिकल एवं फार्मास्यूटिकल्स खोला। अनेक बीमा कंपनियां व बैंक जमींदारों तथा जागीरदारों की सहायता से खोले गए। जिससे विदेशी वस्तुओं के आयात में भारी गिरावट आई।

अगस्त 1906 तक बारीसाल समिति ने 89 पंच अदालतों के ​जरिए 523 विवादों का निपटारा किया। स्वदेशी आन्दोलन के प्रचार के लिए पारम्परिक त्यौहारों, धार्मिक मेलों, लोक परम्पराओं तथा लोक संगीत, लोक नाट्य मंचों का भी सहारा लिया। लोकमान्य तिलक ने गणपति महोत्सव एवं शिवाजी जयन्ती के जरिए स्वदेशी आन्दोलन का प्रचार-प्रसार किया।

स्वदेशी आन्दोलन की दूसरी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने आत्मनिर्भरता तथा आत्मशक्ति का नारा दिया। आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी अथवा राष्ट्रीय शिक्षा की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस की गई। इसके लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन की तर्ज पर 14 अगस्त 1906 को बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना की गई। अरविन्द घोष इसके प्राचार्य बने।

अगस्त 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन किया गया, इसमें देश के जाने माने लोग शामिल थे। ​तकनीकी शिक्षा के लिए जुलाई 1906 में बंगाल टेक्नीकल इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई। पूरे देश में स्वदेशी कल-कारखाने स्थापित किए गए, जिससे कपड़ा मिलों, चमड़े के कारखानों, साबुन और माचिस की फैक्ट्रियों और अन्य उद्यमों में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिला।

स्वदेशी आन्दोलन का सांस्कृतिक जीवन पर प्रभाव

स्वदेशी आन्दोलन का सांस्कृतिक क्षेत्र पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। बंगला साहित्य के लिए यह स्वर्णिम काल था। रवीन्द्रनाथ टैगोर, रजनीकान्त सेन, द्विजेन्द्रलाल राय, मुकुन्द दास, सैयद अबू मुहम्मद इत्यादि ने उस समय के गीत लिखे। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बांग्लादेश के स्वाधीनता संघर्ष को तेज करने के लिए एक गीता लिखा जिसका शीर्षक था आमार सोनार बांगला जो 1971 में बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना रवीन्द्रनाथ टैगोर को उनके गीतों के संकलन गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला।

बंगला लोक संगीत पर भी स्वदेशी आन्दोलन की गहरी छाप पड़ी। इसके अलावा तमाम लोककथाएं भी लिखी गईं, जैसे दक्षिणारंजन मित्र लिखित ठाकुरमार झूली (दादी मां कथाएं) आज भी बंगाली बच्चों को आह्लादित करती हैं। चित्रकला के क्षेत्र में पाश्चात्य प्रभाव से मुक्त होकर अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने मुगलों-राजपूतों की समृद्ध स्वदेशी कलाओं से प्रेरणा लेनी शुरू की।

साल 1906 में स्थापित इंडियन सोसाइटी ऑफ़  ओरिएंटल आर्ट्स की पहली छात्रवृत्ति भारतीय कला के मर्मज्ञ नन्दलाल बोस को मिली। विज्ञान के क्षेत्र में जगदीश चन्द्र बोस, प्रफुल्लचन्द्र राय आदि की उल्लेखनीय सफलताएं, आविष्कार, स्वदेशी आन्दोलन को और भी मजबूत बनाने लगे।

स्वदेशी आन्दोलन की राजनीतिक सफलता

स्वदेशी आन्दोलन ने पहली बार समाज के एक बड़े तबके को अपने साथ जोड़ा। स्वदेशी आन्दोलन में जमींदार, शहरी निम्न मध्यमवर्ग के लोग तथा छात्र शामिल हुए। पहली बार औरतें घर से बाहर निकलकर प्रदर्शन एवं धरने में हिस्सा लेने लगीं।

आन्दोलनकारी नेता विदेशी मालिकों के कारखानों में हड़ताल आयोजित करने लगे। इस्टर्न रेलवे और क्लाइव जूट मिलें इसका उदाहरण हैं। हांलाकि स्वदेशी आन्दोलन किसानों तथा बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय को जोड़ने में विफल रहा।

कुल मिलाकर स्वदेशी आन्दोलन ने समाज के उस बड़े तबके में राष्ट्रीय भावना को जगाया जो राष्ट्रीयता से पूर्णत: अनभिज्ञ था। स्वदेशी आन्दोलन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध भारतवासियों का पहला सशक्त राष्ट्रीय आन्दोलन था जो भावी संघर्ष का बीज बोकर समाप्त हुआ।

स्वदेशी आन्दोलन का दमन

साल 1908 के मध्य तक स्वदेशी आन्दोलन की गति बिल्कुल धीमी पड़ गई। ब्रिटिश सरकार ने स्वदेशी आन्दोलन के खतरे को भांपते हुए इसे निर्ममतापूर्वक दबाना शुरू कर दियासार्व​जनिक सभाओं, प्रदर्शनों और प्रेस पर प्रतिबंध लगाए जाने लगे।

आन्दोलन समर्थक छात्रों को सरकारी स्कूलों से निकाला जाने लगा, सरकारी नौकरियों के दरवाजे इनके लिए बन्द होने लगे। साथ ही इन पर जुर्माना लगाया गया और पुलिस ने बेरहमी से पिटाई भी की।

छात्रों पर की जा रही दमनात्मक कार्रवाई के विरूद्ध शचीन्द्रनाथ बसु ने एंटी सेक्यूलर सोसाइटी की स्थापना की, इसी प्रकार डॉन सोसायटी बनी। साल 1906 में बारीसाल सम्मेलन में पुलिस ने जिस निर्ममता से पिटाई की, जो स्वयं में इस बात का सबूत है कि ब्रिटिश सरकार स्वदेशी आन्दोलन के प्रति कितना सख्त थी।

1907 के कांग्रेस विभाजन ने स्वदेशी आन्दोलन को ज्यादा क्षति पहुंचाई। नेताओं के वैचारिक मतभेद व आपसी संघर्ष का अंग्रेजी हुकूमत ने फायदा उठाते हुए दमनचक्र तेज कर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने अखबारों पर प्रतिबन्ध लगाने तथा अभियुक्तों की जमानत न होने देने के लिए कानून बनाए।

1907 से 1908 के बीच बंगाल के 9 बड़े नेता जिनमें अश्विनी कुमार दत्त तथा कृष्णकुमार मित्र भी शामिल थे, निर्वासित कर दिए गए। लोकमान्य तिलक को छह वर्ष की कैद हुई। पंजाब के अजीत सिंह और लाला लाजपत राय को निर्वासित किया गया।

मद्रास के चिदम्बरम पिल्ले तथा आन्ध्र प्रदेश के हरिसर्वोत्तम राव को गिरफ्तार कर लिया गया। वहीं, विपिनचन्द्र पाल तथा अरबिन्द घोष ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके अलावा अंग्रेजी सरकार ने ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना करवा करके मुस्लिम साम्प्रदायिकता को उभारने का प्रयत्न किया, जिससे मुसलमान भी स्वदेशी आन्दोलन से धीरे-धीरे अलग होने लगे। इस प्रकार आन्दोलन पूरी तरह से अचानक ही नेतृत्वविहीन हो गया।

इसे भी पढ़ें - बंगाल विभाजन (19 जुलाई 1905) : एक अध्ययन