राजस्थान की राजधानी जयपुर में नाहरगढ़ और जयगढ़ के पास अरावली पहाड़ियों पर स्थित गढ़ गणेश मंदिर एक ऐसा दुर्लभ मंदिर है, जिसमें बिना सूंड वाले बाल गणेश की प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है कि बाल गणेश की यह मूर्ति सिद्ध है, इसलिए भक्तों की हर मन्नतें पूरी होती हैं। यही वजह है कि बाल गणेश के दर्शन हेतु बुधवार के दिन यहां खूब भीड़ जुटती है।
गढ़ गणेश मंदिर का भी अपना रोचक इतिहास है। जयपुर शहर की नींव रखने से पहले गढ़ गणेश मंदिर का निर्माण करवाया गया था। कहा जाता है कि जयपुर के महाराजा ने गढ़ गणेश मंदिर का निर्माण कुछ इस प्रकार से करवाया कि वह अपने राजमहल से दूरबीन के जरिए गणेश जी के दर्शन कर सके।
इतना कुछ जानने के बाद अब आप भी गढ़ गणेश मंदिर का रोचक इतिहास जानने को उत्सुक हो चुके होंगे। इतना ही नहीं, आप यह भी जानना चाहते होंगे कि आखिर में जयपुर का वह कौन सा महाराजा था जो अपने राजमहल के सबसे ऊपरी बुर्ज से दूरबीन के जरिए सीधे बाल गणेश के दर्शन करता था। इस रोचक जानकारी के लिए यह ऐतिहासिक स्टोरी जरूर पढ़ें।
गढ़ गणेश मंदिर की स्थापना
पिंक सिटी अथवा गुलाबी नगरी के नाम से विख्यात राजस्थान की राजधानी जयपुर की नींव 1727 ई. में नवम्बर महीने की 18 तारीख को आमेर के शासक सवाई जयसिंह द्वितीय ने रखी थी। इस मौके पर सवाई जयसिंह द्वितीय ने कलयुग का प्रथम तथा अंतिम अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करवाया था।
सवाई जयसिंह द्वितीय का यह अश्वमेध यज्ञ सवा साल तक चला। अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को भांडारेज ठिकाने के कुम्भाणी राजपूतों (कुम्भाणी शाखा भी कछवाहों की ही एक शाखा है) ने रोका, तत्पश्चात जय सिंह ने यज्ञ के घोड़े को मुक्त करवाया।
जयपुर महाराजा के सकंल्प के अनुसार, तीन करोड़ ब्राह्मणों को भोजन करवाया गया। कुरूक्षेत्र में सप्त स्वर्ण सागर और काशी में हाथी-घोड़े दान किए गए। मथुरा में चांदी का तुला दान कर करीब 33 करोड़ रुपए पुण्य में खर्च किए। अश्वमेध यज्ञ के दौरान यज्ञ मंडपों को चांदी के पत्तरों से ढका गया था।
महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने अश्वमेध यज्ञ की स्मृति में जयपुर नगर के बाहर जलमहल की पहाड़ी पर 40 फुट ऊंचा एक यूप स्तम्भ खड़ा करवाया था। अब यह पहाड़ी ‘यज्ञशाला की डूंगरी’ कहलाती है।
अश्वमेध यज्ञ के दौरान जो मिट्टी के गणेशजी बनाए गए, उन्हें बाद में किला बनाकर स्थापित किया गया, जिसे हम सभी ‘गढ़ गणेश’ के नाम से जानते हैं। चूंकि बाल गणेश का यह मंदिर नाहरगढ़ और जयगढ़ के पास स्थित है, इसलिए इसे गढ़ (किला) गणेश कहा जाता है।

गढ़ गणेश मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
— ऐतिहासिक गढ़ गणेश मंदिर का निर्माण 1727 ई. में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था।
— गढ़ गणेश दुनिया के कुछ दुर्लभ मंदिरों में से एक है, जहां बाल गणेश की बिना सूंड वाली सिद्ध मूर्ति (पुरुषाकृति) स्थापित है।
— श्रद्धालुओं का मानना है कि बाल गणेश का स्वरूप विशेष रूप से शुभ और सिद्धिदायक होता है।
— गढ़ गणेश मंदिर में मूर्ति के नजदीक भगवान गणेश के अनन्य वाहन मूषक की दो सुन्दर प्रतिमाएं विराजमान है।
— गढ़ गणेश मंदिर आने वाले श्रद्धालु तथा भक्तजन गणपति महाराज के समक्ष चिट्ठी लिखकर अपनी मनोकामनाएं प्रकट करते हैं। ऐसी मान्यता है कि बाल गणेश हर एक पत्र को पढ़ते हैं तथा समय आने पर आशीर्वाद स्वरूप उत्तर भी देते हैं।
— गढ़ गणेश मंदिर तक पहुंचने वाले श्रद्धालु भक्तों को 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है, जो वर्ष के 365 दिनों का प्रतीक हैं।
— मंदिर निर्माण के दौरान प्रतिदिन एक सीढ़ी तैयार की जाती थी, इस प्रकार 365 सीढ़ियों को तैयार करने में पूरे 365 दिन लगे थे।
— भाद्रपद शुक्ल पक्ष में गणेश चतुर्थी के दिर यहां हर साल पांच दिनों का भव्य का मेला लगता है, इसके अतिरिक्त प्रत्येक बुधवार को यहां खूब भीड़ जुटती है।
— गढ़ गणेश मंदिर में हर साल दिवाली के बाद पहले बुधवार को ‘अन्न-कूट महोत्सव’ तथा आखिरी बुधवार को ‘पौष बड़े’ का आयोजन किया जाता है।
— अरावली पहाड़ी पर स्थित गढ़ गणेश मंदिर से पूरे जयपुर शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।
— गुलाबी बलुआ पत्थर से बना गढ़ गणेश मंदिर नागर शैली में निर्मित है।
— ऊँचे शिखर वाले गढ़ गणेश मंदिर के स्तंभों और अग्रभाग पर पौराणिक कथाओं के दृश्य नक्काशी किए गए हैं।
— गढ़ गणेश मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि इसके चारों तरफ हरे-भरे पेड़-पौधों की ताजी हवा तथा चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देती है।
महाराजा जयसिंह दूरबीन से करते थे बाल गणेश के दर्शन
जयपुर स्थित सिटी पैलेस परिसर के पश्चिमी हिस्से में स्थित चन्द्र महल अपनी दीवारों पर अद्भुत चित्रकारी, कीमती रत्नों के काम और पुरानी काँच की कारीगरी के लिए विख्यात है, यह राजमहल आज भी जयपुर के शाही परिवार का निवास स्थान है।

चन्द्र महल को ‘चंद्र निवास’ भी कहा जाता है। सात मंजिले चन्द्र महल का निर्माण जयपुर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। अपनी भव्यता और ऐश्वर्य के लिए मशहूर चन्द्रमहल के निर्माण में पांच साल लगे थे, यह बेहतरीन इमारत साल 1732 में बनकर तैयार हुई।
राजपूत और मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना चन्द्रमहल के सात मंजिलों में से प्रत्येक मंजिल का एक अलग नाम और उद्देश्य है। पहली दो मंजिलें सुख निवास हॉल का हिस्सा हैं, जबकि रंगीन कांच से सुसज्जित तीसरी मंजिल पर सुख निवास स्थित है, इसे ‘शोभा निवास’ भी कहा जाता है। सुख निवास में शाही परिवार का बैठक व भोजन कक्ष है।
चौथी मंजिल पर शोभा निवास है, जिसे 'सौंदर्य कक्ष' भी कहा जाता है। शोभा निवास की कई अनूठी पेंटिंग, दीवारों पर दर्पण का काम और फूलों की सजावट का काम देखते ही बनता है। पांचवीं मंजिल छवि निवास है जिसकी दीवारों में लगे दर्पण स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना हैं।
चंद्र महल का सबसे ऊपरी एवं आखिरी हिस्सा ‘मुकुट महल’ अथवा ‘मुकुट मंदिर’ कहलाता है। मुकुट मंदिर के शीर्ष पर जयपुर का शाही ध्वज फहराया जाता है। मुकुट महल से ही पूरे जयपुर शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।
इतिहासकारों के मुताबिक, जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने गढ़ गणेश मंदिर को कुछ इस तरह से बनवाया कि वह चन्द्र महल के सबसे ऊपरी मंजिल ‘मुकुट मंदिर’ के बुर्ज से दूरबीन के जरिए बाल गणेश की दुर्लभ मूर्ति का दशर्न कर सकें। ऐसा कहा जाता है कि महाराजा जयसिंह प्रतिदिन सुबह बाल गणेश का दर्शन करने के पश्चात ही अपनी दिनचर्या की शुरूआत करते थे।
मुकुट मंदिर के शीर्ष पर आज भी शाही परिवार का ध्वज आसानी से देखा जा सकता है। सदियों से राजपरिवार की परम्परा रही है कि महाराजा के राजमहल में रहने के दौरान एक चौथाई ध्वज फहराया जाता है जबकि रियासत से दूर रहने पर रानी का झंडा फहराया जाता है।
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