अरविडु वंश विजयनगर साम्राज्य का चौथा तथा अंतिम हिंदू राजवंश था। अरविडु वंश ने विजयनगर साम्राज्य पर साल 1570 से 1649 ई. तक शासन किया। अरविडु वंश के पतन के पश्चात विजयनगर साम्राज्य दक्कन सल्तनतों के हाथों में चला गया।
तिरूमाल (1572-1586 ई.)
साल 1565 में तालीकोटा युद्ध के बाद बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा की संयुक्त मुस्लिम सेनाओं ने विजयनगर का विनाश कर दिया। रामराय की मृत्यु के बाद उसके भाई तिरूमाल ने तुलुव वंश के सदाशिव राय को अपदस्थ कर 1570 ई. में अरविडु वंश की नींव डाली।
तिरूमाल ने विजयनगर के स्थान पर वेनुगोंडा (पेनगोंडा) को अपनी राजधानी बनाई। तिरूमाल ने ‘कर्नाटक के पुरूत्थानकर्ता’ की उपाधि धारण की। तिरूमाल के बाद उसका पुत्र वेंकट द्वितीय विजयनगर साम्राज्य का शासक हुआ।
वेंकट द्वितीय (1586-1614 ई.)
— तिरूमाल के पुत्र वेंकट द्वितीय ने विजयनगर का मुख्यालय वेनुगोंडा से चन्द्रगिरि स्थानान्तरित कर दिया। साल 1612 में राजा ओडियार ने वेंकट द्वितीय की अनुमति लेकर मैसूर राज्य की स्थापना की।
— वेंकट द्वितीय का स्पेन के राजा फिलिप तृतीय के साथ सीधा पत्र व्यवहार था। साल 1598 ई. में वेंकट द्वितीय ने ईसाई पादरियों का अपने दरबार में स्वागत किया।
— वेंकट द्वितीय की चित्रकला में विशेष रूचि थी। उसने दो जैसुएट चित्रकार अपनी सेवा में रखे। वे यूरोपीय चित्र बनाते थे।
— वेंकट द्वितीय ने पुर्तगालियों को वैल्लोर में गिरिजाघर बनाने की अनुमति दी।
— वेंकट द्वितीय के बाद अधिकतर नायकों ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।
श्री रंग तृतीय (1642-1652 ई.)
श्री रंग तृतीय विजयनगर का अंतिम शासक था। इसके समय मैसूर, बेदनूर, मदुरा व तंजौर जैसे स्वतंत्र राज्यों का निर्माण हुआ। श्रीरंग तृतीय ने विजयनगर को वेल्लोर की छोटी सी रियासत तक ही सीमित कर दिया। जिससे साल 1646 में बीजापुर और गोलकोंडा की सेनाओं ने राजधानी विजयनगर पर कब्ज़ा कर लिया और उसे लूट लिया। तत्पश्चात अरविडु राजवंश का अंत हो गया।
विजयनगर साम्राज्य के पतन के पश्चात अरविडु वंश के शासकों ने कुछ समय तक छोटे-छोटे इलाकों पर कब्ज़ा बनाए रखा। इन शासकों ने कला और साहित्य को बढ़ावा देने में भी अहम भूमिका निभाई। यद्यपि उनका राजनीतिक असर कम होता गया और वे गुमनामी में खो गए।
अरविडु वंश की विशेषताएं
1. कला और साहित्य को संरक्षण
अरविडु वंश के शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य में कवियों, विद्वानों तथा कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया गया लिहाजा तेलुगू तथा संस्कृत में कई साहित्य लिखे गए।
2. स्थापत्यकला पर दृष्टि
अरविडु शासकों ने मंदिरों के निर्माण एवं पुनर्निर्माण का काम जारी रखा। हांलाकि साम्राज्य पतन के कारण इनके शासनकाल में मंदिर बनाने की भव्यता पहले की तुलना में थोड़ी कम थी।
3. युद्ध और आंतरिक संघर्ष
अरविडु शासकों को आंतरिक सत्ता संघषों के साथ ही मुस्लिम सल्तनतों के साथ भी कई युद्ध करने पड़े। हांलाकि अरविडु शासकों ने विजयनगर साम्राज्य को बचाए रखने का भरसक प्रयास किया किन्तु वे इस साम्राज्य के पतन को रोक नहीं पाए।
4. प्रशासन और सत्ता संचालन की कोशिश
अरविडु शासकों ने विजयनगर साम्राज्य के आधिपत्य वाले हिस्सों पर प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने की भरसक कोशिश की। उन्होंने इसके लिए अधिकारियों तथा प्रशासकों की नियुक्तियां की किन्तु उनका नियंत्रण सीमित था क्योंकि केन्द्रीय व्यवस्था काफी कमजोर हो चुकी थी।
अरविडु वंश से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— विजयनगर साम्राज्य का चौथा और अंतिम हिंदू राजवंश था - अरविडु वंश।
— अरविडु वंश की स्थापना की थी - तिरूमाल ने।
— अरविडु वंश के संस्थापक तिरूमाल ने अपनी राजधानी बनाई थी - वेनुगोंडा।
— अरविडु वंश के शासक वेंकट द्वितीय ने अपना मुख्यालय बनाया था - चन्द्रगिरि को।
— साल 1612 में मैसूर राज्य की स्थापना की थी - राजा ओडियार ने।
— संगम वंश ने सर्वाधिक 149 वर्ष शासन किया जबकि सालुव वंश ने सबसे कम 20 वर्ष शासन किया।
— विजयनगर के शासकों ने शासन किया था - 300 वर्षों तक।
— अरविडु वंश के शासकों का शासनकाल
तिरुमाला देव राय श्रीरंगा देव राय (श्रीरंगा प्रथम) (1572-1586 ई.)
वेंकटपति देव राय (वेंकट द्वितीय) (1586-1614 ई.)
श्रीरंग द्वितीय (1614–1617 ई.)
राम देव राय (1617-1632 ई.)
पेडा वेंकट राया (वेंकट तृतीय) (1632-1642 ई.)
श्रीरंग तृतीय (1642-1652 ई.), अरविडु राजवंश और विजयनगर साम्राज्य का अंतिम शासक।
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