भारत का इतिहास

Important facts related to Chishti Silsila in India

भारत में चिश्ती सिलसिले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

10वीं सदी में चिश्ती सम्प्रदाय की उत्पत्ति पश्चिम में ईरान और उत्तर में तुर्कमेनिस्तान से घिरे अफगानिस्तान के चिश्त शहर से हुई जहां इसकी शुरूआत सीरिया निवासी अबू इशाक शमी ने की थी। भारत में चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (1142-1236) हैं, जो आक्रमणकारी मुहम्मद गोरी के साथ 1192 ई. में यहां आए थे।

शुरूआती दौर में चिश्ती पंथ की गतिविधियों का केन्द्र अजमेर था एवं अन्य केन्द्र नारनौल, हांसी, सरवर, बदायूं एवं नागौर थे। इसके बाद हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन ने चिश्ती सम्प्रदाय को पूरे दक्षिण एशिया में फैलाया। साल 1236 में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की मृत्यु हो गई। अजमेर में ​ही मुईनुद्दीन चिश्ती की ख्वाजा साहब के नाम से प्रसिद्ध दरगाह है, जहां प्रति वर्ष लाखों हिन्दू एवं मुसलमान आते हैं।

सिजिस्तान (ईरान) के मूल निवासी ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अद्वैतवाद दर्शन में विश्वास करते थे। ईश्वर प्रेम और मानव सेवा उनके प्रमुख सिद्धान्त थे। चिश्ती संत निजी सम्पत्ति के खिलाफ थे, वे सम्पत्ति को आध्यात्मिक विकास में बाधक मानते थे। वे समा (नृत्य-संगीत) में विश्वास करते थे। चिश्ती स्वयं को सुल्तानों, राजनीति व सरकारी सेवा से अलग रखते थे तथा दरिद्रता का जीवन व्यतीत करते थे।

मुहम्मद गोरी ने ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती को सुल्तान-उल-हिन्द (हिन्द का आध्यात्मिक गुरू) की उपाधि दी। अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (ख्वाजा साहब) की दरगाह का निर्माण सुल्तान इल्तुतमिश ने करवाया। प्रख्यात चिश्ती संत शेख हमीमुद्दीन नागौरी राजस्थान के नागौर में आकर बस गए। उन्होंने इल्तुतमिश द्वारा दिए गए शेख-उल-इस्लाम के पद को अस्वीकार कर दिया। वे सिर्फ कृषि कार्य से अपनी आजीविका चलाते थे।

चिश्ती संत हमीमुद्दीन नागौरी के संयम एवं धार्मिकता के चलते ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने उन्हें सुल्तान-उल-तरीकीन (संन्यासियों का सुल्तान) की उपाधि दी। साल 1274 ई. में हमीमुद्दीन नागौरी की मृत्यु हो गई। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के एक शिष्य ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (1173-1235) फरगना के निवासी थे।

सुल्तान इल्तुतमिश के समकालीन थे ख्वाजा बख्तियार काकी। ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के अनुसार, “मनुष्य को कम खाना, कम सोना, कम बोलना और सांसारिक धन्धों से बचना चाहिए। जो इन चार सिद्धान्तों को अपना लेगा वह ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलने योग्य हो जाएगा।” 

बख्तियार काकी के शिष्य शेख फरीदुद्दीन गज--शंकर थे जो बाबा फरीद (1173-1265) के नाम से विख्यात हुए। शाही घराने से ताल्लुकात रखने वाले बाबा फरीद का जन्म मुल्तान में हुआ था, किन्तु वे अजोधन (पंजाब) में रहने लगे। बाबा फरीद ने हांसी, अजोधन तथा अन्य स्थानों पर सूफी मत का प्रचार किया। पाकपाटन में बाबा फरीद की मजार है। बाबा फरीद के वचन गुरू ग्रन्थ साहिब में संकलित हैं। बाबा फरीद सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी से काफी प्रभावित थे।

बाबा फरीद को पंजाबी भाषा का प्रथम कवि माना जाता है। बाबा फरीद के कारण ही चिश्तिया सिलसिले को भारत में सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। ऐसा कहा जाता है कि बाबा फरीद दिल्ली के सुल्तान बलबन के दामाद थे। बाबा फरीद का 1265 ई. में निधन हो गया।

बाबा फरीद के शिष्य निजामुद्दीन औलिया सबसे लोकप्रिय चिश्ती संत थे और उनके शिष्य का नाम ​नासिरूद्दीन चिराग--दिल्ली था। निजामुद्दीन औलिया (1238-1325) सभी वर्ग के लोगों से मुक्त रूप से मिलते थे। हजरत निजामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शिष्य अमीर खुसरो थे। अमीर खुसरो ने निजामुद्दीन औलिया के निधन की खबर सुनकर दूसरे दिन ही अपने प्राण त्याग दिए। अमीर खुसरो को उनके गुरू के पास ही दफनाया गया।

सूफी संत निजामुद्दीन औलिया की लोक​प्रियता से चिढ़ता था सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक, इसलिए उसने निजामुद्दीन औलिया पर वर्जित संगीत गोष्ठियों में भाग लेने का आरोप लगाकर 53 उलेमाओं की अदालत में मुकदमा चलाया था परन्तु वह बाइज्जत बरी हो गए।

तत्पश्चात एकमात्र अविवाहित और ब्रह्मचारी सूफी संत निजामुद्दीन औलिया को गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली छोड़ने का आदेश दिया। गयासुद्दीन तुगलक जब बंगाल से दिल्ली वापस लौट रहा था, तभी निजामुद्दीन औलिया ने कहा कि अभी दिल्ली दूर है (हुनूज दिल्ली दूरअस्त)। इसके बाद दिल्ली से कुछ किमी. दूर अफगानपुर गांव (तुगलकाबाद) में गयासुद्दीन तुगलक की मौत हो गई।

निजामुद्दीन औलिया ने खुशरव शाह से 5 लाख टंका की भेंट स्वीकार की। निजामुद्दीन औलिया के समय सात सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठे किन्तु वह किसी सुल्तान के दरबार में नहीं गए। एक बार अलाउद्दीन खिलजी ने निजामुद्दीन औलिया से मिलने की अनुमति मांगी तब निजामुद्दीन औलिया ने जवाब दिया- मेरे मकान में दो दरवाजे हैं, यदि सुल्तान एक दरवाजे से आएगा तो मैं दूसरे दरवाजे से बाहर चला जाऊंगा। 

प्रख्यात चिश्ती संत निजामुद्दीन औलिया के उदार एवं सहिष्णु दृष्टिकोण के कारण उन्हें महबूब--इलाही (ईश्वर के प्रेमी) तथा सुल्तान-उल-औलिया (संतों का सुल्तान) कहा जाता था। निजामुद्दीन औलिया का वास्तविक नाम मुहम्मद बिन अहमद दानियाल अल बुखारी था, इनका जन्म बदायूं में हुआ। निजामुद्दीन औलिया को योग की प्राणायाम (हब्स--दम पद्धति) में निपुणता प्राप्त थी। उन्हें योगी सिद्ध कहा जाने लगा।

निजामुद्दीन औलिया की इच्छा थी कि उनकी कब्र पर कोई स्मारक न बने उन्हें खुले मैदान में ही आराम करने दिया जाए। किन्तु मुहम्मद बिन तुगलक ने उनकी कब्र पर मकबरा बनवा दिया। निजामुद्दीन औलिया ने कहा कि कुछ हिन्दू जानते हैं कि इस्लाम एक सच्चा धर्म है किन्तु वे इस्लाम को कबूल नहीं करते।अमीर हसन सिज्जी के फारसी ग्रंथ फवायद-उल- फुवाद में निजामुद्दीन की वार्ताएं संकलित हैं। यह ग्रन्थ सूफी मत के व्यावहारिक पक्ष पर लिखा गया है।

नासिरूद्दीन चिराग--दिल्ली उत्तरी भारत के चमत्कारी संत थे, उन्होंने तौहीद--वजूदी की रचना की। इनकी मृत्यु के साथ ही चिश्ती सिलसिलों का पहला दौर समाप्त हो जाता है। हमीर कलन्दर की कृति खैर-उल-मजलिस में नासिरूद्दीन चिराग--दिल्ली की 100 वार्ताओं का वर्णन है।

सूफी संत नासिरूद्दीन चिराग-ए-दिल्ली के उत्तराधिकारी सैयद मुहम्मद गेसूदराज औलिया साल 1398 में बहमनी साम्राज्य के दौरान कर्नाटक के गुलबर्गा में बस गए। दीन-दरिद्रों के प्रति गेसूदराज के प्रेम तथा मानव अधिकारों की रक्षा के कारण उन्हें बन्दा नवाज कहा जाता था। दक्षिण भारत में चिश्ती सम्प्रदाय की नींव निजामुद्दीन औलिया के एक शिख्य शेख बुरहानुद्दीन गरीब ने रखी। शेख बुरहानुद्दीन गरीब दौलताबाद में रहते थे।

बंगाल के शासक हुसैन शाह का सत्यपीर आन्दोलन चिश्ती सम्प्रदाय से प्रभावित था। भारत में चिश्ती संतों ने विलायत नामक संस्था विकसित की जो राज्य नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र था।

चिश्ती संत शेख कुद्दूस गंगोही (1455-1536 ई.) सिकन्दर लोदी व बाबर के समकालीन थे। शेख कुद्दूस गंगोही का खानकाह सहारनपुर स्थित गंगोही में स्थित है, जिसके कारण वे गंगोही कहलाए। शेख कुद्दूस गंगोही नाथ योगियों के सर्वेश्वरवादी सिद्धान्त को मानते थे। उन्होंने रूश्दनामा लिखा जिसमें सर्वात्यवाद को स्वीकार किया गया। संत शेख कुद्दूस गंगोही ने अलख नाम से कविताएं लिखनी प्रारम्भ की थी।

अकबर ने चित्तौड़गढ़ की जीत का श्रेय चिश्ती शेखों को दिया। अकबर ने अपनी ​प्रतिज्ञा अनुसार विजय प्राप्त करने के बाद अजमेर स्थित चिश्ती दरगाह जाकर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के मकबरे का दर्शन किया। बादशाह अकबर ने साल 1562 से 1579 ई. के बीच ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के दरगाह की दस बार यात्रा की।

मुगलकाल के विख्यात सूफी संत शेख सलीम चिश्ती का मकबरा फतेहपुर सीकरी में बादशाह अकबर ने बनवाया। संत शेख सलीम चिश्ती का बहुत सम्मान करता था बादशाह अकबर। सलीम (जहांगीर) का जन्म शेख सलीम चिश्ती की कुटिया में हुआ। मुगलिया दौर में बादशाह अकबर चिश्ती सिलसिले का सबसे बड़ा संरक्षक था।

इसके बाद शाहजहां की बेटी जहाँआरा बेगम भी चिश्ती सिलसिले की एक धर्मनिष्ठ अनुयायी थीं। वहीं, बादशाह औरंगज़ेब ने विभिन्न चिश्ती दरगाहों को संरक्षण प्रदान किया। 16वीं और 18वीं शताब्दियों के बीच चिश्ती सिलसिला बेहद सम्मानित रहा।

वर्तमान में चिश्ती सम्प्रदाय के आध्यात्मिक केन्द्र भारत, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में फैले हुए हैं।  भारत में चिश्ती सम्प्रदाय की तीन प्रमुख शाखाएं थी - 1. नागौरी शाखा (हमीमुद्दीन नागौरी से) 2. साबिरी शाखा (अलाउद्दीन साबिर कलियारी से)  3. निजामी शाखा (निजामुद्दीन औलिया से) चिश्ती सिलेसिले के प्रमुख सिद्धांत — 1. बाह्यडम्बर एवं कर्मकाण्डों का विरोध करना। 2. जनहित पर ध्यान देना। 3. सत्ता की राजनीति से दूर रहना। 4. इस्लाम धर्म के प्र​ति आस्था रखते हुए सर्वधर्म समभाव पर जोर। 5. निचले तबके पर ज्यादा ध्यान देना। 6. समा (नृत्य-संगीत) का आयोजन करना तथा उनमें हिस्सा लेना।

इसे भी पढ़ें - सूफी मत का इतिहास : भारत के सन्दर्भ में