कांग्रेस की नरमपंथी नीतियों के खिलाफ 1895 ई. से ही असंतोष व्यक्त किया जाने लगा था। 1902 ई. तक कांग्रेस में बाल गंगाधर तिलक, अरविन्द घोष, बिपिन चन्द्र पाल तथा लाला लाजपत राय जैसे उग्रवादी विचारधारा के व्यक्ति आ चुके थे। ये नेता नरमपंथियों के विचारों तथा कार्यों को खुली चुनौती देने लगे थे।
सूरत विभाजन का कारण - 1905 से 1907 ई. के बीच उग्रवादियों तथा नरमपंथियों के मध्य अनेक मतभेद देखने को मिले जिसकी चरम परिणति दिसम्बर 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन था। जहां नरमपंथी क्रमिक सुधारों की वकालत करते थे, वहीं उग्रवादी गुट ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तत्काल और प्रत्यक्ष कार्रवाई की मांग करता था।
साल 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में ही गरम दल के नेताओं ने विद्रोह का झण्डा उठा लिया था। गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में हुए बनारस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक ने उदारवादियों की “याचिका-याचना की नीति” का कड़ा विरोध किया। बनारस अधिवेशन में लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक ने प्रिन्स ऑफ वेल्स (जॉर्ज पंचम) के भारत आगमन के समय उनके स्वागत के प्रश्न को लेकर कड़ी चुनौती पेश की।
तत्पश्चात साल 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी में विभाजन की नौबत आ गई। दरअसल उग्रवादी गुट बाल गंगाधर तिलक अथवा लाला लाजपत राय को अध्यक्ष बनवाने पर तुला हुआ था किन्तु दादा भाई नौरोजी जैसे पितृवत एवं सम्मानित व्यक्ति को अध्यक्ष बनाए जाने से सम्भावित विभाजन फिलहाल टल गया।
कलकत्ता अधिवेशन में उग्रवादी जहां स्वदेशी और बहिष्कार आन्दोलन को बंगाल से बाहर सम्पूर्ण देश में फैलाना चाहते थे, वहीं नरमपंथी इसे बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे। हांलाकि दादा भाई नौरोजी द्वारा कांग्रेस का लक्ष्य स्वराज्य घोषित कर देने से गरम दल के लोग शान्त हो गए।
कलकत्ता अधिवेशन में उग्रवादी प्रभाव छाया रहा- इसमें बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा तथा स्वायत्त शासन जैसे चार प्रमुख प्रस्ताव रखे गए। हांलाकि इन प्रस्तावों का मसविदा इतना अस्पष्ट था कि साल 1907 तक नरमपंथी और गरमपंथी इसे अपने-अपने ढंग से परिभाषित करते रहे और आपस में लड़ते रहे।
जानकारी के लिए बता दें कि 1907 में सूरत में होने वाला कांग्रेस का 23वां अधिवेशन पहले नागपुर में होना प्रस्तावित था किन्तु नरमपंथियों ने बाल गंगाधर तिलक को कांग्रेस अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए फिरोज शाह मेहता से अधिवेशन स्थल बदलवाकर सूरत करवा दिया। चूंकि सूरत उस समय बम्बई प्रान्त में था तथा नागपुर मध्य प्रान्त में था, ऐसे में मेजबान होने के नाते बाल गंगाधर तिलक अधिवेशन की अध्यक्षता नहीं कर सकते थे।
सूरत अधिवेशन में जहां उग्रवादी लाला लाजपत राय को अध्यक्ष बनाने पर तुले हुए थे, वहीं उदारवादी रास बिहारी घोष को अध्यक्ष बनना चाहते थे। जब लाला लाजपत राय ने अपना नाम वापस ले लिया, तब तनावपूर्ण माहौल में सूरत अधिवेशन की अध्यक्षता रास बिहारी घोष ने की।
सूरत सम्मेलन में साल 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में पारित किए चार प्रस्तावों- स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा तथा स्वशासन की व्याख्या को लेकर पहले से ही विवाद था अत: अधिवेशन के पहले ही दिन शोर-शराबे के दृश्य देखने को मिले क्योंकि अफवाह थी कि कलकत्ता के चारों प्रस्ताव रद्द कर दिए जाएंगे।
आखिरकार 26 दिसम्बर 1907 को ताप्ती नदी के किनारे आयोजित सूरत अधिवेशन में दोनों पक्षों के मध्य खुला संघर्ष हुआ। रासबिहारी घोष के अध्यक्षीय भाषण देने से पूर्व ही 1600 प्रतिनिधि एक दूसरे पर चिल्लाने लगे, मारपीट पर उतारू हो गए और कुर्सियां फेंकने लगे। इसी बीच किसी अज्ञात व्यक्ति ने जूता फेंका जो फिरोजशाह मेहता और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को लगा। इसके बाद पुलिस आई और पूरे सभागार को खाली कराया। अधिवेशन स्थगित हो गया और कांग्रेस दो गुटों - उग्रवादी तथा उदारवादी दल में विभाजित हो गई। इस बारे में एनी बेसेंट ने कहा “सूरत की घटना कांग्रेस के इतिहास में सबसे अधिक दुःखद घटना है।”
सूरत विभाजन के पश्चात अप्रैल 1908 में इलाहाबाद के वार्षिक अधिवेशन में कांग्रेस का एक नया संविधान और बैठकें आयोजित करने के लिए एक नई नियमावली तैयार की गई। नवीन संविधान के प्राविधानों के बाद उग्रवादियों को अगले सात वर्ष तक कांग्रेस में प्रवेश प्रतिबंधित हो गया। ऐसे में 1908 के इलाहाबाद सम्मेलन ने कांग्रेस विभाजन को तकरीबन पक्का कर दिया।
कांग्रेस के नरम दल द्वारा अचानक इस प्रकार का कठोर रवैया अपनाने का सबसे कारण था सुधारों की आशा क्योंकि इंग्लैण्ड में सत्ता उदारवादियों के हाथ में थी और ब्रिटिश भारत के सचिव पद पर उदारवादी राजनीतिक चिंतक मार्ले विराजमान था।
कांग्रेस विभाजन का प्रभाव - लार्ड मिन्टो ने मार्ले को पत्र लिखा कि “सूरत में कांग्रेस का पतन हमारी बहुत बड़ी जीत है।” कांग्रेस विभाजन उग्रवादी और उदारवादियों के लिए विनाशकारी साबित हुआ। ब्रिटिश सरकार ने साल 1907 से 1911 के दौरान राष्ट्रीय आंदोलन को बाधित करने के लिए कई अधिनियम पारित किए, जैसे - राजद्रोह सभा अधिनियम (1907), आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम (1908), भारतीय समाचार पत्र अधिनियम (1908), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम (1908) तथा भारतीय प्रेस अधिनियम (1910)।
यही नहीं, अंग्रेजी सरकार ने नरमपंथियों को भ्रमित करने और मुसलमानों को खुश करने के उद्देश्य से भारतीय परिषद अधिनियम 1909 भी लागू किया, जिसे हम सभी ‘मोर्ले-मिंटो सुधार’ के नाम से जानते हैं। अग्रेंजी सरकार ने ‘मोर्ले-मिंटो सुधार’ के तहत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन पद्धति की व्यवस्था कर ब्रिटिश भारत में साम्प्रदायिकता की शुरूआत की।
इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार ने उग्रपंथियों के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर दमनात्मक कारवाईयां शुरू की। सूरत विभाजन के बाद बाल गंगाधर तिलक को कैदकर छह वर्ष के लिए वर्मा के माण्डले जेल में भेज दिया गया। जबकि अरविन्द घोष राजनीति से संन्यास लेकर पाण्डिचेरी चले गए। वहीं, बिपिन चन्द्र पाल ने भी अस्थायी रूप से राजनीति से संन्यास ले लिया। जबकि लाला लाजपत राय 1908 में ब्रिटेन चले गए, इसके बाद 1909 में वहां से लौटकर आए तो फिर अमेरिका चले गए। इन परिस्थितियों में गरमपंथी कोई सशक्त वैकल्पिक दल नहीं बना सके जो आन्दोलन को आगे ले जाता। हांलाकि ब्रिटिश सरकार इन्हें कुछ ही समय दबाने में सफल रही।
निष्कर्षतया 1908 के बाद समूचा राष्ट्रीय आन्दोलन पतन की ओर उन्मुख हो चुका था। किन्तु इसका मतलब यह नहीं था कि जनता के दिलों से राष्ट्रीय संवेदनाएं भी खत्म हो गई थीं। ये संवेदनाएं जनता के दिलों में अभी भी बरकरार थीं और लोग आन्दोलन के अगले चरण का इंतजार कर रहे थे। यहीं वजह है कि साल 1914 में बाल गंगाधर तिलक जब जेल से छूटे तो उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को दोबारा पटरी पर ला खड़ा किया।
तकरीबन 8 वर्षों बाद 1916 ई. में कांग्रेस लखनऊ अधिवेशन में दोनों दलों (उदारवादी और उग्रवादी) में पुन: एकता कायम हो गई। उदारवादी और उग्रवादी गुट ने 1916 की ‘लखनऊ संधि’ पर हस्ताक्षर किए। ऐतिहासिक लखनऊ अधिवेशन (1916) की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की थी। जबकि बाल गंगाधर तिलक संयुक्त कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए। लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए तिलक ने कहा था – “I got Luck in Lucknow.”
सूरत विभाजन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— सूरत विभाजन 1907 का क्या हुआ था — कांग्रेस दो गुटों नरमपंथी और उग्रवादी में बंट गई।
— 1907 के सूरत विभाजन का मुख्य कारण क्या था — अध्यक्ष पद हेतु संघर्ष।
— सूरत विभाजन कब हुआ था — 26 दिसम्बर 1907 को ताप्ती नदी के किनारे।
— 1907 के सूरत अधिवेशन का अध्यक्ष कौन था — रास बिहारी घोष।
— 1907 के सूरत विभाजन का कारण क्या था — नरमपंथियों तथा उग्रवादियों में वैचारिक मतभेद।
— 1907 में सूरत विभाजन के समय वायसराय कौन था — लॉर्ड मिंटो द्वितीय ।
— सूरत अधिवेशन की मूल बैठक कहां होनी थी — नागपुर में।
— 1905 के बनारस अधिवेशन का अध्यक्ष — गोपाल कृष्ण गोखले।
— 1906 के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष — दादा भाई नौरोजी।
— 1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पारित चार प्रमुख प्रस्ताव— बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा तथा स्वशासन।
— ब्रिटिश सरकार ने बाल गंगाधर तिलक को किस जेल में कैद कर रखा था — मांडले जेल (बर्मा)।
— बाल गंगाधर तिलक को कितने साल की कैद हुई थी — 6 साल।
— अरविन्द घोष राजनीति से संन्यास लेकर कहां चले गए — पाण्डिचेरी।
— किस उग्रपंथी नेता को ‘पंजाब केसरी’ कहा जाता था — लाला लाजपत राय।
— ऐतिहासिक लखनऊ अधिवेशन (1916) की अध्यक्षता किसने की — अंबिका चरण मजूमदार।
