नक्शबन्दी सिलसिला की स्थापना बुखारा (उज्बेकिस्तान) के संत बहाउद्दीन नक्शबन्द ने (1317-1389 ई.) बगदाद में की थी। किन्तु भारत में इस सिलसिले की स्थापना ख्वाजा बाकी बिल्लाह (1563-1603 ई.) ने उच्छ में की। ख्वाजा बाकी बिल्लाह काबुल से दिल्ली आए थे। ख्वाजा बाकी बिल्लाह अजीज कोका (अकबर के दूध भाई), किलिच खां तथा अब्दुल रहीम खानखाना को प्रभावित करने में सफल हुआ।
सुन्नी इस्लाम के तहत सूफियों में यह सबसे अधिक कट्टरवादी सिलसिला था। इस सिलसिले ने संगीत का भी विरोध किया। नक्शबन्दी सिलसिले के संतों ने शरियत के कानूनों पर बल दिया। नक्शबन्दी सम्प्रदाय को छोड़कर बाकी सभी सूफी सम्प्रदायों ने यौगिक मुद्राओं व प्राणायाम को अपनाया। नक्शबंदी संत ‘मूक सूफी’ कहे जाते थे क्योंकि वे मौन ध्यान का अभ्यास करते थे। इस सम्प्रदाय के लोगों को नक्शबन्दी इसलिए कहा गया क्योंकि “ये लोग आध्यात्मिक तत्वों से सम्बन्धित तरह-तरह के नक्शे बनाकर उसमें रंग भरते थे।”
मुगल वंश में नक्शबन्दी सिलसिले का सम्बन्ध बाबर से था। मुगल बादशाह बाबर नक्शबन्दी नेता ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार और उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों का भक्त था। तत्पश्चात मुगल बादशाह अकबर के समय ख्वाजा बाकी बिल्लाह के प्रमुख शिष्य शेख अहमद सरहिन्दी के नेतृत्व में यह आन्दोलन अपने उत्कर्ष पर पहुंच गया। शेख अहमद सरहिन्दी (मृत्यु 1625 ई.) ने स्वयं को ‘मुजाहिद अलिफसानी’ कहा व अकबर की उदार नीतियों (विशेषकर सुलह-ए-कुल) का विरोध किया। शेख अहमद सरहिन्दी मुजाहिद अर्थात् ‘इस्लाम के पुनरूद्धारक या सुधारक’ के रूप में प्रसिद्ध थे।
मुजाहिद अलिफसानी का अर्थ है — इस्लाम की स्थापना के एक हजार वर्ष बाद होने वाले सुधारक। शेख अहमद सरहिन्दी ने अल्लाह के साथ एकत्व (वहदत-उल-वुजूद) के दर्शन को नकार कर वहदत-उल-शुहूद (प्रत्यक्षवाद) का दर्शन प्रतिपादित किया। सरहिन्दी मनुष्य व ईश्वर का सम्बन्ध दास व मालिक का मानते थे न कि प्रेमिका व प्रेमी का। शेख अहमद सरहिन्दी शियाओं के साथ-साथ हिन्दुओं के भी कट्टर विरोधी थे। उन्होंने उन लोगों की आलोचना की जो राम और रहमान को बराबर समझते थे। शेख अहमद सरहिन्दी ने राम और कृष्ण की तुलना निम्नवर्ग के व्यक्तियों से की और दावा किया कि इस्लाम का गौरव इसी से बढ़ेगा जब गैर मुसलमानों को बेइज्जत किया जाए और उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए।
मुगल बादशाह जहांगीर ने शेख अहमद सरहिन्दी को 1619 ई. में बन्दी बना लिया। शेख अहमद सरहिन्दी को इस आरोप में गिरफ्तार किया गया कि वह पांखडी थे और यह दावा करते थे कि आध्यात्मिक क्षेत्र में वह प्रथम तीन खलीफाओं से भी आगे थे। इतना ही नहीं, शाहजहां ने शेख अहमद सरहिन्दी के शिष्य आदम बनूरी को देश से निष्कासित कर दिया। यद्यपि औरंगजेब इस सिलसिले से काफी प्रभावित था और वह 1665 ई. में नक्शबंदी सिलसिले का अनुयायी बना। शेख अहमद सरहिन्दी के पुत्र मीर मासूम का शिष्य था औरंगजेब। बावजूद इसके वह शेख अहमद के विरोध को समाप्त नहीं कर सका। साल 1679 में औरंगजेब को शेख अहमद के पत्रों का प्रचार-प्रसार औरंगाबाद में रोकना पड़ा।
नक्शबन्दी सिलसिले के संत शाह वली उल्लाह देहलवी ने शेख अहमद सरहिन्दी की भांति संकट के समय इस्लाम को नया रूप देने का प्रयत्न किया। 18वीं सदी में जब मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया, बाहरी आक्रमण होने लगे, जाटों और मराठों की शक्ति बढ़ गई, तब शाह वली उल्लाह ने इन सभी घटनाओं को भारत में इस्लाम के कमजोर होने का लक्षण बताया। ऐसे में मुस्लिम समाज को सशक्त बनाने के लिए उन्होंने अरबी और फारसी में अनेक प्रपत्र लिखे। देश में इस्लाम को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से शाह वली उल्लाह ने समकालीन राजनीतिज्ञों को पत्र लिखे जिनमें उन्हें सलाह दी गई और उनसे कहा गया कि भारत में इस्लाम को मजबूत करने के उपाय करें। नक्शबंदिया संप्रदाय भारत-मुस्लिम समाज में एक शक्तिशाली ताकत बन गया और यह दो शताब्दियों तक भारतीय उपमहाद्वीप का प्रमुख आध्यात्मिक संगठन रहा।
तरीका-ए-मुहम्मदिया ( Tariqa-i-muhammadiya )
18वीं सदी में नक्शबन्दी सिलसिले में एक नई परम्परा ‘तरीका-ए-मुहम्मदिया’ विकसित हुई जिसमें पैगम्बर मुहम्मद के उपदेशों को नई शक्ति देने का दावा किया गया। इस आन्दोलन के नेताओं में ख्वाजा मुहम्मद नासिर अन्दलीब व उनके पुत्र ख्वाजा मीर दर्द थे। इन दोनों ने मिलकर ने ‘इल्मे इलाही मुहम्मदी’ नामक रहस्यवादी सिद्धान्त का विकास किया।
ख्वाजा मुहम्मद नासिर अंदलीब ने ‘नालाए अंदलीब’ नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमें तत्कालीन धार्मिक विवादों के बारे में लिखा गया था। जबकि ख्वाजा मीर दर्द उर्दू के कवि भी थे, ऐसे में मीर दर्द ने सूफी मत से जुड़े कई ग्रन्थ लिखे जिनमें ‘इल्म-उल-किताब’ काफी प्रसिद्ध है। ख्वाजा मीर दर्द ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति में दिल्ली में अपने अनुयायियों को धैर्य रखने, दयावान होने और एक पवित्र जीवन व्यतीत करने की सलाह दी।
मिर्जा मजहर जानेजाना
नक्शबन्दी सिलसिले के अन्य सन्तों में मिर्जा मजहर जानेजाना का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। मिर्जा मजहर जानेजाना ने हिन्दुओं के प्रति अधिक सहिष्णुता दिखाई। मिर्जा मजहर का कहना था कि कुरान की भांति वेद भी ईश्वरीय देन थी और उनमें जिन लोगों का उल्लेख है, वे भी पैगम्बर थे। उन्होंने मूर्तियों के समक्ष दंडवत प्रणाम करने की प्रथा का समर्थन किया और यह कहा कि यह श्रद्धा प्रकट करने का एक तरीका था। ख्वाजा मीर दर्द की ही भांति मिर्जा मजहर जानेजाना भी उर्दू के एक कवि थे।
नक्शबंदी संप्रदाय के 11 सिद्धांत
नक्शबन्दी सिलसिले में कुल 11 प्रमुख सिद्धान्त हैं जिनमें पहले 8 सिद्धान्तों को अब्दुल खालिक गजदवानी ने प्रतिपादित किया था जबकि शेष 3 सिद्धान्त बहाउद्दीन नक्शबंद बुखारी द्वारा जोड़े गए थे।
- पालन— हर क्षण मानसिक एवं वाचिक रूप से ईश्वर का पाठ करना। 2. संयम — कलमा अर्थात –‘ इलाहा इल-अल्लाह मुहम्मदुर रसूल-अल्लाह’ का दिल से पाठ करना। 3. स्मरण — बिना किसी बाहरी मदद के ईश्वर की उपस्थिति पर एकाग्रता। 4. वतन की यात्रा — एक ऐसी आंतरिक यात्रा जो व्यक्ति के गुणों को निंदनीय से प्रशंसनीय में बदल देती है। 5. खुद के कदमों पर नजर — आध्यात्मिक यात्रा के अंतिम लक्ष्य से विचलित न हों। 6. भीड़ के बीच एकांतवास — ऐसी आध्यात्मिक यात्रा जो बाह्य रूप से दुनिया में हो, किन्तु आंतरिक रूप से ईश्वर के साथ। 7. श्वास लेते समय जागरुकता— ईश्वर को याद करते हुए अपनी श्वास को नियंत्रित करना।
8. क्षणिक विराम — समय का सदुपयोग कर अपनी गलती के लिए क्षमा मांगें। 9. हृदय विराम — खुद के लिए ऐसे हृदय की कल्पना करना जिस पर ईश्वर का नाम लिखा हो। 10. सतर्कता — भटकते विचारों के प्रति सतर्क अथवा सजग रहना। 11. संख्यात्मक विराम— इस बात की तफ्शीश करना कि ज़िक्र (अल्लाह का नाम याद करना) विषम संख्या में दोहराया गया है।
नक्शबन्दी सिलिसिले के ये उपरोक्त सिद्धांत न केवल औपचारिक आध्यात्मिक अभ्यासों का मार्गदर्शन करते हैं, बल्कि व्यावहारिक जिंदगी में भी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति एकीकरण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
भारत में ख्वाजा बाकी बिल्लाह और शेख अहमद सरहिन्दी, शाह वलीउल्लाह देहलवी, ख्वाजा मुहम्मद नासिर अन्दलीब, ख्वाजा मीर दर्द तथा मिर्जा मजरह जानेजाना के अलावा मौलाना खालिद, उस्मान सिराज-उद-दीन नक्शबंदी, सैय्यद मीर जान, शाह अकबर दानापुरी, ख्वाजा यूनुस अली, सुलेमान हिल्मी तुनाहन, मुहम्मद उस्मान सिराज-उद-दीन नक्शबंदी आदि नक्शबन्दी सिलसिले के प्रमुख संत थे।
नक़्शबंदिया सिलेसिले का विस्तार
नक्शबन्दी सिलसिले के अनुयायी भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, तुर्की, सीरिया, मिस्र एवं मलेशिया में मौजूद हैं। नक्शबंदी सिलसिला मध्य एशिया में विशेष रूप से आधुनिक उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कजाकिस्तान और किर्गिस्तान के कुछ हिस्सों में भी फला-फूला।
यह सिलसिला आमजन में लोकप्रिय नहीं हो सका क्योंकि इसकी स्तुतियाँ बेहद शांत है और इसमें मौन साधना पर जोर दिया जाता है। शेख अहमद सरहिन्दी के सुधारवादी सिद्धान्तों के कारण भारत में नक्शबन्दियों को पुनर्जीवन मिला।
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