भारत में आए यूनानियों के बाद शक आए। भारतीय स्रोतों में शकों को ‘सीथियन’ (Indo-Scythians) कहा गया है। पुस्तक ‘मिलिन्दपन्हों’ में भी शक जाति का उल्लेख है। चीनी ग्रन्थों तथा चीनी लेखकों ने शकों को ‘सई’ तथा ‘'सईवांग' कहा है। शक शासक ‘मुरूण्ड’ की उपाधि धारण करते थे जिसका शाब्दिक अर्थ-स्वामी होता था। स्टेनकोनो इसे शक मुरूण्ड जाति नाम से पुकारते हैं।
पुराणों, रामायण, महाभारत, महाभाष्य, जैनग्रंथ आदि में भी शकों के विषय में जानकारी मिलती है। प्राकृत जैन ग्रंथ ‘काल्काचार्य कथानक’ में उज्जयिनी के ऊपर शकों के आक्रमण तथा विक्रमादित्य द्वारा उन्हे पराजित करने का उल्लेख मिलता है। कुछ लेखों एवं सिक्कों से भी शकों के विषय में जानकारी मिलती है। भारतीय साहित्य में शकों के प्रदेश को ‘शकद्वीप’ व ‘शकस्थान’ कहा गया है।
भारत में शक नरेश स्वयं को ‘क्षत्रप’ कहते थे। ईरानी शब्द 'क्षत्रपवन' (प्रान्तीय गर्वनर) से क्षत्रप शब्द की उत्पत्ति हुई है। शकों की भारत में दो शाखाएं हो गईं — 1. उत्तरी क्षत्रप ( तक्षशिला एवं मथुरा )। 2. पश्चिमी क्षत्रप ( नासिक एवं उज्जैन )।
तक्षशिला के शक शासक
तक्षशिला के प्रारम्भिक शक शासकों में मेउस का नाम उल्लेखनीय है। वह भारत का प्रथम शक विजेता था। मेउस के पश्चात एजेज (Azes) उसके बाद एजिलिसेज ( Azilises) राजा हुआ। वह एजेज का पुत्र का था। एजिलिसेज ने दो प्रकार की मुद्राएं चलवाईं। प्रथम प्रकार की मुद्राओं के मुख भाग पर यूनानी लिपि में एजेज का नाम तथा पृष्ठ भाग पर खरोष्ठी में एजिलिसेज का नाम मिलता है। इन दोनों शक नरेशों को ‘महाराज’ कहा गया है।
दूसरे प्रकार की मुद्राओं के मुख भाग पर यूनानी में एजिलिसेज तथा पृष्ठ भाग पर खरोष्ठी में एजेज का नाम उत्कीर्ण है। इन मुद्राओं से प्रमाणित होता है कि एजिलिसेज से पहले एजेज प्रथम हुआ तथा एजिलिसेज के बाद एजेज द्वितीय राजा बना। एजेज द्वितीय के समय से पश्चिमोत्तर भारत से शकों की शक्ति का हृास प्रारम्भ हो गया।
मथुरा के शक क्षत्रप
जैन ग्रन्थ ‘कालकाचार्य कथानक’ के अनुसार, उज्जैन के शासक विक्रमादित्य द्वारा जैन धर्म ग्रहण करने व शकों को 57 ई.पू. में पराजित कर खदेड़े जाने के पश्चात शक मथुरा में आकर बस गए। विक्रमादित्य को ही ‘विक्रम संवत’ अथवा ‘मालव संवत’ का संस्थापक कहा जाता है।
गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण करने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध था तथा मध्यकाल में हेमू अंतिम शासक था जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। जैन ग्रन्थों के अनुसार, इस घटना के 135 वर्ष बाद शक संवत प्रारम्भ हुआ।
मथुरा सिंहशीर्ष अभिलेख से पता चलता है कि राजुल अथवा राजवुल मथुरा का प्रथम शासक था। उसके सिक्कों पर महाक्षत्रप की उपाधि खुदी हुई मिलती है। इसके सिक्के सिन्धु नदी घाटी से गया के दोआब तक पाए जाते हैं। राजवुल के पश्चात उसका पुत्र शोडास राजा बना। उसके सिक्कों पर क्षत्रप की उपाधि मिलती है। शोडास के उत्तराधिकारियों के विषय में जानकारी नहीं मिलती है।
पश्चिमी भारत के क्षहरात
कालान्तर में 'यू-ची' लोगों से भयभीत होकर पश्चिमी क्षत्रप दक्षिण की ओर बढ़ आए, जिससे पश्चिमी भारत में दो शक वंशों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं। 1. महाराष्ट्र का क्षहरात वंश। 2. कार्दमक (चष्टन) वंश अथवा सुराष्ट्र एवं मालवा के शक क्षत्रप।
1. महाराष्ट्र का क्षहरात वंश
क्षहरात वंश ने सम्पूर्ण महाराष्ट्र, लाट तथा सुराष्ट्र प्रदेश पर शासन किया। क्षहरात वंश का प्रथम शासक भूमक था। भूमक के सिक्के गुजरात, काठियावाड़ तथा मालवा क्षेत्र में मिलते हैं।
नहपान
भूमक का उत्तराधिकारी नहपान इस वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक था। नहपान का राज्य उत्तर में अजमेर से लेकर दक्षिण में उत्तरी महाराष्ट्र तक विस्तृत था। पेरिप्लस के अनुसार, उसकी राजधानी मिन्नगर (भड़ौच तथा उज्जैन के बीच स्थित) थी।
नासिक अभिलेख संख्या-10 के अनुसार, नहपान के दामाद उषावदात (ऋषभदत्त) ने ब्राह्मणों व बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया। नहपान का दामाद ऋषभदत्त दक्षिणी प्रान्त गोवर्धन (नासिक) तथा मामल्ल (पूना) का वायसराय था। सातवाहन नरेश गौतमीपुत्र शातकर्णि ने नहपान को पराजित कर मार डाला। नहपान की मृत्यु के साथ ही पश्चिमी भारत में क्षहरातों की शक्ति का अन्त हो गया।
कान्हेरी अभिलेख में कार्ले के बौद्ध संघ के लिए करजिक ग्राम के दान का उल्लेख है। इसी अभिलेख में वर्णासा व प्रभास के ब्राह्मणों को गांव दान देने का उल्लेख मिलता है। शक मुद्राओं पर शिव-पार्वती के चित्र मिलते हैं। प्राकृत जैन ग्रन्थ ‘कालकाचार्य कथानक’ के अनुसार, शक नरेश षाहि कहलाते थे।
2. कार्दमक (चष्टन) वंश
क्षहरातों के पश्चात सुराष्ट्र तथा मालवा में शकों के एक दूसरे कुल ने शासन किया जो ‘कार्दमक वंश’ के नाम प्रसिद्ध है। चष्टन वंश अथवा कार्दमक वंश का संस्थापक यशोमोतिक है।
चष्टन
यशोमोतिक का पुत्र चष्टन था, जो उज्जयिनी का प्रथम शक क्षत्रप था। उसने अपने अभिलेखों में शक संवत् का प्रयोग किया है। वृद्धावस्था में चष्टन ने अपने पुत्र जयदामन को क्षत्रप नियुक्त किया। हांलाकि चष्टन के जीवनकाल में ही जयदामन की मृत्यु हो गई तत्पश्चात उसने अपने पौत्र रूद्रदामन प्रथम को क्षत्रप नियुक्त किया। 'अन्धै' (कच्छखाड़ी) के अभिलेख से ज्ञात होता है कि 130 ई. में चष्टन अपने पौत्र रुद्रदामन के साथ मिलकर शासन कर रहा था।
रुद्रदामन
रूद्रदामन उज्जैन का सर्वाधिक प्रसिद्ध शक शासक था उसने 130 से 150 ई. तक सिन्ध, कोंकण, नर्मदा घाटी, मालवा, काठियावाड़ और गुजरात के एक बड़े भाग पर शासन किया।
महान विजेता होने के साथ-साथ रूद्रदामन एक प्रजापालक सम्राट भी था। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार, रूद्रदामन ने गिरनार स्थित प्रसिद्ध सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई। सुदर्शन झील का निर्माण मौर्यकाल में हुआ था। इस समय सौराष्ट्र का प्रान्तपाल (गवर्नर) सुविशाख था। रूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत में लिखित प्रथम अभिलेख था। इससे पूर्व के सभी अभिलेख प्राकृत में थे। इसने संस्कृत को राजकीय संरक्षण प्रदान किया।
जूनागढ़ अभिलेख के मुताबिक, रूद्रदामन ने सातवाहन शासक वशिष्ठी पुत्र पुलमावी को दो बार पराजित किया किन्तु निकट सम्बन्धी होने के कारण उसे छोड़ दिया। रूद्रदामन प्रथम नामक शक शासक संगीत (गान्धर्व) विद्या में प्रवीण था। रूद्रदामन नामक सिक्का भी शक शासक रूद्रदामन ने ही चलवाए थे। भारत में संस्कृत व तिथि लेख युक्त सिक्के शक शासक रूद्रदामन ने चलवाए। अभिलेखों में रूद्रदामन को ‘भ्रष्टराज प्रतिस्थापक’ कहा गया है।
कच्छ की खाड़ी स्थित अन्धौ अभिलेख के अनुसार, रूद्रदाम ने चष्टन के साथ सहशासक के रूप में शासन किया। रूद्रदामन ने चांदी की मुद्राएं चलवाई। रूद्रदामन वैदिक धर्मानुयायी था। शक-सातवाहन काल में सोने व चांदी के सिक्कों की विनियम दर 1 : 35 थी। शकों ने क्षत्रप प्रणाली ईरान से ग्रहण की।
रुद्रदामन के उत्तराधिकारी
रूद्रदामन की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र दामयसद गद्दी पर बैठा किन्तु वह थोड़े ही समय तक ही राज्य कर पाया। इसके बाद उसका पुत्र जीवदामन महाक्षत्रप बना। जीवदामन के पश्चात रूद्र सिंह प्रथम 191 ईस्वी में महाक्षत्रप बना और 196 ईस्वी तक राज्य करता रहा।
इसके बाद जीवनदामन पुन: महाक्षत्रप बना और 199 ई. तक राज्य किया। जीवनदामन के बाद रूद्रसिंह प्रथम का पुत्र रूद्रसेन प्रथम महाक्षत्रप बना। रूद्रसेन प्रथम ने 200 ईस्वी से 222 ईस्वी तक राज्य किया। तत्पश्चात संघदामन एवं दामसेन महाक्षत्रप हुए।
दामसेन के पश्चात उसका पुत्र यशोदामन महाक्षत्रप बना। 250 ईस्वी के पश्चात शक सत्ता का ह्रास होने लगा। पश्चिमी भारत का अंतिम शासक रूद्र सिंह तृतीय था। चौथी शताब्दी में गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय (375-415 ईस्वी) ने अंतिम शक शासक रूद्र सिंह तृतीय को पराजित कर शक शक्ति का उन्मूलन किया।
पह्लव वंश
पश्चिमोत्तर भारत में शकों के बाद पार्थियाई लोगों का आधिपत्य स्थापित हुआ। पार्थियाई लोगों का मूल निवास स्थान ईरान था। भारतीय स्रोतों में इन्हे पह्लव कहा गया है। पहलव शक्ति का वास्तविक संस्थापक मिथ्रेडेट्स प्रथम था ,जिसने 171 ई. पू. के लगभग तक राज्य किया। उसका साम्राज्य जेड्रोसिया, हेरात, सीस्तान में था।
पहलवों का प्रथम भारतीय शासक वोनोन्स था। उसका प्रभाव दक्षिणी अफगानिस्तान पर था। उसके सिक्कों पर महाराजाधिराज की उपाधि प्राप्त होती है, तथा उसके लेख यूनानी तथा खरोष्ठी लिपि में प्राप्त होते हैं।
पह्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक गोन्दोफर्निस (20- 41 ई.) था। खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण तख्तेबही अभिलेख में इसे ‘गुदुव्हर’ कहा गया है। फारसी में उसका नाम बिन्दफर्ण है जिसका अर्थ है — यश विजयी। गोन्दोफर्निस के शासनकाल में सेन्ट टॉमस ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करने हेतु भारत आया था। गोन्दोफर्निस की राजधानी तक्षशिला थी।
ईसाई अनुश्रुति में कहा जाता है कि गोंडोफर्निस ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, किन्तु यह प्रामाणिक तथ्य नहीं है। क्योंकि पार्थियन राजाओं के सिक्कों पर ध्रमिय (धार्मिक) की उपाधि मिलती है। इसका तात्पर्य है, भारतीय संस्कृति से प्रभावित पार्थियन राजाओं ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था। भारत में पहला पार्थियन शासक माउस था। इस साम्राज्य का अन्त कुषाणों द्वारा हुआ।
