उत्तर-पश्चिम से पश्चिमी विदेशियों के आक्रमण मार्योत्तर काल की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। इनमें सबसे पहले आक्रान्ता थे बैक्ट्रिया के ग्रीक (यूनानी) जिन्हें प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में ‘यवन’ कहा गया है। इस काल की जानकारी के ऐतिहासिक स्रोत हैं - जातक ग्रन्थ, दिव्यावदान, मिलिन्दपन्हों, गार्गी संहिता, मालविकाग्निमित्रम, आर्यमंजूश्रीमूलकल्प, ललितविस्तार इत्यादि। इसके अतिरिक्त पोलिबियस, स्ट्रेबो, जस्टिन, प्लूटार्क आदि क्लासिकल लेखकों के विवरण इण्डो- ग्रीक इतिहास के ज्ञान के लिए उपयोगी हैं।
यूनानी विजेता सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात उसके सेनापति सेल्यूकस ने मध्य एशिया के एक विस्तृत भाग पर यूनानी साम्राज्य स्थापित किया, जिसके अन्दर बैक्ट्रिया (उत्तरी अफगानिस्तान) तथा पार्थिया (ईरान) थे। यह एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक मार्ग पर स्थित था, जिससे इसका महत्व बढ़ गया था। ये दोनों प्रान्त सेल्युकस के पुत्र एण्टयोकस प्रथम के काल तक सेल्युकसी साम्राज्य के अंग बने रहे।
किन्तु सेल्यूकस के पौत्र एण्टयोकस द्वितीय के शासनकाल में 250 ईसा पूर्व के लगभग बैक्ट्रिया के गवर्नर डायोडोटस (Diodots) एवं पर्थिया के गवर्नर औरेक्सस ने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, जो इण्डो-ग्रीक राज्य कहलाया। डायोडोटस की मृत्यु के पश्चात उसके अल्पवयस्क पुत्र की हत्या कर यूथीडेमस नामक एक महत्वाकांक्षी सरदार ने गद्दी संभाली, फिर उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र डेमेट्रियस प्रथम शासक हुआ।
यूथीडेमस का साम्राज्य हिन्दूकुश तक ही सीमित था किन्तु भारतीय सीमा में सर्वप्रथम प्रवेश करने का श्रेय डेमेट्रियस प्रथम को है। इसने 183 ईसा पूर्व के लगभग पंजाब के कुछ भाग को जीतकर साकल (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनाया। डेमेट्रियस ने भारतीयों के राजा की उपाधि धारण की और यूनानी तथा खरोष्ठी दोनों लिपियों वाले सिक्के चलाए। डेमेट्रियस के उपरान्त यूक्रेटाइड्स ने भारत के कुछ हिस्सों को जीतकर तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया। स्ट्रेबो के अनुसार, यूक्रेटाइड्स झेलम नदी तक बढ़ आया था।
इण्डो-ग्रीक शासकों में डेमेट्रियस कुल का मीनाण्डर (160-120 ईसा पूर्व) सबसे प्रसिद्ध यवन शासक था। उसने भारत में यूनानी सत्ता को स्थायित्व प्रदान किया। उसके साम्राज्य में काबुल घाटी, भारत की पश्चिमोत्तर सीमा, पंजाब, सिन्ध, राजपूताना और आधुनिक उत्तर प्रदेश के कुछ भाग सम्मिलित थे। स्ट्रेबो लिखता है कि “मेनाण्डर ने सिकन्दर से भी अधिक प्रदेश जीते थे।” डेमेट्रियस का छोटा भाई मिनाण्डर का एक अभिलेख इलाहाबाद के निकट ‘रेह’ नामक स्थान पर मिलता है। मिनाण्डर का एक लेख शिवकोट (बजौर-घाटी) की धातुगर्भ मंजूषा के ऊपर उत्कीर्ण मिला है। शिवकोट लेख से पता चलता है कि वियकमित्र तथा विजयमित्र नामक उसके राज्यपाल स्वात घाटी (अब खैबर पख्तूनवा का क्षेत्र) में शासन करते थे।
मीनाण्डर बौद्ध साहित्य में मिलिन्द नाम से विख्यात है। सम्भवत: नागसेन ने इसे बौद्ध धर्म में दीक्षा दी थी। प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ मिलिन्दपन्हो में बौद्ध भिक्षु नागसेन एवं मीनाण्डर की वृहद वार्ता संकलित है। क्षेमेन्द्र कृत ‘अवदानकल्पलता’ से भी मिनाण्डर की जानकारी मिलती है। इन ग्रन्थों से उसके बौद्ध मतानुयायी होने की बात पुष्ट होती है। मिलिन्दपन्हो के अनुसार, “मेनाण्डर को इतिहास, पुराण, ज्योतिष, न्याय-वैशेषिक, दर्शन, तर्कशास्त्र, सांख्य, योग, संगीत, गणित, काव्य आदि विद्याओं का अच्छा ज्ञान था।” मीनाण्डर की राजधानी साकल (स्यालकोट) शिक्षा, धर्म, कला और व्यापार का प्रमुख केन्द्र थी।
स्ट्रेबो ने लिखा है कि “यूनानियों ने गंगा नदी और पाटलिपुत्र तक आक्रमण किए।” वहीं, गार्गी संहिता के युगपुराण अध्याय से ज्ञात होता है कि वीर यवनों ने अवध के साकेत, पंचाल, और मथुरा को जीतकर पाटलिपुत्र तक धावा मारा किन्तु घरेलू युद्धों के कारण वे तुरन्त लौट आए। भारतीय सिक्कों पर पहले केवल देवताओं के चित्र ही अंकित रहते थे, उनका नाम या तिथि उत्कीर्ण नहीं की जाती थी। इण्डो-ग्रीक शासकों से पूर्व भारतीय सिक्कों पर राजा का नाम व तिथि उत्कीर्ण नहीं जाती थी।
जब से उत्तर-पश्चिमी भाग पर बैक्ट्रिया के यूनानी राजाओं का शासन आरम्भ हुआ, तब से सिक्कों पर यूनानी राजाओं के नाम व तिथियां उत्कीर्ण की जाने लगी। सर्वप्रथम इण्डो ग्रीक शासकों ने ही लेख वाले सिक्के (मुद्रालेख) तथा सोने (स्वर्ण) सिक्के जारी किए। वास्तव में सिक्कों के इतिहास की दृष्टि से यह काल मौर्योत्तर काल अभूतपूर्व है।
मेनाण्डर की कांस्य मुद्राओं पर धर्म चक्र, हाथी के चित्र तथा धमिकस शब्द अंकित था जो काबुल से मथुरा और बुन्देलखण्ड तक पाए गए हैं। मीनाण्डर ने त्रिभाषिक लेख युक्त मुद्राएं चलाईं।
इस वंश के एन्टियालकीडस ने अपने दूत हेलियोडोरस को काशीपुत्र भागभद्र के दरबार में भेजा था। हेलियोडोरस स्वयं को भागवत कहता था, उसने वसुदेव के सम्मान में बेसनगर (विदिशा) में गरूड़ ध्वज की स्थापना की। ऐसे में बेसनगर से प्राप्त गरुड़ स्तम्भ लेख से यवनों की भारतीय धर्म के प्रति निष्ठा सूचित होती है।
मेनाण्डर के उत्तराधिकारी
मेनाण्डर की मृत्यु के समय उसका पुत्र स्ट्रेटो प्रथम अल्पवयस्क था, ऐसे में उसकी पत्नी ऐगथाक्लिया ने शासन सम्हाला। ऐगथाक्लिया ने अपने पुत्र के साथ मिलकर सिक्के जारी करवाए थे।
बाद में स्ट्रेटो प्रथम का पुत्र स्ट्रेटो द्वितीय शासक बना, किन्तु पिता-पुत्र का काल यूथीडेमस साम्राज्य के पतन का काल रहा। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक इनके राज्यों पर शकों ने अधिकार कर लिया। इस प्रकार यूथीडेमस कुल का अंत हो गया।
यूक्रेटाइड्स वंश
यूक्रेटाइड्स ने बैक्ट्रिया पर अधिकार करने के पश्चात भारत के कुछ भूभागों को जीतकर तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया। यूक्रेटाइड्स के सिक्के बैक्ट्रिया, सीस्तान, काबुल की घाटी, कपिश और गंधार में मिले हैं। सम्भवत: झेलम एवं पश्चिमी पंजाब को भी अपने राज्य में मिला लिया था किन्तु वह इससे आगे नहीं बढ़ सका।
यूक्रेटाइड्स कुल के दो राजाओं— एन्तियालकीडस एवं हर्मियस के नाम मिलते हैं। तक्षशिला के शासक एन्तियालकीडस ने शुंग नरेश भागभद्र के दरबार में हेलियोडोरस नामक राजदूत भेजा था। उसका उल्लेख बेसनगर (विदिशा) के गरूड़ स्तम्भ लेख में है।
हर्मियस यूक्रेटाइड्स वंश का अंतिम इण्डो-ग्रीक शासक था। उसका राज्य काबुल घाटी तक सीमित था। उसके कुछ सिक्कों पर कुषाण वंश के प्रथम शासक कुजुल कडफिसेस का नाम उत्कीर्ण है, इस पता चलता है कि बैक्ट्रिया में कुजुल कडफिसेस उसकी आधीनता स्वीकार करता था। हर्मियस ने 50 ईसा पूर्व से 30 ईसा पूर्व तक शासन किया। इसी के साथ पश्चिमोत्तर भारत से यवनों का तकरीबन 200 वर्षों का शासन समाप्त हुआ।
यवन आधिपत्य का भारत पर प्रभाव
इण्डो-ग्रीक शासकों का पश्चिमोत्तर भारत पर शासन सिकन्दर के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ। भारतीयों ने यूनानियों से कला, विज्ञान, मुद्रा, ज्योतिष आदि बहुत कुछ सीखा।
गार्गी संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि “ज्योतिष के क्षेत्र में भारत यूनान का ऋणी है।” फलित ज्योतिष का ज्ञान भारतीयों को पहले से था किन्तु नक्षत्रों को देखकर भविष्य बताने की कला भारतीयों ने यूनानियों से ही सीखी। भारतीयों ने यूनानियों से ही कैलेण्डर ज्ञान प्राप्त किया, सप्ताह का सात दिनों में विभाजन एवं विभिन्न ग्रहों के नाम भी उनसे ही लिए।
सिक्के बनाने की कला में भारतीयों ने यूनानियों से बहुत कुछ सीखा। भारतीय पहले आहत मुद्राएं (Punch marked coins) ही काम में लेते थे, सिक्कों पर कोई मुद्रालेख नहीं होता था। किन्तु यवनों नो यहां जो सिक्के जारी किए उन पर एक ओर राजाओं की आकृति और दूसरी ओर देवता की मूर्ति अथवा कोई अन्य चिह्न बनाए गए।
इसके अतिरिक्त ग्रीक आक्रमण ने भारतीय नाटकों तथा मूर्तिकला पर विशेष प्रभाव डाला, बतौर उदाहरण - गान्धार एवं मथुरा की बुद्ध एवं बोधिसत्वों की मूर्तियों पर यूनानी और रोमन कला का स्पष्ट प्रभाव नजर आता है।
संस्कृत नाटकों में पर्दे के लिए ‘यवनिका’ शब्द आया है जो यूनानी भाषा से लिया गया प्रतीत होता है। संस्कृत शब्दकोष में स्याही, कलम, फलक आदि के लिए जो शब्द मिलते हैं, वे यूनानी भाषा से लिए गए प्रतीत होते हैं।
महाकाव्य महाभारत में यवनों को ‘सर्वज्ञ यवन’ कहा गया है तथा यह भी कहा गया है कि “यवन मलेच्छ हैं किन्तु अपने ज्ञान के कारण पूजनीय हैं।” व्यूह रचना के विशेषज्ञ एवं युद्ध मशीनों की डिजाइन बनाने वाले यवन इंजीनियरों का पूरे भारत में सम्मान था।
इण्डो-ग्रीक आक्रमण से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— सेल्युकस को किस भारतीय राजा ने पराजित किया था - चन्द्रगुप्त मौर्य।
— चन्द्रगुप्त मौर्य ने भारत के किन प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था - पश्चिमोत्तर प्रदेशों तथा अफगानिस्तान।
— भारतीय-यवन राजाओं को कहा जाता है – हिन्द-यवन, इण्डो-ग्रीक, बैक्ट्रियन-ग्रीक आदि।
— सेल्युकस साम्राज्य के दो प्रान्त थे - बैक्ट्रिया (उत्तरी अफगानिस्तान) तथा पार्थिया (ईरान)।
— बैक्ट्रिया के स्वतंत्र यूनानी साम्राज्य का संस्थापक था - डायोडोटस।
— इण्डो-ग्रीक शासकों में सबसे प्रसिद्ध राजा का नाम - मेनाण्डर।
— डेमेट्रियस का छोटा भाई था - मेनाण्डर।
— कौन सा यवन शासक बौद्ध धर्म का संरक्षक था - मेनाण्डर।
— किस यवन शासक ने सिकन्दर से भी ज्यादा भारतीय प्रदेश जीते थे - मेनाण्डर।
— यूक्रेटाइड्स वंश का अंतिम इण्डो-ग्रीक शासक था- हर्मियस।
— भारतीय संस्कृति पर सर्वाधिक यूनानी प्रभाव - ज्योतिष एवं मूर्तिकला।
