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thousands of Shivlingas in the Shalmala River sirsi, karnataka

कौन था वह शिवभक्त जिसने शालमाला नदी में स्थापित करवाए हजारों शिवलिंग?

कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में सिरसी तहसील से तकरीबन 14 किलोमीटर की दूरी पर पवित्र शालमाला नदी स्थित है। हैरानी की बात है कि शालमाला नदी की जलधारा में पत्थरों पर तकरीबन एक हजार से अधिक सहस्रलिंग (शि​वलिंग और भगवान शिव के वाहन नंदी) की आकृतियां उकेरी गई हैं।

शालमाला नदी की पवित्र जलधारा साल के 365 दिन 1,000 या उससे भी अधिक शिवलिंग और नंदी महाराज के जलाभिषेक करती रहती है। यह सच है कि नदी का जलस्तर कम होने की पश्चात ही शिवभक्त श्रद्धालु स​हस्रलिंग के दर्शन-पूजन कर पाते हैं।

अब आपका सोचना बिल्कुल लाजिमी है कि आखिर में कौन था वह शिवभक्त जिसने शालमाला नदी की जलधारा में सहस्रलिंग स्थापित करवाए और आखिर में क्यों? इससे जुड़ा सच जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।

कहां है पवित्र शालमाला नदी

कर्नाटक की शालमाला नदी अपनी जलधारा में स्थापित 'सहस्रलिंग' (तकरीबन 1,000 या उससे भी अधिक शिवलिंग और भगवान शिव के वाहन नंदी) के लिए विख्यात है। शालमाला नदी की पवित्र जलधारा में स्थापित हजारों शिवलिंग उसे अनूठा धार्मिक स्थल बनाते हैं।

जलधारा के मध्य स्थापित होने के कारण यह पवित्र नदी स्वयं ही सहस्रलिंग का प्राकृतिक जलाभिषेक करती है। कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में सिरसी तहसील से तकरीबन 14 किलोमीटर की दूरी पर पवित्र शालमाला नदी स्थित है। धारवाड़ से निकलने वाली शालमाला नदी सोंडा गांव के पास निर्मल जंगल से होकर शांत रूप से बहती है।

नदी का जलस्तर कम होते ही जलधारा के मध्य से हजारों शिवलिंग दिखाई देते हैं, जो अपने आप में दुर्लभ दृश्य प्रदान करते हैं। श्रावण मास के अतिरिक्त महाशिवरात्रि के दिन सहस्रलिंग के दर्शन करने वाले श्रद्धालु भक्तों का जैनसैलाब देखने को मिलता है।

वर्षा ऋतु के दौरान ज्यादातर शिवलिंग शालमाला नदी के जल में डूब जाते हैं। चूंकि नवंबर से मई महीने के बीच शालमाला नदी का जलस्तर कम हो जाता है इसलिए सहस्रलिंग के दर्शन हेतु यह अवधि श्रद्धालु भक्तों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

नदी की जलधारा में स्थापित सहस्रलिंग का रहस्य

पवित्र शालमाला नदी के तल की चट्टानें गहरे भूरे रंग की कठोर ग्रेनाइट पत्थरों जैसी दिखती हैं जिन पर तकरीबन एक हजार से अधिक शिवलिंगों के साथ-साथ नंदी महाराज, भगवान गणेश  तथा सर्प आदि की आकृतियां उत्कीर्ण की गई हैं। शालमाला नदी की एक शिला पर नाग देवी की मूर्ति भी उत्कीर्ण की गई है। जहिर है,  नंदी महाराज और नाग देवता के बिना भगवान शिव का चित्रण कैसे सम्भव हो सकता है। नदी में स्थापित हजार से ज्यादा शिविलंगों के कारण इस स्थान का नाम सहस्रलिंग भी है।

शालमाला नदी की जलधारा के मध्य स्थापित सहस्रलिंग के दर्शन बरबस की मन मोह लेते हैं। शालमाला नदी की पवित्र जलधारा स्वयं ही सहस्रलिंग का प्राकृतिक जलाभिषेक करती है। नवम्बर से मई महीने के मध्य जब नदी का जलस्तर कम होता है तब ज्यादातर शिवलिंग स्वत: ही दिखाई देने लगते हैं।

परम शिवभक्त राजा सदाशिवराय

विजयनगर साम्राज्य के राजा सदाशिवराय परम शिवभक्त थे। मान्यता है कि राजा सदाशिवराय ने साल 1542 से 1570 के मध्य शालमाला नदी की जलधारा के मध्य तकरीबन एक हजार शिवलिंग स्थापित करवाए थे।

कुछ विद्वानों का कहना है कि महान शिवभक्त राजा सदाशिवराय अपने ईष्टदेव के लिए कुछ अद्भुत करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पवित्र शालमाला नदी के मध्य में सहस्रलिंग स्थापित करवाए। यह भी कहते हैं कि राजा सदाशिवराय ने साल के 365 दिन सहस्रलिंगों का जलाभिषेक होते रहने के लिए शालमाला नदी की जलधारा में इन्हें स्थापित करवाया।

जबकि शालमाला नदी तट पर लगे एक छोटे से बोर्ड के अनुसार, सोंडा या स्वादी आकाशप्पा नायक नि:सन्तान था, ऐसे में एक पुजारी ने उसे संतान प्राप्ति के लिए 1008 शिवलिंग बनवाने की सलाह दी। फिर क्या था, स्वादी आकाशप्पा नायक ने शालमाला नदी की प्राकृतिक जलधारा के मध्य स्थित शिलाओं पर तकरीबन एक हजार से अधिक शिवलिंग तथा उनके समक्ष नंदी महाराज, भगवान गणेश और नाग देवता आदि की आकृतियां उत्कीर्ण करवाई।

कहते हैं, इस महान कार्य के सिद्ध होते ही सोंडा या स्वादी आकाशप्पा नायक को सन्तान की प्राप्ति हुई, तभी से ये सहस्रलिंग मनोकामनापूर्ति के पूरक माने जाते हैं। श्रद्धालु शिवभक्त आज भी इच्छापूर्ति शिवलिंग के रूप में ही इनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कहते हैं, कालान्तर में कई कारीगरों और भक्तों ने इस जगह अन्य शिवलिंग उत्कीर्ण किए तत्पश्चात यह जगह शिवभक्ति की अनूठी जगह बन गई।

सदाशिवराय के शासनकाल में ही 23-25 जनवरी, 1565 ई. को हुए तालीकोटा युद्ध के पश्चात विजयनगर का वैभव पूरी तरह समाप्त हो गया। तालीकोटा युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी आर.सेवेल अपनी किताब ए फोरगोटेन एम्पायर में लिखता है कि संसार के इतिहास में इतने वैभवशाली नगर का इस प्रकार अचानक सर्वनाश नहीं किया गया जैसा कि विजयनगर का।

सहस्रलिंग की वर्तमान स्थिति

वर्तमान में शालमाला नदी की जलधारा के मध्य पत्थरों पर तकरीबन 100-150 शिवलिंग ही बचे हैं। कुछ शिवलिंग प्राकृतिक जल आपदा के दौरान तेज बहाव के कारण नष्ट हो गए, जबकि शेष नदी की गहराई में दब गए अथवा बह गए।

वहीं, स्थानीय लोग कुछ शिवलिंगों को अपने साथ उठा ले गए, हांलाकि शालमाला नदी के आसपास अभी भी कई शिवलिंगों के दर्शन आसानी से होते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या ये सभी शिवलिंग केवल मनोकामना पूर्ति के उद्देश्य से तराशे गए थे अथवा शिवभक्तों द्वारा भगवान का आभार व्यक्त करने का एक नायाब तरीका मात्र था।

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