मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स की पृष्ठभूमि - 1905 में बंगाल विभाजन ने जनता के अन्दर तीव्र राष्ट्रवादी भावना को जन्म दिया, परिणामस्वरूप अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध व्यापक स्तर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। इस आन्दोलन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी पुरजोर समर्थन किया।
वहीं दूसरी तरफ, अक्टूबर 1906 में आगा खान की अगुवाई में मुस्लिम अभिजात वर्ग के एक समूह ने शिमला में वायसराय (गवर्नर जनरल) लॉर्ड मिंटो से मुलाकात की और मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल व प्रतिनिधित्व की मांग की। इसके अलावा प्रख्यात उदारवादी कांग्रेसी नेता गोपालकृष्ण गोखले ने भी भारत सचिव जॉन मार्ले से मिलने एवं अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों की भांति भारत में भी स्वशासन प्रणाली की मांग हेतु इंग्लैंड की यात्रा सम्पन्न की।
राजनीतिक अशांति - लार्ड कर्जन के बाद लार्ड मिन्टो ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल बने, इसी दौरान इंग्लैण्ड में जॉन मार्ले ने भारत सचिव का पद सम्भाला। यह वह समय था जब समूचा भारत राजनीतिक अशांति की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रहा था।
लार्ड मिन्टो ने इस अशांति के बारे में स्वयं लिखा था कि “ऊपर से शांत दिखने वाली सतह के नीचे भारी राजनीतिक अशांति का गुबार छिपा था और उसमें से बहुत कुछ नितांत न्यायोचित था।”
लार्ड मिन्टो ने भारत सचिव मार्ले की अनुमति से एक समिति की नियुक्ति की जिसे विधान परिषदों में अधिक प्रतिनिधित्व, बजट पर वाद-विवाद के लिए अधिक समय तथा बजट प्रस्तुत करने और उनमें संशोधन करने की प्रक्रिया आदि विषयों पर विचार करने को कहा।
समिति की सहायता से गवर्नर जनरल मिन्टो तथा भारत सचिव लार्ड मार्ले की यह योजना तकरीबन तीन वर्ष तक गर्भ में रहने के पश्चात मार्ले-मिन्टो सुधार के रूप में साल 1909 में सामने आई।
मार्ले-मिंटो रिफॉर्म्स का असली उद्देश्य
भारतीय परिषद अधिनियम-1909 को मार्ले-मिंटो सुधार भी कहा जाता है। इस अधिनियम का वास्तविक उद्देश्य उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना नहीं अपितु उदारवादी नेताओं को खुश करना और राष्ट्रवाद का दमन करना था।
मार्ले ने स्वयं कहा कि “यदि इन सुधारों से किसी तरह भी भारत में संसदीय व्यवस्था स्थापित होने का डर हो तो कम से कम मैं उससे कोई नाता रखने को तैयार नहीं हूं।” मार्ले-मिंटो रिफॉर्म्स के तहत मुसलमानों को पृथक साम्प्रदायिक निर्वाचन दिया गया। दरअसल इस अधिनियम का लक्ष्य भारत में एक समुदाय के विरूद्ध दूसरे को लड़ाना था।
लार्ड मार्ले ने वायसराय मिन्टो को एक पत्र में पृथक निर्वाचन के बारे में लिखा कि “हम नागदन्त (dragon teeth) बो रहे हैं जिसकी फसल बड़ी कड़वी होगी।”
मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स , 1909 ई.
मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स की संकल्पना और निर्माण में उदारवादी नेता गोपालकृष्ण गोखले के सलाह मशविरे को भी स्थान दिया गया। 17 दिसम्बर 1908 को भारत सचिव लार्ड मार्ले ने हाउस आफ लार्डस में सुधार प्रस्तावों की व्याख्या की। तत्पश्चात 7 फरवरी 1909 को भारतीय परिषद अधिनियम (मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स) को सदन में रखा गया। 25 मई 1909 को यह विधेयक पास हुआ। इसके बाद 15 नवम्बर 1909 को राजकीय अनुमोदन के बाद भारतीय परिषद अधिनियम-1909 के नाम से लागू हुआ।
भारतीय परिषद अधिनियम-1909 की धाराएं
इस अधिनियम के द्वारा विधायिका का पुनर्गठन किया गया। इसमें केन्द्रीय और प्रान्तीय विधानसभाओं में तीन प्रकार के सदस्य रखे गए और तीन ही प्रकार की विचित्र निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई। सदस्यों और विधायिका के अधिकारों में बढ़ोतरी की गई।
1. केन्द्रीय विधानसभा
मार्ले मिन्टो रिफॉर्म्स 1909 के द्वारा वायसराय की व्यवस्थापिका सभा (इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल) में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 69 (37 सरकारी और 32 गैर सरकारी) कर दी गई। सरकारी सदस्यों में 9 पदेन तथा 28 वायसराय द्वारा मनोनीत सदस्य थे।
गैर सरकारी सदस्यों में 05 का मनोनयन वायसराय स्वयं करता था तथा शेष 27 सदस्यों का निर्वाचन होता था। निर्वाचित सदस्य विशेष वर्गों तथा हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। 09 सदस्यों का चुनाव प्रान्तीय विधानमंडलों के गैर सरकारी सदस्यों द्वारा किया जाता था जबकि शेष 18 सदस्यों को जमींदार एवं व्यापारिक संघ चुनते थे।
2. प्रान्तीय विधानसभाएं
प्रान्तीय विधानसभाओं की सदस्य संख्या में भी बढ़ोतरी की गई। अब बंगाल, बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई) तथा संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) की विधानसभाओं में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या अधिकतम 50 रखने की व्यवस्था की गई। जबकि अन्य प्रान्तों में सदस्यों की अधिकतम संख्या 30 निश्चित की गई।
प्रान्तीय विधानसभाओं में गैर सरकारी सदस्यों का बहुमत था। इनमें कुछ निर्वाचित, कुछ सरकार द्वारा मनोनीत तथा कुछ गैर सरकारी मनोनीत सदस्य होते थे। निर्वाचित सदस्य नगरपालिकाओं, जिलामण्डलों, विश्वविद्यालयों, जमींदारों एवं व्यापारिक संघों से होते थे।
3. साम्प्रदायिक निर्वाचन की व्यवस्था
मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स 1909 की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गई। उन्हें दोहरे मतदान का अधिकार दिया गया। वे सामान्य निर्वाचन में भी भाग ले सकते थे तथा पृथक रूप से भी मतदान कर सकते थे।
केन्द्रीय एवं प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं में उनके लिए सीटें सुरक्षित कर दी गईं। केन्द्रीय विधानमण्डल में मुसलमानों को 5 सुरक्षित स्थान दिए गए। इसी प्रकार की व्यवस्था प्रान्तों में भी की गई।
4. निर्वाचन पद्धति
विधानमण्डल के निर्वाचनों के लिए तीन प्रकार के निर्वाचन समूह की प्रणाली अपनाई गई। पहला समूह मतदाताओं का था। ये व्यक्ति प्रान्तीय विधानसभाओं, नगरपालिकाओं तथा जिलामंडलों के गैर सरकारी सदस्य थे जो क्रमश: केन्द्रीय एवं प्रान्तीय विधानसभा के सदस्यों को चुनते थे। दूसरा वर्ग मुसलमान मतदाताओं का था जो सिर्फ मुसलमान उम्मीदवारों को ही मत देते थे। तीसरा वर्ग विशिष्ट वर्गों का ही प्रतिनिधित्व करता था, जैसे व्यापारिक संघ, भूस्वामी जमींदार या विश्वविद्यालय।
5. विधानसभाओं के कार्यों का विस्तार
भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में विधानसभाओं के कार्यक्षेत्र में भी विस्तार किया गया। बजट पर बहस करने के लिए विस्तृत नियम बनाए गए। सदस्यों को सुझाव देने, प्रस्ताव प्रस्तुत करने तथा पूरक प्रश्न पूछने का भी अधिकार मिला।
अब सार्वजनिक हित वाले मामलों पर भी बहस हो सकती थी, किन्तु किसी विशेष सभा में उसके अधिकार से बाहर के मामलों पर या विदेशी सरकार से सम्बन्धित या देशी राज्यों से सरकार के सम्बन्धों पर या किसी अदालती मामलों पर ही चर्चा की जा सकती थी।
6. मताधिकार में विभिन्नता
मताधिकार का अधिकार सभी व्यक्तियों को समान रूप से नहीं दिया गया। मत देने के लिए सम्पत्ति की योग्यता बहुत ऊंची थी एवं प्रत्येक स्थान पर अलग-अलग व्यवस्था की गई थी।
मुसलमानों की अपेक्षा गैर मुसलमानों के लिए मताधिकार की योग्यता काफी बढ़ा-चढ़ाकर रखी गई। बतौर उदाहरण- एक मुस्लिम स्नातक पांच वर्षों में ही मताधिकार का अधिकारी बन जाता था, परन्तु गैर मुस्लिम को ज्यादा समय के पश्चात मत देने का अधिकार मिलता था।
7. इंडिया कौंसिल एवं केन्द्रीय कौंसिल में भारतीयों का प्रवेश
1909 के अधिनियम के तहत भारतीयों को इंडिया कौंसिल एवं वायसराय की केन्द्रीय कौंसिल में प्रवेश पाने का अधिकार प्राप्त हुआ। यद्यपि नौकरशाही ने इसका विरोध किया, परन्तु लॉर्ड मिन्टो के प्रयास से उन्हें यह सुविधा मिल गई। फलस्वरूप श्री एस.पी. सिन्हा (सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा) वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य बनाए गए।
भारतीय परिषद अधिनियम 1909 का महत्व
— ब्रिटिश शासन की कार्यकारी परिषद में भारतीयों की भागीदारी की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम।
— भारत में भविष्य के लिए एक प्रकार से संसदीय प्रणाली की शुरूआत हुई।
— इस एक्ट ने भविष्य के संवैधानिक सुधारों की नींव रखीं जैसे — भारतीय परिषद अधिनियम (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) 1919, भारत सरकार अधिनियम 1935 आदि।
— मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स ने भारतीयों में राष्ट्रवादी भावना की एक नई लहर को जन्म दिया। यह अलग बात है कि मुसलमानों के पृथक निर्वाचन प्रणाली से देश में साम्प्रदायिकता की भी शुरूआत हो गई।
अधिनियम की आलोचना
यद्यपि भारतीय परिषद अधिनियम 1909 नरमपंथियों को संतुष्ट करने के लिए ही बनाया गया था, परन्तु वास्तव में इसका उद्देश्य राष्ट्रवादियों को उलझन में डालना, राष्ट्रवादी जगत में फूट डालना तथा भारतीयों में फूट डालना था। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था तथा विशेष सुविधाएं देकर ब्रिटिश सरकार ने भारत की एकता को खंडित कर दिया।
इसके बाद से ही मुसलमान क्रमश: राष्ट्रीय धारा से अलग होते गए और अपने हितों की रक्षा के लिए लीग ने सरकार से सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया। आगे चलकर मुसलमानों की देखा देखी अन्य जातियों (जैसे हरिजन, एंग्लो इंडियन आदि) ने भी पृथक निर्वाचन की मांग प्रारम्भ कर दी, जो उन्हें 1935 में प्राप्त हो गई।
भारतीयों की महत्वाकांक्षाओं को इस अधिनियम से गहरी ठेस लगी। वे उत्तरदायी सरकार की मांग कर रहे थे, किन्तु इसके बदले उन्हें हितैषी निरंकुशवाद ही प्राप्त हो सका। सुधार के बावजूद व्यवस्थापिका सभाओं में कोई वास्तविक अधिकार नहीं मिल सका।
निर्वाचन प्रणाली भी अस्पष्ट एवं दोषपूर्ण थी। 1909 के सुधारों के संबंध में महात्मा गांधी ने कहा “मार्ले-मिंटो सुधारों ने हमारा सर्वनाश कर दिया”। इस अधिनियम को समर्थन देने के चलते नरमपंथी राष्ट्रवादी जनता का विश्वास और समर्थन खो बैठे। उग्रवादी राष्ट्रवादी तत्व अब ज्यादा प्रबल हो उठे। परिणास्वरूप यह अधिनियम अस्थाई सिद्ध हुआ।
मार्ले-मिंटो सुधारों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण प्रश्न
1. मार्ले-मिंटो सुधारों का मुख्य उद्देश्य सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को लागू कर राष्ट्रीय एकता में फूट डालना था, परीक्षण कीजिये?
2. भारतीय परिषद अधिनियम 1909 पारित होने के समय ब्रिटिश भारत का गवर्नर जनरल कौन था?
3. भारतीय परिषद अधिनियम 1909 के लागू करते समय इंग्लैण्ड में भारत सचिव का पद किसने सम्भाला?
4. मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स की मुख्य विशेषताएं लिखिए?
5. मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स के बारे में आप क्या जानते हैं?
6. भारतीय परिषद अधिनियम 1909 को मोर्ले-मिंटो रिफॉर्म्स क्यों कहा जाता है?
7. मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स 1909 के कारण भारत विभाजन की शुरूआत कैसे हुई?
