पंजाब के एक महान बुद्धिजीवी और प्रचण्ड क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने एक नवम्बर 1913 ई. को संयुक्त राज्य अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को में ‘गदर दल’ ( Ghadar Party) का गठन किया। रामचन्द्र तथा बरकतुल्ला ने पार्टी गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दल ने ‘गदर’ नामक एक साप्ताहिक पत्रिका भी शुरू की जो साल 1857 के गदर की स्मृति में स्थापित की गई थी।
साप्ताहिक पत्रिका गदर ने अपने प्रथम अंक की शुरूआत कुछ इस प्रकार किया था — “हमारा नाम क्या है? गदर अथवा विद्रोह। हमारा काम क्या है? विद्रोह। यह विद्रोह कहां होगा? भारत में।” गदर दल ने यह तथ्य सामने लाने का प्रयत्न किया कि विदेश में भारतीयों का सम्मान इसलिए नहीं होता क्योंकि हम परतंत्र हैं। अंग्रेजों के कहने पर अमेरिकी प्रशासन ने लाला हरदयाल के विरूद्ध मुकदमा दर्ज कर उन्हें अमेरिका से भागने पर बाध्य कर दिया।
प्रथम विश्वयुद्ध के शुरू होते ही लाला हरदयाल और उनके क्रांतिकारी साथी जर्मनी चले गए। उन्होंने बर्लिन में ‘भारतीय स्वतंत्रता समिति’ का गठन किया। इस समिति का उद्देश्य यह था कि विदेश में रहने वाले भारतीयों को अपने देश की स्वतंत्रता के लिए सभी प्रकार के प्रयत्न करने चाहिए जैसे — भारत में स्वयंसेवकों को भेजकर देशी सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार करना, भारतीय क्रांतिकारियों के लिए विस्फोटक पदार्थ भेजना और सम्भव हो तो भारत पर सैनिक आक्रमण करना इत्यादि।
पंजाब में कामागाटामारू काण्ड ने एक विस्फोटक स्थिति उत्पन्न कर दी। बाबा गुरूदत्त सिंह ने एक जापानी जहाज कामागाटामारू को भाड़े पर लेकर 351 पंजाबी सिक्खों तथा 21 मुसलमानों को कनाडा के बैंकूवर नगर ले जाने का प्रयत्न किया। उद्देश्य यह था कि ये सभी लोग कनाडा के बैंकूवर में एक स्वतंत्र जीवन का रसास्वादन करके भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा ले सकेंगे। हांलाकि कनाडा सरकार ने इन यात्रियों को बन्दरगाह में उतरने की अनुमति नहीं दी और कामागाटामारू जहाज 27 दिसम्बर 1914 ई. को कलकत्ता बन्दरगाह लौट आया।
सभी यात्रियों को यह विश्वास था कि अंग्रेजी सरकार के दबाव के कारण ही कनाडा सरकार ने उन्हें लौटाया है। जब बाबा गुरूदत्त को गिरफ्तार करने का प्रयत्न किया गया तो वह भाग गए। शेष यात्रियों को एक गाड़ी में बैठाकर पंजाब लाया गया। इन असन्तुष्ट यात्रियों तथा अन्य लोगों ने लुधियाना, जालन्धर तथा अमृतसर में राजनीतिक प्रकृति के कई डाके डाले।
प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत ने भी गदर आन्दोलन को हवा दी। गदर पार्टी ने हिन्दुस्तान जाकर भारतीय सैनिकों की मदद करने का निर्णय लिया। लिहाजा गदर पार्टी ने ‘ऐलान-ए-जंग’ की घोषणा कर दी और परचे बांटे।
मोहम्मद बरकतुल्ला, रामचन्द्र और भगवान सिंह ने प्रवासियों के बीच जाकर सभाएं की और हिन्दुस्तान जाकर सशस्त्र विद्रोह करने का अनुरोध किया। कुछ उग्रपंथी नेता जैसे करतार सिंह सराभा और व रघुवीर दयाल गुप्ता पहले ही भारत के लिए रवाना हो चुके थे। करतार सिंह सराभा को बाद में गदर षडयंत्र में शामिल होने के आरोप में फांसी दे दी गई।
हांलाकि ब्रिटिश हुकूमत गदर आन्दोलनकारियों को कुचलने के लिए कमर कस चुकी थी। अनुमानत: 8000 प्रवासी भारतीय स्वदेश लौटे थे, जिनमें 5000 को अपने घर जाने दिया गया। जबकि 1500 लोगों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। 189 लोगों को नजरबन्द किया गया और 704 व्यक्तियों को अपने ही गांव में रहने का आदेश दिया गया।
बावजूद इसके श्रीलंका और दक्षिण भारत के रास्ते से तमाम लोग प्रशासन को चकमा देकर पंजाब पहुंच गए। लेकिन चौंकाने वाली बात है कि पंजाबी लोग गदर क्रांतिकारियों का साथ देने को तैयार नहीं थे। अंग्रेजी हुकूमत के प्रबल समर्थक ‘खालसा दीवान’ ने इन क्रांतिकारियों को पतित व अपराधी सिख घोषित किया तथा इनके दमन में अंग्रेजी हुकूमत का पूरा साथ दिया।
गदर आन्दोलनकारियों ने नवम्बर 1914 में सैनिक विद्रोह के तमाम प्रयास किए किन्तु संगठित नेतृत्व व केन्द्रीय नियंत्रण के अभाव में असफल रहे। इसके लिए अब बंगाली क्रांतिकारियों से सम्पर्क किया जाने लगा। लिहाजा शचीन्द्र सान्याल और विष्णु पिंगले के प्रयासों से कुछ सफलता मिली। वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के लिए क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने नेतृत्व सम्भालना स्वीकार कर लिया और जनवरी 1915 में पंजाब पहुंच गए।
रास बिहारी बोस ने एक संगठन तैयार किया और अपने लोगों को देश की अनेक सैनिक छावनियों में सम्पर्क करने के लिए भेजा गया। 11 फरवरी को रिपोर्ट देने कहा गया, रिपोर्ट काफी उत्साहजनक थी। इसी आधार पर सैनिक विद्रोह के लिए 21 फरवरी की तारीख सुनिश्चित की गई जिसे बदलकर 19 फरवरी कर दी गई। इससे पूर्व ही सीआईडी (C.I.D) को सबकुछ पता चल गया।
ब्रिटिश सरकार ने इन आन्दोलनकारियों को धर दबोचने की पूरी तैयारी कर ली, लिहाजा ज्यादातर नेता गिरफ्तार कर लिए गए, रास बिहारी बोस किसी तरह बच निकलने में सफल हो गए। इस प्रकार गदर आन्दोलन व्यवहारिक रूप से समाप्त हो गया। पंजाब और मंडालय में चले षड्यंत्र के मुकदमों में 42 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई और तकरीबन 200 क्रांतिकारियों को लम्बी सजा। इस तरह से पंजाब के समूचे राष्ट्रीय नेतृत्व का गला घोंट दिया गया।
कामागाटामारू प्रकरण
कामागाटामारू प्रकरण कनाडा में भारतीयों के प्रवेश से सम्बन्धित विवाद था। कनाडा सरकार ने ऐसे भारतीयों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया जो सीधे भारत से नहीं आते थे। दरअसल उन दिनों भारत से सीधे कनाडा जाने का कोई मार्ग नहीं था।
नवम्बर, 1913 ई. में कनाडा के सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने ऐसे 35 भारतीयों को प्रवेश की अनुमति दे दी जो सीधे भारत से कनाडा नहीं आए थे। इस फैसले से उत्साहित होकर सिंगापुर के एक भारतीय मूल के व्यापारी बाबा गुरूदत्त सिंह ने कामागाटमारू नामक जापानी जहाज को किराए पर लेकर दक्षिण पूर्व एशिया के करीब 376 यात्रियों (351 पंजाबी सिक्ख तथा 21 मुसलमान) को बैठाकर वैंकूवर ले जाने का फैसला किया।
ऐसे में 376 यात्रियों से लदा कामागाटामारू जहाज बैंकूवर की तरफ चल पड़ा। याकोहामा (जापान) में गदर क्रांतिकारी इन यात्रियों से मिले, भाषण दिए और परचे बांटे। यहां तक कि पंजाब प्रेस ने चेतावनी दी कि “यदि इन भारतीयों को कनाडा में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली तो इसके गम्भीर परिणाम होंगे।”
इसी बीच कनाडा सरकार ने कानून की उन खामियों को दूर कर लिया था, जिनकी वजह से नवम्बर, 1913 ई. में सुप्रीम कोर्ट ने 35 भारतीयों को प्रवेश की अनुमति प्रदान की थी। अत: कामागाटामारू जहाज के वैंकूवर तट पर पहुंचने से पहले ही पुलिस ने यात्रियों को घेर लिया और जहाज से नीचे नहीं उतरने दिया।
यात्रियों के अधिकार के लिए संघर्ष हेतु वैंकूवर में बलवन्त सिंह, सोहनलाल पाठक तथा हुसैन रहीम की अध्यक्षता में ‘शोर कमेटी’ (तटीय समिति) का गठन हुआ। इन लोगों ने चन्दा एकत्र कर यात्रियों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने की योजना बनाई। वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका में रह रहे भारतीयों भगवान सिंह, बरकतुल्ला, रामचन्द्र तथा सोहन सिंह भकना ने भी यात्रियों के समर्थन में आन्दोलन चलाया एवं भारतीयों से विद्रोह के लिए तैयार होने को कहा गया।
यद्यपि कनाडा सरकार के सख्त रवैये के कारण कामागाटामारू जहाज को वैंकूवर तट छोड़ना पड़ा, ठीक इसी समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने कामागाटामारू जहाज को सीधे कलकत्ता (अब कोलकाता) लाए जाने का आदेश दिया। कामागाटामारू जहाज के बजबज (कलकत्ता) पहुंचने पर क्रुद्ध यात्रियों व पुलिस में संघर्ष हुआ जिसमें 18 यात्री मारे गए तथा 202 यात्रियों को जेल में डाल दिया गया जबकि कुछ यात्री निकल भागने में कामयाब रहे।
गदर आन्दोलन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— गदर पार्टी की स्थापना कब और कहां हुई थी — साल 1913, अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को में।
— ग़दर पार्टी का शुरूआती नाम — प्रशांत तट हिंदुस्तान एसोसिएशन (15 जुलाई 1913, संयुक्त राज्य अमेरिका)।
— गदर पार्टी के संस्थापक सदस्य — सोहन सिंह भकना (अध्यक्ष), लाला हरदयाल (महामंत्री) ।
— गदर पार्टी के अन्य प्रमुख नेता — करतार सिंह सराभा, भाई परमानंद, रघुवीर दयाल गुप्त और रासबिहारी बोस।
— पंजाबी शब्द ‘ग़दर’ से क्या तात्पर्य है — विद्रोह अथवा क्रांति।
— गदर नाम का साप्ताहिक समाचार पत्र कहां से प्रकाशित होता था — सैन फ्रांसिस्को से ।
— साप्ताहिक समाचार पत्र ‘गदर’ किन-किन भाषाओं में प्रकाशित होता था — उर्दू, पंजाबी, हिंदी और गुरुमुखी।
— किस अखबार का अखबार शीर्षक था ‘अंग्रेज़ी राज का दुश्मन’ — गदर।
— गदर आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था — सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का अंत और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की स्थापना।
— वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के लिए गदर आन्दोलनकारियों ने किसे पंजाब से बुलाया था — रास बिहारी बोस।
— गदर क्रांतिकारियों को कुचलने में पंजाब की किस संस्था ने अंग्रेजी हुकूमत का खुलकर साथ दिया — खालसा दीवान।
— गदर पार्टी को कब भंग कर दिया गया — जनवरी, 1948।
कामागाटामारू घटना से जुड़े रोचक तथ्य
— कामागाटामारू की चर्चित घटना कब हुई थी — साल 1914 में।
— नवम्बर, 1913 में कनाडा सरकार ने कितने भारतीयों को कनाडा में प्रवेश की अनुमति दी थी — 35 भारतीयों को।
— जापानी जलपोत कामागाटामारू को किसने किराए पर लिया था — बाबा गुरूदत्त सिंह।
— जापानी जहाज कामागाटामारू पर कितने यात्री सवार थे — 376 भारतीय यात्री।
— कामागाटामारू जहाज के यात्रियों से गदर क्रांतिकारी कहां मिले थे — (याकोहामा) जापान में।
— कामागाटामारू यात्रियों के संघर्ष हेतु ‘शोर कमेटी’ का गठन किसने किया था — हसन रहीम, सोहनलाल पाठक और बलवन्त सिंह।
— कामागाटामारू यात्रियों एवं अंग्रेजी पुलिस के बीच हिंसक संघर्ष कहां हुआ था — बजबज (कोलकाता)।
— कलकत्ता के बजबज में हुए हिंसक संघर्ष में कामागाटमारू के कितने यात्री मारे गए थे — 18 यात्री शहीद और 202 को जेल।
