पार्थियाई अथवा पहलव लोगों के बाद कुषाणों का आगमन हुआ। कुषाण वंश के प्रारम्भिक इतिहास की जानकारी चीनी ग्रन्थों ‘पान-कू’ (Pan-ku) तथा ‘सिएन-हान-शू’ (Tsien-Han-Shu) से मिलती है। कुषाणों का मूल निवास स्थान चीन की सीमा पर स्थित चीनी तुर्किस्तान था। कुषाणों को यू-ची या तोचेरियन (तोखारी) भी कहा जाता है। कालांतर में ‘यू-ची’ कबीला पांच भागों में बंट गया, इन्ही में से एक शक्तिशाली कबीले ‘कुई-शुआंग’ ने भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया।
कुजुल कडफिसेस
कुषाण वंश का प्रथम शासक कुजुल कडफिसेस था, जिसने पार्थियनों पर आक्रमण कर किपिन तथा काबुल पर अधिकार कर लिया। कुजुल कडफिसेस प्राचीन भारत के इतिहास में कडफिसेस प्रथम के नाम से भी प्रसिद्ध है। कुजुल कडफिसेस के प्रारम्भिक सिक्कों के मुख्य भाग पर यूनानी राजा हर्मियस की आकृति तथा पृष्ठ भाग पर स्वयं उसकी आकृति उत्कीर्ण मिलती है। इसका तात्पर्य यह है कि कुजुल कडफिसेस प्रारम्भ में यवन शासक हर्मियस के अधीन था, किन्तु बाद में वह स्वतंत्र हो गया।
कुजुल कडफिसेस ने रोमन सिक्कों की नकल करके केवल तांबे के सिक्के चलवाए। कुजुल के सिक्कों पर ‘धर्मथिदस’ तथा ‘धर्माधित’ उत्कीर्ण है, जिसके आधार पर कुछ विद्वानों का मानना है कि उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था। उसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की। कुजुल कडफिसेस का शासनकाल 15 ई. से लेकर 65 ई. के बीच माना जाता है। कुजुल की मृत्यु 80 वर्ष की आयु में हुई थी।
विम कडफिसेस
चीनी ग्रन्थों के मुताबिक, कुजुल कडफिसेस के उत्तराधिकारी विम कडफिसेस के समय में ही भारत में कुषाण राजवंश की वास्तविक स्थापना हुई थी। विम कडफिसेस को कडफिसेस द्वितीय के नाम से भी जाना जाता है। विम कडफिसेस ने सिन्धु नदी पारकर तक्षशिला तथा पंजाब पर अधिकार कर लिया। विम कडफिसेस के समय ही कुषाण सत्ता का विस्तार मथुरा तक हुआ था। विम कडफिसेस ने 65 ई. से 78 ई. तक शासन किया।
भारत में स्वर्ण सिक्के सर्वप्रथम विम कडफिसेस ने ही चलवाए। उसके समय भारत एवं रोम के मध्य व्यापारिक सम्बन्ध अत्यन्त विकसित थे। चीन के साथ भी उसका व्यापारिक सम्बन्ध था। यह शैव मतानुयायी था, उसने ‘महेश्वर’ की उपाधि धारण की। विम कडफिसेस के कुछ सिक्कों पर शिव, नन्दी तथा त्रिशूल की आकृतियां मिलती हैं।

राजा कनिष्क
विम कडफिसेस की मृत्यु के पश्चात कुषाण शासन की बागडोर कनिष्क के हाथों में आई। भारत के कुषाण राजाओं में कनिष्क सबसे महान था। कनिष्क के शासनकाल के तकरीबन 12 अभिलेख एवं बहुसंख्यक स्वर्ण तथा ताम्र मुद्राएं प्राप्त हुई हैं।
कनिष्क तथा उसके उत्तराधिकारियों का इतिहास मुख्य रूप से तिब्बती बौद्ध स्रोतों, संस्कृत बौद्ध ग्रन्थों के चीनी अनुवाद तथा चीनी यात्रियों फाह्यान तथा ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से ज्ञात होता है। फर्ग्यूसन, ओल्डेनबर्ग, थॉमस, रैप्सन तथा बनर्जी जैसे प्रख्यात इतिहासकार कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 78 ई. मानते हैं।
कनिष्क 78 ई. से शक सम्वत का प्रवर्तक था। यह सम्वत आज भी भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। ‘श्रीधर्मपिटकनिदानसूत्र’ के चीनी अनुवाद से जानकारी मिलती है कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र के राजा पर आक्रमण कर उसे बुरी तरह पराजित किया था।
सांची से कनिष्क संवत 28 का एक लेख मिला है, यह वासिष्क का है और बौद्ध धर्म प्रतिमा पर उत्कीर्ण है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत तथा अन्य चीनी ग्रन्थों से प्रकट होता है कि गन्धार राज्य कनिष्क के अधीन था। कल्हण कृत राजतंरगिणी से स्पष्ट होता है कि कश्मीर पर कनिष्क का अधिकार था। सुई विहार लेख तथा मनिक्याल अभिलेख से जानकारी मिलती है कि कनिष्क का पंजाब पर भी अधिकार था।
इस प्रकार कनिष्क का साम्राज्य पश्चिम में उत्तरी अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण में विंध्यपर्वत तथा पूर्व में पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार तक विस्तृत था। पुरूषपुर (अब पेशावर) इस विशाल साम्राज्य की राजधानी थी।
कुषाण शासक कनिष्क अपने साम्राज्य का शासन क्षत्रपों की सहायता से करता था। समुद्रगुप्त के प्रयाग अभिलेखों के अनुसार, कुषाण राज्य में ‘विषय’ तथा ‘भुक्ति’ जैसी प्रशासनिक इकाइयां होती थी। कनिष्क के सिक्कों पर उसके कुछ प्रांतीय क्षत्रपों के नाम प्राप्त होते हैं, जैसे — वासु, विरू तथा मही आदि।
कनिष्क के शासनकाल में दो स्वतंत्र कला शैलियों का विकास हुआ — 1. गांधार शैली 2. मथुरा शैली। एक कुशल सेनानायक तथा सफल प्रशासक के रूप में कनिष्क ने 23 वर्षों तक राज्य किया।
महान राजा कनिष्क ने बौद्ध धर्म का मुक्त हृदय से सम्पोषण एवं संरक्षण किया। कनिष्क के समय कश्मीर के कुण्डलवन में वसुमित्र की अध्यक्षता में चौथी बौद्ध संगीति हुई। इसी संगीति में बौद्ध ग्रन्थों के उपर टीकाएं लिखी गईं ‘विभाषशास्त्र’ कहलाती है। विभाशास्त्र की रचना का श्रेय वसुमित्र को दिया जाता है। बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अभ्युदय और प्रचार भी कनिष्क के समय में हुआ।
कनिष्क की पहली राजधानी पेशावर तथा दूसरी राजधानी मथुरा थी। कनिष्क ने कश्मीर को जीतकर वहां कनिष्कपुर नगर बसाया। उसने काश्गर, यारकन्द व खोतान पर भी विजय प्राप्त की। कनिष्क ने पेशावर में एक स्तूप एवं विहार का निर्माण कराया जिसमें बुद्ध के अस्थि अवशेषों को प्रतिष्ठित कराया। खुदाई में इस स्तूप से बुद्ध, इन्द्र, ब्रह्मा एवं कनिष्क की मूर्तियां मिली हैं।
महास्थान (बोगरा) में पाई गई सोने की एक मुद्रा पर कनिष्क की एक खड़ी मूर्ति अंकित है। मथुरा में कनिष्क की एक मूर्ति मिली है, जिसमें उसे घुटने तक चोंगा एवं पैरों में भारी जूते पहने हुए दिखाया गया है। कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर वहां से प्रख्यात विद्वान अश्वघोष, बुद्ध का भिक्षापात्र तथा एक अनोखा कुक्कुट प्राप्त किया था।
कनिष्क द्वारा जारी किए गए एक तांबे के सिक्के पर उसे बलि वेदी पर बलि करते हुए दिखाया गया है। कनिष्क का एक कथन — “मैंने उत्तर को छोड़कर शेष तीन क्षेत्रों को जीत लिया है।” कनिष्क के दरबार में पार्श्व, वसुमित्र, अश्वघोष जैसे बौद्ध दार्शनिक तथा नागार्जुन जैसे विद्वान एवं चरक जैसे चिकित्सक विद्यमान थे।
कनिष्क के राजकवि अश्वघोष की तीन रचनाएं प्रमुख हैं - 1. बुद्धचरित 2. सौन्दरनन्द 3. शारिपुत्रप्रकरण। कनिष्क की राज्य सभा में निवास करने वाले प्रसिद्ध आचार्य नागार्जुन ने प्रज्ञापारमितासूत्र की रचना की जिसमें शून्यवाद का प्रतिपादन है। कनिष्क के राजवैद्य चरक ने चरक संहिता की रचना की, यह ग्रन्थ औषधिशास्त्र की सबसे प्राचीनतम रचना है।

कनिष्क के उत्तराधिकारी
वासिष्क
कनिष्क की मृत्यु के पश्चात उसके बड़े पुत्र वासिष्क ने कुषाण राजवंश की सत्ता सम्भाली। वासिष्क ने महज 4 वर्षों तक शासन किया। वासिष्क के शासनकाल में दो अभिलेख प्राप्त हुए हैं — 1. मथुरा (कनिष्क सं. 24) तथा 2. सांची (कनिष्क सं. 28) । वासिष्क का साम्राज्य मथुरा से पूर्वी मालवा तक विस्तृत था।
हुविष्क
वासिष्क के पश्चात हुविष्क ने कनिष्क सं. 28 से 62 तक शासन किया। हुविष्क का साम्राज्य कनिष्क के समान ही विशाल था। हुविष्क के समय कुषाण सत्ता का केन्द्र पेशावर से हटकर मथुरा हो गया। हुविष्क के सिक्कों पर शिव, स्कन्द तथा विष्णु आदि की आकृतियां उत्कीर्ण मिलती हैं।
हुविष्क द्वारा जारी स्वर्ण एवं तांबे के सिक्कों से उसके साम्राज्य की शान्ति एवं समृद्धि सूचित होती है। उसने मथुरा में एक सुन्दर विहार का निर्माण करवाया था तथा कश्मीर में हुष्कपुर नामक नगर की स्थापना करवाई थी।
कनिष्क द्वितीय
आरा लेख के मुताबिक, “हुविष्क के पश्चात वासिष्क का पुत्र कनिष्क द्वितीय राजा हुआ।” कनिष्क द्वितीय के समय से पश्चिमोत्तर प्रदेश से कुषाणों का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा था। अब कुषाण सत्ता का केन्द्र मथुरा के सीमावर्ती क्षेत्रों तक ही सीमित होने लगा।
वासुदेव
कुषाण राजवंश का अंतिम सम्राट वासुदेव था। वासुदेव शिव एवं विष्णु का उपासक था। वासुदेव के समय में उत्तर पश्चिम का बहुत बड़ा भाग कुषाणों के हाथ से निकल गया। इस प्रकार वासुदेव के साथ ही कनिष्क राजवंश का अन्त हो गया। चूंकि वासुदेव के उत्तराधिकारी कमजोर थे, ऐसे में ईरान में सासानियन वंश तथा पूर्व में नाग भारशिव वंश के उदय ने कुषाणों के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुषाण राजवंश : कला एवं स्थापत्य
गान्धार कला शैली में मुख्य रूप से बौद्ध धर्म से सम्बन्धित मूर्तियों का निर्माण हुआ। मूर्तियों के निर्माण में मुख्यतया काले या हरे स्लेटी पत्थरों (स्टकों) का उपयोग किया गया। कुषाण काल में मथुरा भी कला का प्रमुख केन्द्र था। वस्तुत: मथुरा शैली में बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण धर्म से सम्बन्धित मूर्तियों का निर्माण हुआ।
गान्धार तथा मथुरा के अतिरिक्त सारनाथ से भी कुषाणकाल की एक बोधिसत्व की विशाल मूर्ति मिली है, जो खड़ी मुद्रा में है। सम्राट कनिष्क, हुविष्क तथा वासुदेव के काल में मथुरा कला का सर्वोत्कृष्ट विकास हुआ।
ख्वारिज्म के टोपरा कला से विशाल कुषाण प्रासाद खुदाई में निकला है, जिसमें एक प्रशासनिक अभिलेखागार था जहां अरेमाइक लिपि व ख्वारिज्मी भाषा में पुरालेख व दस्तावेज रखे हुए थे।
भारत में चमड़े के जूते बनाने, लम्बे कोट पहनने व पतलून बनाने का प्रचलन कुषाण काल में ही शुरू हुआ। बतौर साक्ष्य कुषाण सिक्कों में उसके कई शासकों को लम्बा कोट, पतलून व जूते पहने दिखाया गया है।
कुषाण साम्राज्य के पतन के मुख्य कारण
कुषाण साम्राज्य के पतन के कारणों को लेकर विद्वानों में निम्नलिखित मतभेद देखने को मिलते हैं।
— इतिहासकार राखाल दास बनर्जी के अनुसार, “गुप्तवंश के उदय के कारण कुषाण सत्ता का विनाश हुआ।” किन्तु समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से पता चलता है कि गुप्त साम्राज्य से पूर्व ही कुषाण शासन समाप्त हो चुका था।
— इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल लिखते हैं कि पंजाब तथा मध्यप्रदेश में कुषाणों का पतन भारशिव नागों के उत्थान के कारण हुआ। हांलाकि अल्टेकर ने इस मत को खंडित करते हुए बताया है कि भारशिव नागों तथा वाकाटकों का कुषाणों से कोई लेना-देना नहीं था।
— अल्टेकर का मत है कि यौधेयों ने कणिन्द, अर्जुनायन आदि गणराज्यों की मदद से कुषाणों को पराजित कर सतलज नदी के पार खदेड़ दिया। यौधेयों के सिक्कों पर ‘जयमंत्रधर’ तथा ‘यौधेयानाम’ उत्कीर्ण मिलता है, जो उनकी विजयों का सूचक है हांलाकि यह दावा नहीं किया जा सकता है कि ये विजयें उन्होंने कुषाणों के विरूद्ध ही प्राप्त की थीं।
— प्राच्य इतिहासकार घिशर्मन ने बेग्राम की खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि वासुदेव के शासनकाल में ससैनियन नरेश शापुर प्रथम ने कुषाण साम्राज्य पर आक्रमण कर पश्चिमोत्तर प्रदेशों पर अधिकार कर लिया।
ऐसे में उपरोक्त मतों को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि नागों, यौधेयों तथा ससैनियनों ने कुषाण सत्ता की समाप्ति में कुछ न कुछ योगदान अवश्य दिया था।
कुषाण राजवंश से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— कुषाण कहां के मूल निवासी थे — चीन की सीमा पर स्थित चीनी तुर्किस्तान।
— कुषाणों को अन्य किस नाम से जाना जाता है — ‘यू-ची’ या ‘तोचेरियन’ (तोखारी ।
— कुषाण वंश का प्रथम शासक कौन था — कुजुल कडफिसेस (कडफिसेस प्रथम) ।
— कुजुल कडफिसेस प्रारम्भ में किस यवन (यूनानी) शासक के अधीन था — हर्मियस।
— कुजुल कडफिसेस के सिक्कों पर क्या उत्कीर्ण है — ‘धर्मथिदस’ तथा ‘धर्माधित’।
— कुजुल कडफिसेस ने कौन सा धर्म ग्रहण कर लिया था — बौद्ध धर्म।
— कुजुल कडफिसेस ने कौन सी उपाधि धारण की थी — महाराजाधिराज।
— कुजुल कडफिसेस का उत्तराधिकारी कौन था — विम कडफिसेस (कडफिसेस द्वितीय) ।
— चीनी लेखकों ने ‘भारत का विजेता’ किस शासक को कहा है — कडफिसेस द्वितीय।
— भारत में स्वर्ण सिक्के सर्वप्रथम किस शासन ने चलवाए — विम कडफिसेस।
— विम कडफिसेस कौन सा मतानुयायी था — शैव मतानुयायी।
— विम कडफिसेस ने कौन सी उपाधि धारण की थी — महेश्वर।
— भारत में कुषाण राजवंश का सबसे महान शासक — कनिष्क।
— भारत में शक सम्वत का प्रवर्तक कौन था — कनिष्क।
— शक सम्वत की स्थापना कब हुई थी — 78 ई.।
— कनिष्क के समय कश्मीर के कुण्डलवन में किसकी अध्यक्षता में चौथी बौद्ध संगीति हुई — वसुमित्र।
— बौद्ध ग्रन्थों के उपर विभाषशास्त्र नामक टीकाएं लिखी थी — वसुमित्र ने ।
— कनिष्क के दरबार में कौन-कौन से प्रख्यात विद्वान रहा करते थे— पार्श्व, वसुमित्र, अश्वघोष, नागार्जुन एवं चरक।
— कनिष्क के राजकवि अश्वघोष की तीन प्रमुख रचनाएं - 1. बुद्धचरित 2. सौन्दरनन्द 3. शारिपुत्रप्रकरण।
— गांधार शैली एवं मथुरा कला शैली का विकास किसके शासनकाल में हुआ — कनिष्क।
— शून्यवाद अथवा माध्यमिक दर्शन का प्रतिपादक कौन था — नागार्जुन।
— कनिष्क का राजवैद्य कौन था — चरक ।
— कनिष्क के उत्तराधिकारियों के नाम — वासिष्क, हुविष्क तथा कनिष्क द्वितीय।
— कुषाण राजवंश का अंतिम सम्राट — वासुदेव।
— कौन सा अभिलेख कनिष्क को बौद्ध साबित करता है — कास्केट अभिलेख।
—भारत में सर्वप्रथम शुद्ध स्वर्ण मुद्राएं निर्मित कराईं — कुषाणों ने।
—कुषाण शासकों में विम कडफिसेस — शैव जबकि कनिष्क और हुविष्क — बौद्ध तथा वासुदेव शैव या वैष्णव।
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