दोस्तों, यदि हम आपसे लार्ड कार्नवालिस के ऐतिहासिक मकबरे को केन्द्र बनाकर आस-पास के एक से दो किमी. के दायरे में आने वाले परिक्षेत्र की बात करें तो मुख्य रूप से छावनी लाइन, पत्थरघाट, बारह बंगला, फॉक्सगंज और हाथीखाना का नाम उभरकर सामने आता है। ये सभी नाम अपने आप में ब्रिटिश हुकूमत का इतिहास समेटे हुए हैं।
अब हम बात करते हैं, लार्ड कार्नवालिस के मकबरे से दो-तीन किमी. दूर हाथीखाना गांव (हथियाखाना) की जहां मुगलों के जमाने में हाथी बांधे जाते थे। हाथीखाना गांव के पास एक तालाब भी है जो अब समाप्ति के कगार पर है, उक्त तालाब में बड़े-बड़े हौदे भी मिले थे। हाथीखाना से ठीक पूरब दिशा में गंगा नदी के किनारे चांदमारी नामक स्थान है, जहां अंग्रेज अफसर और सिपाही ट्रेनिंग के दौरान असलहे चलाने का अभ्यास करते थे।
इन सब तथ्यों से परे, आज हम आपको हाथीखाना स्थित ब्रिटिश कब्रगाह से रूबरू कराने जा रहे हैं जिसमें अंग्रेजी सेना के उच्चाधिकारी- प्रशासनिक अफसर एवं उनके परिजनों को दफनाया गया है। तकरीबन दो बीघा क्षेत्र में फैले इस ब्रिटिश कब्रगाह में अंग्रेज सैन्य अफसरों के साथ ही गाजीपुर का भी रोचक इतिहास दफन है, इसलिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
हाथीखाना स्थित ब्रिटिश कब्रगाह की वर्तमान स्थिति
गाजीपुर जनपद स्थित लार्ड कार्नवालिस के मकबरे से तकरीबन दो किमी. की दूरी पर स्थित आदर्श बाजार इलाके में स्थित हाथीखाना में एक ब्रिटिश कब्रगाह मौजूद हैं।
इस ब्रिटिश कब्रगाह के अन्दर मौजूद सैकड़ों शिलापट्ट एवं स्तम्भ टूटने की कगार पर हैं और कुछ टूट चुके हैं। बावजूद इसके इन शिलापट्टों व स्तम्भों पर की गई नक्काशी ब्रिटिश शान-शौकत को बयां करने के लिए पर्याप्त है।
हाथीखाना स्थित इस ब्रिटिश कब्रगाह की मौजूदा स्थिति यह है कि जंगली झाड़ियों एवं पेड़ों के मध्य असंख्य नक्काशीदार शिलापट्ट व स्तम्भ टूटते-बिखरते मूक खड़े हैं।
हाथीखाना स्थित ब्रिटिश कब्रगाह से जुड़े रोचक तथ्य
हाथीखाना स्थित ब्रिटिश कब्रगाह में लगे शिलापट्टों तथा स्तम्भों की विशेष नक्काशी देखने लायक है। इन शिलापट्टों पर आंग्ल भाषा में ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों तथा उनके परिजनों के नाम, पद तथा दिवंगत होने की तिथि उत्कीर्ण है।
ब्रिटिश कब्रगाह के शिलापट्टों पर साल 1833 से 1860 के बीच की तिथियां अंकित हैं, ब्रिटिशकाल का यह वो दौर था जब ब्रिटिश भारत में 1857 की प्रथम महाक्रांति की ज्वाला धधक रही थी। इस अतिमहत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल की साफ-सफाई नहीं होने से इस ब्रिटिश कब्रगाह में जंगली झाड़ियों की भरमार है, लिहाजा इनमें जहरीले जीवों का होना सामान्य बात है।
हांलाकि इस ब्रिटिश कब्रगाह में मैंने बरसात के दिनों में अपने कुछ साथियों संग प्रवेश करने की हिमाकत की थी और ग्रामीणों द्वारा बनाई पंगडंडियों के किनारे खड़े कुछ शिलापट्टों से जो नाम लिपिबद्ध किए, वे इस प्रकार हैं —
- आर्थर एम. कॉटन, दिवंगत 26 मार्च 1833
- मिसेज मार्गेट पत्नी फ्रांसिस वर्ड, ग्रेनेडियर कम्पनी, दिवंगत 7 जून 1834
- रॉबर्ट केन्नी, दिवंगत 18 सितम्बर 1833
- एडवर्ड केन्ड्रान पुत्र ब्रेयान एण्ड मैरी, दिवंगत 23 मार्च 1837
- नील फॉक्स, गहमर फैक्ट्री, दिवंगत 7 अगस्त 1914
- अल्बर्ट जेम्स अर्नाल्ड मैथ्यूज पुत्र अल्बर्ट मैथ्यूज, बक्सर, दिवंगत 12 अप्रैल 1862
- सेमुअल ब्राउन, दमदम, दिवंगत 18 जून 1859
- सेमुअल एंड एलिजा ब्राउन, गाजीपुर, दिवंगत 7 जून 1858
- रॉबर्ट जोसेफ ब्राउन, दमदम, दिवंगत 13 अगस्त, 1858
- मार्गेट बटलर पत्नी कॉर्प सेमुअल बटलर, एच.एम.77 रेजिडेन्ट गाजीपुर, दिवंगत 7 अप्रैल 1860
- मेरी एन्न बटलर पुत्री सेमुअल बटलर, दमदम, दिवंगत 6 अगस्त 1858
- जेम्स स्वीन्ने पुत्र जॉन एंड होनोरिया स्वीन्ने, एच.एम.33 रेजिडेन्ट गाजीपुर, दिवंगत तिथि धूमिल हो चुकी है।
- फोरेस्ट बेक, एच.एम.37 रेजिडेन्ट गाजीपुर, दिवंगत 11 सितम्बर 1857
- वीनिड स्विन्चेट पत्नी कॉर्प जे. स्विन्चेट, एच.एम.77 गाजीपुर, दिवंगत 30 मार्च 1860
ध्यान रहे, उपरोक्त नाम मैंने बड़ी मुश्किल से लिपिबद्ध किए हैं, ऐसे ही अभी सैकड़ों नाम शेष हैं जिन्हें लिपिबद्ध करना इतना आसान नहीं हैं क्योंकि जंगली झाड़ियों से भरा यह ब्रिटिश कब्रगाह तकरीबन खण्डर में तब्दील हो चुका है।
हाथीखाना स्थित ब्रिटिश कब्रगाह से जुड़े कुछ रोचक प्रश्न
हाथीखाना स्थित ब्रिटिश कब्रगाह में मौजूद शिलापट्टों एवं स्तम्भों से सूचीबद्ध उपरोक्त नाम हमारे जेहन में एक साथ कई सवाल खड़े करते हैं। पहला सवाल यह है कि जिस अंग्रेज की मृत्यु दमदम (कलकत्ता) में हुई उसे गाजीपुर में क्यों दफनाया गया?
दूसरा रोचक प्रश्न यह है कि गंगा किनारे स्थित गहमर में अंग्रेज फैक्ट्री होने का उल्लेख है, ऐसे में गहमर में वह कौन सी जगह है जहां कभी अंग्रेजों की फैक्ट्री थी?
तीसरा सवाल यह है कि मैंने जिन अंग्रेजों के नाम सूचीबद्ध किए हैं, वे सभी तकरीबन 1857 की महाक्रांति के आसपास ही दिवंगत हुए हैं, तो क्या इनकी मृत्यु का असली वजह 1857 की प्रथम महाक्रांति है?
इन्हीं प्रश्नों के साथ मैं गाजीपुर के जिलाधिकारी महोदय से निवेदन करना चाहता हूं कि पुरातात्विक विभाग के निर्देशन में हाथीखाना स्थित ब्रिटिश कब्रगाह का जीर्णोद्धार करवारकर गाजीपुर के ब्रिटिश इतिहास को एक नया आयाम दिलवाने की कृपा करें।
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