भारत का इतिहास

The Rise of Revolutionary Terrorism in British India

ब्रिटिश भारत में क्रांतिकारी आतंकवाद का उदय (1902-1915)

कांग्रेस के उदारवादी नेताओं की संवैधानिक कार्य पद्धति से निराश तथा उग्रवादी आदर्शवाद से प्रेरित होकर अनेक भारतीय युवाओं ने क्रांति का रास्ता चुना। इस समय क्रांतिकारी आतंकवाद के प्रमुख केन्द्र बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब में सक्रिय क्रांतिकारियों ने लोकमान्य तिलक के नारे अनुनय-विनय नहीं अपितु युयुत्सा के नारे को अपना आदर्श वाक्य बनाया।

क्रांतिकारी विचारधारा के लोग बम और पिस्तौल की नीति में विश्वास करते थे। उनका उद्देश्य यह था कि शक्ति के सहारे डराकर अंग्रेजों से स्वराज्य छीन लो। राजनीतिक निष्क्रियता के दौर में कोई रास्ता नहीं पाकर क्रांतिकारी आत्मबलिदान के रास्ते पर निकल पड़े थे, दरअसल वे शीघ्र परिणाम चाहते थे।

1. क्रांतिकारी आतंकवाद का गढ़ बंगाल

क्रांतिकारी विचारधारा के सर्वाधिक समर्थक बंगाल में थे। यदि बंगाल को क्रांतिकारी आतंकवाद का गढ़ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बंगाल में क्रांतिकारी विचारधारा सर्वप्रथम वारीन्द्र कुमार घोष और भूपेन्द्र दत्त (विवेकानन्द के भाई) ने फैलाया।

साल 1902 में कलकत्ता में अनुशीलन सीमिति का गठन वारीन्द्र कुमार घोष, जतीन्द्र नाथ बनर्जी तथा प्रमोथ मित्तर द्वारा किया गया। ढाका की अनुशीलन समिति पुलिन दास द्वारा 1902 में स्थापित की गई। अनुशीलन समिति के अलावा बंगाल में सुहृद समिति, साधना समि​ति, स्वदेश बांधव समिति, ब्रती समिति भी आतंकवादी गतिविधियों का संचालन करती थीं। ये सभी बंगाल की क्रांतिकारी गुप्त संस्थाएं थीं।

साल 1905 में वारीन्द्र कुमार घोष ने भवानी मंदिर नामक पुस्तिका लिखी, जिसमें क्रांतिकारी आन्दोलन को संगठित करने के लिए विस्तृत जानकारी दी गई। दरअसल बंगाल विभाजन के पश्चात अनेक क्रांतिकारी समाचार पत्रों का प्रकाशन बंगाल में शुरू हुआ, जिनमें ब्रह्मबान्धव उपाध्याय द्वारा सम्पादित वन्देमातरम संन्ध्या तथा  भूपेन्द्र नाथ दत्त द्वारा सम्पादित युगान्तर आदि। युगान्तर पत्रिका से अरविन्द घोष जुड़े थे।

बारीसाल में पुलिस द्वारा की गई बर्बर लाठी चार्ज पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए युगान्तर ने लिखा कि अंग्रेजी सरकार के दमन को रोकने के लिए भारत की 30 करोड़ जनता अपने 60 करोड़ हाथ उठाए, ताकत का मुकाबला ताकत से किया जाए।  युगान्तर अखबार के नाम पर युगान्तर नामक क्रां​तिकारी संगठन भी बंगाल में सक्रिय था। वारीन्द्र घोस के नेतृत्व में युगान्तर ने समूह सर्वत्र क्रांति का बिगुल बजाया।

बंगाल में क्रांतिकारी आन्दोलन की शुरूआत भद्रलोक समाज ने किया। इस समाचार पत्र ने क्रांति के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बंगाल के क्रांतिकारियों की पहली पीढ़ी में हेमचन्द्र कानूनगो का नाम आता है, इन्होंने पेरिस में एक रूसी से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर साल 1908 में भारत आए और कलकत्ता स्थित मणिकतल्ला में बम बनाने का कारखाना खोला।

खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाकी ने 30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर जिले के न्यायाधीश किंग्सफोर्ड की हत्या का प्रयास किया, किन्तु दोनों पकड़े गए। प्रफुल्ल चाकी ने आत्महत्या कर ली, जबकि खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई।

इस घटना के बाद अंग्रेजी पुलिस ने मणिकतल्ला पर छापा मारा और वहां 34 लोगों को गिरफ्तार किया जिसमें वारीन्द्र और अरविन्द घोष भी शामिल थे। इन सभी पर अलीपुर षड्यंत्र (1909) केस के तहत मुकदमा चलाया गया। वारीन्द्र को आजीवन कारावास की सजा मिली जबकि अरविन्द घोष को साक्ष्य के आभाव में बरी कर दिया गया। इस दौरान सरकारी गवाह नरेन्द्र गोसाई की हत्या कर दी गई।

बाघा जतिन के नाम से विख्यात क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ मुखर्जी 9 सितम्बर, 1915 को बालासोर (उड़ीसा) में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। जबकि बंगाल के एक अन्य महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस राजधानी परिवर्तन (कलकत्ता से दिल्ली, 22 दिसम्बर 1912) के समय गिरफ्तारी से बचने के लिए जापान चले गए। कैद किए क्रांतिकारियों में अवध बिहारी, अमीर चन्द्र, लाला मुकुंद और बसंत कुमार पर दिल्ली षड्यंत्र केस के तहत मुकदमा चलाया गया।

बंगाल में बढ़ रही क्रांतिकारी गतिविधियों को रोकने के लिए अंग्रेजी सरकार ने 1900 में विस्फोटक पदार्थ अ​धिनियम तथा 1908 में समाचार पत्र अधिनियम का सहारा लेकर आतंकवाद को कुचलने का प्रयास किया। लिहाजा कुछ क्रांतिकारी भूमिगत होकर कार्य करने लगे तथा कुछ क्रांतिकारियों ने विदेशी धरती से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन का निर्णय लिया।

अरविन्द घोष सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर पांडिचेरी चले गए। अरविन्द घोष ने साल 1907 में वन्देमातरम अखबार के लेख में निष्क्रिय प्रतिरोध के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। अरविन्द घोष ने सावित्री (अंग्रेजी की सबसे लम्बी काव्यात्मक कविता) तथा द लाइफ डिवाइन नामक पुस्तक लिखी और अध्यात्मक की दुनिया में महर्षि अरविन्द के नाम से विख्यात हुए।

2. महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आन्दोलन की शुरूआत

महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आन्दोलन की शुरूआत बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र मराठा (अंग्रेजी) और केसरी (मराठी) के जरिए शुरू की थी। लोकमान्य तिलक ने 1893 ई. में गणपति महोत्सव एवं 1895 ई. में शिवाजी महोत्सव प्रारम्भ किया, जिसका उद्देश्य धार्मिक कम अपितु राजनीतिक ज्यादा था।

साल 1893 से 1897 के बीच महाराष्ट्र में प्लेग फैला, बावजूद इसके अंग्रेजी सरकार ने कड़ाई से लगान वसूल किया। इसलिए 22 जून, 1897 को चापेकर बन्धुओं (दामोदर चापेकर और बाल कृष्ण चापेकर) ने प्लेग कमिश्नर आमर्स्ट एवं रैण्ड की पूना में गोली मारकर हत्या कर दी। चापेकर बन्धुओं को कैदकर फांसी दे दी गई। यह भारत में प्रथम राजनीतिक हत्या थी। चापेकर बन्धु क्रांतिकारी संस्था हिन्दू धर्म संघ से जुड़े थे।

बाल गंगाधर तिलक को भी विद्रोह भड़काने के आरोप में 18 माह के कारावास की सजा दी गई। महाराष्ट्र में आर्य बान्धव समिति नामक क्रांतिकारी संस्था तिलक की प्रेरणा स्थापित की गई थी। साल 1897 में ​तिलक ने अपने प्रमुख पत्र केसरी में लिखा कि श्रीकृष्ण का गीता में यह उपदेश है कि अपने गुरूजनों तथा बन्धुओं की हत्या कर दो, यदि कोई व्यक्ति कर्म फल की इच्छा के बिना अथवा कर्म में लिप्त न होकर कोई कर्म करता है तो उसे कोई दोष नहीं लगता।

महाराष्ट्र का नासिक भी क्रांतिकारियों का गढ़ बन चुका था। विनायक दामोदर सावरकर ने 1904 ई. में नासिक में मित्र मेला नामक संस्था की स्थापना की, जो बाद में मेजिनी के यंग इटली के आधार पर अभिनव भारत में परिवर्तित हो गई। क्रांतिकारी संगठन अभिनव भारत के सक्रिय सदस्य अनन्त लक्ष्मण कान्हेरे ने नासिक के जिला मजिस्ट्रेट जैक्शन की हत्या कर दी। जैक्सन की हत्या में 17 वर्षीय कान्हेरे ने ब्राउनिंग पिस्टल का इस्तेमाल किया था।

अभिनव भारत के कई सदस्यों सहित विनायक दामोदर सावरकर पर नासिक षड्यंत्र (1909) के तहत मुकदमा चलाया गया। वीर सावरकर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और साल 1910 में उन्हें अंडमान जेल (काला पानी की सजा) निर्वासित कर दिया गया। नासिक षड्यंत्र के तहत सावरकर के भाई गणेश सावरकर को भी आजीवन कारावास की सजा मिली।

साल 1937 में सावरकर को रिहा कर दिया गया और उन्हें हिन्दू महासभा अध्यक्ष के रूप में चुना गया। विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी पुस्तक द इंडियन वार आफ द इंडिपेन्डेस में 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा। विनायक दामोदर सावरकर की दूसरी पुस्तक का नाम द ग्रेव वार्निंग था, जिसकी प्रतियां लन्दन तथा भारत में बांटी गई। महाराष्ट्र का प्रमुख समाचार पत्र काल था।

3.पंजाब एवं अन्य प्रान्तों में क्रांतिकारी गतिविधियां

पंजाब में क्रांतिकारी आतंकवाद का उदय बार-बार पड़ने वाले अकाल, भू राजस्व तथा सिंचाई करों में बढ़ोतरी के फलस्वरूप हुआ। जे.एम. चटर्जी ने 1904 ई. में भारत माता सोसाइटी की स्थापना पंजाब में की, जिसमें लाला हरदयाल, अजीत सिंह एवं सूफी अम्बा प्रसाद भी शामिल थे। इस प्रकार पंजाब में अजीत सिंह, सूफी अम्बा प्रसाद, लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने क्रांतिकारी आतंकवाद को जन्म दिया।

यू.एस.ए. (सैनफ्रांसिस्को) में गदर पार्टी की स्थापना के पश्चात पंजाब गदर पार्टी की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बन गया। अजीत सिंह (सरदार भगत सिंह के चाचा) ने लाहौर में अंजुमने-मोहिब्बने वतन नामक एक संस्था की स्थापना की तथा भारत माता नाम से एक अखबार भी निकाला था। बाद में सूफी अम्बा प्रसाद और अजीत सिंह देश छोड़कर अफगानिस्तान चले गए।

वहीं, मद्रास में नीलकंठ ब्रह्मचारी तथा बी.सी. अय्यर ने गुप्त रूप से भारत माता समिति की स्थापना की। साल 1911 में बी.सी. अय्यर ने तिरूनेवेली के जिलाधीश की हत्या कर दी। हांलाकि बी.सी.अय्यर ने आत्महत्या कर ली।

4.भारत से बाहर क्रांतिकारी ग​तिविधियां

भारत में आतंकवाद निरोधी अधिनियमों द्वारा क्रांतिकारियों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगने के बाद यहां से ज्यादातर क्रांतिकारी विदेशों को पलायन कर गए। भारत से बाहर गए क्रांतिकारी ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी तथा अफगानिस्तान में सक्रिय हुए।

भारत से बाहर विदेशी धरती पर स्थापित सबसे पुरानी क्रांतिकारी संस्था इंडियन होमरूल सोसाइटी थी। इंडियन होमरूल सोसायटी की स्थापना श्यामजी कृष्ण वर्मा ने 1905 ई. में इंग्लैण्ड में की एवं इंडियन सोशियोलॉजिस्ट नामक पत्र निकाला। इस संस्था को इंडिया हाउस भी कहा जाता है।

यह इंडिया हाउस शीघ्र ही लंदन में रहने वाले भारतीय क्रांतिकारियों के लिए आन्दोलन का केन्द्र बन गया। इस संस्था के प्रमुख सदस्य थे लाला हरदयाल, मदन लाल ढींगरा, विनायक दामोदर सावरकर आदि। 1908 ई. में इंडिया हाउस ने 1857 विद्रोह की स्वर्ण जयंती मनाई।

मदन लाल ढींगरा ने 1909 ई. में इंडिया हाउस के एक अधिकारी सदस्य कर्जन वाइली की लंदन में गोली मारकर हत्या कर दी। बाद में ढींगरा को फांसी दे दी गई। इस हत्याकाण्ड के बाद वीर सावरकर को कैद कर नासिक षड्यंत्र केस तहत मुकदमा चलाने के लिए भारत लाया गया।

श्यामजी कृष्ण वर्मा की एक अन्य सहयोगी मैडम भीखाजी रूस्तम कामा ने देश छोड़ दिया और अमेरिका सहित यूरोप के विभिन्न देशों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रचार किया। मैडम भीखाजी कामा ने साल 1907 में स्टुटगार्ट (जर्मनी) सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया और पहली बार हरा, पीला और लाल रंग के राष्ट्रीय झण्डे को फहराया। मैडम भीखी जी कामा को ‘Mother of Indian Revolution’ भी कहा जाता है।

जबकि  1915 ई. में जर्मनी की मदद से राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने काबुल में अंतरिम भारत सरकार की स्थापना की। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के मंत्रीमण्डल में बरकतुल्ला (प्रधानमंत्री), मौलाना अब्दुल्ला, मौलाना बशीर, सी. पिल्ले, शमशेर सिंह, डॉ. मथुरा सिंह, खुदा बख्श और मुहम्मद अली थे। राजा महेन्द्र प्रताप ने लेनिन से भी मुलाकात की।

5. क्रांतिकारी आतंकवाद की अन्य गतिविधियां

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने भारतीय क्रांतिकारियों को आर्थिक एवं अस्त्र-शस्त्र का सहयोग देने के लिए एक इंडियन इंडिपेन्डेंस कमेटी की स्थापना की। मौलबी उबेदुल्ला सिन्धी ने महमूद हसन को पीली सिल्क पर फारसी में कुछ पत्र लिखे जिसके पकड़े जाने पर सिल्क पेपर षड्यंत्र नाम से मुकदमा चलाया गया।

1907 ई. में अमेरिका में निर्वासित जीवन व्यतीत करने वाले रामनाथपुरी ने सर्कुलर--आजादी नामक परिपत्र बांटा तथा हिन्दुस्तान एसोसिएशन की स्थापना की। जबकि तारकनाथ दास ने बैंकूवर (कनाडा) में फ्री हिन्दुस्तान नामक पत्र निकाला। इतना ही नहीं, तारकनाथ दास ने 1907 में कैलिफोर्निया में भारतीय स्वतंत्रता लीग की स्थापना की।

जी.डी. कुमार ने वैंकूवर में स्वदेश सेवक होम की स्थापना की तथा गुरूमुखी में स्वदेश सेवक नामक अखबार निकाला जिसमें भारतीय सैनिकों से ब्रिटेन के विरूद्ध विद्रोह करने की अपील की गई। साल 1910 में तारकनाथ दास और जी. डी. कुमार को वैंकूवर से निष्कासित कर दिया गया, इसके बाद इन दोनों ने सिएटल (अमेरिका) में यूनाइटेड इंडिया हाउस की स्थापना की। यूनाइटेड इंडिया हाउस संस्था में प्रत्येक शनिवार को 25 भारतीय मजदूरों को भाषण दिया जाता था।

लाला हरदयाल ने कुछ समय अमेरिका की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाया तथा उन्होंने युगान्तर नामक सर्कुलर जारी किया जिसमें लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की प्रशंसा की गई।

साल 1913 में लाला हरदयाल तथा सोहन सिंह भखना द्वारा यू.एस.ए. (सैनफ्रांसिस्को) में हिन्दुस्तान एसोसिएशन आफ पैसिफिक कोस्ट नामक संस्था का गठन किया गया। इस संस्था ने उर्दू एवं पंजाबी भाषा (गुरूमुखी) में गदर नामक साप्ताहिक पत्र आरम्भ किया, जिसके कारण इस आन्दोलन का नाम ही गदर आन्दोलन पड़ गया।

इस समाचार पत्र में प्रकाशित होने वाली कविताओं को गदर की गूंज शीर्षक से प्रकाशित किया जाता था। गदर पार्टी के सदस्यों में लाला हरदयाल, पंडित काशीराम, भाई परमानन्द, करतार सिंह सराभा, रामचन्द्र आदि का नाम शामिल था। इन लोगों ने पहली बार गोरिल्ला पद्धति से भारत को आजाद कराने की योजना बनाई।

गदर पार्टी के एक अन्य सदस्य रास बिहारी बोस ने भारत आकर, 19 फरवरी 1915 को विद्रोह की योजना बनाई किन्तु भेद खुल जाने पर यह योजना असफल हो गई। गदर आन्दोलनकारियों पर प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस के तहत मुकदमा चलाया गया।

मई 1913 में पोर्टलैण्ड में हिन्दी एसोसिएशन की स्थापना की गई जिसमें काशीराम, भाई परमानन्द, सोहन सिंह भाकना तथा हरनाम सिंह तुंडीलाट ने हिस्सा लिया। बाद में इस पार्टी का नाम बदलकर हिन्दुस्तान गदर पार्टी रख दिया गया।

गदर पार्टी के प्रथम अध्यक्ष सोहन सिंह भाकना, महासचिव लाला हरदयाल व कोषाध्यक्ष काशीराम मोराली चुने गए। नवम्बर 1913 में सोहन सिंह भाकना ने हिन्द एसोसिएशन आफ अमेरिका की स्थापना की। इस संस्था ने गदर अथवा हिन्दुस्तान गदर नामक अखबार 1857 ​के विद्रोह की स्मृति में प्रकाशित किया।

गदर का पहला अंक सैनफ्रैंसिस्को में एक नवम्बर 1913 को उर्दू में प्रकाशित हुआ, बाद में यह अंग्रेजी, मराठी, हिन्दी, गुजराती तथा पश्तों में भी प्रकाशित हुआ। गदर के सम्पादक रामचन्द्र पेशावरी थे। भारत छोड़कर अमेरिका जाने से पूर्व रामचन्द्र पेशावरी ने गुजरांवाला से भारत तथा दिल्ली से आकाश नामक समाचार पत्रों का सम्पादन किया।

साल 1914 में बाबा गुरूदीप सिंह ने कामागाटामारू नामक एक जहाज किराए पर लिया और 376 भारतीय नागरिकों को लेकर बैंकूवर लेकर चल पड़े, किन्तु कनाडा सरकार ने उन्हें उतरने नहीं दिया इसलिए यह जहाज वापस कलकत्ता आ गया। कलकत्ता वापस आने पर यात्रियों एवं पुलिस में संघर्ष हुआ, इसी को कामागाटामारू प्रकरण के नाम से जाना जाता है।

करतार सिंह सराभा तथा रघुवर दयाल गुप्त जैसे कार्यकर्ता भारत आने में सफल रहे। किन्तु पंजाब में गदर कार्यकर्ताओं को कोई उत्साह नजर नहीं आया। अंग्रेजों ने करतार सिंह सराभा को फांसी दे दी। हांलाकि गदर कार्यकर्ताओं ने रास बिहारी बोस को अपना नेता चुना किन्तु अंग्रेजी सरकार ने साल 1915 में गदर आन्दोलन को कुचल दिया।

प्रमुख क्रांतिकारी संगठन , वर्ष, स्थान एवं संस्थापक - (1899 से 1915 तक )           

हिन्दू धर्म संघ - पूना, चापेकर बन्धु।

मित्र मेला - साल 1899, नासिक, सावरकर बन्धु।

अनुशीलन समिति - साल 1902, मिदनापुर, ज्ञानेन्द्र नाथ बोस।

अभिनव भारत - 1904 ई., नासिक, वी.डी.सावरकर।

स्वदेश बान्धव समिति - साल 1905, बारीसाल, अश्विनी कुमार दत्त।

युगान्तर - 1906 ई., कलकत्ता, वारीन्द्र घोष।

इंडियन इंडिपेन्डेस लीग - 1907 ई., कैलीफोर्निया, तारकनाथ दास।

अनुशीलन समिति - 1907 ई., ढाका, वारीन्द्र घोष, भूपेन्द्र दत्त, सतीश चन्द्र बोस तथा जतीन्द्र बनर्जी।

भारत माता सोसाइटी - 1907 ई., पंजाब, अजीत सिंह, सूफी अम्बा प्रसाद।

इंडियन होमरूल सोसाइटी - साल 1905, लन्दन, श्यामजी कृष्ण वर्मा।

हिन्दुस्तान एसोसिएशन - 1907 ई., अमेरिका, रामनाथ पुरी।

गदर पार्टी - 1913 ई., अमेरिका, लाला हरदयाल।

इंडियन इंडिपेन्डेस कमेटी - 1915 ई., बर्लिन, लाला हरदयाल और भूपेन्द्र नाथ दत्त।

क्रांतिकारी समाचार पत्र, लेखक एवं स्थान

युगान्तर (1906) - वारीन्द्र कुमार घोष व भूपेन्द्र नाथ दत्त, बंगाल।

संध्या (1906) - ब्रह्म बान्धव उपाध्याय, बंगाल।

काल (1906) - ...., महाराष्ट्र।

इंडियन सोसियोलोजिस्ट - श्यामजी कृष्ण वर्मा, लन्दन।

वन्देमातरम - मैडम भीखाजी कामा, पेरिस।

वन्देमातरम - अरविन्द घोष, बंगाल।

तलवार - वारीन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय, बर्लिन।

फ्री हिन्दुस्तान - तारकनाथ दास, बैंकुअर।

कीर्ति - संतोष सिंह, पंजाब।

लांगल और गणवाणी - गोपू चक्रवर्ती और धरणी गोस्वामी, बंगाल।

क्रांति - एस.एस. मिराजकर, जोगलेकर, ए.वी.घाटे, मुम्बई।

बन्दी जीवन - सचीन्द्र सान्याल, बंगाल।

गदर - लाला हरदयाल, सैन फ्रैंसिस्को।

जमींदार - सिराजुद्दीन और जफर अली खान, लाहौर।

भारत माता - अजीत सिंह, पंजाब।

भवानी मंदिर - अरविन्द घोष, बंगाल।

वर्तमान रणनीति - वारीन्द्र कुमार घोष, बंगाल।

पथेर दावी - शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय, बंगाल।

बम मैनुअल - पी.एन. वापट।

स्वदेश सेवक - जी.डी. कुमार, वैंकूअर।