ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के फैक्ट्री रिकॉर्ड के मुताबिक, “सूरत शहर का प्रसिद्ध व्यापारी वीरजी वोरा 17वीं सदी में दुनिया का सबसे अमीर शख्स था।” अंग्रेज लोग दुनिया के सबसे अमीर व्यापारी वीरजी वोरा को 'मर्चेंट प्रिंस' कहकर बुलाते थे।
ईस्ट इंडिया कम्पनी के सबसे बड़े फाइनेन्सर वीरजी वोरा ने अंग्रेजों को एक-दो बार नहीं अपितु कई बार कर्ज दिया दिया था। वीरजी वोरा एकमात्र भारतीय व्यापारी थे जिनका फारस की खाड़ी से लेकर लाल सागर और दक्षिण पूर्व एशिया के बन्दरगाहों पर एकछत्र राज चल रहा था।
अब आपका सोचना लाजिमी है कि मसाले, अफीम और कीमती धातुओं के बाजार पर एकाधिकार रखने वाले अमीर व्यापारी वीरजी वोरा को छत्रपति शिवाजी महाराज ने क्यों लूटा? इस संवेदनशील प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
सूरत के व्यापारी वीरजी वोरा की कुल सम्पत्ति
गुजरात राज्य स्थित सूरत शहर के प्रसिद्ध व्यापारी वीरजी वोरा ने साल 1619 से लेकर 1670 के बीच वैश्विक व्यापार में धूम मचा रखी थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के फैक्ट्री रिकॉर्ड के मुताबिक, “व्यापारी वीरजी वोरा 17वीं सदी में दुनिया का सबसे अमीर व्यापारी था।” वीरजी वोरा को अंग्रेज 'मर्चेंट प्रिंस' तथा फ्रांसीसी ‘वोरा ब्रदर्स’ कहकर बुलाते थे।
मुगल काल में सूरत एकमात्र समृद्ध बन्दरगाह था जहां 84 से अधिक देशों के जहाज लंगर डालते थे। इतना ही नहीं, उन दिनों सूरत बन्दरगाह को ‘मक्का का प्रवेश द्वार’ भी कहा जाता था। सूरत बन्दरगाह से गरम मसालों, बुलियन, मूंगा, हाथीदांत, सीसा और अफीम के व्यापार पर एकाधिकार रखने वाले वीरजी वोरा का थोक व्यापार, धन उधार देने एवं बैंकिंग के क्षेत्र में भी सिक्का चलता था।
दुनिया के सबसे अमीर व्यापारी वीरजी वोरा का फारस की खाड़ी से लेकर लाल सागर और दक्षिण पूर्व एशिया के बन्दरगाहों पर एकछत्र राज कायम था। इसके अलावा अहमदाबाद, आगरा, बुरहानपुर, गोलकुंडा, गोवा में वीरजी वोरा के व्यापारिक केन्द्र बने हुए थे जहां उसके प्रतिनिधि मौजूद थे।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के दस्तावेजों के मुताबिक, 17वीं सदी में सूरत के जैन व्यापारी वीरजी वोरा की कुल सम्पत्ति 24,000 अरब डॉलर की थी, आज की तारीख में यह रकम खरबों रुपए में होगी।

छत्रपति शिवाजी महाराज का सूरत आक्रमण
महाराष्ट्र में एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना करना छत्रपति शिवाजी महाराज का मुख्य लक्ष्य था। शिवाजी का प्रारम्भिक उद्देश्य मुसलमानी सत्ता से हिन्दुओं को मुक्ति दिलाना था। दक्कन के प्रभावशाली मुगल सूबेदार और सेनापति शाइस्ता खान का अंगूठा काटने के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र सूरत को निशाना बनाने का निर्णय लिया।
लिहाजा छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगल साम्राज्य के समृद्ध बंदरगाह शहर सूरत को दो बार लूटा। मराठा छत्रपति शिवाजी महाराज ने सूरत शहर पर पहला आक्रमण 5 जनवरी 1664 को किया। इस हमले में मराठा सेना की अगुवाई स्वयं शिवाजी महाराज के हाथों में थी जबकि मुगल सेना का नेतृत्व किलेदार इनायत खान कर रहा था। शिवाजी के सूरत हमले के दौरान इनायत खान भाग खड़ा हुआ और सूरत फोर्ट में जाकर छुप गया।, तत्पश्चात मराठा सैनिकों ने सूरत शहर को छह दिनों तक अच्छी तरह से लूटा और तकरीबन एक करोड़ रुपए का खजाना लेकर लौट गए।
सूरत से मिली संपत्ति में केवल नकदी ही नहीं, अपितु भारी मात्रा में सोने की मोहरें, चांदी के सिक्के, हीरे, मोती, अन्य कीमती जवाहरात और रेशमी कपड़े शामिल थे। कहते हैं, इस धन का उपयोग शिवाजी महाराज ने अपने प्रमुख नौसैनिक अड्डे सिंधुदुर्ग किले के निर्माण के लिए किया था।
तत्पश्चात मुगल सूबेदार दिलेर खां और शाहजादा मुअ्ज्जम के झगड़े का लाभ उठाते हुए शिवाजी महाराज ने अक्टूबर, 1670 में सूरत शहर पर दूसरा आक्रमण किया। इस हमले में शिवाजी महाराज को तकरीबन 6.6 मिलियन स्वर्ण मुद्राएं (कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में 1.32 करोड़ रुपए) की संपत्ति हाथ लगी थी। इस लूट के माल में तकरीबन 5 मिलियन रुपए मूल्य के रत्न, सोना और सिक्के शामिल थे।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने वीरजी वोरा को क्यों लूटा
गुजरात का सूरत बन्दरगाह मुगलों का सबसे समृद्ध बन्दरगाह था, जहां से अरब सागर के रास्ते मुगल साम्राज्य का समस्त समुद्री कारोबार संचालित होता था। बंदरगाह शहर सूरत प्रतिवर्ष तकरीबन दस मिलियन रुपए का ‘कर’ (tax) उत्पन्न करता था।
ऐसे में मुगल साम्राज्य को आर्थिक नुकसान पहुंचाने तथा स्वयं की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए शिवाजी महाराज ने सूरत शहर पर दो बार हमले किए और अकूत सम्पत्ति प्राप्त की।
ऐसे में अब एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर में शिवाजी महाराज ने सूरत के व्यापारी वीरजी वोरा को किस वजह से लूटा? छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा सूरत पर किए गए दोनों हमलों (साल 1664 और 1670 ) में वीरजी वोरा को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था।
वीरजी वोरा की कारोबारी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और डच ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी जरूरतों को पूरा करने तथा व्यापार चलाने के लिए लाखों रुपए का लोन लेती थी, कम्पनी ने एक-दो बार नहीं कई बार किया। इसके बदले वीरजी वोरा ब्रिटिश कम्पनी से उच्च दर पर ब्याज लेते और मनचाही शर्तें पूरी करवाते थे। बतौर उदाहरण – 27 जनवरी 1642 को लंदन मुख्यालय को लिखे गए एक पत्र में “वीरजी वोहरा को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का सबसे बड़ा ऋणदाता (फाइनेंसर) बताया गया है”।
कुछ प्रमुख इतिहासकारों का मानना है कि वीरजी वोरा मुगलों के बड़े फाइनेंसर थे। वीरजी वोरा के पास इतना पैसा था कि दक्कन अभियानों के लिए मुगल बादशाह औरंगजेब ने भी उससे कर्ज लिया था। हांलाकि इस बात का उल्लेख नहीं मिलता है कि वीरजी वोरा ने औरंगजेब को कितनी धनराशि की मदद की थी।
इतना ही नहीं, वीरजी वोरा ने औरंगजेब के पिता शाहजहां को भी चार अरबी घोड़े उपहार में दिए थे। ऐसे में यह स्पष्ट है कि सूरत लूट के दौरान मुगलों को आर्थिक मदद देने वाले समृद्ध व्यापारी वीरजी वोरा को शिवाजी के मराठा सैनिकों ने बख्शने की भूल कत्तई नहीं की।

छत्रपति शिवाजी को वीरजी वोरा से कितनी सम्पत्ति हासिल हुई
छत्रपति शिवाजी महाराज को साल 1664 में सूरत हमले के दौरान वीरजी वोरा से हीरे, मोती, माणिक के अलावा बड़ी मात्रा में सोना-चांदी मिला था। एक डच चश्मदीद वॉलक्वार्ड इवरसन के अनुसार, “छत्रपति शिवाजी महाराज को वीरजी वोरा के पास से 6 बैरल (पीपे) सोना, मोती, रत्न और कीमती सामान प्राप्त हुए थे”।
जबकि वीरजी वोरा के एक फ्रांसीसी मित्र जीन डी थेवेनोट ने लिखा है कि “शिवाजी की सूरत लूट से वीरजी वोरा को तकरीबन 50 हजार यूरो की आर्थिक क्षति पहुंची थी”। हांलाकि 27 नवंबर 1664 के एक अंग्रेज़ी पत्र के मुताबिक, “शिवाजी सब कुछ लूटकर नहीं ले गए, बल्कि उन्होंने विरजी वोरा के लिए इतना कुछ छोड़ दिया है कि वे अपना व्यापार जारी रख सकें।”
अक्टूबर, 1670 में शिवाजी महाराज ने बन्दरगाह शहर सूरत को दूसरी बार लूटा। इस दौरान शिवाजी को तकरीबन 6.6 मिलियन रुपए की संपत्ति प्राप्त हुई, जिसमें बहुमूल्य रत्न और स्वर्ण सिक्के शामिल थे। हांलाकि साल 1670 में वीरजी वोरा को हुए आर्थिक नुकसान की कोई सटीक जानकारी नहीं मिलती है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि सूरत हमले के दौरान शिवाजी महाराज की मराठा सेना ने केवल मुगलों के कारोबारी केन्द्रों तथा अमीर व्यापारियों वीरजी वोरा और हाजी जाहिद बेग को ही अपना निशाना बनाया था जबकि उन्होंने आम जनता, पुर्तगाली और अंग्रेज मिशनरियों, गरीबों तथा महिलाओं को तनिक भी नुकसान नहीं पहुंचाया।
वीरजी वोरा का निधन
छत्रपति शिवाजी महाराज के सूरत लूट के बाद भी वीरजी वोरा की कारोबारी स्थिति बनी रही क्योंकि सूरत के बाहर भी पूरे देश के कई कारोबारी केन्द्रों में उसकी सम्पत्ति बंटी हुई थी। चूंकि 1670 तक विरजी वोरा बूढ़े हो चुके थे, इसीलिए सूरत के व्यापारियों और दलालों के बारे में लिखे अंग्रेज़ों और डच लोगों के रिकॉर्ड में 1670 के बाद वीरजी वोरा का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है।
सम्भवत: वीरजी वोरा की मृत्यु 1670 में हो चुकी थी। किन्तु साल 1670 के एक अंग्रेज़ी रिकॉर्ड के अनुसार, ख्वाजा मिनाज़ नाम के एक अर्मेनियाई व्यापारी द्वारा वीरजी वोरा की तरफ से 'ब्रॉड क्लॉथ' (एक तरह का मोटा ऊनी कपड़ा) खरीदने और वीरजी वोरा के पोते नानचंद द्वारा टिन और तांबा खरीदने की बात कही गई है। सम्भवत: वीरजी वोरा 1670 तक एक प्रभावशाली अमीर बने रहे।
वहीं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वीरजी वोरा के पोते नानचंद ने कारोबार संभाल लिया था, सम्भवत : विरजी वोरा कारोबार से रिटायर हो गए होंगे और 1675 में उनकी मृत्यु हो गई होगी। इसके अलावा, पॉल डंडास का भी यह मानना है कि विरजी वोरा का निधन 1675 में हुआ था।
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