भारत का इतिहास

Congress Muslim League Agreement: Lucknow Pact, 1916

कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौता : लखनऊ पैक्ट, 1916

साल 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता अम्बिका चरण मजूमदार ने की, इसी के बाद कांग्रेस पर गरमदल वालों का आधिपत्य कायम हुआ। लखनऊ अधिवेशन में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं 1. साल 1907 में सूरत अधिवेशन में निष्कासित उग्रपंथियों का कांग्रेस में पुन: प्रवेश। 2. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच ऐतिहासिक लखनऊ समझौता।

मुहम्मद अली जिन्ना ने पहली बार 1913 ई. में मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन में हिस्सा लिया। इतना ही नहीं, जिन्ना इसी वर्ष यानि की 1913 ई. में कांग्रेस के कराची अधिवेशन में भी उपस्थित थे। साल 1913 मुस्लिम लीग ने अपने लखनऊ अधिवेशन में स्वशासन को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप से स्वीकार किया व कांग्रेस के साथ सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।     

साल 1914 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में भी स्वशासन की मांग पर जोर दिया गया। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने अपना लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य के तहत स्वशासन निर्धारित किया।

साल 1915 में मु​हम्मद अली जिन्ना के व्यक्तिगत प्रयास से मुम्बई में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अधिवेशन एक साथ हुए, दोनों संगठन आपसी सहयोग द्वारा देश में संविधान सुधार की योजना बनाने और उसे लागू करवाने हेतु ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालने के लिए सहमत हो गए। 

निष्कर्षत: दिसम्बर, 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग द्वारा नियुक्त समितियों ने मिलकर एक संयुक्त योजना बनाई जो लखनऊ अधिवेशन में उत्साह के साथ स्वीकार की गई, इसी योजना को लखनऊ पैक्ट कहा जाता है। हांलाकि मदनमोहन मालवीय समेत कई वरिष्ठ नेता कांग्रेस-लीग समझौते के बिल्कुल खिलाफ थे। उनका आरोप था कि यह समझौता मुस्लिम लीग को बहुत ज्यादा तवज्जो देता है।

1916 के लखनऊ पैक्ट में कांग्रेस ने पहली बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। यह घटना कांग्रेस और देश, दोनों के लिए बड़ी भूल साबित हुई। उपरोक्त प्रावधान कालान्तर में मुस्लिम लीग के लिए द्विराष्ट्र सिद्धान्त का अंकुर सिद्ध हुआ।

मुहम्मद अली जिन्ना शुरूआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थक थे, किन्तु गांधीजी के असहयोग आंदोलन का जिन्ना ने तीव्र विरोध किया और इसी प्रश्न पर वह कांग्रेस से अलग हो गए। तत्पश्चात जिन्ना पर पाकिस्तान नामक नए देश की स्थापना का भूत सवार हो गया।

जिन्ना को यह ग़लत फ़हमी हो चुकी थी कि हिन्दू बहुसंख्यक भारत में मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व कभी नहीं मिल सकेगा। इसलिए मुहम्म्मद अली जिन्ना एक नए राष्ट्र (पाकिस्तान) की स्थापना के घोर समर्थक और प्रचारक बन गए।

कांग्रेस-लीग समझौते के प्रमुख कारण  (Key reasons for the Congress-League Pact)

बाल्कन युद्ध (1912-13) में ब्रिटेन ने तुर्की को मदद देने से इनकार कर दिया। चूंकि सभी मुसलमानों की सहानुभूति तुर्की के साथ थी, ऐसे में ब्रिटेन द्वारा तुर्की को सहायता नहीं दिए जाने से भारतीय मुसलमान रुष्ट हो गए। तत्पश्चात मुस्लिम लीग ने ब्रिटेन के विरूद्ध स्वतंत्रता आंदोलन चला रही कांग्रेस को सहयोग करने का निश्चय किया।

साल 1905 में बंगाल विभाजन का मुसलमानों ने जोरदार समर्थन किया था किन्तु अंग्रेजी सरकार द्वारा बंगाल विभाजन रद्द किए जाने से भारतीय मुसलमानों में घोर निराशा हुई।

ब्रिटिश गवर्नमेन्ट ने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की स्थापना करने तथा सरकारी मदद देने से इनकार कर दिया था, जिससे शिक्षित मुसलमान काफी नाराज हो गए थे।

मौलाना अबुल कलाम आजाद के राष्ट्रीय पत्र अल हिलाल तथा मोहम्मद अली के पत्र कामरेड को ब्रिटिश सरकार ने बन्द करवा दिया। जब​कि अली बन्धुओं (मुहम्मद अली-शौकत अली), मौलाना अबुल कलाम आजाद तथा हसरत मोहानी जैसे प्रमुख मुस्लिम नेताओं को नजरबंद कर दिया गया।​अंग्रेजी सरकार की इस दमनकारी नीति से मुस्लिम लीग के युवा सदस्यों में साम्राज्यवाद विरोधी भावनाएँ जागृत हुईं।

लखनऊ समझौते में बाल गंगाधर तिलक की भूमिका  (Bal Gangadhar Tilak's role in the Lucknow Pact)

साल 1914 में मांडले जेल से रिहा होने के बाद बाल गंगाधर तिलक और ऐनी बेसेन्ट ने कांग्रेस के उग्र राष्ट्रवादियों तथा नरमपंथियों को एक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वहीं, उदारवादी नेताओं फिरोजशाह मेहता तथा गोपालकृष्ण गोखले की साल 1915 में मृत्यु के चलते उग्रपंथियों और नरमपंथियों के मध्य एकता का मार्ग प्रशस्त हुआ, क्योंकि ये दोनों ही उग्र राष्ट्रवादियों के कट्टर विरोधी थे।

इसके अलावा तिलक के प्रयासों की बदौलत ऑल इंडिया मुस्लिम लीग भी 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में एक साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हो गई।

कांग्रेस-लीग पैक्ट से जुड़े 19 सूत्रीय ज्ञापन (19-point memorandum related to the Congress-League Pact)

मुस्लिम लीग के मध्य समझौता कराने में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना ने महत्वपूर्ण ​भूमिका निभाई। लखनऊ समझौते का मकसद सांप्रदायिक मतभेदों को दूर करना और स्व-शासन की सामूहिक मांगों को बढ़ावा देना था। लिहाजा मुस्लिम लीग ने कांग्रेस द्वारा उत्तरदायी शासन की मांग को स्वीकार कर लिया। लखनऊ पैक्ट में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के द्वारा 19 सूत्रीय ज्ञापन तैयार किया गया जिसकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित थीं

1. भारत को बिना देरी किए स्वशासन प्रदान किया जाए।

2. प्रान्तीय विधान परिषदों तथा गवर्नर जनरल की विधान का विस्तार तथा इनमें निर्वाचित सदस्यों का प्रतिनिधत्व बढ़ाया जाए।

3. कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली व उनके अधि-प्र​तिनिधित्व की मांग को स्वीकार कर लिया।

4. विभिन्न प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं में निर्वाचित भारतीय सदस्यों की संख्या के निश्चित भाग मुसलमानों के लिए सुरक्षित कर दिए गए।

5. इस प्रकार मुसलमानों के लिए पंजाब में 50 फीसदी, बंगाल में 40 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 30 फीसदी, बिहार में 25 फीसदी, मद्रास में 15 फीसदी और सिन्ध सहित मुम्बई में 15 फीसदी स्थान सुरक्षित किए गए।

6. केन्द्रीय व्यवस्थापिका में मुसलमानों के लिए एक तिहाई सुरक्षित स्थान मिले।

7. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में आधे से अधिक सदस्य भारतीय हों।

8. लखनऊ समझौते में मुस्लिम नेताओं ने कुछ प्रान्तों में अधिक प्रतिनिधित्व के बदले अधिसंख्यक क्षेत्रों में कम प्रतिनिधित्व स्वीकार किया।

लखनऊ समझौते का महत्व  (Significance of the Lucknow Pact)

लखनऊ समझौते का स्वागत कांग्रेस और मुस्लिम लीग के द्वारा समान रूप से किया गया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह हिन्दू-मुस्लिम एकता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम था। गुरूमुख निहाल सिंह लिखते हैं कि लखनऊ समझौते के तहत भारत की दो बड़ी जातियों और दो बड़ी राजनीतिक संस्थाओं ने एक कार्यक्रम अपनाया।

सरोजिनी नायडू ने मुहम्मद अली जिन्ना को हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत कहा, क्योंकि उन्होंने दो राजनीतिक समूहों को एक साथ लाने की कोशिशें की थीं। हांलाकि कांग्रेस और लीग की यह निकटता 1922 ई. में असहयोग आन्दोलन के स्थगित होने तक बनी रही।

इसके आलोचकों का विचार है किलखनऊ समझौते का कोई स्थाई परिणाम नहीं निकला स्वयं महात्मा गांधी की यह धारणा थी कि वह शिक्षित और धनी हिन्दुओं तथा शिक्षित व धनी मुसलमानों के बीच का एक समझौता था। इस समझौते ने हिन्दू-मुसलमान जनता में लगाव की भावना पैदा नहीं की।

लखनऊ समझौते की सबसे बड़ी कमी यह थी कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि मानकर कांग्रेस ने स्वयं केवल हिन्दुओं का प्रतिनिधि बना लिया जिसके चलते कांग्रेस पार्टी ने अपने राष्ट्रीय होने के दावे को हमेशा के लिए दुर्बल कर दिया। इस तथ्य ने जाने-अनजाने देश विभाजन की भूमिका तैयार कर दी।

लखनऊ समझौते के परिणाम  (Consequences of the Lucknow Pact)

लखनऊ समझौते के कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए। इस समझौते के दौरान हिन्दू-मुस्लिम एकता को देखकर ब्रिटिश सरकार साल 1917 में मोंटेग्यू घोषणा-पत्र लाने पर मजबूर हो गई तथा भारतीयों के लिए ज़्यादा स्व-शासन का वादा किया गया।

लखनऊ पैक्ट में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग स्वीकार किया गया जिसने भविष्य में सांप्रदायिक बंटवारे को जन्म दिया और एक अलग मुस्लिम राज्य (पाकिस्तान) के मांग की नींव पड़ी। यद्यपि यह समझौता हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक था, किन्तु कमज़ोर गठबंधन के चलते जल्द ही कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच तनाव पैदा हो गया।

लखनऊ समझौते से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य  (Key facts related to the Lucknow Pact)

किस अधिवेशन के पश्चात नरमपंथी और गरमपंथी अलग हो गए थे सूरत अधिवेशन, 1907

बाल गंगाधर तिलक मांडले जेल से रिहा होकर कब भारत आए साल 1914 में

साल 1915 में कांग्रेस के किन दो नेताओं की मौत हो गई बालकृष्ण गोखले और फिरोज शाह मेहता

लखनऊ समझौता कब और किसके बीच हुआ था दिसंबर 1916, कांग्रेस-मुस्लिम लीग

1916 में कांग्रेस और लीग के बीच होने वाला ऐतिहासिक समझौता किस नाम से प्रख्यात है लखनऊ पैक्ट।

लखनऊ समझौते का मुख्य उद्देश्य क्या था हिंदू- मुस्लिम एकता

लखनऊ समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी जिसने साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचल मंडल की स्वीकृति

राष्ट्रवादी अखबार अलहिलाल का प्रकाशक कौन था अबुल कलाम आजाद

राष्ट्रवादी अखबार कामरेडके प्रकाशक का नाम बताइए मौलाना मुहम्मद अली

ब्रिटिश सरकार ने अखबार अलहिलालऔर कामरेड का प्रकाशन कब बंद करवा दिया — 1914 ई. में

ब्रिटिश सरकार ने 1914 में किन मुस्लिम नेताओं को नजरबन्द कर दिया था मुहम्मद अली-शौकत अली (अली बन्धु), हसरत मोहानी, अबुल कलाम आजाद आदि।

साल 1915 में कांग्रेस-लीग का पहला अधिवेशन एक साथ कहां हुआ मुम्बई

साल 1916 में कांग्रेस-लीग का अधिवेशन साथ-साथ कहां हुआ लखनऊ

लखनऊ समझौते को सम्पन्न कराने में किसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना