यह घटना है कि साल 1567 की जब बादशाह अकबर राजपूताना के खिलाफ अभियान पर जाते समय थानेसर (हरियाणा) में सरस्वती घग्गर नदी के किनारे रुका था। इसी स्थल पर मुगल सेना और साधुओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ था।
9 अप्रैल की यह ऐतिहासिक घटना मध्यकालीन इतिहास में ‘थानेसर का युद्ध’ अथवा ‘संन्यासियों का युद्ध’ के नाम से दर्ज है। इस युद्ध में मुगलों के हाथों तकरीबन 150 से 800 की संख्या में साधु मारे गए थे।
कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में यह संख्या 7000 से 8000 तक भी दर्ज है। अब आपका सोचना लाजिमी है कि आखिर में अकबर ने इतने साधुओं की हत्या क्यों करवाई? इस संवेदनशील प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
थानेसर में एकत्रित थे असंख्य साधु
वर्तमान में हरियाणा राज्य के थानेसर (कुरूक्षेत्र कस्बे के समीप) में स्थानेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। इस शहर का नाम स्थानेश्वर से जुड़ा है, जिसका अर्थ है - ‘ईश्वर का स्थान’। सरस्वती घग्गर नदी के किनारे सूर्यग्रहण के दौरान कालान्तर से ही यहां हर साल स्नान मेला लगता है। ऐसा कहते हैं, धार्मिक महत्व के चलते उन दिनों मुगल बादशाह भी यहां आया करते थे।
बादशाह अकबर का दरबारी इतिहासकार अबुल फजल अपनी कृति ‘अकबरनामा’ में लिखता है कि “थानेसर के पास एक जलकुंड (कनात नामक एक जलाशय) जिसे ‘समुद्र’ कहा जा सकता है। प्राचीनकाल से ही साधु-संन्यासी इस तालाब को पवित्र समझते थे। इतना ही नहीं, देश के कोने-कोने से तीर्थयात्री भी कुरूक्षेत्र स्थित इस स्थान पर आते थे और साधुओं को दान-पुण्य किया करते थे।”
ऐसे में 9 अप्रैल, 1567 को सूर्य ग्रहण के अवसर पर यहां असंख्य साधु एकत्र हुए थे। फिर क्या था, तीर्थयात्रियों द्वारा दिए जाने वाले दान तथा कनात नामक पवित्र जलकुंड पर अधिकार को लेकर पुरी और गिरि साधुओं के मध्य खूनी संघर्ष शुरू हो गया।

थानेसर में क्यों रूका था अकबर
बादशाह अकबर राजपूताना (विशेषकर मेवाड़ के राणा उदय सिंह) के खिलाफ सैन्य अभियान पर जाते समय हरियाणा प्रान्त के थानेसर (कुरूक्षेत्र कस्बे के समीप) स्थित सरस्वती घग्गर नदी के किनारे रुका था। इस दौरान भीषण गर्मी से बचने के लिए उसकी मुगल सेना ने कनात नामक मीठे पानी के जलाशय के आस-पास अपना डेरा डाल रखा था।
मुगलों- साधुओं के मध्य संघर्ष का कारण
साल 1567 में 9 अप्रैल के दिन सूर्यग्रहण के दौरान थानेसर (कुरूक्षेत्र) में पवित्र स्नान के शुभ अवसर साधु-संन्यासियों का जमावड़ा लगा था। इस दौरान तीर्थयात्रियों द्वारा किए जाने वाले दान-पुण्य और कनात जलकुंड पर बैठने के स्थान को लेकर पुरी तथा गिरि सम्प्रदाय के साधुओं के बीच होने वाले विवाद ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया।
दरअसल जब पुरी सम्प्रदाय के साधुओं का स्थान गोसाईंयों (गिरि सम्प्रदाय) ने छीन लिया तब साधु केशु पुरी ने इस मामले में न्याय दिलाने के लिए बादशाह अकबर से गुहार लगाई। किन्तु अकबर ने न्याय की जगह एक नई राजनीति खेल दी और कहा कि जो संन्यासी गुट शक्तिशाली होगा, वह उस स्थान पर कब्जा करेगा।
अकबर का दरबारी इतिहासकार अबुल फजल लिखता है कि “अकबर ने साधुओं को आपस में ही लड़ने की अनुमति दे दी और स्वयं तमाशा देखते रहे।” बादशाह अकबर के आदेश पर पुरी और गिरि सम्प्रदाय के साधु पंक्तिबद्ध आमने-सामने खड़े हो गए। पुरी साधुओं की संख्या 300 और गिरी साधुओं की संख्या तकरीबन 500 थी। अकबर की उपास्थित में दोनों पक्ष के साधुओं के मध्य तलवारों और कटारों से युद्ध होने लगा।
थानेसर का युद्ध (9 अप्रैल, 1567 )
सूर्यग्रहण के दिन कनात जलकुंड पर अधिकार लेकर पुरी और गिरी साधुओं का खूनी संघर्ष जब मुगल शिविरों की तरफ बढ़ने लगा। तब बादशाह अकबर ने अपने 250 सैनिकों को उन साधुओं पर हमला करने का आदेश दिया। थानेसर में धनुष-बाण, तलवार, भाले और आग्नेयास्त्रों (बंदूकों) से लैश मुगल सैनिकों और साधुओं के मध्य होने वाले संघर्ष को ‘संन्यासियों का युद्ध’ भी कहा जाता है।
मुगल सैनिकों के इस भीषण हमलें सैकड़ों साधु मारे गए गए तथा तकरीबन सभी संन्यासियों को वहां से खदेड़ दिया गया। हांलाकि थानेसर युद्ध में मारे गए साधुओं की कोई विशिष्ट संख्या दर्ज नहीं है, किन्तु अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में इनकी संख्या 800 से 8000 तक उल्लेखित है।
विकिपीडिया के मुताबिक, मुगल सेनापति मेहतर खान और गाजी खान बदक्शानी की अगुवाई में तकरीबन 300 मुगल सैनिकों ने 2 तोपों, 400 बन्दूकों तथा 75 युद्ध हाथियों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर साधुओं का नरसंहार किया था। मुगल-संन्यासी युद्ध में साधुओं की संख्या 7000-9000 तक बताई गई है।
बड़े पैमाने पर हुए साधुओं के नरसंहार की घटना अबुल फजल कृत ‘अकबरनामा’ में दर्ज है। इस सम्बन्ध में अकबर के दरबार में 'मीर बख्शी' (सैन्य प्रमुख) के पद पर तैनात ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद अपनी कृति ‘तबकात-ए-अकबरी’ (Tabaqat-I-Akbari) में लिखता है कि "चाहे किसी भी पक्ष के लोग मारे जाएं, इसमें इस्लाम को ही फायदा है।
इसे भी पढ़ें : मुगल बादशाह अकबर के क्रूरतम कारनामें जानकर दंग रह जाएंगे आप
