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Battle of Haldighati: 12 pieces of authentic evidence pointing to Maharana Pratap's victory

हल्दीघाटी युद्ध : महाराणा प्रताप की जीत से जुड़े 12 प्रामाणिक साक्ष्य

कहां है हल्दीघाटी उदयपुर से तकरीबन 27 मील दूर उत्तर पश्चिम में एवं नाथद्वारा से 7 मील पश्चिम में हल्दीघाटी नामक स्थान मौजूद है। गोगुन्दा तथा खमनौर की पहाड़ियों के मध्य पीले रंग की मिट्टी होने के कारण इतिहासकारों ने इसे हल्दीघाटी नाम दिया।

साल 1576 में 18 जून को हल्दीघाटी में अकबर की मुगल सेना और महाराणा प्रताप के मध्य भयंकर युद्ध हुआ था। इसी पवित्र तीर्थ स्थल पर प्रतिवर्ष महाराणा प्रताप जयन्ती (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया) के शुभ अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। 

गोगुन्दा में बनी थी रणनीति उदयपुर से 22 मील उत्तर पश्चिम में स्थित गोगुन्दा नामक गांव चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा होने के कारण सैन्य दृ​ष्टि से काफी सुरक्षित था।

यही वजह है कि महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध से पूर्व अपनी रणनीति एवं व्यूह रचना को अंतिम रूप देने के लिए गोगुन्दा में अपने प्रमुख सेनानायकों और सरदारों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की थी।

इस महत्वपूर्ण बैठक में हकीम खान सूरी, रामशाह तोमर, रामदास राठौर, भीम सिंह डोइया, भामाशाह, ताराचंद, झाला मान सिंह (झाला मन्ना), चारण रामा जी सांदू, राणा पूंजा के साथ भील समाज के वीर सपूत तथा अनेक राजपूत योद्धा मौजूद थे।

मुगल एवं मेवाड़ी सेना का पड़ाव — महाराणा प्रताप को बन्दी बनाने की योजना मुगल सेना ने अजमेर स्थित अकबर के किले में बनाई थी, इस किले को अकबर का दौलतखाना भी कहा जाता है। बादशाह अकबर ने आमेर के राजा मान सिंह को मुगल सेना का मुख्य सेनापति तथा आसफ खां को उसका सहयोगी नियुक्त किया।

मान सिंह 3 अप्रैल, 1576 ई. को शाही सेना लेकर अजमेर से रवाना हुआ, उसने पहला पड़ाव मांडलगढ़ में डाला। मांडलगढ़ में 2 माह तक रूकने के पश्चात वह आगे बढ़ा और खमनौर के मोलेला नामक गांव के पास अपना पड़ाव डाला।

चूंकि शाही सेना के आगमन की सूचना महाराणा प्रताप को पहले ही मिल चुकी थी। लिहाजा महाराणा प्रताप कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा की ओर चले गए। हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व महाराणा प्रताप की सेना ने लोहसिंह (राजसमंद) नामक स्थान पर पड़ाव डाला था।

कितना मुश्किल था हल्दीघाटी दर्रा - हल्दीघाटी के दर्रे में एक बार में केवल एक घुड़सवार ही प्रवेश कर सकता था। इसलिए सैनिकों की कमी होने के चलते हल्दीघाटी का दर्रा महाराणा प्रताप की सेना की मोर्चाबंदी के लिए सबसे उपयुक्त स्थान था।

हल्दीघाटी के पहाड़ी दर्रे से चिरपरिचित महाराणा प्रताप के सैनिक आसानी से छिपकर आक्रमण कर सकते थे, वहीं मुगल सैनिक इन पहाड़ों में भटकर मेवाड़ी सैनिकों के हाथों अथवा भूखे-प्यासे मरकर अपना जीवन गवां सकते थे।

हल्दीघाटी युद्ध की वास्तविक तिथि हल्दीघाटी के पास लगे शिलालेख के अनुसार, मुगल सेना और मेवाड़ी राजपूतों के बीच यह महायुद्ध 18 जून 1576 ई. को हुआ था। जबकि गोपीनाथ शर्मा सहित अन्य इतिहासकारों के मुताबिक 21 जून, 1576 ई. को प्रात:काल हल्दीघाटी युद्ध की भेरी के साथ दोनों सेनाएं आमने-सामने हुईं।

हल्दीघाटी युद्ध का विस्तृत वर्णन -  अकबर की मुगल सेना संख्या बल में महाराणा प्रताप की सेना से चार गुना अधिक थी। हल्दीघाटी के युद्ध में मेवाड़ के महाराणा प्रताप के विरूद्ध मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के कछवाहा राजा मान सिंह ने किया था।

18 जून 1576 ई. को प्रात:काल जब युद्ध शुरू हुआ था तब राजपूतों ने इतना जोशीला प्रहार किया कि मुगल सैनिक जान बचाकर चारों तरफ भागने लगे। अकबर का दरबारी इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी जो कि मुगल सेना के साथ था, स्वयं इस युद्ध से भाग खड़ा हुआ।

इसके बाद मुगल सेना की रिजर्व टुकड़ी का प्रभारी मिहत्तर खान ने झूठी अफवाह फैला दी कि बादशाह सलामत (अकबर) शाही सेना लेकर स्वयं आ रहे हैं। फिर क्या था, मुगल सैनिक हिम्मत बांधकर पुन: युद्ध के लिए आगे बढ़े। युद्ध के पहले मोर्चे में सफल होने के पश्चात मेवाड़ी राजपूत बनास नदी के किनारे वाले मैदान रक्ततलाई में आ जमे।

युद्ध के दूसरे चरण में मुगलों तथा राजपूतों के मध्य हाथियों की लड़ाई शुरू हुई। हाथियों के चिंघाड़ से सारा युद्ध स्थल गूंज उठा। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से मुख्यतया पूणा व रामप्रसाद हाथी तथा मुगलों की ओर से गजयुक्ता व गजराज हाथियों के मध्य युद्ध शुरू हुआ।

मुगलों ने रामप्रसाद हाथी के महावत को गोली मार दी, जिस कारण वह हाथी मुगलों के हाथ लग गया। अकबर रामप्रसाद हाथी को पहले ही मांग चुका था, किन्तु महाराणा प्रताप ने रामप्रसाद हाथी को देने से मना कर दिया था। ऐसे में रामप्रसाद हाथी को जब अकबर के सम्मुख पेश किया गया तब उसके मुंह से अकस्मात निकल पड़ा कि यह हाथी मुझे पीर की कृपा से मिला है। इसलिए अकबर ने रामप्रसाद हाथी का नाम बदलकर पीर प्रसाद रख दिया।

हाथियों का युद्ध थमा और दूसरे दिन पुन: युद्ध शुरू हुआ। महाराणा प्रताप अपने राजपूत योद्धाओं के साथ स्वयं मैदान में उतरे। हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने अपनी तलवार के भयानक प्रहार से मुगल सरदार बहलोल खान (लगभग 7 फीट 8 इंच लंबा) को घोड़े सहित दो हिस्सों में काट दिया।

इतना ही नहीं, महाराणा प्रताप ने मुगल शहजादे सलीम (बाद में बादशाह जहाँगीर) पर भी सीधा आक्रमण किया था। इस हमले में प्रताप के भाले से सलीम तो बच गया लेकिन उसका महावत मारा गया और हौदे को भारी क्षति पहुँची।

रीमा हूजा अपनी किताब महाराणा प्रताप- द इनविंसिबिल वारियरमें लिखती हैं कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप और मान सिंह के बीच ज़बरदस्त लड़ाई हुई।मुगल सेनापति मानसिंह मरदानानामक हाथी के हौदे में बैठकर युद्ध कर रहा था। एक राजपूत होने के नाते मुगल सेना का नेतृत्व कर रहे राजा मान सिंह पर महाराणा प्रताप अत्यधिक कुपित थे।

युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप के इशारे पर उनके स्वामिभक्त घोड़े चेतक ने मरदाना हाथी के सिर पर जैसे ही अपना पैर रखा तब प्रताप ने मान सिंह पर भाले से जबरदस्त प्रहार किया किन्तु वह हौदे में छुप गया और उसकी जान बच गई। हांलाकि महाराणा प्रताप के प्रहार से मान सिंह के पीछे बैठा उसका अंगरक्षक मारा गया और हौदे की छतरी का एक खम्भा टूट गया।

महाराणा प्रताप का चेतक इस प्रहार को सफल समझकर अपने पैर मरदाना हाथी के सिर से हटा रहा था, ठीक उसी समय मान सिंह के हाथी की सूंड में बंधी जहरीली तलवार से चेतक का एक पैर बुरी तरह घायल हो गया। ऐसे में मुगल सैनिकों ने महाराणा प्रताप को चारों तरफ से घेरना शुरू किया।

तभी महाराणा प्रताप के सैन्य सरदारों में से एक झाला मान सिंह शारीरिक बनावट में बिल्कुल महाराणा प्रताप की तरह दिखता था, साथ ही उन्हीं की तरह युद्ध कला में भी निपुण था। झाला मान सिंह युद्ध का नेतृत्व सम्भालने तथा उन्हें युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए महाराणा प्रताप के पास पहुंचे।

बड़ी सादड़ी के राजराणा झाला मान सिंह ने महाराणा प्रताप से निवेदन किया कि आप अपना राजचिन्ह उतारकर मुझे दे दीजिए और युद्ध मैदान से सुरक्षित बाहर निकल जाइए, इसी में मेवाड़ की भलाई है।मौके की नजाकत देखकर महाराणा प्रताप ने भी वैसा ही किया।

फिर क्या था, झाला मान सिंह ने महाराणा प्रताप का छत्र (राजमुकुट) अपने सिर पर धारण कर लिया और तेज़ी के साथ कुछ दूरी पर जाकर घमासान युद्ध करने लगे। झाला मान सिंह के असीम शौर्य और सिर पर रखे राजपूताना छत्र को देखकर मुगल सैनिक झाला सरदार मन्नाजी को ही महाराणा प्रताप समझ बैठे और उन पर टूट पड़े, लिहाजा महाराणा प्रताप युद्ध मैदान से सुरक्षित बाहर निकलने में सफल हो गए।

इतना ही नहीं, राजपूत योद्धा झाला मान सिंह ने वीरगति प्राप्त करने से पूर्व अपने असीम शौर्य की बदौलत मुगल सेना को पूर्व की तरफ काफी पीछे धकेल दिया था। महाराणा प्रताप का घायल घोड़ा चेतक बलीचा गांव में स्थिल 25 फीट चौड़े बरसाती नाला पार करते समय परलोक सिधार गया। बलीचा गांव में ही चेतक की छतरी बनी हुई है। चेतक की मृत्यु पर महाराणा प्रताप की आंखों से आंसू निकल पड़े।

रणछोड़ भट्ट रचित अमर काव्य वंशावली व राजप्रशस्ति के अनुसार, महाराणा प्रताप युद्ध मैदान से बाहर जा रहे थे, तभी उन्हें दो मुगल सैनिकों ने देख लिया था। मुगल सैनिकों ने जब महाराणा प्रताप का पीछा किया तभी शक्ति सिंह की नजर उन पड़ी और बड़े भाई को संकट में जानकर उनका भ्रातृ प्रेम जाग उठा और उन्होंने उन मुगल सैनिकों को मार दिया।

हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत से जुड़े साक्ष्य

देश के ज्यादातर वामपंथी इतिहासकारों के मुताबिक, हल्दीघाटी युद्ध में मुगलों की विजय हुई। किन्तु इतिहासकार डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने इसे अनिर्णित युद्ध की संज्ञा दी, क्योंकि युद्ध के पश्चात कोई स्पष्ट राजनीतिक अथवा सैन्य परिणाम सामने नहीं आया।

जबकि ठीक इसके विपरीत हल्दीघाटी युद्ध के दूरगामी परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत हुई थी। ऐसे में महाराणा प्रताप की जीत से जुड़े 12 प्रामाणिक साक्ष्य निम्नलिखित हैं-

  1. अकबर के दरबारी इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी की किताब 'मुंतखब उत तवारिख' के अनुसार, “महाराणा प्रताप के सेनापति हकीम खान सूर के नेतृत्व में राजपूती सेना ने मुगलों पर ऐसा प्रहार किया कि मुगल सेना 6-7 मील तक पीछे खदेड़ दी गई थी।
  2. मेवाड़ी राजपूतों के पराक्रम से मुगल सैनिक इतने घबराए हुए थे कि युद्ध के पश्चात बनास नदी के किनारे पीछे हटकर गहरी खाइयां खोदकर शिविर लगाए, ताकि वे महाराणा प्रताप के संभावित हमलों से सुरक्षित रह सकें।
  3. राजपूताना इतिहास के जनक कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी युद्ध को मेवाड़ की थर्मोपल्ली कहा है। बता दें कि ग्रीक भाषा में थर्मोपल्ली का अर्थ "गर्म द्वार" होता है, जाहिर है हल्दीघाटी का युद्ध मुगल सेना को झुलसाने वाला साबित हुआ।
  4. हल्दीघाटी युद्ध के परिणाम से कुपित होकर बादशाह अकबर ने मुख्य सेनापति राजा मान सिंह को दी हुई सात हजारी मनसबदारी छीन ली और उसके घोड़ों को शाही दाग से मुक्त कर दिया।
  5. बादशाह अकबर मुगलिया सेनापति मानसिंह और आसफ खान से इतना नाराज हुआ था कि उसने कुछ समय के लिए उन्हें शाही दरबार में आने से रोक दिया था और दोबारा कभी मेवाड़ अभियान की कमान नहीं सौंपी।
  6. इतिहासकार डॉ. चंद्रशेखर शर्मा के मौलिक शोध के अनुसार, “हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप द्वारा कई ताम्रपत्र (भूमि के पट्टे और अनुदान) जारी किए गए थे। यह इस बात का सबसे ठोस प्रमाण है कि युद्ध के बाद भी मेवाड़ की भूमि पर महाराणा का पूर्ण नियंत्रण और संप्रभुता बनी हुई थी।
  7. अकबर का मुख्य उद्देश्य महाराणा प्रताप को कैद करना था मेवाड़ को मुगल सत्ता के अधीन कर प्रताप को नतमस्तक करना था। किन्तु अकबर अपने किसी भी उद्देश्य में सफल नहीं हुआ।
  8. हल्दीघाटी युद्ध के चार माह पश्चात नवम्बर 1576 ई. में अकबर ने मेवाड़ पर स्वयं आक्रमण किया और उदयपुर को जीतकर उसका नाम मुहम्मदाबाद रख दिया किन्तु वह महाराणा प्रताप को पराजित करने में विफल रहा।
  9. महाराणा प्रताप को कैद करने के लिए अकबर ने सेनापति शाहबाज खां को पहली बार अप्रैल 1578 ई. में, दूसरी बार नवम्बर 1578 में. तथा तीसरी बार अक्टूबर 1579 ई. में भेजा, किन्तु वह हर बार प्रताप को पकड़ने में असफल रहा।
  10. हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी महाराणा प्रताप ने मुगलों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध जारी रखा। साल 1583 में विजयदशमी के दिन दिवेर के ऐतिहासिक युद्ध (चावंड का युद्ध) में महाराणा ने कई मुगल थानों को नेस्तनाबूद कर दिया और एक विशाल मुगल सेना को बुरी तरह पराजित किया। इसके बाद मुगलों को मेवाड़ से स्थायी रूप से खदेड़ दिया गया। दिवेर युद्ध को कर्नल जेम्स टॉड ने मेवाड़ का मैराथन कहा है।
  11. मुगल बादशाह अकबर ने अंतिम प्रयास के रूप में 5 दिसम्बर 1584 ई. को आमेर के राजा भारमल के छोटे पुत्र जगन्नाथ कछवाहा को प्रताप के विरूद्ध सैन्य ​अभियान पर भेजा। किन्तु जगन्नाथ कछवाहा को भी कोई सफलता नहीं मिली अपितु मांडलगढ़ में जगन्नाथ कछवाहा की मृत्यु हो गई।
  12. महाराणा प्रताप ने अपने जीवनकाल में चित्तौड़ एवं मांडलगढ़ को छोड़कर मेवाड़ के अधिकांश हिस्सों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। महाराणा प्रताप ने चांवड को अपनी आपातकालीन राजधानी बनाया। चांवड साल 1585 से लेकर अगले 25 वर्ष तक मेवाड़ की राजधानी रही। यहीं पर महाराणा प्रताप ने चामुंडा माता का मंदिर बनवाया।

उपरोक्त साक्ष्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि सैन्य दृष्टिकोण से हल्दीघाटी का युद्ध भले ही अनिर्णित रहा हो, किन्तु उसके वास्तविक विजेता महाराणा प्रताप ही थे। बावजूद इसके रक्ततलाई में लगे शीलापट्ट पर हल्दीघाटी युद्ध में अकबर को विजेता तथा महाराणा प्रताप को भगोड़ा बताया गया है, जो राष्ट्रप्रेमियों तथा भारतीय इतिहास के लिए शर्म की बात है।

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