मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में जब पूरा उत्तरी भारत उसकी धार्मिक कट्टरता से ग्रसित था, तब गाजीपुर जिले में एक ऐतिहासिक सिद्धपीठ की स्थापना हुई जिसने चहुंओर सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
यह सतनामी पीठ निर्गुण ब्रह्म की उपासना के लिए प्रख्यात है। इस मठ में सिद्ध संतों की कुल 10 समाधियां बनी हैं। तप, ज्ञान और भक्ति से सिंचित इन सिद्ध संतों की कई चमत्कारी सिद्धियां जनमानस में आज भी श्रद्धा का विषय बनी हुई हैं।
हैरानी की बात यह है कि गंगा-जमुनी तहजीब का संदेश देने वाली इस सिद्धपीठ ने आजादी के दिनों में ही शिक्षण संस्थाओं का निर्माण कार्य शुरू कर दिया था। स्वतंत्रता आन्दोलन में भी इस सिद्धपीठ की महती भूमिका नजर आती है।
जी हां, मैं गाजीपुर जनपद की भुड़कुड़ा मठ की बात कर रहा हूं, इस मठ के इतिहास में एक रोचक प्रसंग यह भी आता है कि स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान देश के प्रख्यात क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद इस सिद्धपीठ की रामशाला में ठहरे थे।
अब आपका सोचना लाजिमी है, क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद जब भुड़कुड़ा मठ में आकर रूके तब इस सिद्धपीठ की गद्दी पर कौन विराजमान था? ऐसे में गाजीपुर जिले की भुड़कुड़ा मठ का इतिहास जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
भुड़कुड़ा मठ की स्थापना
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 36 किलोमीटर की दूरी पर भुड़कुड़ा मठ स्थित है। यह क्षेत्र जखनियां तहसील तहसील के अंतर्गत आता है। निर्गुण ब्रह्म की उपासना के लिए प्रख्यात भुड़कुड़ा मठ का इतिहास तकरीबन 350 वर्ष पुराना है।
सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ की स्थापना (1679 ई.) ऐसे दौर में हुई जब मुगल बादशाह औरंगजेब की धर्मान्धता से पूरा उत्तरी भारत ग्रसित था और प्रमुख हिन्दू मंदिरों के विध्वंस का खेल जारी था।
इस कठिन समय में निर्गुण ब्रह्म के उपासक इस सतनामी पीठ के सिद्ध संतों ने पूरे जनपद को सामाजिक समरसता के साथ-साथ तप, ज्ञान और भक्ति से सिंचित करना शुरू किया। भुड़कुड़ा मठ के सिद्ध संतों की चमत्कारी शक्तियां आज भी जनमानस की जुबान पर बनी हुई हैं।

भुड़कुड़ा मठ के सिद्ध संतों की सूची
सतनामी पीठ के नाम से विख्यात भुड़कुड़ा मठ की गद्दी पर विराजमान होने वाले संतों को महन्त कहा जाता है। इस सिद्धपीठ के विषय में यह मान्यता थी कि यहां सिर्फ 10 महन्त होंगे। बतौर प्रमाण, भुड़कुड़ा मठ में विराजमान 10 सिद्ध संतों की 10 समाधियां बनी हुई हैं।
इस गद्दी की परम्परा से जुड़े सभी दस सिद्ध संतों का चित्र इस मठ में लगा हुआ है। विजयदशमी के शुभ अवसर पर यहां प्रतिवर्ष विशाल मेला लगता है, जो मठ की स्थापनाकाल से ही जारी है। सीढ़ियों से ऊपर जाने पर हनुमानजी का एक मंदिर भी है, जहां दर्शन मात्र से ही भक्तजनों को सुकून की प्राप्ति होती है।
श्रीसिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ में लगे शिलापट्ट में जिन 10 सिद्ध संतों की जो सूची उत्कीर्ण है, वो कुछ इस प्रकार है — 1. बुला साहेब (1679-1709) 2. गुलाल साहेब (1710-1759) 3. भीखा साहेब (1760-1791) 4. चतुर्भुज साहेब (1792-1818) 5. नरसिंह साहेब (1819 - 1849) 6. रामकुमार साहेब (1850-1879) 7. रामहित साहेब (1880-1892) 8. जयनारायण साहेब (1893- 1924) 9. रामबरन दास जी (1925-1969) 10. रामाश्रय दास जी महाराज (1970- मई, 2008) वर्तमान में इस सिद्धपीठ की गद्दी पर महंत शत्रुघ्नदास महाराज विराजमान हैं।
सिद्ध संतों का संक्षिप्त परिचय एवं चमत्कारी शक्तियां
इस सतनामी पीठ की नींव किसी सेठ, किसी राजपरिवार अथवा किसी कुलीन समाज के शख्स ने नहीं अपितु सिद्ध संत बुलाकी राम ने साल 1679 में रखी थी। अपनी सिद्धियों और आध्यात्मिक श्रेष्ठता की वजह से बुलाकी राम ‘बूला साहेब’ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
दरअसल बूला साहेब (बुलाकी राम) एक खेतिहर मजदूर थे, जो ठाकुर गुलाल सिंह के खेतों पर हल जोतने का काम करते थे। हांलाकि इस दौरान बूला साहेब ईश्वर से साक्षात्कार करने लगे थे, लेकिन यह बात स्वयं गुलाल सिंह को भी नहीं पता थी।
किसी शख्स ने गुलाल सिंह से कहा कि बुलाकी राम तो तुम्हारे खेत में हल नहीं जोत रहा है अपितु एक वृक्ष के नीचे बैठकर आराम कर रहा है। इसके बाद गुलाल सिंह जब बुलाकी राम के पास पहुंचे तो वे आंख बन्द किए हुए बैठे थे, तभी गुलाल सिंह ने बुलाकी राम के पीठ पर पैर से प्रहार किया, इसी के साथ बुलाकी राम के मुंह से दही का पूरा थक्का नीचे गिर गया।
बुलाकी राम ने गुलाल सिंह से कहा कि अभी तो मैं उपर वाले को समर्पित भी नहीं कर पाया था, तभी आप ने ऐसा कर दिया। फिर गुलाल सिंह ने अपने खेत की तरफ देखा तो बिना किसी हलवाहे के बैल स्वयं खेत जोत रहे थे। इस चमत्कारिक घटना से गुलाल सिंह को बुलाकी राम की आध्यात्मिक ज्ञान की अनुभूति हुई।
फिर क्या था, गुलाल सिंह स्वयं बुलाकी राम के शिष्य बन गए। ईश्वरीय साक्षात्कार करने वाले गुरू और शिष्य संत बूला साहेब और ‘गुलाल साहेब’ कहलाए। गुलाल साहेब भुड़कुड़ा सिद्धपीठ के सबसे प्रतिष्ठित संत थे। गुलाल साहेब ने कई पदसंग्रहों की रचना की तथा रामशाला का निर्माण करवाया।
गुलाल साहेब की समाधि कक्ष में लकड़ी का एक खटोला आज भी रखा हुआ, इस खटोले के सम्बन्ध में मठ और स्थानीय लोगों की मान्यता है कि गुलाल साहब का यह ‘उड़न खटोला’ था जिसके जरिए वह कहीं भी आसानी से आते-जाते थे। गुलाल साहब के समय इस सिद्धपीठ पर बाबा कीनाराम आए थे।

गुलाल साहब के शिष्य भीखा साहब इस गद्दी के तीसरे महंथ बने। आजमगढ़ जिले के खानपुर बोहना गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में जन्में भीखा साहब का पूरा नाम भीखानंद चौबे था। भीखा साहब को बचपन से साधु-संतों की तरफ आकर्षण था। लिहाजा उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनमें यह आकर्षण बढ़ता ही गया और आखिर में वैराग्य का रूप धारण कर लिया।
11 साल की उम्र में जब भीखा साहेब के विवाह की तैयारियां होने लगी तब वह एक दिन चुपचाप घर से निकल गए। संन्यास भ्रमण के दौरान ही भीखा साहेब ने गुलाल साहेब का एक पद सुना और उनके पास पहुंच गए। भीखा साहेब जब गुलाल साहेब के पास पहुंचे तो वह आमजन को प्रवचन दे रहे थे, भीखा साहेब को देखते ही गुलाल साहेब ने कहा कि इतने दिनों से तू कहां था और फिर भीखा साहब को अपने पास बैठाकर आत्मीय स्नेह करने लगे।
गुलाल साहब के संरक्षण में भीखा साहेब की आध्यात्मिक साधना इतनी बढ़ी कि भीखा साहेब ही गुलाल साहब उत्तराधिकारी बने। संयोगवश भीखा साहेब के समय भी बाबा कीनाराम भुड़कुड़ा मठ पर आए थे।
भीखा साहेब से जुड़ी एक चमत्कारी घटना बेहद प्रसिद्ध हैं — कहते हैं, भीखा साहेब एक बार जखनियां रेलवे स्टेशन से कहीं जा रहे थे। अभी वह ट्रेन में बैठे ही तभी टीटी ने उन्हें साधारण इंसान समझकर टिकट मांगा और फिर ट्रेन से नीचे उतार दिया। तब भीखा साहेब ने कहा कि मैं नहीं जाऊंगा तो यह ट्रेन भी नहीं जाएगी।
तत्पश्चात भीखा साहेब जैसे ही ट्रेन से नीचे उतरे इन्जन ने काम करना बन्द कर दिया। भीखा साहेब वहीं चुपचाप बैठे रहे, ट्रेन को बनाने के लिए कई काबिल इन्जीनियरों को बुलवाया गया, फिर भी ट्रेन का इन्जन ठीक नहीं हुआ।
तभी टीटी को ध्यान आया कि मैंने जिसे आदमी को ट्रेन से उतारा था, वो तो यहीं बैठा है, फिर उसे भीखा साहेब की आध्यात्मिक शक्तियों की अनुभूति हुई और उसने भीखा साहेब से मांफी मांगी और ट्रेन में ले जाकर बैठाया। भीखा साहेब जैसे ही ट्रेन में बैठे इन्जन स्टार्ट हो गया।
जनसामान्य के बीच यह घटना इतनी लोकप्रिय हो गई कि इस पर एक लोकगीत बना जिसकी एक पंक्ति कुछ इस प्रकार है — “छत्तीस पेंच इन्जन में लागल एको ना कईलस काम, सुन सजनवा रसिया। साधु कईले बा हरनवा सुन सजनवा रसिया…..।।”
बिरहा नामक इस लोकगीत का हिन्दी अर्थ है — “एक महिला अपने पति से कह रही है कि सुनो पतिदेव- रेलवे के इन्जीनियरों ने ट्रेन के इन्जन को ठीक करने के लिए सभी तकनीकी उपाय कर लिए किन्तु ट्रेन का इन्जन ठीक नहीं हुआ। दरअसल उस साधु (भीखा साहेब को सम्बोधित) की वजह से ट्रेन का इन्जन ठीक नहीं हो रहा है और ट्रेन नहीं चल रही है।
दोस्तों, सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ के संतों से जुड़े ऐसी कई चमत्कारी घटनाएं हैं, जो मैं इस लेख में लिख नहीं पाया हूं, किन्तु आगे इसकी चर्चा आप से जरूर करूंगा। बूला साहेब, गुलाल साहेब और भीखा साहेब की संत परम्परा में क्रमश: चतुर्भज साहेब, नरसिंह साहेब, रामकुमार साहेब, रामहित साहेब, जयनारायण साहेब भुड़कुड़ा मठ की गद्दी पर आसीन हुए।
भुड़कुड़ा मठ की रामशाला में ठहरे थे चन्द्रशेखर आजाद
निर्गुनिया संत परंपरा की सतनामी पीठ भुड़कुड़ा मठ की 9वीं गद्दी पर साल 1925 में संत रामबरन दास विराजमान हुए। भुड़कुड़ा मठ के महान संतों में रामबरन दास साहेब का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। रामबरन दास साहेब ने अपने जीवनकाल में जरूरतमंदों और साधकों को मठ में आश्रय दिया।
संत साहित्य के प्रचार-प्रसार और जनसेवा में स्वयं को समर्पित करने वाले रामबरन दास साहेब के कार्यकाल में सभी के प्रति सेवा भाव और अनेक शिक्षण संस्थाओं का निर्माण कार्य शुरू हुआ। रामबरन दास साहेब ने सर्वप्रथम इण्टर कॉलेज की नींव रखी।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी इस सिद्धपीठ ने महती भूमिका निभाई थी। रामबरन दास साहेब के समय यह मठ गुप्त बैठकों और क्रांतिकारियों के छिपने का एक सुरक्षित ठिकाना माना जाता था। यह वही समय था जब साल 1925 में काकोरी काण्ड हो चुका था और चन्द्रशेखर आजाद की अगुवाई में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का पुनर्गठन हो चुका था।
जाहिर सी बात है, महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद के पीछे अंग्रेजी पुलिस हाथ धोकर पड़ी थी। ऐसे में चन्द्रशेखर आजाद अंग्रेजों की नजरों से बचने के लिए गुप्त रूप से इस ऐतिहासिक मठ में आए थे। इस दौरान चन्द्रशेखर आजाद भुड़कुड़ा मठ की रामशाला में ठहरे हुए थे। महंत रामबरन दास साहेब ने साल 1969 में समाधि ले ली। इसके बाद उनके प्रिय शिष्य महंत रामाश्रय दास भुड़कुड़ा मठ के पीठाधिपति बने।

महंथ रामाश्रय दास
श्रीसिद्धपीठ भुड़कुड़ा की दस समाधियों में आखिरी समाधि महंत रामाश्रय दास की है। साल 1919 में जन्में रामाश्रय दास बाल्यकाल में रेलमार्ग से काशी जा रहे थे किन्तु भूख-प्यास से व्याकुल होकर जखनियां स्टेशन पर ही उतर गए। वहां से किसी ने रामाश्रय दास को भुड़कुड़ा भेज दिया।
महंत रामबरन दास जी ने बालक रामाश्रय दास को मठ परिसर में शरण प्रदान की। महंत रामाश्रय दास की आध्यात्मिक उन्नति को देखते हुए रामबरन दास साहेब ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया। रामचरितमानस के मर्मज्ञ और शिक्षा के प्रति समर्पित रामाश्रय दास ने डिग्री कॉलेज की स्थापना की।
यह शिक्षण संस्थान वर्तमान में रामाश्रय दास स्नातकोत्तर महाविद्यालय के नाम से जाना जाता है। 14 मई 2008 को महंत रामाश्रय दास ब्रह्मलीन हो गए। वर्तमान में इस सिद्धपीठ की गद्दी पर शत्रुघ्नदास जी महाराज 11वें महंत के रूप में विराजमान हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि संत बूला साहेब के समय से ही भुड़कुड़ा मठ पर हर साल विजयदशमी के दिन विशाल मेला लगता है जिसमें दूर-दूराज के लोग शामिल होते हैं। अभी हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस ऐतिहासिक सिद्धपीठ के जीर्णोद्धार के लिए विशेष धनराशि स्वीकृत की है।
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