आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुपति शहर से तकरीबन 13 किमी. दक्षिणपूर्व में स्वर्णमुखी नदी के तट पर स्थित एक छोटे से गाँव गुडीमल्लम में गुडीमल्लम लिंगम मंदिर मौजूद है, जिसे ‘परशुरामेश्वर मंदिर’ भी कहा जाता है। गुडीमल्लम लिंगम मंदिर में मौजूद शिवलिंग को दुनिया का सबसे प्राचीन पूजित शिवलिंग माना जाता है।
हैरानी की बात है कि गुडीमल्लम लिंगम मंदिर का शिवलिंग जिस पत्थर से बना है, वह इस पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। यह पत्थर कहां से आया, इसे लेकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं। इस शिवलिंग का दूसरा अन्य उदाहरण इस दुनिया में कहीं नहीं मिलता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह शिवलिंग त्रेतायुग में आसमान से गिरा था, इसमें जबरदस्त ब्रह्माण्डीय ऊर्जा है।
इसी तरह से गुडीमल्लम लिंगम मंदिर से जुड़े कई अन्य ऐसे रहस्य हैं जिन्हें जानकर आप दंग रह जाएंगे। ऐसे में यदि आप भी भगवान शिव के अनन्य भक्त हैं तो इस जीवंत शिवलिंग के रहस्यों को जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
कहां हैं गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर
आन्ध प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुपति शहर से तकरीबन 13 किमी. दक्षिणपूर्व में स्वर्णमुखी नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा गांव गुड्डीमल्लम है। गुड्डीमल्लम गांव में ही गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर मौजूद है जिसे परशुरामेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। गुड्डीमल्लम में परशुरामेश्वर मंदिर के शिवलिंग की खोज साल 1913 में भारतीय पुरातत्वविद् टी.ए. गोपीनाथ राव ने की थी। साल 1973 में पुरातत्वविद् कार्तिकेय शर्मा ने इस जगह खुदाई के कार्य को थोड़ा आगे बढ़ाया। गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर यानि की परशुरामेश्वर मंदिर साल 1954 से ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग द्वारा संरक्षित है।
दुनिया का सबसे प्राचीन पूजित शिवलिंग
पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का इशारा करते हैं कि गुड्डीमल्लम लिंगम विश्व का सबसे प्राचीन एवं पूजित शिवलिंग है। पुरातात्विक साक्ष्यों के मुताबिक, गुड्डीमल्लम का शिवलिंग मंदिर भवन से तकरीबन 1300 साल पहले का है। विद्वानों के अनुसार, गुड्डीमल्लम लिंगम नामक शिवलिंग ईसा पूर्व तीसरी से दूसरी शताब्दी का है।
तकरीबन 2400 साल पुराना यह शिवलिंग दुनिया का सबसे प्राचीन शिवलिंग हैं जो जमीन के नीचे बना हुआ है। कुछ विद्वानों के अनुसार, गुड्डीमल्लम लिंगम एक स्वयंभू शिवलिंग है। सामान्यतया भारतवर्ष के प्रत्येक शिवलिंग गोल अथवा अण्डाकार होते हैं लेकिन इस अद्वितीय शिवलिंग का आकार पुरुषों के जननांग जैसा है।

लिंगम के सात फलक हैं जो अग्नि के सात जिह्वाओं और सूर्य के साथ घोड़ों के प्रतीक माने जाते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, गुड्डीमल्लम लिंगम का सम्बन्ध सिन्धु घाटी सभ्यता से भी है। मंदिर और लिंगम की बनावट में सिन्धु घाटी सभ्यता के चिह्न मिलते हैं जैसे - केसर का फूल, हाथी, भेड़ आदि।
इसकी संरचना किसी इंसानी तकनीक से परे प्रतीत होती है। अब तक वैज्ञानिक इस शिवलिंग की उत्पत्ति को स्पष्ट करने में असमर्थ रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह शिवलिंग त्रेतायुग में आसमान से गिरा था, इसमें जबरदस्त ब्रह्माडीय उर्जा है। हांलाकि कुछ विद्वानों के अनुसार, यह रहस्यमयी शिवलिंग पल्लव, चोल, और विजयनगर साम्राजय की अवधि का है। हांलाकि कुछ इतिहासकार परशुरामेश्वर मंदिर को सातवाहन काल का बताते हैं।
गुड्डीमल्लम लिंगम की विशेषता
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित गुडीमल्लम लिंगम विश्व का सबसे प्राचीन पूजित शिवलिंग है। परशुरामेश्वर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित गुडीमल्लम लिंगम नामक यह शिवलिंग पांच फीट पांच ईंच ऊँचा है। इस लिंग के अग्र भाग पर भगवान शिव की एक प्रतिमा उकेरी गई है, जिन्हें शिकारी के रूप में दर्शाया गया है और वे एक बौने के ऊपर खड़े हैं। मछली के आकार के पैरों और शंख के आकार के कानों वाले इस बौने को यक्ष बताया जाता है जो आध्यात्मिक अज्ञानता का प्रतिनिधित्व करता है।
शिकारी की आकृति में मौजूद भगवान शिव के दाहिने हाथ में एक मेंढा अथवा मृग है और बाएं हाथ में एक छोटा पानी का बर्तन पकड़े हुए है। जबकि बाएं कंधे पर एक युद्ध कुल्हाड़ी (परशु) है। भगवान शिव कानों में भारी झुमके, गले में हार है तथा कमर में एक करधनी धारण किए हुए हैं।

भगवान शिव की प्रत्येक कलाई में पांच कंगन हैं और प्रत्येक तरफ एक ऊँची बाजू की अंगूठी है। पगड़ी धारण किए हुए भगवान शिव के बाल लंबे और लटदार (जटा हुआ नहीं) हैं। भगवान शिव की प्रतिमा पर पतली सामग्री की धोती उकेरी गई है जिसे कमर पर वस्त्र-मेखला से बांधा गया है, यह लिंग के के चारों ओर फैली हुई है। गुड्डीमल्लम लिंगम पर उकेरी गई शिव प्रतिमा भारत सहित पूरी दुनिया में अद्भुत और इकलौती है। मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा में है, जहां से प्रांगण में प्रवेश होता है। प्रांगण में देवी पार्वती, कार्तिकेय और सूर्य देव के छोटे- छोटे मंदिर मौजूद हैं।
परशुरामेश्वर मंदिर से जुड़ी कहानी
परशुरामेश्वर मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कहानी भगवान परशुराम से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के 6वें अवतार परशुराम के पिता का नाम महर्षि जमदग्नि तथा माता का नाम रेणुका था। एक दिन परशुराम की माता रेणुका स्नान करने को गई, जिस समय वह स्नान करके आश्रम को लौट रही थीं, तभी उन्होंने गन्धर्वराज चित्ररथ को जलविहार करते देखा। यह दृश्य देखकर उनका मन विचलित हो उठा और जब वह घर लौटी तब उनका मलिन मुख देखकर महर्षि जमदग्नि पूरी बात जान गए।
तत्पश्चात क्रोधावेश में आकर महर्षि जमदग्नि ने अपने सभी पुत्रों (परशुराम, रुक्मवान, सुषेणु, वसु और विश्वावसु) से अपनी मां का वध करने को कहा लेकिन सभी ने ऐसा करने से मना कर दिया। इसके बाद परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा पूर्ण करने के लिए अपनी मां का गला काट दिया। ऐसे में पितृभक्त से प्रसन्न होकर महर्षि जमदग्नि ने परशुराम से वर मांगने को कहा। इसके बाद परशुराम ने तीन वर मांगे, पहला वर — माता रेणुका को पुनर्जीवित करने, दूसरा वर चारों भाइयों को ठीक करने तथा तीसरा वरदान उन्होंने स्वयं के अपराजेय एवं दीघार्यु होने का मांगा। महर्षि जमदग्नि ने अपने पुत्र परशुराम के तीनों वरदान पूर्ण किए।
बावजूद इसके मातृ वध के जघन्य पाप से मुक्ति पाने के लिए परशुराम ने भगवान शिव की घोर तपस्या शुरू की। मान्यता है कि परशुराम ने एक दिव्य जलाशय का निर्माण किया जिसमें प्रतिदिन एक दिव्य कमल पुष्प खिलता था। यह कमल पुष्प पूजा के दौरान परशुराम जी भगवान शिव को अर्पित करते थे।
परशुराम ने दिव्य कमल पुष्प की रक्षा के लिए यक्ष चित्रसेन को नियुक्त किया था। एक दिन परशुराम पूजा के लिए काफी देर से पहुंचे, इससे पूर्व ही चित्रसेन वह कमल पुष्प भगवान शिव को अर्पित कर चुका था। फिर क्या था, क्रोधित परशुराम ने चित्रसेन पर प्रहार किया जिससे इन दोनों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। आखिरकार इस युद्ध में हस्तक्षेप करने के लिए भगवान शिव को स्वयं आना पड़ा। भगवान शिव ने इस लिंगम में परशुराम और चित्रसेन को समाहित कर दिया। जनश्रुतियों के मुताबिक यह शिवलिंग ब्रह्मा को यक्षरूप में, विष्णु को परशुराम के रूप में तथा भगवान शिव को पुरुष लिंगाकार के रूप में दर्शाता है।
गुड्डीमल्लम लिंगम से जुड़े रहस्य
— गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित रहस्यमयी शिवलिंग जमीन के नीचे बना हुआ है।
— गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर का शिवलिंग जिस पत्थर से बना है, वह पत्थर इस पृथ्वी पर कहीं नहीं मिलता है। यह पत्थर कहां से आया, इसे लेकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं।
— गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर का अति प्राचीन शिवलिंग 60 साल में एक बार पानी में पूरी तरह से डूब जाता है, हांलाकि यह जल कुछ ही मिनटों में अचानक गायब हो जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह जल काशी से स्वयं आता है जो शिव का अभिषेक करने के बाद लुप्त हो जाता है।
— असंख्य श्रद्दालु भक्तों ने शिवलिंग के समक्ष ब्रह्माण्डीय ऊर्जा (super natural power) को महसूस किया है।
— कई साधकों ने गर्भगृह में रहस्यमयी आवाजें भी सुनी हैं।
— गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर में एक के बाद एक कई रहस्यमयी दरवाजे हैं।
— कहते हैं गुड्डीमल्लम लिंगम मंदिर में कई गुप्त सुरंगें हैं जो कालहस्ति मंदिर तक जाती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, उनके पूर्वज इन सुरंगों के रास्ते कालहस्ति मंदिर तक जाते थे।
— गुड्डीमल्लम लिंगम शिलालेखों में मंदिर का नाम परशुरामेश्वर मंदिर बताया गया है। जबकि इन शिलालेखों में मंदिर के मूल निर्माताओं का कहीं भी उल्लेख नहीं है।
— मंदिर की दीवारों और प्रांगण में पल्लव, यादव, बाण और चोल काल के कई शिलालेख (संस्कृत और तमिल में) हैं जो मंदिर में हुए विभिन्न पुनर्निर्माण और विस्तार के साथ दान (भूमि, धन और गाय) आदि के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।
— इस शिव प्रतिमा को किसने और कैसे बनाया? क्योंकि तकरीबन दो हजार चार सौ वर्ष पहले ऐसी कोई इलेक्ट्रॉनिक अथवा वैज्ञानिक तकनीक नहीं थी, जिससे मूर्तिकार इतनी अद्भुत एवं बारीक कलाकारी वाली प्रतिमा बना सके। शिल्पकार की एक छोटी सी गलती से शिवलिंग सहित पूरी प्रतिमा विखण्डित हो सकती है।
— आखिर में सवाल यह उठता है कि गुड्डीमल्लम गांव के परशुरामेश्वर मंदिर की शिवप्रतिमा को किसी इंसान ने बनाया है अथवा किसी दैवीय शक्ति ने?
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