हनुमान जी को अमर और अजर (बुढ़ापे से रहित) होने का वरदान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के सात चिरंजीवियों में भगवान हनुमान, विभीषण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, राजा महाबली, वेद व्यास और परशुराम का नाम शामिल है। किन्तु इनमें से हनुमानजी ही एकमात्र चिरंजीवी ऐसे हैं जिन्हें कलियुग का ‘जागृत देवता’ कहा जाता है।
दोस्तों, त्रेता और द्वापर युग में हनुमान जी के मौजूद होने के अनेकों वर्णन हैं, किन्तु कलियुग में भी हनुमानजी से जुड़े ऐसे कई साक्ष्य हैं जिनमें उनके द्वारा सशरीर दर्शन देने की बात पुख्ता होती है। इस वर्ष 2 अप्रैल को हनुमान जयंती है, इसलिए इस रोचक स्टोरी में हम आप से कलियुग की उन घटनाओं का उल्लेख करेंगे जिनमें हनुमान जी द्वारा सशरीर मौजूद होने की जानकारी मिलती है।
मां सीता ने दिया था अमरता का वरदान
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, कलियुग के एकमात्र जागृत देवता हनुमान जी स्वयं रुद्रावतार (शिव का रूप) हैं, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से अमर हैं। किन्तु रामायण के विभिन्न संस्करणों विशेषकर गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि माता सीता ने ही हनुमानजी को अजर-अमर होने का वरदान दिया था।

रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में वर्णित है कि माता सीता के खोज में निकले असंख्य वानरों में से सिर्फ हनुमानजी को ही सर्वप्रथम उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हनुमानजी ने समुद्र पारकर लंकापति रावण की अशोक वाटिका में कैद माता सीता को श्रीराम जी का संदेश सुनाया और रामनामी मुद्रिका (अंगूठी) देकर उन्हें यह विश्वास दिलाया कि प्रभु श्रीराम जल्द ही लंका आ आएंगे और रावण का सर्वनाश कर उन्हें मुक्त कराएंगे।
तत्पश्चात माता सीता ने प्रसन्न होकर हनुमानजी को अमरता का आशीर्वाद दिया था। इस तथ्य को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ इस प्रकार लिखा है - “अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥” इसका हिन्दी भावार्थ है - हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें।
वहीं, गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी लोकप्रिय कृति हनुमान चालीसा में भी उल्लेख किया है कि माता सीता ने हनुमान जी को आठ दिव्य सिद्धियां (शक्तियां) और नौ निधियों के दाता होने का वरदान दिया था। हनुमान चालीसा की वह चौपाई कुछ इस प्रकार है - 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता' अर्थात मां जानकी ने वरदान दिया कि हे पुत्र तुम आठ सिद्धियों और नव निधियों के दाता बन जाओ।
कलियुग के अंत तक रहने का मिला था आदेश
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, 14 वर्षों तक वनवास भोगने के पश्चात भगवान श्रीराम ने अयोध्या पर 11 हजार वर्षों तक शासन किया था, जिसे हम सभी ‘रामराज्य’ के रूप में जानते हैं। किन्तु 11 हजार वर्षों की शासन अवधि के प्रश्न पर कुछ विद्वानों का कहना है कि यह गणना अहोरेव संवत्सर (अर्थात 1 दिन = 1 वर्ष) के अनुसार है, जिसके मुताबिक प्रभु श्रीराम ने राजा के रूप में अयोध्या पर 30 वर्ष 6 महीने तक शासन किया।
तत्पश्चात श्रीराम ने अपना देह त्यागकर सरयू नदी में जल समाधि ले ली और विष्णु स्वरूप में वापस लौटकर बैकुण्ठ धाम प्रस्थान किया। ऐसा उल्लेख मिलता है कि बैकुण्ठ धाम जाते समय प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी को कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर रहकर धर्म की रक्षा करने और भक्तों का कल्याण करने का आदेश दिया था।
गन्धमादन पर्वत रहते हैं हनुमानजी
हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित है कि माता सीता और प्रभु श्रीराम से अमरता का वरदान प्राप्त करने वाले हनुमान जी आज भी सशरीर गन्धमादन पर्वत रहते हैं। महाकाव्य रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा पुराणों में गन्धमादन पर्वत को गन्धर्वों, किन्नरों, अप्सराओं, ऋषियों, सिद्धों, चारणों सहित हनुमानजी का निवास स्थान बताया गया है। इसके अतिरिक्त रामायण के परम विद्वान और जगद्गुरू रामभद्राचार्य जी ने भी अपनी टाकाओं तथा प्रवचनों में हनुमान जी के सन्दर्भ में गन्धमादन पर्वत का ही उल्लेख किया है।

हिन्दू धर्मग्रन्थों से इतर बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में भी गन्धमादन पर्वत का उल्लेख मिलता है। गन्धमादन पर्वत का अर्थ है – “सुगन्ध से उन्मत करने वाला पहाड़”। गन्धमादन पर्वत का एक नाम यक्षलोक भी है जहां महर्षि कश्यप ने तपस्या की थी।
पुराणों के मुताबिक, लंकापति रावण द्वारा स्वर्ण नगरी लंका छीने लिए जाने के पश्चात कुबेर ने गन्धमादन पर्वत पर ही निवास किया था। इस पर्वत पर पहुंचना जनसामान्य के लिए असम्भव माना जाता है। पुराणों के अनुसार, हनुमान जी त्रेता तथा द्वापर युग में गन्धमादन पर्वत पर ही ध्यान-साधना किया करते थे।
गन्धमादन पर्वत अपने कमल पुष्पों वाले अद्भुत सरोवर के लिए विख्यात है। ऐसी मान्यता है कि गन्धमादन पर्वत पर प्रभु श्रीराम का एक प्राचीन मंदिर है जहां प्रत्येक दिन हनुमान जी उन्हें एक कमल पुष्प अर्पित करते हैं। महाभारत महाकाव्य के अनुसार, एक बार नकली कृष्ण बने राजा पौण्ड्रक ने द्विवीद वानर को कमल पुष्प लाने के लिए गन्धमादन पर्वत पर भेजा था किन्तु हनुमान जी ने उसे वहां से भगा दिया था।
महाभारत में यह भी उल्लेख मिलता है कि अज्ञातवास के दौरान पाण्डु पुत्र भीम सहस्रदल कमल पुष्प लेने के लिए हिमवंत पार करके गन्धमादन पहुंचे थे, जहां उनकी मुलाकात हनुमान जी से हुई थी। गन्धमादन पर्वत पर ही हनुमानजी ने भीम के अति बलशाली होने का घमंड तोड़ा था। तत्पश्चात भीम के अनुनय-विनय करने पर हनुमानजी ने अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया था। महाभारत में गांडीवधारी अर्जुन द्वारा भी इन्द्रलोक जाते समय गन्धमादन पर्वत का उल्लेख मिलता है।
कलियुग में हनुमान जी द्वारा सशरीर दर्शन देने के साक्ष्य
त्रेता और द्वापर युग से इतर वर्तमान कलिकाल में भी कई महान शख्सियतों को हनुमान जी द्वारा साक्षात दर्शन देने का उल्लेख मिलता है। इनमें से कुछ नाम निम्नलिखित हैं—
1. गोस्वामी तुलसीदास
पौराणिक कथाओं के अनुसार, उत्तर भारत के सबसे लोकप्रिय ग्रन्थ ‘रामचरितमानस’ के लेखक गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज को हनुमान जी ने न केवल दर्शन दिए अपितु चित्रकूट में प्रभु श्रीराम के दर्शन भी करवाए। हनुमान जी द्वारा तुलसीदास जी से जुड़ी उक्त चर्चित चौपाई कुछ इस प्रकार है — “चित्रकूट के घाट पै, भई संतन भी भीड़। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुवीर”।। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमानजी की महिमा का गुणगान करते हुए हनुमान चालीसा, 'बजरंग बाण' और 'हनुमान बहुक' जैसी कई चर्चित कृतियां लिखीं।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा हनुमानजी के सर्वप्रथम दर्शन की कथा इस प्रकार मिलती है — दरअसल गोस्वामी जी काशी के प्रह्लाद घाट पर वाल्मीकी रामायण की कथा सुनने जाया करते थे। इस दौरान एक विचित्र घटना घटी, तुलसीदास जी प्रतिदिन शौच के लिए जंगल में जाते और लौटते समय लोटे में बचे शेष जल को पीपल वृक्ष के नीचे गिरा देते थे। उस पीपल पर एक प्रेत रहता था।
चूंकि उस जल से प्रेत की आत्मा तृप्त हो जाती थी, इससे प्रसन्न होकर उस प्रेत ने तुलसीदास जी से कहा— मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करना चाहता हूं। इस पर तुलसीदासजी ने कहा कि मैं भगवान श्रीराम के दर्शन करना चाहता हूं। तब प्रेत ने कहा कि मुझमें इतनी सार्मथ्य नहीं है कि मैं तुम्हें श्रीराम के दर्शन करवा सकूं किन्तु हां, रामायण कथा सुनने के लिए हनुमानजी प्रतिदिन यहां कोढ़ी वेष में आते हैं।
प्रेत ने हनुमान जी की पहचान बताते हुए कहा कि राम कथा के समय वह सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं, इसलिए समय देखकर तुम उनके चरण पकड़ लेना, वही तुम्हें श्रीराम के दर्शन करवाएंगे। इसके आगे हुनमानजी द्वारा तुलसीदास को दर्शन देने की कथा सर्वविदित है।
2. गुरु समर्थ रामदास
छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु समर्थ रामदास ने 'दासबोध' और 'मनाचे श्लोक' जैसे ग्रंथों के माध्यम से भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग का संदेश दिया। अनेक पौराणिक कथाओं में गुरु समर्थ रामदास स्वामी को हनुमानजी के दर्शन और उनके साथ संवाद के कई प्रसंग मिलते हैं।

चर्चित कथा के अनुसार, एक बार गुरु समर्थ रामदास जी श्रीराम कथा सुना रहे थे तब हनुमान जी भी तपस्वी भेष बदलकर सामने बैठे हुए थे। रामकथा के दौरान जब गुरु समर्थ रामदास ने कहा कि हनुमान जी ने अशोक वाटिका में सीताजी को देखा तब श्वेत पुष्प खिले हुए थे। तब हनुमानजी ने आपत्ति जताते हुए कहा कि नहीं, लाल पुष्प थे। इसके बाद रामदास जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से सत्य सिद्ध किया और रामजी के हस्तक्षेप से हनुमान जी ने क्षमा मांगी। हनुमान जी के अवतार माने जाने वाले गुरु समर्थ रामदास महाराष्ट्र में 11 हनुमान (मारुति) मंदिरों की स्थापना की, जो युवाओं के लिए स्वास्थ्य और राष्ट्र सेवा के प्रेरणा स्रोत बने।
3. नीम करौली बाबा
उत्तराखंड में कैंची धाम आश्रम के संस्थापक नीम करौली बाबा का जीवन चमत्कारों से भरा था। बाबा नीम करौली बचपन से ही हनुमान जी के परम भक्त थे और उन्हें हनुमान जी के साक्षात दर्शन भी हुए थे। बाबा नीम करौली को हनुमान जी का अवतार माना जाता है।

बाबा नीम करौली ने देशभर में हनुमान जी के 108 अधिक मंदिर बनवाए, जिनमें नैनीताल का प्रसिद्ध कैंची धाम प्रमुख है। बाबा नीम करौली कहा करते थे कि मेरा पैर छूने के बजाय हनुमान जी के पैर छूना चाहिए। बाबा ने कहा कि हनुमान चालीसा पढ़ने से जीवन में खुशहाली आती है।
हाल के दिनों में एक कथा वाचक हैं धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जो अपनी दिव्य शक्ति से लोगों के मन की बात व समस्याओं का पर्चा लिखने के लिए विख्यात हैं। धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री भी अपनी इस शक्ति का श्रेय हनुमान जी की कृपा को ही देते हैं, न कि किसी जादू-टोटेक को।
भगवान कल्कि के रक्षक की भूमिका निभाएंगे हनुमान जी
कल्कि पुराण के मुताबिक, कलियुग के अंत में पाप एवं अधर्म आचरण बढ़ने पर भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि का जन्म होगा। इस दौरान चिरंजीवी (अमर) हनुमान जी दुष्ट शक्तियों का विनाश करने में भगवान कल्कि के रक्षक और मुख्य सहयोगी की भूमिका निभाएंगे। इतना ही नहीं, हनुमान जी उन्हें दिव्य अस्त्र (जैसे राम का धनुष) सौंपेंगे और राम-भक्ति का संदेश पुनः स्थापित करने में मार्गदर्शन करेंगे।
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