मुगल साम्राज्य के आखिरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से महज 6 साल पहले दिल्ली की यमुना नदी में मगरमच्छ का शिकार किया था। उर्दू के मशहूर शायर बहादुर शाह ज़फ़र को यमुना नदी की सैर करना काफी पसंद था।
बहादुर शाह ज़फ़र अप्रैल-मई के महीनों में भी यमुना नदी की सैर किया करते थे। बहादुर शाह जफर ने साल 1851 में क्रिसमस के दिन यमुना नदी पारकर एक ऐसे मगरमच्छ का शिकार किया, जिसने उन्हें काफी दुख पहुंचाया था।
अब आपका सोचना लाजिमी है कि आखिर में किस घटना से दुखी होकर बहादुर शाह जफर ने यमुना नदी में मगरमच्छ का शिकार किया था? बहादुर शाह जफर द्वारा मगरमच्छ के शिकार से जुड़ा सच जानने के लिए इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें।
यमुना नदी में थी मगरमच्छों की भरमार
साल 1883-84 के दिल्ली गज़ेटियर के मुताबिक, “यमुना नदी में बहुत ज्यादा मगरमच्छ थे। दिल्ली स्थित पुराने किले के पास मगरमच्छों को धूप सेंकते हुए आसानी से देखा जा सकता था। यमुना नदी के मगरमच्छ अंग्रेज अफसरों और सिपाहियों के लिए मनोरंजन का साधन हुआ करते थे, जो इन मगरमच्छों पर बड़े आराम से गोलियां चलाया करते थे।”
वैसे तो प्राकृतिक रूप से यमुना नदी में मगरमच्छ और घड़ियाल पाए जाते हैं किन्तु दिल्ली या आसपास के शहरी इलाकों में इनका दिखना बहुत सामान्य नहीं है। किन्तु प्रख्यात इतिहासकार आर.वी. स्मिथ अपने आर्टिकल्स लिखते हैं कि “मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के दिनों में दिल्ली की यमुना नदी में मगरमच्छ बेखौफ घूमते थे और धोबियों-मछुआरों की जान को खतरा पैदा करते थे।”

मछली मारने तथा तैराकी के शौकीन थे मुगल शहजादे
मुगलिया शासनकाल में शुरूआत से ही शहजादों को यमुना नदी में तैराकी करने और मछली पकड़ने का शौक था। बतौर उदाहरण- शहजादे सलीम (जहांगीर) को बेहतरीन तैराक होने के नाते 'उस्ताद-ए-तैराकी' की उपाधि दी गई थी। यमुना किनारे सावन-भादों के महीने में तैराकी का मेला लगता था।
फ्रांसीसी यात्री बर्नियर अपनी किताब ‘ट्रैवल्स इन द मुगल्स एम्पायर’ लिखता है कि “शाही नावों को ‘बजरा’ कहा जाता था जो रात में यमुना नदी पर तैरती थीं। इन शाही नावों में दीपक जलते थे तथा संगीत की धुनें बजती थीं”। मुगल शहजादों के अलावा हरम की बेगमें व शहजादियां गर्मियों की रात में यमुना नदी में स्नान तथा नौकायन करती थीं।
हालांकि, कुछ मुगल शहजादों का मछली पकड़ने का यह शौक जानलेवा भी साबित हुआ। दरअसल, साल 1851 में मिर्जा कौस शेखन का 17 वर्षीय बेटा मिर्जा कलां गर्मियों की दोपहर में दिल्ली की यमुना नदी में मछली पकड़ रहा था, तभी उसे एक मगरमच्छ ने अपना निवाला बना लिया।
बहादुर शाह जफर ने किया मगरमच्छ का शिकार
मुगल साम्राज्य के आखिरी बादशाह, प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अगुवा और उर्दू के मशहूर शायर बहादुर शाह ज़फ़र को यमुना नदी की सैर करना काफी पसंद था। वह अप्रैल-मई के महीनों में भी यमुना नदी की सैर किया करते थे।
मशहूर इतिहासकार पर्सिवल स्पीयर ने अपनी चर्चित किताब ‘ट्वाइलाइट ऑफ़ द मुग़ल्स’ में बहादुर शाह ज़फ़र की उस डायरी का ज़िक्र किया है, जिसमें उनके रोज़ाना के कामकाज का ब्यौरा दिया गया है। दरअसल पर्सिवल स्पीयर को बहादुर शाह जफर की यह शाही डायरी भारत सरकार के विदेश व राजनीति विभाग से मिली थी।
पर्सिवल स्पीयर की चर्चित किताब ‘ट्वाइलाइट ऑफ़ द मुग़ल्स’ में इस घटना का उल्लेख मिलता है कि साल 1851 में मुगल बादशाह जफर एक, दो और तीन मई को यमुना नदी के भ्रमण पर गए। 4 मई को बहादुर शाह जफर को पटना से प्राप्त अफीम के दो डिब्बे भेंट किए गए। तत्पश्चात 12 मई की शाम 4 बजे बहादुर शाह जफर को यह खबर मिली कि मिर्जा कौस शेखन के 17 साल के लड़के को यमुना नदी में मछली पकड़ते समय एक मगरमच्छ ने अपना निवाला बना लिया।
कहते हैं इस घटना के बाद, शाही दरबार के ज्योतिषियों और सूफी पीरों ने अंतिम मुगल बादशाह को उस मगरमच्छ का शिकार करने की सलाह दी थी। फिर क्या था, साल 1851 में 25 दिसंबर को क्रिसमस के दिन बादशाह बहादुर शाह जफर ने यमुना नदी पार करके उस मगरमच्छ का शिकार किया।
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