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The history of India's national flag: From the Vajra flag to the tiranga

भारत के राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास : वज्र ध्वज से लेकर तिरंगे तक

साल 2026 में भारत वर्ष 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। इस अवसर पर भारत गणराज्य के राष्ट्रपति दिल्ली के कर्तव्य पथ पर तिरंगा फहराते हैं। इसके अतिरिक्त देश के हर कोने मे जगह-जगह राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का वन्दन होता है, इतना ही नहीं, विश्वभर में फैले भारतीय दूतावास तथा भारतीय मूल के लोग भी तिरंगे को सॉल्यूट कर गणतंत्र दिवस पूरे हर्षोल्लास के साथ मनातें हैं।

जी हां! दोस्तों, यह सच है कि राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस से जुड़े इतिहास के बारे में तकरीबन हर भारतीय वाकिफ है किन्तु इस शुभ अवसर पर फहराए जाने वाले राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का जन्म कैसे हुआ? ऐसे में ब्रिटिश भारत से लेकर आज तक राष्ट्रीय ध्वज का रोचक इतिहास जानने के लिए यह स्टोरी जरूर पढ़ें।

राष्ट्रीय ध्वज का जन्म

1. वज्र ध्वज

साल 1904 में स्वामी विवेकानन्द की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने जगदीश चन्द्र बोस, रवीन्द्रनाथ टैगोर, इतिहासकार यदुनाथ सरकार और स्टे्टसमैन के सम्पादक आर्थर मूथ के साथ बोधगया की यात्रा के दौरान पहली बार वज्र प्रतीक देखा। सिस्टर निवेदता ने पाया कि सनातनी धर्मग्रन्थों में वज्र का उल्लेख देवराज इन्द्र और देवी दुर्गा के परमशक्तिशाली अस्त्र के रूप में किया गया है।

इसके बाद साल 1905 में सिस्टर निवेदिता ने राष्ट्रीय ध्वज का डिजाइन किया था, जिसे वज्र ध्वज के नाम से जाना जाता है। लाल और पीले रंग के वज्र ध्वज के केन्द्र में वज्र, सफेद कमल और दोनों तरफ बंगाली में वंदेमातरम लिखा हुआ था। वज्र ध्वज पर एक सफेद कमल और 101 दीपों की एक कतार भी थी।

शक्ति, आत्मत्याग और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक था वज्र ध्वज। वज्र ध्वज का उपयोग बंगाल विभाजन के दौरान कई रैलियों तथा सभाओं में किया गया। इसके अतिरिक्त साल 1906 में वज्र ध्वज को कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में भी प्रदर्शित किया गया।

2. कमल ध्वज

ब्रिटिश हुकूमत द्वारा किए बंगाल विभाजन के विरोध में कलकत्ता के पारसी बागान स्क्वेयर (ग्रीन पार्क) में आयोजित रैली में 7 अगस्त 1906 को एक राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया जिसे हम सभी कमल ध्वज के नाम से जानते हैं। इसे कलकत्ता ध्वज भी कहा जाता है। कमल ध्वज को श्री अरबिन्द घोष के निकटस्थ सहयोगी सचिंद्र प्रसाद बोस और हेमचंद्र कानूनगो ने डिजाइन किया था।

कमल ध्वज में हरे, पीले और लाल रंग की तीन क्षैतिज पट्टियां बनी हुई थीं। कमल ध्वज के सबसे ऊपर हरी पट्टी पर आठ अर्ध-खिले हुए कमल अंकित थे, जो तत्कालीन ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आने वाले भारत में आठ बड़े प्रांतों के अलावा, रियासतें भी थीं। इनमें हैदराबाद और मैसूर जैसी कुछ रियासतें यूरोपीय देशों जितनी बड़ी थीं, जबकि अन्य आज के जिलों के आकार जितनी ही थीं।

कमल ध्वज के मध्य में पीली पट्टी पर देवनागरी लिपि में 'वंदे मातरम' लिखा था। जबकि कमल ध्वज के निचले हिस्से में लाल रंग की पटटी थी जिस पर सूर्य और एक अर्धचंद्र (चांद) बना था, जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक था। कमल ध्वज साल 1905-1906 के दौरान बंग-भंग और स्वदेशी आन्दोलन का प्रतीक बन चुका था।

3. सप्तऋषि ध्वज

साल 1907 में महिला क्रांतिकारी मैडम भीकाजी कामा ने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी में आयोजित इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। अपने सम्बोधन में मैडम भीकाजी कामा ने कहा कि यह भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज है, इसका जन्म हो चुका है। यहां उपस्थित सभी महानुभावों से मेरा निवेदन है कि सब खड़े होकर हिन्दुस्तान की आजादी के इस ध्वज की वंदना करें।

सप्तऋषि ध्वज को डिजाइन करने का श्रेय मैडम भीकाजी कामा, विनायक दामोदर सावरकर, श्यामजी कृष्ण वर्मा को जाता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बने इस राष्ट्रीय ध्वज को सप्तऋषि ध्वज के नाम से जाना जाता है। हरे, पीले और लाल रंग के सप्तऋषि ध्वज में आठ कमल, वन्दे मातरम, सूर्य, अर्धचंद्र और 7 सितारे (सप्तऋषि) बने थे।

सप्तऋषि ध्वज के उपरी हिस्से में हरा रंग, मध्य में पीला तथा नीचे लाल रंग की पट्टी बनी हुई थी। आठ कमल तत्कालीन ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे। जबकि सप्तऋषि ध्वज के ऊपरी हरी पट्टी पर 7 तारे, मध्य की पीली पट्टी पर देवनागरी में वंदे मातरम अंकित ​था तथा नीचे लाल रंग की पट्टी पर हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक सूर्य और अर्धचंद्र बना हुए थे। सप्तऋषि ध्वज विदेशी धरती पर फहराया गया पहला भारतीय झंडा था।

4. होमरुल फ्लैग

साल 1917 में बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने ब्रिटिश भारत में होमरूल आंदोलन की शुरूआत की। होमरूल आन्दोलन का उद्देश्य संवैधानिक तरीकों से ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन प्राप्त करना था।

बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेन्ट के नेतृत्व में ब्रिटिश साम्राज्य के अंदर स्वशासन की मांग को प्रदर्शित करने वाला एक ध्वज भी अपनाया गया जिसे आधुनिक भारत के इतिहास में होमरूल फ्लैग (1917) के नाम से जाना जाता है।

होम रूल फ्लैग में पांच लाल और चार हरी क्षैतिज पट्टियां, ऊपरी बाएं कोने में 'यूनियन जैक' दाईं ओर सात सफेद सितारे (सप्तऋषि) व एक अर्धचंद्र-तारा अंकित था। इस ध्वज पर बने चांद-सितारें भारतीय संस्कृति एवं स्वशासन के प्रतीक थे जबकि यूनियन जैक ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर अधिराज्य की मांग को दर्शाता था। होमरूल आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों की कड़ी प्रतिक्रिया के बावजूद इस ध्वज को फहराया गया हांलाकि यह ध्वज आमजन के बीच ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ।

5. स्वराज ध्वज

आन्ध्र प्रदेश के काकीनाडा में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में फ्रीडम फाइटर पिंगली वैंकैया ने भारत का राष्ट्रीय ध्वज होने की बात कही। इसके बाद गांधीजी ने उन्हें राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप तैयार करने सुझाव दिया। फिर क्या था, पिंगली वैंकैया ने 5 सालों तक तीस देशों के राष्ट्रीय ध्वजों पर शोध करने के पश्चात साल 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गांधी से मुलाकात की और उन्हें अपने द्वारा डिज़ाइन किया हुआ लाल और हरे रंग का झंडा दिखाया।

तत्पश्चात महात्मा गांधी के सुझाव पर पिंगली वैंकैया द्वारा डिजाइन किए हुए लाल एवं हरे रंगे के स्वराज ध्वज के बीच में सफेद पट्टी और केंद्र में चरखा अंकित किया गया, क्योंकि चरखा उन दिनों अंग्रेज़ों के खिलाफ क्रांति का प्रतीक था। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के सभी अधिवेशनों में दो रंगों वाले झंडे का प्रयोग किया जाने लगा जिसके मध्य में चरखा अंकित था।

स्वराज ध्वज को अगस्त 1931 में कांग्रेस कराची अधिवेशन में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। बाद में स्वराज ध्वज में अंकित लाल रंग की जगह बलिदान का प्रतीक केसरिया, शांति और पवित्रता का प्रतीक सफेद तथा समृद्धि एवं आशा के प्रतीक हरे रंग को चयनित किया गया।

6. भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

जब देश आजाद हुआ तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता वाली एक समिति ने स्वराज ध्वज को चुनते हुए उसमें चरखे की जगह 24 तीलियों वाले अशोक चक्र को लगाया जिसे आज हम सभी भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के रूप में जानते हैं। कहा जाता है कि जब तिरंगे में चरखे की जगह अशोक चक्र लिया गया तो महात्मा गांधी काफी नाराज हो गए थे। तिरंगे के वर्तमान स्वरूप को भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान 22 जुलाई 1947 ई. को अपनाया गया था। इसके बाद 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच इसे भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया। 

तिरंगे से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

तिरंगे के मध्य में अंकित अशोक चक्र में सिर्फ 24 तिल्लियां होनी आवश्यक हैं, इसका कोई माप नहीं है।

तिरंगे पर कुछ भी बनाना या लिखना गैरकानूनी है। किसी भी गाड़ी के पीछे, बोट या प्लेन में तिरंगा नहीं लगाया जा सकता।  

किसी भी स्थिति में तिरंगा जमीन पर टच नहीं होना चाहिए।

तिरंगे में प्रयुक्त केसरिया रंग साहस, सफेद रंग शांति और हरा रंग समृद्धि का प्रतीक है।

तिरंगे के सफेद पट्टी के बीच में अंकित 24 तीलियों वाला गहरा नीला 'अशोक चक्र' धर्म और निरंतर प्रगति का प्रतीक है।

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया, इसके बाद देश के आम नागरिकों के घरों या ऑफिस में सामान्य दिनों में भी तिरंगा फहराने की अनुमति मिल गई।  

तिरंगे को रात में फहराने की अनुमति साल 2009 में मिली।

किसी अन्य ध्‍वज पट्ट को राष्ट्रीय ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाने की अनुमति नहीं है।

आजाद भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को डिजाइन करने का श्रेय पिंगली वैंकैया को जाता है।

तिरंगे के डिजाइनर पिंगली वैंकैया एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, व्याख्याता, लेखक, भूविज्ञानी, शिक्षाविद, कृषक और बहुभाषी व्यक्तित्व के धनी थे।

पिंगली वेंकैया द्वारा डिजाइन किए गए तिरंगे का अनुपात 3 : 2 है।

तिरंगे को डिजाइन करने वाले पिंगली वेंकैया के सम्मान में भारत सरकार ने साल 2009 में एक डाक टिकट जारी किया।

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