ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल (वायसराय) लार्ड कर्जन (1898-1905) का सबसे विवादास्पद कार्य था बंगाल विभाजन। लार्ड कर्जन के अनुसार, “अंग्रेजी हुकूमत का यह प्रयास कलकत्ता को सिंहासनाच्युत करना था, बंगाली आबादी का बंटवारा करना तथा ऐसे केन्द्र को समाप्त करना था जहां से बंगाल सहित पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का संचालन होता था और साजिशें रची जाती थीं।” बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रवाद पर एक प्रछन्न प्रहार था, यही वजह है कि लार्ड कर्जन को ‘भारतीय राष्ट्रवाद का उत्प्रेरक’ कहा जाता है।
भारत का सबसे बड़ा प्रान्त था बंगाल
ब्रिटिश हुकूमत के बंगाल विभाजन के निर्णय से बंगालवासी जितने क्रोधित और क्षुब्ध हुए, वह अप्रत्याशित था। उस समय बंगाल प्रांत का क्षेत्रफल 489,500 वर्ग किलोमीटर था और कुल आबादी साढ़े आठ करोड़ थी जो ब्रिटिश भारत की कुल आबादी का तकरीबन एक चौथाई। एक अन्य तथ्य के मुताबिक, बंगाल प्रान्त तकरीबन फ़्रांस जितना बड़ा था जबकि उसकी जनसंख्या फ़्रांस से भी अधिक थी।
बंगाल प्रेसिडेन्सी में पूर्वी तथा पश्चिमी बंगाल सहित बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे। बंगाल से असम साल 1874 में ही अलग हो चुका था। अंग्रेजी सरकार ने बंगाल को विभाजित करने का कारण यह बताया कि इतने बड़े प्रान्त को विभाजित किए बिना शासन सुव्यस्थित रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता।
किन्तु सच यह है कि अंग्रेजों ने इतने बड़े राज्य के बंटवारे का निर्णय प्रशासनिक कारणों से नहीं अपितु राजनीतिक कारणों से लिया। दरअसल बंगाल उन दिनों भारतीय राष्ट्रीय चेतना का केन्द्र बिन्दु था, ऐसे में अंग्रेजों ने इसी जुझारू चेतना पर आघात करने के लिए बंगाल विभाजन का निर्णय लिया।
धार्मिक आधार पर विभाजन
बंगाल विभाजन में ही अंग्रेजों ने धार्मिक विभाजन की भी शुरूआत की। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने कांग्रेस तथा राष्ट्रीय आन्दोलन को कमजोर करने के लिए मुस्लिम साम्प्रदायिकता को भड़काने का काम शुरू किया।
लार्ड कर्जन का भाषण इस तथ्य की पुष्टि करता है, कर्जन ने कहा- “बंगाल विभाजन के बाद ढाका बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले नए प्रान्त की राजधानी बन जाएगा। इससे पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की एकता स्थापित होगी। मुसलमानों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और पूर्वी जिले कलकत्ता की राजशाही से मुक्त हो जाएंगे।”
इस प्रकार धार्मिक आधार पर बंगाल विभाजन से साम्प्रदायिकता का जो छुटपुट विकास हुआ उसकी चरम परिणति साल 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना के रूप में हुई, जिसका गठन बंगाल में ही हुआ।
दिसम्बर, 1903 में बंगाल के तत्कालीन गवर्नर सर एन्ड्रूय फ्रेजर ने बंगाल विभाजन का प्रस्ताव रखा जिसकी जानकारी मिलते ही विरोध की जबरदस्त लहर उठी, जिनमें बंगाली समाज के सभी राजनेता, बुद्धिजीवी तथा आमजन शामिल थे। शुरूआती दो महीने में ही पूर्वी बंगाल में विभाजन के खिलाफ ढाका, मैमन सिंह और चटगांव में तकरीबन 500 बैठकें हुईं। बंगाल विभाजन के खिलाफ पूरे बंगाल में 40 से 50 हजार पर्चे बांटे गए।
‘ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन’, ‘बंगाल लैण्ड होल्डर एसोसिएशन’ जैसे संगठनों ने भी बंगाल विभाजन का विरोध कर इसे रद्द करने की मांग की। कांग्रेस ने भी साल 1903 से लेकर 1906 तक अपने प्रत्येक सत्र में बंगाल विभाजन का विरोध किया और इसे रद्द करने की मांग की।
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्णकुमार मित्र तथा पृथ्वीशचन्द्रराय ने 'बंगाली', 'हितवादी' एवं 'संजीवनी' जैसे अखबारों के जरिए बंगाल विभाजन का विरोध किया। मार्च 1904 और जनवरी 1905 के बीच कलकत्ता टाउन हाल में कई विशाल विरोध सभाएं हुईं।
बंगाल विभाजन के विरोध में भारत सरकार गृह सचिव के नाम तमाम याचिकाएं भेजी गईं। इनमें से कुछ याचिकाओं पर 70 हजार से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर थे। कुल मिलाकर 1903 से 1905 की अवधि में आवदेनबाजी, ज्ञापनबाजी, भाषणबाजी, जनसभाओं का आयोजन तथा प्रेस के माध्यम से प्रचार-प्रसार तेजी से शुरू हो चुका था।
इसका मुख्य उद्देश्य बंगाल विभाजन के विरूद्ध भारत एवं ब्रिटेन में जनमत तैयार करना था। आन्दोलनकारियों को यह विश्वास था कि ऐसा करने से अंग्रेजी हुकूमत पर दबाव पड़ेगा और वह विभाजन जैसा अन्यायी कदम उठाने से हिचकेगी। किन्तु ठीक इसके विपरीत अंग्रेजी हुकूमत पर इस जनविरोध का कोई असर नहीं हुआ और भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने 19 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन की घोषणा कर दी।
बंगाल विभाजन की घोषणा के तुरन्त बाद ही दिनाजपुर, पाबना, फरीदपुर, टंगाइल, जैसोर, ढाका, वीरभूमि, बारीसाल व अन्य कस्बों में विरोध सभाएं आयोजित की गईं। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता टाउन हाल में स्वदेशी आन्दोलन की घोषणा हुई तथा बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ। 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन की योजना प्रभावी हो गई।
अंग्रेजों द्वारा नवगठित बंगाल प्रान्त
बंगाल को पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल के रूप में बांट दिया गया। पश्चिम बंगाल में मुख्यतः हिन्दू बाहुल्य आबादी जबकि पूर्वी बंगाल में मुस्लिम बाहुल्य आबादी है। पूर्वी बंगाल के नवनियुक्त लेफ्टिनेन्ट गवर्नर सर जोसेफ बेमफायल्ड फुल्लर ने कई जगहों पर खुलेआम कहा था कि “उनकी दो पत्नियाँ हैं, एक हिंदू और एक मुस्लिम, जिनमें से मुसलमानों को उन्होंने अपनी ‘चहेती पत्नी’ के रूप में उल्लेखित किया।” इस कथन का अर्थ स्पष्ट है कि बंगाल का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था।
पूर्वी बंगाल के 15 जिलों और असम को मिलाकर एक नया प्रान्त बनाया गया जिसमें राजशाही, चटगांव, ढाका आदि सम्मिलित थे जहां की कुल जनसंख्या 3 करोड़ 10 लाख थी, जिसमें एक करोड़ 80 लाख मुसलमान तथा एक करोड़ बीस लाख हिन्दू थे। ढाका इसकी राजधानी थी।
विभाजित बंगाल के दूसरे भाग में पं. बंगाल, बिहार और उड़ीसा शामिल थे, जिसकी कुल जनसंख्या 5 करोड़ 40 लाख थी जिसमें 4 करोड़ 20 लाख हिन्दू तथा 90 लाख मुसलमान थे। कलकत्ता इसकी राजधानी थी।
बंगाल विभाजन के विरोध में जबरदस्त प्रतिक्रिया
16 अक्टूबर 1905 के दिन पूरे बंगाल में ‘शोक दिवस’ के रूप में मनाया गया। घरों में चूल्हा नहीं जला, लोगों ने उपवास रखा और कलकत्ता में हड़ताल घोषित की गई। जनता ने जुलूस निकाला। सुबह-सवेर जत्थे के जत्थे लोगों ने गंगा स्नान किया और फिर सड़कों पर वंदे मातरम गाते हुए प्रदर्शन करने लगे। बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ की कविता ‘वंदे मातरम’ ही समूचे आन्दोलन की ओर से युद्ध की दुंदुभी था।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के सुझाव विभाजन दिवस को एकता के प्रतीक स्वरूप ‘रक्षाबन्धन’ के रूप में मनाया गया। लोगों ने एक दूसरे को राखी बांधी। आनन्द मोहन बोस और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने दो विशाल जनसभाओं को सम्बोधित किया, एक जनसभा में 50 हजार और दूसरी जनसभा में 70 हजार लोग एकत्र हुए। कुछ ही घंटों के भीतर आन्दोलन के लिए 50 हजार रूपए इकट्ठे किए गए।
बंगाल विभाजन पर गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा कि “यह एक निर्मम भूल है।” जबकि सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा कि “विभाजन हमारे उपर एक वज्र की तरह गिरा है।”
स्वदेशी आन्दोलन का जन्म
बंगाल विभाजन कड़ी प्रतिक्रिया स्वरूप स्वदेशी आन्दोलन जन्मा, जिसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश मालों का बहिष्कार करके साम्राज्यवादी ब्रिटेन को आर्थिक हानि पहुंचाना तथा देशी लोगों के लिए रोजगार सृजन करना था। अत: पूरे बंगाल में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का निर्णय लिया गया। इसके साथ ही मैनचेस्टर कपड़े और लिवरपूल नमक के बहिष्कार का संदेश फैलाया गया।
स्वदेशी आंदोलन के समय जनसमर्थन जुटाने में 'स्वदेश बान्धव समिति' ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साल 1906 में बंगाल नेशनल कॉलेज (बाद में जादवपुर विश्वविद्यालय) तथा राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना की गई।
स्वदेशी आन्दोलन बंगला साहित्य के लिए स्वर्णिम काल साबित हुआ। रवीन्द्रनाथ टैगोर का गीत ‘आमार सोनार बांगला’ साल 1971 में बंगलादेश का राष्ट्रीय गान बना। रवीन्द्रनाथ टैगोर के काव्य संकलन 'गीतांजलि' के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। कलाकार अवनिन्द्रनाथ टैगोर की पेंटिंग ‘भारत माता’ को देवी के रूप में दर्शाया गया है जो स्वदेशी आंदोलन के आदर्शों का प्रतीक बन गई।
स्वदेशी आन्दोलन का विस्तार धीरे-धीरे पूरे देश में होने लगा। इस आन्दोलन का प्रचार अजित सिंह तथा लाला लाजपतराय ने पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में,सैय्यद हैदर रज़ा ने दिल्ली में, लोकमान्य तिलक ने बम्बई तथा पुणे में एवं चिदम्बरम पिल्लै ने मद्रास में किया। यहां तक कि 1905 ई. में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में हुए बनारस कांग्रेस अधिवेशन में स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन को समर्थन दिया गया।
बंगाल विभाजन का प्रभाव
बंग भंग के विरोध में उठे जबरदस्त आन्दोलन के चलते साल 1911 में लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय ने बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया। हांलाकि भाषाई आधार (हिंदी, उड़िया और असमिया) पर बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करके अलग प्रांत बना दिया गया, जबकि असम को भी एक अलग प्रांत बना दिया गया।
साल 1911 में ही ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दी गई। बंगाल विभाजन से हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एक स्थाई विभाजन ने जन्म लिया लिहाजा साल 1919 में मुसलमानों और हिंदुओं के लिए अलग-अलग चुनाव प्रणाली स्थापित की गई।
बंग भंग के दौरान उदारवादियों की विफलता के कारण बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल तथा लाला लाजपत राय जैसे उग्रवादी नेताओं का जन्म हुआ। स्वदेशी आन्दोलन के दौरान बनाई गई रणनीतियां तथा पद्धतियां असहयोग आन्दोलन (1920-22) तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-34) के समय प्रेरणा का स्रोत बनीं।
बंगाल विभाजन का दीर्घकालिक प्रभाव यह देखने को मिला कि राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू और मुस्लिमों के लिए दो स्वतंत्र राज्यों के निर्माण की मांग उठने लगी। ज्यादातर बंगाली हिंदू और मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र के आधार पर बंगाल विभाजन के पक्षधर होने लगे।
बंगाल एक बार फिर से 1947 ई. में धार्मिक आधार पर विभाजित हुआ, जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान बन गया। हालाँकि साल 1971 में भारत-पाक युद्ध के पश्चात पूर्वी पाकिस्तान से बंटकर बांग्लादेश नाम से एक स्वतंत्र देश बन गया।
बंगाल विभाजन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
— साल 1903 में बंगाल विभाजऩ का प्रस्ताव किसने रखा — बंगाल के गवर्नर सर एन्ड्रूय फ्रेजर।
— बंगाल विभाजन की घोषणा कब और किसने की — 20 जुलाई 1905, गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन।
— बंगाल में ‘शोक दिवस’ कब मनाया गया था — 16 अक्टूबर 1905 ई. को।
— 1906 में स्थापित बंगाल नेशनल कॉलेज (बाद में जादवपुर विश्वविद्यालय) के प्रथम प्राचार्य — श्री अरबिन्दो घोष।
— राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education - NCE) की स्थापना कब हुई — 15 अगस्त 1906 को।
— बंगाल विभाजन कब और किसने रद्द कर दिया — साल 1911, लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय।
— साल 1911 में बंगाल विभाजन रद्द करने की असली वजह — जबरदस्त राजनीतिक विरोध, दंगे और हिंसा।
— भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित कब हुई — साल 1911 में।
— बंगाल विभाजन का मुख्य उद्देश्य —राष्ट्रवादी गतिविधियों को समाप्त करना तथा हिन्दुओं तथा मुसलमानों में फूट पैदा करना।
माउण्टबेटन योजना (3 जून 1947) के आधार पर भारत का बंटवारा कर दिया गया। 14 अगस्त को पाकिस्तान तथा 15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत कानूनी तौर पर दो स्वतन्त्र राष्ट्र बने।
