भारत का इतिहास

Interesting history related to the establishment of Muslim League (December 30, 1906)

मुस्लिम लीग की स्थापना (30 दिसम्बर, 1906) से जुड़ा रोचक इतिहास

कांग्रेस से विमुख होकर मुसलमानों ने अपना एक अलग राजनीतिक संगठन बनाने का निश्चय किया जो उनके हितों की रक्षा कर सके। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेज राजनीतिज्ञ एवं इंग्लैण्ड स्थित भारत राज्य सचिव से लेकर जिला प्रशासन तक सभी अंग्रेज अफसर भी भारत में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव एवं राष्ट्रीयता के विकास से चिन्तित थे।

इसे रोकने के लिए उनके पास सबसे बढ़िया उपाय था हिन्दू-मुसलमानों के मध्य विभेद को बढ़ाना तथा कांग्रेस की प्रतिद्वंदी संस्था की स्थापना करवाना जो मुसलमानों की हो। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस कार्य में अलीगढ़ कॉलेज के प्रिसिंपल आर्चबोल्ड तथा वायसराय के प्राइवेट सेक्रेटरी डनलप स्मिथ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुस्लिम लीग की स्थापना

अलीगढ़ कॉलेज के प्रिसिंपल आर्चबोल्ड के सुझाव पर एक अक्टूबर 1906 को आगा खां के नेतृत्व में 35 मुस्लिम नेताओं का एक शिष्ट मंडल तत्कालीन वायसराय लार्ड मिन्टों से शिमला में मिला। इस शिष्ट मंडल को मौलाना मुहम्मद अली ने आज्ञानुसार कार्य की संज्ञा दी। आर्चबोल्ड ने ही शिष्ट मंडल के निवेदन पत्र का मसविदा भी तैयार किया। 

इस शिष्ट ​मंडल ने वायसराय लार्ड मिन्टो को मुसलमानों की राजभक्ति का विश्वास दिलाया और अपने लिए कुछ विशेष सुविधाओं की मांग की जो इस प्रकार हैं - 1.केन्द्रीय, प्रान्तीय, व स्थानीय निकायों में निर्वाचन हेतु मुसलमानों के लिए एक विशिष्ट स्थिति। 2.  सरकारी नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व देना। 3. हाईकोर्ट तथा स्थानीय न्यायालयों में मुसलमान न्यायाधीशों की बहाली। इस मांग के जवाब में लार्ड मिंटों ने मुसलमानों को आश्वस्त करते हुए कहा कि उनके राजनीतिक अधिकारों एवं हितों की भारत में रक्षा की जाएगी। इससे उत्साहित होकर मुसलमानों ने एक केन्द्रीय संगठन के निर्माण की योजना बनाई।

तत्पश्चात ढाका के नवाब सलीमुल्लाह के नेतृत्व में 30 दिसम्बर 1906 को ढाका के अहसान मंज़िल महल में (नवाब का आधिकारिक महल और प्रशासनिक केन्द्र) आयोजित मुहम्मदन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस की एक बैठक में ​3000 प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (AIML) की स्थापना की गई। मुस्लिम लीग के प्र​थम अध्यक्ष वकार-मुल्क-मुस्ताक हुसैन थे जबकि नवाब सलीमुल्लाह मुस्लिम लीग के संस्थापक अध्यक्ष थे। साल 1908 में आगा खां मुस्लिम लीग के स्थायी अध्यक्ष बने। मुस्लिम लीग के अन्य संस्थापक सदस्यों में ख्वाजा सलीमउल्लाह, विकार-उल-मुल्क, सैयद अमीर अली, सैयद नबीउल्लाह, खान बहादुर गुलाम और मुस्तफा चौधरी आदि प्रमुख थे।

मुस्लिम लीग का पहला वार्षिक अधिवेशन 29 दिसम्बर 1907 को कराची में हुआ। सर सुल्तान मोहम्मद शाह उर्फ आगा खान को लीग का पहला मानद अध्यक्ष नियुक्त किया गया। मुस्लिम लीग का मुख्यालय लखनऊ में स्थित था।

मुस्लिम लीग की स्थापना के मुख्य उद्देश्य

1907 ई. के कराची अधिवेशन में मुस्लिम लीग के उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया। ये उद्देश्य निम्नलिखित थे-

1- अंग्रेजी सरकार के प्रति मुसलमानों की निष्ठा को बढ़ाना तथा सरकार के प्रति गलतफहमी को दूर करना।

 2- मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना तथा उनकी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं को विनीत ढंग से सरकार के सम्मुख पेश करना।

3- पहले दोनों उद्देश्यों को नुकसान पहुंचाए बिना मुसलमानों तथा अन्य सम्प्रदायों के मध्य मैत्री भावना का प्रचार करना।

हांलाकि मुस्लिम लीग प्रारम्भ से ही एक साम्प्रदायिक सभा थी जिसका उद्देश्य केवल मुसलमानों के राजनीतिक एवं अन्य हितों की रक्षा करना था। इसका यह स्वरूप 1947 तक बना रहा। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग भारत की पहली मुस्लिम राजनीतिक पार्टी थी।

पृथक निर्वाचन मंडल की मांग

साल 1908 में अमृतसर में आयोजित मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की गई, जिसकी पूर्ति ब्रिटिश सरकार ने मार्ले-मिन्टों रिफॉर्म्स 1909 के तहत किया। मार्ले-मिन्टो रिफॉर्म्स 1909 की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गई। मुसलमानों को दोहरा मतदान का ​अधिकार दिया गया। वे सामान्य निर्वाचन में भी भाग ले सकते थे तथा पृथक रूप से भी मतदान कर सकते थे।

केन्द्रीय एवं प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं में मुसलमानों के लिए सीटें सुरक्षित कर दी गईं। केन्द्रीय विधान मंडल में उन्हें 05 सुरक्षित स्थान दिए गए, जबकि इसी प्रकार की व्यवस्था प्रान्तों में भी की गई। इस अधिनियम ने भारत में साम्प्रदायिकता और भावी विभाजन के बीज बो दिए।

दरअसल मार्ले-मिन्टों रिफॉर्म्स 1909 का असली लक्ष्य भारत में एक विशेष समुदाय के विरूद्ध दूसरे को लड़ाना था। लार्ड मार्ले ने वायसराय मिन्टो को एक पत्र लिखा कि, “हम नागदन्त बो रहे हैं जिसकी फसल बड़ी कड़वी होगी।

भारतीय मुक्ति संग्राम में मुस्लिम लीग

1913 के पश्चात तकरीबन एक दशक तक मुस्लिम लीग उदारवादी मुस्लिम नेताओं के प्रभाव में आ गई जिनमें मौलाना मुहम्मद अली, मौलाना अजहर-उल-हक, सैयद वजीर हुसैन, हजरत इमाम और मुहम्मद अली जिन्ना (उन दिनों राष्ट्रवादी थे) प्रमुख थे। बता दें कि मुहम्मद अली जिन्ना साल 1913 में मुस्लिम लीग में शामिल हुए थे। 1920 से 23 तक मुस्लिम लीग का कार्य ठप्प रहा। किन्तु साइमन कमीशन की नियुक्ति तथा लन्दन में आयोजित तीनों गोलमेज क्रान्फ्रेसों के दौरान मुस्लिम लीग में एक बार फिर से जान आ गई।

साल 1927 में मुस्लिम लीग ने दो अधिवेशन आयोजित किए। मुहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में पहला अधिवेशन कलकत्ता में आयोजित किया गया जहां साइमन कमीशन का विरोध करने का निर्णय लिया गया। दूसरा अधिवेशन लाहौर में मुहम्मद शफी के नेतृत्व में आयोजित हुआ जिन्होंने सरकार का समर्थन किया।

साल 1928 में जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट के संविधान के मसौदे को खारिज करते हुए चौदह सूत्रीय प्रस्ताव रखे जिसमें अलग निर्वाचक मंडल और केन्द्रीय विधानसभा में मुसलमानों के लिए एक तिहाई प्रतिनिधित्व की मांग की। 1932 के साम्प्रदायिक निर्णय (communal Award) ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच की खाईं और भी चौड़ी कर दी।

कांग्रेस मंत्रिमण्डल और मुस्लिम लीग

भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधीन पहली बार 1937 में चुनाव हुए। मुसलमानों के लिए आरक्षित 485 सीटों में से मुस्लिम लीग केवल 110 सीटों पर विजयी हुई। मुस्लिम बहुसंख्यक प्रान्तों पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त, बंगाल और सिन्ध में भी मुस्लिम लीग को अन्य मुस्लिम दलों ने पछाड़ दिया।

कांग्रेस ने बम्बई, मद्रास, यूपी, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रान्त में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया जबकि उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त में सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई। कांग्रेस ने जुलाई, 1937 में सरकार बनाने का निश्चय किया।

मुस्लिम लीग ने बंगाल, असम और पंजाब में कांग्रेस के साथ मिलकर मिली-जुली सरकार बनाने की इच्छा प्रकट की और उन्हें आशा थी कि यूपी और बिहार में भी उनके सदस्य मंत्रिमण्डल में सम्मिलित कर लिए जाएंगे। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि यदि मुस्लिम लीग के सदस्य मंत्री बनना चाहते हैं तो वे कांग्रेस के प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करें। सम्भवत: यह कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल थी।

मुहम्मद अली जिन्ना ने इस सुझाव को मुस्लिम लीग के विरूद्ध सबसे बड़ी चाल बताया। जिन्ना ने कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था बताया जो अल्पसंख्यकों को दबाना चाहती है। अन्तत: मुस्लिम लीग इस परिणाम पर पहुंची कि कांग्रेस से मुसलमानों को न्याय की आशा नहीं करनी चाहिए।

ध्यान देने योग्य है कि 1937 तक मुस्लिम लीग एक अभिजात वर्गीय संगठन बना रहा, तत्पश्चात मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में इसने मुस्लिम जनता को भी संगठित करना शुरू किया, जिससे यह पार्टी शीघ्र ही एक लोकप्रिय संगठन में बदल गई।

साल 1939 में जब ब्रिटिश वायसराय ने भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा की तब कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया। ठीक इसके विपरीत मुस्लिम लीग ने 22 दिसंबर 1939 को कांग्रेस शासन से छुटकारा मिलने की खुशी में मुक्ति दिवस मनाया।

दो राष्ट्र सिद्धान्त और पाकिस्तान की मांग

कवि और राजनीतिक चिन्तक मुहम्मद इकबाल को मुसलमानों के लिए अलग राज्य पाकिस्तान के विचार का प्रवर्तक माना जाता है। मुसलमानों के लिए पृथक देश पाकिस्तान का स्पष्ट विचार सर्वप्रथम कैम्ब्रिज के एक स्नातक रहमत अली के मन में उत्पन्न हुआ। उसने सोचा कि पंजाब, उत्तर पश्चिमी प्रान्त, कश्मीर, सिन्ध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक देश होना चाहिए जिसे उसने पाकिस्तान की संज्ञा दी।

रहमत अली का विचार यह था कि हिन्दू और मुसलमान पृथक राष्ट्र अथवा जातियां है। उसने लिखा कि हमारा धर्म, संस्कृति, इतिहास, परम्पराएं, साहित्य, आर्थिक प्रणाली, कानून, उत्तराधिकार और विवाह हिन्दुओं से मूलत: भिन्न हैं। हम हिन्दू-मुसलमान आपस में बैठकर खाते नहीं और न ही विवाह करते हैं। हमारी राष्ट्रीय रीतियां, पंचांग य​हां तक कि खाना और पहनावा भी भिन्न हैं।

हिन्दू और मुसलमान पृथक-पृथक जातियां है, इसकी अप्रत्यक्ष घोषणा मुहम्मद अली जिन्ना ने मार्च, 1940 के लाहौर अधिवेशन में की, इसे पाकिस्तान प्रस्ताव कहा जाता है। जिन्ना ने कहा कि हिन्दू और मुसलमान भिन्न और स्पष्ट सामाजिक व्यवस्था हैं और यह एक स्वप्न है कि कभी भी हिन्दू और मुसलमान मिलकर एक राष्ट्र बना सकते हैं।...इन दोनों के धार्मिक दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाज और साहित्य भिन्न-भिन्न हैंइन दोनों जातियां को एक राज्य में इकट्ठे बांधने से एक अल्पसंख्यक और दूसरा बहुसंख्यक हो जाएगा जिससे असंतोष बढ़ेगा और राष्ट्र ही नष्ट हो जाएगा।

इसी क्रम में मुस्लिम लीग ने 1940 के दशक में अगस्त प्रस्तावों, क्रिप्स मिशन, शिमला सम्मेलन तथा कैबिनेट मिशन योजना के तहत हुई बैठकों में पाकिस्तान की मांग को बरकरार रखा। इतना ही नहीं, 1942 में मुस्लिम लीग ने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया।

1942 में जिन्ना ने कहा कि पाकिस्तान एक मुस्लिम राज्य होगा और भारत के एक ओर उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, पंजाब और सिन्ध तथा बंगाल होंगे। उसने बलूचिस्तान और असम का उल्लेख नहीं किया था, न ही कश्मीर और हैदराबाद का। तत्पश्चात मुस्लिम लीग ने 1944 के कराची अधिवेशन में बांटो और छोड़ो का नारा दिया।

इसके बाद 12 मई 1946 को मंत्रिमंडलीय शिष्टमंडल से मुस्लिम लीग ने छह प्रान्त पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त, बलूचिस्तान, सिन्ध, बंगाल और असम को एक समूह में सम्मिलित करने की बात कही। पाकिस्तान की मांग को लेकर 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस का ऐलान किया जिससे कलकत्ता में भीषण साम्प्रदायिक हिंसा भड़की जिसमें हजारों लोग मारे गए और हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया। 

निष्कर्षत: मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के लिए एक अभियाना चलाया, आखिरकार यह पार्टी देश को विभाजित करने में सफल रही। भारत विभाजन के बाद 14 अगस्त 1947 को मुस्लिम लीग भंग कर दी गई थी। वर्तमान में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग नामक एक राजनीतिक दल केरल में कार्यर​त है, जिसका कांग्रेस के साथ गठबन्धन है।