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Akbar watched a puppet show in Fatehpur Sikri.

अकबर ने फतेहपुर सीकरी में देखा था कठपुतली नाच

कठपुतली नाच एक पारम्परिक कला है, जिससे हिन्दुस्तान का तकरीबन हर शख्स वा​किफ है। आज की तारीख में कठपुतली नाच तकरीबन विलुप्त होने की कगार पर है, बता दें कि कठपुतली नाच में लकड़ी की गुड़ियों को धागों की मदद से नचाया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि कठपुतली नाच को राजपूताना के मारवाड़ क्षेत्र के भट समुदाय द्वारा विकसित किया गया था। कठपुतली नृत्य ऐतिहासिक कहानियों, और सामयिक सामाजिक मुद्दों (दहेज प्रथा, साक्षरता) एवं लोकगीतों को जीवंत करती है।

फतेहपुर सीकरी दरबार की प्रसिद्ध लोककथाओं में से एक नवरत्नों की कठपुतली के अनुसार बीरबल ने बादशाह अकबर के लिए कठपुतली नाच का आयोजन किया था, जिसका अकबर ने जमकर आनन्द लिया था। अब आपका सोचना लाजिमी है कि अकबर के हरम में एक से बढ़कर एक खूबसूरत नृत्यांगनाएं थी, ऐसे में बीरबल ने उसके लिए कठपुतली नाच का आयोजन क्यों किया था? इस रोचक प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह शिक्षाप्रद स्टोरी जरूर पढ़ें।

अकबर का सबसे भरोसेमंद साथी था बीरबल

अकबर से उम्र में 14 साल बड़ा बीरबल मुगल दरबार के सबसे विश्वासपात्र पदाधिकारियों में से एक था। साल 1528 में काल्पी के पास में जन्में बीरबल को अकबर ने राजाकी उपाधि से नवाजा था। मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल बीरबल अपनी हाजिर जवाबी, व्यंगपूर्ण किस्सों और बुद्धिमता के लिए विख्यात होने के साथ-साथ एक कहानीकार, ब्रजभाषा के कवि, अध्येता, दार्शनिक, कलाकार, संगीतकार, सेनापति, प्रशासक तथा बेहतरीन शख्सियत का भी धनी था।

1582 ई. में अकबर ने जब दीन-ए-इलाहीनामक नया धर्म प्रवर्तित किया तब हिन्दुओं में केवल राजा बीरबल (महेशदास) ने ही इसे स्वीकार किया था। इरा मुखौटी की चर्चित किताब 'अकबर द ग्रेट मुग़ल' के अनुसार, “अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी में बीरबल के लिए भी एक महल बनवाया था। बीरबल का महल जब जनवरी 1583 में बनकर तैयार हुआ तो इसके उद्घाटन समारोह (गृह प्रवेश कार्यक्रम) में अकबर भी शामिल हुए थे।

बादशाह अकबर का सबसे भरोसेमंद साथी राजा बीरबल मुगल दरबार का एकमात्र ऐसा मंत्री था जिसने कई विभागों की जिम्मेदारियां निभाईं। अब आप समझ गए होंगे कि मुगल बादशाह अकबर और राजा बीरबल के मध्य कितनी घनिष्ठता रही होगी। अकबर और बीरबल के किस्से आज भी लोगों के मुंह से सुनने को मिल ही जाते हैं। इन्हीं कथाओं में एक कथा है नवरत्नों की कठपुतली जिसमें बीरबल ने बादशाह अकबर के​ लिए एक कठपुतली नाच का आयोजन किया था।

फतेहपुरी सीकरी की प्रसिद्ध कथा है नवरत्नों की कठपुतली

साल 1572-1573 में गुजरात विजय के पश्चात बादशाह अकबर ने आगरा से तकरीबन 37 किमी. (23 मील) दूर सीकरी गांव में लाल बलुआ पत्थर से एक शानदार शहर बनवाया जिसे हम सभी फतेहपुर सीकरी के नाम से जानते हैं।

अकबर ने फतेहपुर सीकरी को राजधानी बनाने की योजना बनाई किन्तु पानी की किल्लत के चलते उसे यह शहर छोड़ना पड़ा। आज की तारीख में भूतिया शहर’ (Ghost city) फतेहपुर सीकरी मुगल इतिहास के सबसे प्रसिद्ध स्थानों में से एक है, जिससे कई रोचक चीजें जुड़ी हैं, जैसे - फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाजा जो दुनिया का सबसे ऊँचा (लगभग 54 मीटर) और सबसे बड़ा प्रवेश द्वार है। बुलन्द दरवाजा को अकबर ने 1601 ई. में बनवाया था।

इसके अलावा फतेहपुर सीकरी का पंचमहल जो अकबर ने अपनी रानियों के लिए बनवाया था। पंचमहल में जोधाबाई महल और बीरबल का महल वास्तुकला का अद्भुत नमूना हैं। फतेहपुर सीकरी में ही शेख सलीम चिश्ती की दरगाह है जहां हर रोज हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है।

सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से ही नि:सन्तान अकबर को पुत्र रत्न सलीम की प्राप्ति हुई थी जो जहांगीर नाम से मुगल गद्दी पर आसीन हुआ। इसी क्रम में फतेहपुर सीकरी के शाही दरबार से जुड़ी कई प्रसिद्ध लोककथाओं में एक कथा नवरत्नों की कठपुतली भी है जिसमें राजा बीरबल ने बादशाह अकबर के लिए कठपुतली नाच का आयोजन किया था। कहा जाता है कि अकबर ने इस कठपुतली नाच का भरपूर आनन्द लिया था।

बादशाह अकबर ने देखा था कठपुतली नाच

कठपुतली नाच राजस्थान की मूल शैली है। कठपुतली नाच में लकड़ी की गुड़ियों को धागों की मदद से नचाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि कठपुतली नाच को राजपूताना के मारवाड़ क्षेत्र के भट समुदाय द्वारा विकसित किया गया था। कठपुतली नृत्य ऐतिहासिक कहानियों तथा सामाजिक मुद्दों एवं लोकगीतों को जीवंत करती है।

फतेहपुरी सीकरी के मुगल दरबार की प्रसिद्ध कथाओं में से एक नवरत्नों की कठपुतली में ऐसा उल्लेख मिलता है कि बीरबल ने मुगल बादशाह अकबर के लिए राजपूताना (अब राजस्थान) की कठपुतली नाच का आयोजन किया था।

कहते हैं, बादशाह अकबर ने बीरबल द्वारा आयोजित कठपुतली नाच का खूब आनन्द लिया था। कथा के मुताबिक, बीरबल ने एक कैदी को फांसी की सजा से बचाने के लिए तथा बादशाह अकबर के अहंकार को तोड़ने के लिए कुठपुतली नाच का आयोजन करवाया था।

दरअसल राजा बीरबल कठपुतली नाच के माध्यम से अकबर को यह आभास करवाना चाहता था कि जिस तरह से कठपुतली धागों से बंधी होती है, ठीक वैसे ही इंसान भी ऊपर वाले (खुदा) के हाथों की कठपुतली है। ऐसा कहते हैं कि राजा बीरबल द्वारा आयोजित कठपुतली नाच देखकर बादशाह अकबर को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने स्वीकार किया कि वह स्वयं को अपनी प्रजा का भाग्य निर्माता समझता था जबकि वास्तव वह ईश्वर (खुदा) के समक्ष एक कठपुतली मात्र है।

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